अज्ञेय की कविता ‘साँप’

अज्ञेय की कविता ‘साँप’ : विवेचना ‘साँप’ कविता में कवि साँप को प्रतीक बनाकर नगरीय सभ्यता में रहने वाले मनुष्य के दोगले और कुटिल चरित्र पर तीखा व्यंग्य करते हैं। कवि कहता है कि साँप नगर में तो बस गया है, पर वह सभ्य नहीं बन पाया। इसके माध्यम से कवि यह संकेत देता है… Continue reading अज्ञेय की कविता ‘साँप’

पोखरा ठकुराइन का (कविता)

एक दिन पोती ने दादी से पूछा-“दादी, ये बताओ न,सब कुछ ठकुराइन का ही क्यों है?” दादी मुस्कुराईं,झुर्रियों में छिपी कहानियों का पन्ना खोला-“क्यों बेटी, क्या पूछा तूने?” पोती बोली- पोखरा ठकुराइन का,कुआँ ठकुराइन का,तो फिर पानी किसका दादी?जिससे सबकी प्यास बुझे,उसपर भी उनका ही अधिकार है क्या? फुलवारी ठकुराइन की,आम-इमली ठकुराइन की,तो फिर फूलों… Continue reading पोखरा ठकुराइन का (कविता)

पुकार गौरैया की (कविता)

प्रकृति की गोद में रहती,नन्ही-सी प्यारी गौरइया।सबेरे गीत सुनाती सबको,जगाती अपने नौनिहालों को। था पेड़ों पर उसका घरौंदा,फूलों से महका था आँगन।मानव ने जब कटवाए पेड़,लूट गया उसका मधुर जीवन। रोकर फिर, बोली गौरइया —“अब घर मैं कहाँ बनाऊँगी?कहाँ मिलेगा ठिकाना मुझको,अपने बच्चे कैसे पालूँगी?” बच्चों ने दी उसको हिम्मत —“मत रो, हम लाएँगे हरियाली।हम… Continue reading पुकार गौरैया की (कविता)

‘नदी के द्वीप’-‘अज्ञेय’ (कविता) महत्वपूर्ण तथ्य

*यह कविता अज्ञेय द्वारा 11 दिसंबर, 1949 ई. को इलाहबाद में लिखी गयी। *यह 1965 ई. में आये उनके काव्य संग्रह ‘हरी घास पर क्षण भर’ में संकलित है। यह ‘प्रतीकात्मक’ कविता है। *‘नदी’ परंपरा और संस्कृति का प्रतीक है और ‘द्वीप’ व्यक्तित्व का प्रतीक है। *विशिष्ट व्यक्तित्व होना दुर्भाग्य नहीं सौभाग्य की बात है।… Continue reading ‘नदी के द्वीप’-‘अज्ञेय’ (कविता) महत्वपूर्ण तथ्य

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (संघ प्रार्थना)

“नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्।” अर्थ- हे! सदा सुख-स्नेह और प्यार करने वाली मातृभूमि, मैं तुझे सदैव नमस्कार करता हूँ। तूने हमें सुख से लालन-पालन किया है। “महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थेपतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते॥” अर्थ- हे पुण्यभूमि! हे मंगलमयी मातृभूमि! तेरी सुरक्षा और सेवाकार्य में मेरा यह शरीर समर्पित हो। मैं तुझे बारंबार… Continue reading राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (संघ प्रार्थना)

वर्णों की बूंदें (कविता)

अक्षर हैं वर्णों की बूँदें, मन की खुशबू सी महके। सार्थक स्वर, मधुर व्यंजन, मिलकर रच दें भावों का संगम। कभी बने ये गीत सुहाने, कभी सजाएँ सपनों के ठिकाने। शब्दों के साथ खिले अक्षर, भावनाओं के दीप मिलें। ‘अ’ से आती अरुण किरण, ‘क’ से खिलता नद में कमल। ‘म’ से बनता मधुर मिठास,… Continue reading वर्णों की बूंदें (कविता)

मुकुटधर पांडेय (कविता)

छत्तीसगढ़ की पावन धरा पर,जन्मे कवि महान।छायावाद के जनक बने वे,दिलाया हिंदी को सम्मान॥   ‘प्रेमपथिक’ लिखकर उन्होंने,कविता को दी राह नई।प्रसाद, पंत, निराला और महादेवी को,दिखलाया उन्होंने चाह सही॥ प्रकृति-प्रेम और संवेदनाएँ,थी जिनकी पहचान।हृदय की गहराइयों से,गाया प्रकृति का गान॥ प्रेम की पगडंडी पर,चला कवि का कोमल मन।छाया में है ढूँढ़ता,सुख, शान्ति और अमन॥… Continue reading मुकुटधर पांडेय (कविता)

चिंतन

अब बस भी कर ऐ जिंदगी, थोड़ी सुस्ता लेने दे।      अगला दर्द भी सह लेंगे, पिछला तो भुला लेने दे॥ 2. हर कदम हमने, जीने के लिए समझौता किया।      शौक तो ख़ुशी से जीने का था, लेकिन घुट-घुट जिया॥ 3. हम दिल के बुरे नहीं है, हमारी भी कुछ कहानी है।      बदली… Continue reading चिंतन

तन्हाई (कविता)

लगता है अब रातें भी मुझसे रूठने लगी हैं, हर यादें मेरे सीने में ज्वाला सी धधकने लगी हैं। अब तो चाँद भी मेरे छत से कहीं दूर चला जाता है, मेरी दर्द को देख कर, वह भी मुझ से कतराता है। मेरे भींगे हुए नैनों से डर कर, नींदें भी चली गई हैं, बीती… Continue reading तन्हाई (कविता)

मानव हूँ मैं (कविता)

मानव हूँ मैं, इसलिए डरता हूँ, सपनों में भी सत्य से लड़ता हूँ। भीड़ में रहकर भी, अकेला रहता हूँ, अपने ही साये से, अक्सर मैं डरता हूँ। आँधियाँ मिटाना चाहती है मुझे, दीपक की तरह सदा कपकपाता हूँ। झूठ के बाजार में सत्य टिकता कहाँ, फिर भी सच कहने में काँपने लग जाता हूँ।… Continue reading मानव हूँ मैं (कविता)