अज्ञेय की कविता ‘साँप’

अज्ञेय की कविता ‘साँप’ : विवेचना

‘साँप’ कविता में कवि साँप को प्रतीक बनाकर नगरीय सभ्यता में रहने वाले मनुष्य के दोगले और कुटिल चरित्र पर तीखा व्यंग्य करते हैं। कवि कहता है कि साँप नगर में तो बस गया है, पर वह सभ्य नहीं बन पाया। इसके माध्यम से कवि यह संकेत देता है कि आधुनिक मनुष्य भी बाहरी सभ्यता अपनाकर भीतर से क्रूर और विषैला बना हुआ है।

कवि का प्रश्न है —

“तब कैसे सीखा डँसना—विष कहाँ पाया?”

दरअसल मनुष्य की उस प्रवृत्ति पर कटाक्ष है, जहाँ वह विचारधारा, राजनीति और स्वार्थ के नाम पर दूसरों को डसना सीख गया है। यह कविता ‘इंद्र-धनुष रौंदे हुए थे’ (1954) काव्य-संग्रह में संकलित है और दिल्ली में 15 जून 1954 को रची गई थी।

साँप !
तुम सभ्य तो हुए नहीं
नगर में बसना
भी तुम्हें नहीं आया।
एक बात पूछूँ – (उत्तर दोगे?)
तब कैसे सीखा डँसना–
विष कहाँ पाया?

दिल्ली, 15 जून, 1954

1. यह एक व्यंग्य कविता है।

2. यह मुक्तक छंद में रची गयी है।

3. इसकी भाषा-शुद्ध खड़ी हिंदी बोली।

4. इस कविता में नगरीय कृतघ्न जनों की तुलना साँप से की गई है, इसलिए उपमा व उत्प्रेक्षा की छठा इसमें विद्यमान है।

5. शैली-प्रभावशाली है।
काव्यगत विशेषताएँ

  1. काव्य-प्रकार
    यह कविता व्यंग्य प्रधान है, जिसमें सामाजिक यथार्थ का तीखा चित्रण है।
  2. छंद-विधान
    कविता मुक्तक छंद में रची गई है, जो अज्ञेय की प्रयोगशील काव्य-दृष्टि को दर्शाती है।
  3. भाषा
    इसकी भाषा शुद्ध, सरल और प्रभावशाली खड़ी बोली हिंदी है।
  4. अलंकार
    नगरीय कृतघ्न और विषैले मनुष्यों की तुलना साँप से की गई है, इसलिए इसमें उपमा, प्रतीकात्मकता, तथा कहीं-कहीं उत्प्रेक्षा का सौंदर्य मिलता है।
  5. शैली
    कविता की शैली संकेतात्मक, व्यंग्यात्मक और प्रभावशाली है, जो कम शब्दों में गहरी बात कह जाती है।

निष्कर्ष:

‘साँप’ कविता आधुनिक सभ्यता के नैतिक पतन पर तीखा प्रहार है। कवि यह स्पष्ट करता है कि केवल नगर में बस जाना या आधुनिक कहलाना सभ्यता का प्रमाण नहीं, जब तक मनुष्य की सोच विषैली बनी रहे।

जय हिन्द

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