जीवन परिचय: सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला‘
जन्म – 21 फरवरी 1899 ई. को बंगाल के महिषादल रियासत (जिला-मिदनापुर) में हुआ था।
बसंत पंचमी पर इनका जन्मदिन मनाने की परंपरा 1930 में शुरू हुई। इनके पिता पंडित रामसहाय त्रिपाठी उन्नाव (बैसवाड़ा) के रहने वाले थे और महिषादल में सिपाही की नौकरी करते थे। मूल रूप से वे उन्नाव जिले के गाढ़ाकोला नामक गाँव के निवासी थे।
नोट- निराला जी के जन्म से संबंधित समय अलग-अलग मिलते है। जैसे- विकिपीडिया में 1899, NCERT. में 1898 ई. और एक अन्य जगह 21 फरवरी 1896 ई. भी मिलता है।
निधन – 15 ऑक्टूबर 1961 ई. इलाहबाद (उ.प्र.) में हुआ।
बचपन का नाम – सूर्य कुमार था।
पिता – रामसहाय त्रिपाठी, माता – रुक्मिणी देवी
पत्नी – मनोहरा देवी, पुत्री – सरोज थी।
गुरु – ‘निराला’ स्वामी विवेकानंद को अपना अध्यात्मिक गुरु मानते थे।
‘निराला’ जी हिंदी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।
सूर्यकांत त्रिपाठी के उपनाम:
1. महाप्राण निराला (गंगा प्रसाद पांडेय ने कहा)
2. छायावाद के महेश/रूद्र (डॉ. कृष्णदेव झारी ने कहा)
3. ओज एवं औदात्य का कवि (रामविलास शर्मा ने कहा)
4. शताब्दी का कवि (नंददुलारे वाजपेयी ने कहा)
5. हिंदी का सबसे बड़ा प्रयोगवादी कवि (अज्ञेय ने कहा)
6. नये कवियों के गोरखनाथ
7. बसंत का अग्रदूत भी कहते है।
8. मुक्तक छंद के प्रवर्तक निराला है।
9. निराला को छायावाद, प्रगतिवाद एवं प्रयोगवाद का पथ प्रदर्शक कवि भी कहा जाता है।
* निराला की प्रथम कविता ‘जुही की कली‘ (1916 ई.) है।
* रामविलास शर्मा ने निराला की प्रथम कविता ‘भारत माता
की वंदना‘ (1920 ई.) को माना है।
* निराला की अंतिम कविता- ‘पत्रोतकंठित जीवन का विष बुझा हुआ’ (1961 ई.) है।
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की प्रमुख काव्य संग्रह:
1. अनामिका (1923 ई.), यह प्रथम काव्य संग्रह है।
2. परिमल (1930 ई.)
3. गीतिका (1936 ई.), गीतिका की भूमिका जयशंकर प्रसाद ने लिखी थी।
4. तुलसीदास (1938 ई.)
5. कुकुरमुत्ता (1942 ई.)
6. अणिमा (1943 ई.)
7. बेला (1946 ई.)
8. नये पत्ते (1946 ई.),
9. अर्चना (1950 ई.)
10. आराधना (1953 ई.)
11. गीत गूंज (1954 ई.)
12. सांध्य काकली (1969 ई.) यह निराला जी का अंतिम काव्य संग्रह है। निधन के बाद प्रकाशित हुआ था।
‘अनामिका’ का प्रथम संस्करण- (1923 ई.) में प्रकाशित हुआ था।
‘अनामिका’ का द्वितीय संस्करण- (1938 ई.) में प्रकाशित हुआ।
‘अनामिका’ के द्वितीय संस्करण में संकलित प्रमुख कविताएँ:
सम्राट एडवर्ड के प्रति, प्रेयसी, रेखा, सच है, सरोज स्मृति (1935 ई.), राम की शक्ति पूजा (1936 ई.), वह तोड़ती पत्थर।
1. ‘परिमल‘ (1930 ई.)
परिमल संग्रह में संकलित प्रमुख कविताएँ:
* जुही की कली (1916 ई.)
* तुम और मैं, तरंगों के प्रति, ध्वनि, विधवा, भिक्षुक, संध्या सुंदरी, बादल-राग, जागो फिर एक बार, दीन, मौन, पंचवटी आदि।
नोट- इस संग्रह में छायावाद के साथ-साथ प्रगतिवाद के तत्त्व भी विद्यमान हैं।
‘जूही की कली’ (कविता) का रचनाकाल 1916 ई. है।
* यह कविता निराला की ‘परमिल’ (1930) काव्य संग्रह में संकलित है।
* यह निराला जी की पहली काव्य संग्रह है।
* इसमें जूही नारी और पवन पुरुष का प्रतीक है।
* इस कविता को ‘सरस्वती’ पत्रिका में छापने के लिए महावीर प्रसाद द्विवेदी ने मना कर दिया था।
* यह कविता 22 दिसंबर को ‘मतवाला’ के 18वें अंक में प्रकाशित हुआ था।
जागो फिर एक बार (कविता)
* यह कविता ‘परमिल’ (1930) काव्य संग्रह में संकलित है।
* ‘परमिल’ की भूमिका में ‘मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होती है।’
इस बात को निराला जी ने उठाया है।
2. ‘तुलसीदास‘ (प्रकाशन वर्ष-1938 ई.)
* इस कविता को महाकाव्य का गौरव प्राप्त है।
* रचनाकाल- 1934 ई. है।
* ‘तुलसीदास’ प्रबंधात्मक लंबी कविता है। इसमें कुल छंद 101 है।
* यह कविता ‘सुधा‘ पत्रिका में 5 खण्डों में (1935 ई.) में
प्रकाशित हुआ था।
* पुस्तक के रूप में ‘तुलसीदास’ कविता का प्रकाशन 1938 ई. में हुआ।
* इस रचना को ‘राम की शक्ति पूजा’ का पूर्व संस्करण कहा जाता है।
* तुलसीदास निराला जी की छंदबद्ध रचना है। इसमें प्रकृति के कल्याणकारी स्वरुप का चित्रण हुआ है। इस रचना का आरंभ संध्या के घिरते अन्धकार और अंत प्रभात के आलोक के साथ होता है। यह पार्थिव ऐश्वर्य पर दैवी भाव की विजय है।
3. राम की शक्ति पूजा (1936 ई.)
*यह प्रबंधात्मक लंबी कविता है।
* यह ‘शक्ति छंद’ में रचित है।
* यह बांग्ला भाषा के ‘कृतिवास रामायण’ पर आधारित है।
* इसमें पौरुष एवं कर्म का संदेश है।
* यह कृति संपूर्ण छायावादी काव्य कि उत्कृष्ट उपलब्धि है
* विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इसे छायावादी कवियों पर लगाये गये पलायनवाद का प्रत्युत्तर कहा है।
4. कुकुरमुत्ता (1942 ई.)
* ‘कुकुरमुत्ता’ कविता संग्रह में संकलित अन्य कविताएँ:
खेल, स्फटिक शिला, प्रेम संगीत, गरम पकौड़ी, रानी और कानी, मास्कों डायलॉग्स।
* यह प्रबंधात्मक लंबी कविता है।
* इसका पूर्वार्द्ध भाग 1941 ई. में ‘हंस’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था ।
* इसका पुस्तक रूप में प्रकाशन 1942 ई. में हुआ।
कुकुरमुत्ता: के विषय में विशेष तथ्य:
* यह प्रगतिवादी, प्रतीकात्मक कविता है।
* कविता में कुकुरमुत्ता शोषित वर्ग और गुलाब पूँजीपति वर्ग का प्रतीक है।
* प्रभाकर माचवे ने ‘कुकुरमुत्ता’ को निराला की कविता का प्रस्थान बिंदु कहा है।
* नंदकिशोर नवल ने इसे संपूर्ण हिंदी साहित्य का प्रस्थान बिंदु कहा है।
आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के शब्दों में– “कुकुरमुत्ता हिंदी की प्रथम कविता है, इसमें पूँजीपति वर्ग के प्रति आक्रोश का तीव्र स्वर है।”
डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार- कुकुरमुत्ता प्रगतिशील विचार की कविता है। पंत के विरुद्ध लिखी गई थी, जिसमें कवि ने गुलाब को ‘पंत’ का प्रतीक और ‘स्वयं’ को कुकुरमुत्ता का प्रतीक माना है।
5. ‘अणिमा’ (1943 ई.)
* ‘अणिमा’ – इसमें निराला के भक्ति भावना से युक्त गीत है।
* इसमें पंचवटी प्रसंग अद्वैतवाद का प्रतिपादन हुआ है।
* ‘अणिमा’ कविता संग्रह में संकलित अन्य कविताएँ हैं-
मैं अकेला, स्नेह निर्झर बह गया, गहन है यह अंधकार, बादल छाये पर न आये, दलित जन पर करो करुणा, मैं बैठा पथ पर, संत कवि रविदास जी के प्रति, सुन्दर हे सुन्दर आदि।
6. ‘बेला’ (1946 ई.)
* इस काव्य संग्रह में निराला जी ने गजलों का प्रयोग किया है इसमें देश भक्ति, अध्यात्म, श्रृंगार, प्रकृति आदि विषयक रचनाएँ हैं।
* ‘बेला’ कविता संग्रह में संकलित अन्य कविताएँ हैं-
वीर जवाहर लाल, जल्द-जल्द पैर बढ़ाओं, वेश रूखे आधार सूखे, शुभ्र आनंद आकाश पर छा गया, रूप की धरा के उस पार, आँखें वे देखी हैं जबसे, कैसे गाते हो? मेरे प्राणों में आदि।
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के महत्वपूर्ण उपन्यास:
1. अप्सरा (1931 ई.)
2. अलका (1933 ई.
3. प्रभावती (1936 ई.)
4. निरुपमा (1936 ई.)
5. चमेली (1941 ई.)
6. चोटी की पकड़ (1944 ई.)
7. काले कारनामे (अपूर्ण)
8. इंदुलेखा (अपूर्ण)
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के महत्वपूर्ण कहानी संग्रह:
1. लिली (1933 ई.)
2. सखी (1935 ई.)
3. सुकुल की बीबी (1941 ई.), इसका परिवर्धित रूप 1945
ई. में ‘चतुरी चमार’ के नाम से प्रकाशित हुआ।
4. देवी- (1948 ई.)
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के महत्वपूर्ण निबंध संग्रह:
1. प्रबंध पद्म (1934 ई.)
2. प्रबंध प्रतिमा (1940 ई.)
3. चाबुक (1951 ई.)
4. चयन (1957 ई.)
5. संग्रह (1967 ई.)
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के महत्वपूर्ण आलोचनात्मक रचनाएँ:
1. रविन्द्र कविता कानन (1928 ई.)
2. पंत और पल्लव- इसके दो संस्करण हैं:
इसका प्रथम संस्करण- 1928 ई. में और दूसरा संस्करण- 1949 ई. में प्रकाशित हुआ था।
निराला जी के काव्यात्मक रेखाचित्र:
1. कुल्ली भाट- 1939 ई.
2. बिल्लेसुर बकरिहा- 1941 ई.
निराला रचनावली (आठ खंडों में) – प्रथम संस्करण 1983 ई. में (सं. नंदकिशोर नवल; राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली से प्रकाशित हुआ।)
निराला जी के द्वारा संपादित पत्र:
* सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ 1922 से 1923 तक कोलकाता से प्रकाशित ‘समन्वय’ पत्रिका का संपादन किया।
* निराला जी 1923 के अगस्त से ‘मतवाला’ के संपादक मंडल में कार्य किया।
* निराला जी लखनऊ के गंगा पुस्तक माला कार्यालय में काम करते हुए, संस्था की मासिक पत्रिका ‘सुधा’ से 1935 के मध्य तक संबंद्ध रहे/जुड़े रहे ।
‘निराला’ जी के रचनाओं के महत्वपूर्ण तथ्य:
1. बाँधों न नाव इस ठाँव बंधु- यह कविता ‘अर्चना’ (1950) कविता संग्रह में संकलित है
2. ‘भिक्षुक’- यह कविता 17 नवंबर, 1923 ई. को ‘मतवाला’ में प्रकाशित हुआ था। यह आर्थिक विषमता को उद्घाटित करने वाली रचना है।
3. ‘संध्यासुंदरी’- यहकविता 24 नवंबर, 1923 ई. को मतवाला में प्रकाशित हुआ था।
4. नये पत्ते – इस कविता में दलितों की दयनीय दशा का चित्रण है।
5. सरोज स्मृति- इसे हिंदी संसार का सर्वाधिक प्रसिद्ध ‘शोकगीत’ माना गया है।
6. ‘तुम और मैं’- कविता में निर्गुण विचारधारा का प्रभाव है।
7. तोड़ती पत्थर- यह आर्थिक विषमता को उद्घाटित करनेवाली रचना है।
8. ‘अर्चना’, ‘अराधना’ और ‘गीतगुंज’ में गेय-तत्व की प्रधानता है।
‘निराला’- ‘मतवाला’ के संपादन मंडल में 1923 ई. में शामिल हुए थे। 1923 ई. में जब कलकाता से ‘मतवाला’ का प्रकाशन हुआ, उस समय (रामविलास शर्मा के अनुसार) निराला ने उसके कवर पेज के लिए दो पंक्तियाँ लिखी थी। ‘निराला’ का मतवाला के बारे में क्या उद्देश्य है? इसके के बारे में उन्होंने स्वयं लिखा है-
“अमिय गरल शशि सीकर रविकर, राग विराग भरा प्याला पीते हैं, जो साधक उनका प्यारा है यह मतवाला।”
निराला ने हिंदी के ‘विष’ को पिया और उसे बदले में ‘अमृत’ का वरदान दिया।
1935 ई. से 1938 ई. तक ‘निराला’ जी के रचनाओं का प्रौढ़ काल माना जाता है।
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के महत्वपूर्ण और चर्चित कथन:
*“भावों की मुक्ति छंदों की मुक्ति भी चाहती है, यहाँ भाषा,
भाव और छंद तीनों स्वच्छंद है। ‘कवित्व हिंदी का जातीय छंद है।’
* “कविता स्त्री की सुकुमारता नहीं, कवि का पुरुष-गर्व है।”
*“मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होती है। मनुष्य की मुक्ति कर्म के बंधन से छुटकारा पाना है और कविता की मुक्ति छंदों की शासन से अलग हो जाना है।”
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के संदर्भ में आलोचकों के महत्वपूर्ण कथन:
* आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में– “निराला में बहुवस्तु- स्पर्शनी प्रतिभा है।”
* आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में- “संगीत को काव्य और काव्य को संगीत के अधिक निकट लाने का प्रयास सबसे अधिक निराला जी ने किया है।”
* दूधनाथ सिंह के शब्दों में– “कुकुरमुत्ता काव्य अभिजात्य से मुक्ति का प्रयास है।”
* डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी के शब्दों में– “आधुनिक युग के सर्वाधिक मौलिक क्षमता से संपन्न कवि निराला है।”
* द्वारकाप्रसाद सक्सेना के शब्दों में– “निराला आधुनिक भाषा के डिक्टेटर थे।”
* नंददुलारे वाजपेयी के शब्दों में– “निराला शताब्दी के कवि है।”
* डॉ. नामवर सिंह के शब्दों में– “निराला का काव्य शताब्दी का काव्य है।”
* “रामविलास शर्मा ने – “निराला को ओज एवं औदात्य का कवि कहा हैं।”
* रामविलास शर्मा के शब्दों में- “जीवन द्रष्टा अनेक हुए हैं जीवन से निराश होकर मृत्यु का आमंत्रण करने वालों की भी कमी नहीं। जो मृत्यु का सामना करके मृत्यु का वरण करते हैं, उन विरले साधकों में थे निराला।”
* निराला के शब्दो में- “मुझे प्रोफेसरों के बीच में छायावाद सिद्ध करना पड़ेगा।”
* निराला के शब्दों में- यहाँ एक ऐसा दल है जो उच्च शिक्षित है, शायद सोशलिस्ट भी है……. ये उच्च शिक्षित जन कुछ लिखते भी हैं, इसमें मुझे संशय है। शायद इसलिए लिखने का एक नया आविष्कार इन्होंने किया है”
‘निराला’ जी की कविता की महत्वपूर्ण पंक्तियाँ :
* “एक बार बस और नाच तू श्यामा ! सामान सभी तैयार, कितने ही असुर, चाहिए कितने तुझको हार? कर मेखला मुण्ड-मालाओं से बन अभिरामा।” (आवाहन-कविता)
* “दुःख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज जो कहीं नहीं।” (सरोज स्मृति- कविता)
* “धन्ये, मैं पिता निरर्थक था, कुछ भी तेरे हित कर न सका।” (सरोज स्मृति- कविता)
* “हो गया व्यर्थ जीवन, मैं रण में गया हार ।” (वनबेला- कविता)
* “मुक्त छंद सहज प्रकाशन वह मन का निज भावों का प्रकट अकृत्रिम चित्र।” (निराला)
* “नयनों का नयनों से गोपन-प्रिय सम्भाषण।” (राम की शक्ति पूजा)
* “अन्याय जिधर है, उधर शक्ति कहते छल-छल हो गए नयन, कुछ बूँद पुनः ढलके दृगजल।” (राम की शक्ति पूजा)
* “हे अमा-निशा, उगलता गगन घन-अंधकार, खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार।”
* “पास हीरे-हीरे की खान; खोजता कहाँ और नादान।” (गीतिका)
* “योग्य जन जीता है; पश्चिम की उक्ति नहीं, गीता है- गीता है।” (जागों फिर एक बार- निराला)
* “स्नेह निर्झर बह गया, रेत ज्यों तन ढह गया है।” (निराला)
* “मैं अकेला देखता हूँ आ रही मेरे दिवस सांध्य बेला।” (मैं अकेला- कविता)
* “अबे सुन बे गुलाब, भूल मत जो पाई खुशबू, रंगों आब।” (कुकुरमुत्ता)
* “चाल मेरी मन्द होती आ आ रही हट रहा मेला और मैं अकेला, मैं अकेला।” (मैं अकेला- कविता)
* जीर्ण बाहु है, शीर्ण शरीर, तुझे बुलाता कृषक अधीर, ऐ विप्लव के वीर चूस लिया है उसका सार, हाड़ मात्र ही है आधार, ऐ जीवन के पारावार। (बादल राग)
जय हिंद