
भारत को अंग्रेजों के शासन से स्वतंत्र कराने के लिए अनेक क्रांतिकारियों ने अपना बलिदान दिया है। उन्हीं क्रांतिकारियों में से एक क्रांतिकारी थे नेताजी सुभाषचंद्र बोस। बालक सुभाष बचपन से ही राष्ट्राभिमानी थे। उन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने के लिए देश के युवकों को आवाहन कर नारा दिया था कि, ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।’ उन्होंने इस संघर्ष के लिए ‘आजाद हिन्द फ़ौज’ की स्थापना की थी।
एक बार की बात है, शरद ऋतु के समय मूसलाधार वर्षा हो रही थी। आधी रात में माँ प्रभावती देवी की नींद खुली, तो उनको सुभाष अपने बिस्तर पर दिखाई नहीं दिए, तब उन्हें सुभाष की चिंता होने लगी। उन्होंने सुभाषचंद्र के कक्ष में जाकर देखा, कि किशोर सुभाष पलंग छोड़ भूमि पर दरी बिछा कर सो रहे थे। यह देखकर उन्हें बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने सुभाष को जगाया और पूछा बेटा, तुम भूमि पर क्यों सो रहे हो? इस प्रकार भूमि पर सोने से तुमको सर्दी लगेगी और तुम बीमार पड़ जाओगे।
सुभाष बोले माँ, मैं कष्ट सहने का अभ्यास कर रहा हूँ। मुझे बड़ा होकर बड़ा कार्य करना है । तब माँ ने कहा कि ‘बेटा! क्या बड़ा काम करने के लिए भूमि पर सोना और कष्ट सहना आवश्यक है?’
सुभाष ने उत्तर दिया, हाँ माँ, सुख-सुविधा में जीनेवाले बड़े काम नहीं कर पाते। हमारे ऋषि-मुनि वनों में आश्रम बनाकर रहते थे तथा भूमिपर सोते थे। इसलिए वे महान ग्रंथों की रचना कर पाए। आपने ही मुझे राम एवं कृष्ण के संबंध में बताया है कि, वे विश्वामित्र एवं संदीपनी ऋषियों के आश्रमों में किस प्रकार अपना देवत्व भुलाकर कठोर जीवन-यापन किया करते थे।
सुभाष बाबू के जीवन पर विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री बेनीप्रसाद माधव का बड़ा प्रभाव पड़ा था। श्री. बेनीप्रसाद माधव अत्यंत उदार तथा एक सच्चे देशभक्त थे। जब सुभाष बाबू श्री. बेनीप्रसाद माधव के संपर्क में आए तब उनकी आयु केवल 11 वर्ष थी। स्वयं बेनीप्रसाद माधव भी बालक सुभाष की कुशाग्र बुद्धि तथा परिश्रमी वृत्ति से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने सुभाष से कहा– ‘तुम जब भी कुछ मुझसे पूछना चाहो, मेरे पास किसी भी समय निःसंकोच आ सकते हो।’ सुभाष तो यही चाहते थे; क्योंकि उनके मन में समाज की दुर्व्यवस्था अर्थात समाज की दयनीय स्थिति के विषय में अनेक प्रश्न थे। वह साथियों से प्रश्न करते थे, परंतु उनका उचित समाधान नहीं मिलता था। एक दिन सुभाष जी ने अपने प्रधानाचार्य से प्रश्न किया, हम अंग्रेजों के दास क्यों हैं? क्या हम सदैव ही इन अंग्रेजों के दास बने रहेंगे। क्या हम कभी स्वतंत्र नहीं थे? बाबूजी बोले ‘बेटा, भारत पहले से ऐसा देश नहीं था। हम तो संसार में सबसे पराक्रमी और महान थे। हमारे देश में इतना धन था कि दूसरे देशों के लोग इसे सोने की चिड़ियाँ कहते थे। रोम, चीन, जापान आदि देशों के लोग यहाँ ज्ञान प्राप्त करने के लिए आया करते थे। हमारा भारत देश प्राचीन काल में विश्वगुरु कहलाता था। सुभाष ने पूछा कि फिर हमारा देश पराधीन क्यों हुआ? तब बाबूजी ने उत्तर दिया हमारा देश आपसी फूट के कारण पराधीन हुआ है। दुष्ट विदेशियों ने हमारी सरलता और फूट का लाभ उठाया और हमें पराधीन बना लिया। तब सुभाष बोले, ‘मैं इस दासता की बेड़ियों को काटकर फेंक देना चाहता हूँ।’ बाबूजी बालक सुभाष का यह विचार सुनकर चकित हो गए तथा बोले तुम्हारा यह विचार बहुत श्रेष्ठ है; परंतु अभी तुम छोटे हो। पहले तुम पढ़-लिखकर बड़े और योग्य बन जाओ तत्पश्चात यह प्रयास अवश्य करना।
सुभाष बोले बाबूजी, मैं भारत माता को पराधीनता से मुक्त कराने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा सकता हूँ। तब से सुभाष ने अनेक रातें देश को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराने के लिए उपाय सोचने में व्यतीत कर दिये। उन्होंने इतिहास तथा संस्कृत का अध्ययन किया। अनेक संस्कृत सुभाषित भाष्य कंठस्थ किए। आगे चलकर, बाबूजी और उनके गुरुओं की प्रेरणा ने उन्हें बालक सुभाष से भारत का गौरवशाली पुरुष – ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस’ बना दिया। ‘नेताजी सुभाषचंद्र बोस इंग्लैंड में ‘आय.सी.एस.’ की परीक्षा देकर भारत लौट आए। उसके बाद उन्हें एक लिखित परीक्षा देनी पड़ी। परीक्षा की प्रश्न पत्रिका देखते ही सुभाष बाबू एकदम गुस्सा हो गए। उस प्रश्न पत्रिका में भाषांतर के लिए एक परिच्छेद दिया हुआ था। उस परिच्छेद में एक वाक्य था, ‘Indian Soldiers are generally dishonest’ अर्थात ‘भारतीय सैनिक सामान्यतः बेईमान होते हैं।’
सुभाषबाबू ने इस प्रश्न का विरोध किया। उन्होंने परीक्षक को यह प्रश्न निरस्त करने की विनती की। इसपर परीक्षक बोला कि, ‘‘इस प्रश्न का उत्तर लिखना अनिवार्य है, जो परीक्षार्थी इस प्रश्न का उत्तर नहीं देगा, उसे उच्च पद की नौकरी नहीं मिलेगी।’’ संचालक का यह उत्तर सुनकर सुभाष बाबू अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने वह प्रश्न पत्रिका ही फाड़ कर फेंक दी। वे परीक्षक से बोले कि, ‘‘आग लगे आपकी ऐसी नौकरी को! मेरे देश बंधुओं पर लगे इस झूठे आरोप को सहन करने की अपेक्षा मुझे भूखा मरना भी स्वीकार है। ऐसी लाचारी स्वीकारने की अपेक्षा मृत्यु अधिक श्रेष्ठ है!’’ ऐसा कहकर सुभाष बाबू उस परीक्षा केन्द्र से सीधे बाहर निकल गए।
इससे यह शिक्षा मिलता है कि व्यक्तिगत स्वार्थ से अपना देश अधिक महत्त्वपूर्ण है। ‘जो अपनी मातृभूमि से प्रेम नहीं कर सकता, वह किसी से प्रेम नहीं कर सकता।’
जय हिन्द