छत्तीसगढ़ की पावन धरा पर,
जन्मे कवि महान।
छायावाद के जनक बने वे,
दिलाया हिंदी को सम्मान॥
‘प्रेमपथिक’ लिखकर उन्होंने,
कविता को दी राह नई।
प्रसाद, पंत, निराला और महादेवी को,
दिखलाया उन्होंने चाह सही॥
प्रकृति-प्रेम और संवेदनाएँ,
थी जिनकी पहचान।
हृदय की गहराइयों से,
गाया प्रकृति का गान॥
प्रेम की पगडंडी पर,
चला कवि का कोमल मन।
छाया में है ढूँढ़ता,
सुख, शान्ति और अमन॥
“प्रेमपथिक” में गूंज उठी थी,
उनकी हृदय की पुकार।
संवेदनाओं में सागर थी,
रहस्यों का पूरा संसार॥
करते प्रकृति से वह संवाद,
संवेदनाओं का हुआ मेल।
छायावाद बना अंकुर,
काव्य बना नव श्रृंगार॥
कृति उनकी अमर हुई,
देती जग को मान।
“प्रेमपथिक” अमर दीप सा,
हिंदी को दी नव-प्राण॥
उनकी लेखनी का हर शब्द,
जीवन का संदेश प्रवर्तक।
छायावाद का प्रथम दीपक,
अमर रहेगा युगों-युगों तक॥