मानव हूँ मैं (कविता)

मानव हूँ मैं, इसलिए डरता हूँ,

सपनों में भी सत्य से लड़ता हूँ।

भीड़ में रहकर भी, अकेला रहता हूँ,

अपने ही साये से, अक्सर मैं डरता हूँ।

आँधियाँ मिटाना चाहती है मुझे,

दीपक की तरह सदा कपकपाता हूँ।

झूठ के बाजार में सत्य टिकता कहाँ,

फिर भी सच कहने में काँपने लग जाता हूँ।

अपनों से ही छुपाकर रखता हूँ, दर्द को

मन में दिल से चुपचाप कहता हूँ।

राह में सिर्फ पत्थर ही पत्थर हैं,

कभी फूल मिल जाए तो हैरान हो जाता हूँ।

फूल में छुप कर चुभ गया काँटा,

उसे दर्द को भी हँसकर सहन कर जाता हूँ।

मानव हूँ और कमजोर हूँ मैं,

इसलिए हर क्षण भीतर ही भीतर मरता हूँ।

माया ने लोगों को अंधा बना दिया है,

इंसानियत देखने के लिए आँखें तरसती है।

जुल्म देखकर पीड़ित हो जाता हूँ,

कुछ कहने की हिम्मत नहीं जूटा पाता हूँ।

चलता हूँ हाथों में मशाल लेकर

फिर क्यों अंधेरों से डर जाता हूँ?

क्यों? क्योंकि मानव हूँ?

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