नीरव नभ की श्यामल छाया में
किसने यह करुणा-दीप जलाया?
किस वीणा के मूक स्वरों ने
अश्रु-संगीत जगत में गाया?
वह तुम ही थीं-
वेदना की वेणु पर जीवन का राग सुनाती,
निशा की नीरव गोद में बैठ
पीड़ा की ज्योति जगाती।
तुम्हारी पंक्तियों में
दुख की मंदाकिनी बहती है,
हर अक्षर में मानो
आत्मा की अनुगूँज रहती है।
नील गगन की उदास चाँदनी-सी
तुम्हारी करुणा झरती है,
मानवता के सूने पथ पर
दीपशिखा बनकर जलती है।
वह मौन व्यथा जो अधरों पर
आकर भी स्वर न पाती थी,
तुम्हारी वीणा की कंपन से
गीत बन जग में गाती थी।
हे काव्य-तपस्विनी!
तुम छाया में छिपा आलोक हो,
हिंदी की करुणा की सरिता में
अमर ज्योति का स्रोत हो।
है संवेदना जब तक आँसू में,
जब तक मन में लहर पीड़ा की,
तब तक गूँजेगा जग में
यह करुणामय तुम्हारा अमर स्वर।