गज़ल – 2

छिपा के नयनों में आँसू मुस्कुराना पड़ा

दिल के दर्द को हँसी में सजाना पड़ा।

जो अपना था, वही हमसे दूर हो गया

भुलाने के लिए उसे, दिल को समझाना पड़ा।

हमसे पूछता रहा, वो वफ़ा के मायने

जबाब में मुझे, खुद को मिटाना पड़ा।

अँधेरे में चले थे, साथ हम उजाला के लिए

मुझे अकेले ही अँधेरे में जाना पड़ा।

दुखों की भीड़ में, हम इतने खो गए

सुखों का नाम, भूल से मुझे लाना पड़ा।

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