ईश्वर की असीम अनुकंपा के दस अद्भुत उपहार

हम जीवन की आपाधापी में जब उलझे हुए रहते हैं, तब अक्सर उन चमत्कारों को भूल जाते हैं जो हर क्षण हमारे साथ घटित हो रहे होते हैं। हम बड़ी-बड़ी उपलब्धियों के लिए तो ईश्वर को याद करते हैं, पर उन सहज, निरंतर और नि:शब्द उपहारों पर ध्यान नहीं देते जिनके सहारे हमारा जीवन चल रहा है। जैसे- साँस लेना, देखना, सुनना, चलना और अनुभव करना। ये सब हमें इतने स्वाभाविक लगते हैं कि हम इन पर अपना अधिकार समझ बैठते हैं, जबकि वास्तव में ये सब ईश्वर की अपार कृपा के अद्भुत उदाहरण हैं।

मनुष्य द्वारा बनाई गई प्रत्येक मशीन, प्रत्येक तकनीक और प्रत्येक आविष्कार की अपनी सीमाएँ होती हैं; परंतु मानव शरीर स्वयं ईश्वर की ऐसी विलक्षण रचना है, जो उन सीमाओं से कहीं आगे है। इसमें ऐसे रहस्य और क्षमताएँ समाहित हैं, जिन्हें आज भी विज्ञान पूरी तरह समझ नहीं पाया है। यदि हम थोड़ी देर ठहरकर अपने ही शरीर और जीवन की संरचना पर विचार करें, तो कृतज्ञता का भाव अपने आप हृदय से उमड़ पड़ेगा।

इसी भावभूमि पर “भगवान का धन्यवाद करने के दस विशेष कारण” हमें यह स्मरण कराते हैं कि जीवन शिकायतों के लिए नहीं, बल्कि कृतज्ञता के लिए मिला है। हर सुबह आँख खुलना, हर धड़कन का चलना और हर अनुभूति का जाग्रत रहना यह सब ईश्वर की अनुकंपा का जीवंत प्रमाण है। जैसे-

  • कोई भी टायर चलते-चलते घिस जाते हैं, किंतु हमारे पैरों के तलवे जीवन भर चलने-दौड़ने के बाद भी लगभग वैसे ही बने रहते हैं।
  • मानव शरीर लगभग 75% पानी से बना है, फिर भी लाखों रोम छिद्र होने के बावजूद शरीर से पानी बाहर नहीं रिसता।
  • कोई भी वस्तु सहारे के बिना खड़ी नहीं रह सकती, किंतु मानव शरीर स्वयं अपना संतुलन बनाए रखता है।
  • कोई भी बैटरी बिना रिचार्ज किए लंबे समय तक कार्य नहीं कर सकती, किंतु हमारा हृदय जन्म से मृत्यु तक बिना रुके धड़कता रहता है।
  • कोई भी पंप निरंतर नहीं चल सकता, फिर भी हमारे शरीर में रक्त का प्रवाह जीवन भर लगातार बना रहता है।
  • संसार के सबसे महंगे कैमरों की भी सीमाएँ होती हैं, किंतु हमारी आँखें अद्भुत स्पष्टता के साथ हर दृश्य को देख और स्मरण कर सकती हैं।
  • कोई भी प्रयोगशाला हर स्वाद का परीक्षण नहीं कर सकती, किंतु हमारी जीभ बिना किसी उपकरण के असंख्य स्वाद पहचान लेती है।
  • सबसे उन्नत सेंसर भी सीमित होते हैं, पर हमारी त्वचा हल्के से हल्का स्पर्श और सूक्ष्म अनुभूति तक महसूस कर लेती है।
  • कोई भी मशीन हर प्रकार की ध्वनि उत्पन्न नहीं कर सकती, किंतु मानव वाणी हजारों प्रकार की ध्वनियाँ और भाव प्रकट कर सकती है।
  • कोई भी उपकरण सभी ध्वनियों को पूरी तरह समझ नहीं सकता, किंतु हमारे कान ध्वनियों को सुनने के साथ उनका अर्थ भी ग्रहण कर लेते हैं।

इन अनमोल उपहारों के लिए, जो ईश्वर ने हमें प्रदान किए हैं, हमें सदैव आभारी रहना चाहिए। वास्तव में हमें ईश्वर से शिकायत करने का कोई अधिकार नहीं है। जब हम इन तथ्यों पर मनन करते हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि हमारा जीवन स्वयं में ईश्वर का एक महान वरदान है। जिस शरीर को हम साधारण समझकर अनदेखा कर देते हैं, वही हर क्षण बिना थके, बिना रुके हमारे लिए कार्य करता रहता है। यह न तो किसी प्रशंसा की अपेक्षा करता है और न ही किसी शिकायत का उत्तर देता है; वह तो बस ईश्वर की आज्ञा से निरंतर चलता रहता है।

अतः हमें अपने जीवन, अपने शरीर और अपनी प्रत्येक साँस के लिए सर्वशक्तिमान ईश्वर का हृदय से धन्यवाद करना चाहिए। यदि हम शिकायतों और असंतोष से भरे मन के स्थान पर कृतज्ञता को अपना लें, तो जीवन स्वयं एक उत्सव बन जाता है।

हे प्रभु! इन अनमोल उपहारों के लिए, इस अद्भुत देह और चेतना के लिए, तथा प्रत्येक नए दिन को देखने का अवसर प्रदान करने के लिए हम आपको कोटि-कोटि धन्यवाद अर्पित करते हैं। हमें ऐसा विवेक दीजिए कि हम आपके इन वरदानों का सम्मान करें, उनका सदुपयोग करें और सदा कृतज्ञ भाव से जीवन जी सकें।

हे ईश्वर! आपको धन्यवाद् अर्पित करती हूँ

Leave a comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.