कलम है जीवन की नैया,
शब्द बने इसके पतवार,
सोच के सागर पार कराती,
दिखलाती सत्य का संसार।
अज्ञान की काली घटाओं में,
यह दीपक बन जलती है,
झूठ, भ्रम और अंधकार को,
क्षण भर में ही छलती है।
जहाँ मौन बोझिल हो जाए,
वहाँ कलम स्वर पाती है,
दबी हुई हर पीड़ा को,
काग़ज़ पर उतार लाती है।
सत्ता से प्रश्न पूछे जो,
वह निर्भय कलम कहलाए,
अन्याय के हर तूफ़ान में,
न्याय का पथ दिखलाए।
कलम न धन की दासी है,
न डर से समझौता करती,
विचारों की यह स्वतंत्र धरा,
सच का ही स्वागत करती।
जिस हाथों में यह सजग रहे,
वहाँ संस्कार पलते हैं,
ज्ञान, विवेक और करुणा के,
बीज निरंतर फलते हैं।
आओ थामें इस नैया को,
संयम, साहस के साथ,
कलम लिखे ऐसा भविष्य,
जहाँ मानवता हो पहचान।