छायावाद की प्रतिनिधि कवयित्री महादेवी वर्मा

जीवन परिचय- महादेवी वर्मा

जन्म- 24 मार्च 1907 ई. को (होली के दिन) फर्रुखाबाद, उ.प्र.

निधन- 11 सितंबर, 1987 ई. इलाहाबाद

पिता- श्री गोविंद प्रसाद वर्मा और माता- हेमरानी देवी थी।

पति- रुनारायण वर्मा थे।

* 11 वर्ष की अवस्था में महादेवी वर्मा जी का विवाह रुनारायण वर्मा के साथ हुआ था।

* महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य में छ्यावाद युग के जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और सुमित्रानंदन पंत के साथ महत्वपूर्ण स्तंभ मानी जाती हैं।

* महादेवी वर्मा के नाना ब्रजभाषा के कवि थे

महादेवी वर्मा जी के उपनाम:

1. ‘आधुनिक युग की मीरा’ के नाम से पुकारा जाता है।

2. कवि निराला ने- ‘हिंदी के विशाल मंदिर की ‘वीणापाणि’ कहा है।

3. छायावाद की शक्ति/दुर्गा, वेदना की कवयित्री, रहस्यवादी कवयित्री के नाम से भी इन्हें जाना जाता है।

* इनकी पहली कविता ‘दीया’ (1918 ई.) यह ब्रजभाषा में है।

* 7 वर्ष की अवस्था में इन्होंने ब्रजभाषा में एक सवैया भी लिखा था।

* महादेवी वर्मा आरंभ में ब्रजभाषा में लिखती थी। महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से वे खड़ीबोली में लिखने लगी थी।

महादेवी वर्मा की महत्वपूर्ण काव्य रचनाएँ:

1. निहार (1930 ई.)

* यह प्रथम काव्य संकलन है।

* इसमें 1924 से 1928 ई. तक के 47 कविताएँ संकलित हैं।  जिसमें- विसर्जन, मिलन, उसपार, स्वप्न, आँसू, प्रतीक्षा, जो तुम आ जाते एक बार आदि प्रमुख हैं।

* इसमें अधिकतर कविताएँ प्रेम और आध्यात्मिक विषयों से संबंधित है।

* इस काव्य संकलन की भूमिका ‘हरिऔंध’ ने लिखी थी।

2. रश्मि (1932 ई.)

* इसमें 1928 से 1931 ई. तक की 35 कविताएँ संकलित हैं।  जिसमें- रश्मि, दुःख, अतृप्ति, जीवन, द्वीप आदि प्रमुख कविताएँ हैं।

* इसका मुख्य स्वर दुःखवाद से जुड़ा हुआ है और इन पर बौद्ध दर्शन का प्रभाव है।

3. नीरजा (1935 ई.)

* इसमें 1932 से 1934 तक की 58 गीतों का संकलन है।

* इसमें वेदना पूर्ण गीतों का संकलन हैं।

* इनमें शीर्षक नहीं दिए गए हैं।

* इनकी इन कविताओं में भावुकता की अपेक्षा अनुभूति पक्ष अधिक सबल है।

* इसी रचना के कारण इन्हें ‘वेदना की कवयित्री’ कहा जाता है। इस रचना के लिए 1936 ई. में इन्हें सेकसरिया पुरस्कार 500 रूपया मिला था।

4. सांध्यगीत (1936 ई.)

* इसमें 1934 से 1936 तक के 45 गीतों का संकलन है।

* इसमें महादेवीजी के दार्शनिक विचार अधिक प्रौढ़ रूप में उभर कर आये हैं।

* इनमें जीवनानुभूतियों की अच्छी अभिव्यक्ति हुई है।

5. यामा- (1940 ई.)

* यह एक कविता संग्रह है।

* इसमें निहार, रश्मि, नीरजा और सांध्यगीत की प्रमुख कविताओं का संकलन कर 1940 ई. में ‘यामा’ के नाम से प्रकाशन करवाया गया। जिसमें कुल 185 कविताएँ हैं।

* इस रचना के लिए इन्हें 1982 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

महादेवी वर्मा ने ‘यामा’ के ‘अपनी बात’ में लिखा है

“यामा मेरी अंतर्जगत के चार ‘यामों’ का छायाचित्र है। ये याम दिन के है या रात के यह कहना मेरे लिये असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। यदि ये दिन के हैं तो इन्होंने मेरे ह्रदय को श्रम से कलांत बनाकर विश्राम के लिए आकुल नहीं बनाया और यदि दिन के हैं तो इन्होंने अंधकार में मेरे विश्वास को खोने नहीं दिया; अतएव मेरे निकट इनका मूल्य समान है और समान ही रहेगा।”

6. दीपशिखा (1942 ई.)

* यह 1936 ई. से 1942 ई. तक के रचित 51 गीतों का संकलन है।

* इसमें सर्वाधिक रचनाएँ ‘दीपक’ पर हैं, जिसमें दीप को ‘आत्मा’ का प्रतीक मानकर, उस समय तक निष्कंप भाव से विरह में जलने के लिए प्रोत्साहित किया गया है जबतक प्रभात की बेला नहीं दिखाई दे। 

* ‘मैं नीर भरी दुःख के बदली’– यह कविता सांध्यगीत में संकलित है।

महादेवी वर्मा की अन्य महत्वपूर्ण काव्य संकलन:

  महादेवी वर्मा की अन्य काव्य संकलन निम्नलिखित है-

  आधुनिक कवि महादेवी, बंग दर्शन, सप्तपर्णा, हिमालय और संधिनी हैं। 

1. आधुनिक कवि महादेवी (1940 ई.)

* यह 74 कविताओं का संकलन हैं।

* इसमें महादेवी वर्मा के नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत कविताओं का संकलन हैं।

* इसे महादेवी वर्मा जी के चार विद्यार्थियों/ शिष्यों के द्वारा प्रकाशित करवाया गया।

* इसके लिए उन्हें 1944 ई. में ‘मंगला प्रसाद पारिसोषिक, दिया गया था।

2. बंग दर्शन (1943 ई.)

* यह बंगाल के अकाल के समय के विभिन्न कवियों द्वारा रचित कविताओं का संकलन हैं। इसमें कुल 23 कविताएँ हैं।  

  (इसे महादेवी के काव्य संकलन में शामिल नहीं किया जा सकता है। इसमें महादेवी वर्मा की सिर्फ एक कविता है।)

3. सप्तपर्णा (1960 ई.)

* सप्तपर्णा में ऋग्वेद व संस्कृत के गीतों का संकलन है। इसमें 32 गीत हैं। (यह महादेवी वर्मा की मौलिक रचना नहीं है)

4. हिमालय (1963 ई.)

* इसमें चीनी आक्रमण के बाद विभिन्न कवियों द्वारा रचित राष्ट्रीय भावना की 21 कविताओं का संकलन हैं।

* इसमें 2 कविताएँ महादेवी वर्मा की और 19 कविताएँ अन्य कवियों की हैं।

5. संधिनी (1965 ई.)

* यह महादेवी वर्मा की चुनी हुई 65 कविताओं का संकलन है।

नोट- महादेवी वर्मा द्वारा कुल 236 गीत/कविताएँ लिखी गई थी। महादेवी वर्मा जी ने अपने काव्यांगों का जो नामकरण किया है उसमें क्रमबद्धता और भावों कि दृष्टि अत्यंत उपयुक्त है।

महादेवी वर्मा के महत्वपूर्ण गद्य साहित्य निम्नलिखित है-

1. अतीत के चलचित्र (1940 ई.)

* यह संस्मरणात्मक रेखाचित्र है।

* इसमें कुल 11 संस्मरण हैं।

* इस रेखाचित्र में लेखिका हमें जिन 11 रेखाचित्रों से परिचय * करवाती है उसका नाम हैं-

* रामा, भाभी, बिंदा, साबिया, बिट्टो, बालिका माँ, घीसा, अभागी स्त्री, अलोपी, बबलू तथा अलोपा। इसमें 8 रेखाचित्र दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

2. स्मृति की रेखाएँ (1943 ई.)

* इसमें कुल 7 रेखाचित्र शामिल हैं। जैसे-

* भक्तिन, वह चीनी भाई/चीनी फेरीवाला, जंगबहादुर/पर्वत पुत्र, मुन्नू की माँ, ठकुरी बाबा, बिबिया और गूँगिया।

3. पथ के साथी (1956 ई.) 

* ‘पथ के साथी’ महादेवी वर्मा द्वारा लिखा गया यह संस्मरणों का संग्रह है।

* इसमें महादेवी वर्मा ने अपने अग्रज और समकालीन साहित्यकारों को शामिल किया हैं। जैसे-

* प्रणाम (रवींद्रनाथ ठाकुर), मैथिलीशरण गुप्त, सुभद्राकुमारी चौहान, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और सियारामशरण गुप्त।

* इन शीर्षकों के तहत इन लेखकों का “लाइफ स्केच” भी है।  

4. मेरा परिवार (1972 ई.)

* मेरा परिवार एक संस्मरण-संग्रह है।

* इसमें कुल 9 संस्मरण हैं।

* इसमें उन्होंने अपने पालतू पशुओं के संस्मरण लिखें हैं।

* इस संस्मरण में संग्रहित पशु-पक्षीयों के संस्मरण के नाम हैं।   

  जैसे-

 मोर (नीलकंठ), गिल्लू (गिलहरी), सोना (हिरणी), दुर्मुख  (खरगोश), गौरा (गाय), नीलू (कुत्ते), निक्की (नेवला), रोजी

 (कुतिया), रानी (घोड़ी),

5. स्मृति चित्र (1973/74  ई.)

* इसमें समकालीन व्यक्तियों के परिचय से संबंधित 22 संस्मरण हैं।

महादेवी वर्मा- “मेरे संस्मरण में उन स्मरणीयों के स्मरण हैं, जिनके अभाव की मुझे तीव्र अनुभूति होती है, चाहे वे मनुष्य हों चाहे पशु-पक्षी।” (स्मृति चित्र की भूमिका से)  

महादेवी वर्मा के महत्वपूर्ण निबंध संग्रह:

1. श्रृंखला की कड़ियाँ  (1942 ई.)

* यह निबंध संकलन है। इसमें कुल ग्यारह निबंध हैं।

* ये निबंध मूलतः “चाँद” पत्रिका के संपादकीय के रूप में लिखे गए थे।    

* नाम हैं- शृंखला की कड़ियाँ, युद्ध और नारी, नारीत्व का अभिशाप, आधुनिक नारी, घर और बाहर, हिंदू स्त्री का पत्नीत्व, स्त्री के अर्थ-स्वतंत्र्य का प्रश्न, हमारी समस्याएँ, समाज और व्यक्ति, जीने की कला।

* यह महादेवी वर्मा जी की समस्या मूलक निबंधों का संग्रह है।

* “इन पवित्र गृहों की नींव स्त्री की बुद्धि पर रखी गई है, पुरुष की शक्ति पर नहीं।… अपनी सहज बुद्धि के कारण ही स्त्री ने पुरुष के साथ अपना संघर्ष नहीं होने दिया। यदि होने दिया होता तो आज मानव जाति की कहानी ही दूसरी होती।”  (युद्ध और नारी- महादेवी वर्मा)

2. साहित्यकार की आस्था (1962 ई.)

* यह महादेवी वर्मा के आलोचनात्मक निबंध है।

3. संकल्पिता (1968 ई.)

* संकल्पिता महादेवी के चुने हुए निबंधों का संग्रह है।

4. क्षणदा (1956 ई.)

* क्षणदा यह ललित निबंधों का संग्रह है।

* इसमें विचारात्मक और आलोचनात्मक निबंध भी है। क्षणदा  में शामिल निबंधों के नाम हैं-

* करुणा का संदेशवाहक, संस्कृति का प्रश्न, कसौटी पर, स्वर्ग का एक कोना, कला और हमारा चित्रमय साहित्य, कुछ  विचार, दोष किसका, सुई दो रानी, अभिनय कला, हमारा देश और राष्ट्रभाषा, साहित्य और साहित्यकार और हमारे वैज्ञानिक युग की समस्या।

1. प्रथम आयाम (1994 ई.)

यह कविता संग्रह है। इस कविता संग्रह में उनकी बाल्यावस्था से लेकर किशोरावस्था तक की कविताओं का संकलन है। ब्रजभाषा और खड़ीबोली की चुनी हुई कविताओं का यह संकलन है। कविताओं के नाम है-

ठाकुर जी, बाया, दीन भारतवर्ष, देशगीत: मस्तक देकर आज खरीदेंगे हम ज्वाल, ध्वज गीत: विजयी तेरी पताका, इन सपनों के पंख न काटो, देशगीत: अनुरागमयी वरदानमयी, कहाँ गया वह श्यामल बादल, खारे क्यों रहे सिंधु, बारहमासा, फुलिहौ, बोलिहै नाहीं, रचि के सहस्त्र रश्मि, जाल परे अरुझे सुरझै नहिं, क्रांति गीत, खुदी न गई आदि।     

2. अग्निरेखा (1990 ई.)

इसमें 27 कविताएँ हैं। यह महादेवी वर्मा की अंतिम कविता संग्रह है। इसमें उनके अंतिम दिनों में  रची गयीं रचनाएँ संग्रहित  हैं जो पाठकों को अभिभूत भी करती है और आश्चर्यचकित भी। वह इस अर्थ में कि महादेवी के काव्य में ओत-प्रोत वेदना और करुणा का वह स्वर, जो महादेवी की पहचान बन चुका था। वह मुखर होकर इसमें सामने आता है।

महादेवी के अनुसार– ‘अंधकार में सूर्य नहीं दीपक जूझता है।’

विशेष तथ्य:

1932 ई. में प्रयाग महिला/विद्यापीठ प्राचार्य थी।

1944 ई.में साहित्यकार संसद की स्थापना की

1946 ई. में रंगवाणी नाट्य संस्था की स्थापना की

1954 ई. में साहित्य अकादमी संस्थान की सदस्य रही थीं।

संपादित पत्रिकाएँ:

1. चाँद 1932 – 1936 (साप्ताहिक)

2. साहित्यकार – 1937 ई. (मासिक)

3. महिला – (1928 – 1987) लंबे समय तक किया- पाक्षिक

4. विश्ववाणी – 1963 ई. (साप्ताहिक)

  यह युद्ध से संबंधित पत्रिका 1966 (चीनी आक्रमण से संबंधित है)

5. स्त्री दर्पण (1964 ई.) 6 महिना तक के लिए

महत्वपूर्ण पंक्तियाँ:

* “बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ।” (यामा)

* “कनक से दिन मोती सी रात सुनहरी साँझ गुलाबी प्रात।” (रश्मि)

* “मैं नीर भरी दुःख की बदली।” (सांध्यगीत)

* “धूप सा तन दीप-सी मैं मोम सा तन घुल चुका अब दीप-सा मन जल चुका।” (दीपशिखा)

* “जो तुम आ जाते एक बार कितनी करुणा, कितने संदेश

   पथ में बिछ जाते बन पराग गाता प्राणों का तार-तार

   अनुराग भरा उन्माद राग।” (जो तुम आ जाते एक बार)

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की दृष्टि में महादेवी वर्मा:

* श्रीमती महादेवी वर्मा- छायावादी कहे जाने वाले कवियों में महादेवी वर्मा जी ही रहस्यवाद के भीतर रही हैं।

* उस अज्ञात प्रियतम के लिए वेदना ही इनके हृदय का भावकेंद्र है, जिससे अनेक प्रकार की भावनाएँ छूट-छूट कर झलक मारती रहती हैं।

* वेदना से इन्होंने अपना स्वाभाविक प्रेम व्यक्त किया है, उसी के साथ वे रहना चाहती हैं। उसके आगे मिलनसुख को भी वे कुछ नहीं गिनतीं।

* वे कहती हैं- ‘मिलन का मत नाम ले मैं विरह में हूँ।’ इस वेदना को लेकर इन्होंने हृदय की ऐसी अनुभूतियाँ सामने रखी हैं जो लोकोत्तर हैं। कहाँ तक वे वास्तविक अनुभूतियाँ हैं और कहाँ तक अनुभूतियों की रमणीय कल्पना है, यह नहीं कहा जा सकता।

* एक पक्ष में अनंत सुषमा, दूसरे पक्ष में अपार वेदना, विश्व के छोर हैं जिनके बीच उसकी अभिव्यक्ति होती हैं-

यह दोनों दो ओरें थीं

संसृति की चित्र पटी की;

उस बिन मेरा दुःख सूना,

मुझ बिन वह सुषमा फीकी।

पीड़ा का चसका इतना है कि-

तुमको पीड़ा में ढूँढा।

तुमको ढूँढेगी पीड़ा॥

* इनकी रचनाएँ समय-समय पर संग्रहों में निकलती हैं- नीहार, रश्मि, गिरजा और सांध्यगीत। अब इन सबका एक में बड़ा संग्रह ‘यामा’ के नाम से बड़े आकर्षक रूप में निकला है। गीत लिखने में जैसी सफलता महादेवी जी को हुई वैसी और किसी को नहीं। न तो भाषा का ऐसा स्निग्ध और प्रांजलप्रवाह और कहीं मिलता है, न  हृदय की ऐसी भावभंगिमा। जगह-जगह ऐसी ढली हुई और अनूठी व्यंजना से भरी हुई पदावली मिलती है कि ह्रदय खिल उठता है।

* ऊपर छायावाद के कुछ प्रमुख कवियों का उल्लेख हो चुका है। इसके साथ ही इस वर्ग के अन्य उल्लेखनीय कवि हैं-

* छायावाद के अन्य उल्लेखनीय कवि है– ‘सर्वश्री मोहनलाल महतो वियोगी’, भगवती चरण वर्मा, नरेंद्र शर्मा और रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’

* श्री वियोगी की कविताएँ ‘निर्माल्य’, ‘एकतारा’ और कल्पना में संगृहीत हैं।

* श्री भगवती चरण की कविताओं के तीन संग्रह हैं- ‘मधुकण’, ‘प्रेम संगीत’ और ‘मानव’।

* श्रीरामकुमार वर्मा ने पहले ‘वीर हमीर’ और ‘चितौड़ की चिंता’ की रचना की थी जो छायावाद के भीतर नहीं आती है। उनकी इस रचना की कविताएँ ‘अंजलि’, ‘रूपराशि’, ‘चित्रलेखा’, और ‘चंद्रकिरण, नाम के संग्रहों के रूप में प्रकाशित हुई हैं।

* श्री आरसीप्रसाद की रचनाओं का संग्रह ‘कलापी’ में हुआ है।

* श्री नरेंद्र के संगीत उनके ‘कर्णफूल’, ‘शूलफूल’, ‘प्रभातफेरी’ और ‘प्रवासी के गीत’ नामक संग्रहों में संकलित हुए हैं। और

* श्री अंचल की कविताएँ ‘मधुलिका’ और ‘अपराजिता’ में संग्रह की गई हैं।

जय हिंद

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