स्वामी विवेकानंद : उत्तम सीख का महत्व

एक बार की बात है। स्वामी विवेकानंद खेतरी (राजस्थान) गए हुए थे। वहाँ के राजा ने उनके सम्मान में एक भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया। कार्यक्रम में मैनाबाई नामक एक प्रसिद्ध नृत्यांगना ने नृत्य प्रस्तुत किया।

जब नृत्य आरंभ हुआ, तो स्वामी विवेकानंद उस वातावरण को अपने संन्यासी आदर्शों के अनुकूल नहीं समझ पाए और वे चुपचाप वहाँ से उठकर जाने लगे। यह देखकर नृत्यांगना मैनाबाई ने तत्काल स्थिति को समझ लिया। उसने नृत्य रोककर भक्त सूरदास का एक भावपूर्ण भजन गाना प्रारंभ कर दिया।

भजन के शब्दों में ऐसी भक्ति, पवित्रता और आत्मिक गहराई थी कि स्वामी विवेकानंद वहीं रुक गए। भजन समाप्त होने पर उन्होंने मैनाबाई को स्नेहपूर्वक “माँ” कहकर संबोधित किया। यह उनके भीतर की उस दृष्टि को दर्शाता है, जिसमें वे स्त्री को केवल मनोरंजन की वस्तु नहीं, बल्कि मातृत्व और शक्ति का प्रतीक मानते थे।

यह प्रसंग हमें एक उत्तम सीख देता है कि कला तभी श्रेष्ठ होती है, जब उसमें शुद्ध भाव, भक्ति और नैतिकता हो। स्वामी विवेकानंद का जीवन हमें सिखाता है कि बाहरी आकर्षण से अधिक आंतरिक पवित्रता और उद्देश्य का महत्व होता है।
यही उनकी शिक्षाओं की सच्ची सार्थकता और आज के समाज के लिए अमूल्य संदेश है।

जय हिन्द

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