रघुवीर सहाय संपूर्ण साहित्यिक जीवन परिचय

कुछ होगा/ कुछ होगा अगर मैं बोलूँगा/

न टूटे न टूटे तिलिस्म सत्ता का/ मेरे अन्दर एक कायर टूटेगा

जन्म- 9 दिसंबर 1929 ई. लखनऊ (उ.प्र)

निधन- 30 दिसंबर 1990 ई. दिल्ली में हुआ था।

पिता- हरदेव सहाय माता- तारादेवी थीं।

ये प्रगतिशील काव्यधारा ‘नई कविता’ के प्रतिनिधि कवि थे। कवि के रूप में इन्हें ‘दूसरा सप्तक’ से विशेष ख्याति प्राप्त हुई।

डॉ. बच्चन सिंह ने इन्हें ‘पोलिटिकल’ कवि कहा है।

इनकी पहली कविता ‘अंत का प्रारंभ’ (1946 ई.) है।

इसी वर्ष दिसंबर में ‘दसमी का मेला’ कविता लखनऊ रेडियों से प्रसारित हुई थी।

समकालीन हिंदी कविता के संवेदनशील कवि थे।

रघुवीर सहाय- प्रमुख काव्य संग्रह:

1. सीढ़ियों पर धूप में (1960 ई.)

2. आत्महत्या के विरुद्ध (1967 ई.)

3. हँसो-हँसो जल्दी हँसो (1975 ई.)

4. लोग भूल गए हैं (1982 ई.)  1984 ई. साहित्य अकादमी पुरस्कार

5. कुछ पते कुछ चिट्ठियाँ (1989 ई.)

6. एक समय था (1994 ई.), मरणोपरांत

कहानी संग्रह-

1. रास्ता इधर से है (1972 ई.)

2. जो आदमी हम बना रहे हैं (1982 ई.)

निबंध संग्रह-

1. लिखने का कारण

2. ऊबे हुए सुखी

3. वे और नहीं होंगे जो मारे जाएँगे

4. भँवर लहरे और तरंग

5. शब्द शक्ति

6. यथार्त का अर्थ आदि।

बाल कविताएँ- चल परियों के देश और फायदा

अनुवाद- शेक्सपियर के नाटक ‘मैकबेथ’ का अनुवाद और तीन हंगरी नाटक आदि।

पत्रकारिता के क्षेत्र में रघुवीर सहाय-

* रघुवीर सहाय ने पत्रकारिता की शुरुआत दैनिक अखबार ‘नवजीवन’ से की थी।

* 1951 ई. में ये ‘प्रतीक’ पत्र के सहायक संपादक बने। यह पत्रिका 1952 ई. में बंद हो गया था।

* 1959 ई. में अज्ञेय के साथ मिलकर इन्होंने ‘वाक्’ त्रैमासिक पत्र निकाला।

* 1963 ई. से 1968 ई. तक ‘नवभारत टाइम्स’ में विशेष संवाददाता रहे थे।

* साप्ताहिक पत्र ‘दिनमान’ का भी इन्होंने संपादन किया।

रघुवीर सहाय जी की चर्चित कविताएँ-

1. भीड़ में मैकू और मैं

2. अधिनायक

3. नेता क्षमा करें

4. लोकतंत्रीय मृत्यु

5. मेरा प्रतिनिधि (राममनोहर लोहिया के प्रति)

6. मूर्ति

7. अनाहत जिजीविसा

8. रामदास

9. एक अधेड़ भारतीय आत्मा

काव्य रचनाओं के संबंध में विशेष तथ्य:

(i) सीढ़ियों पर धूप में (1960 ई.)

इस काव्य संग्रह में अस्तित्ववादी कवियों के दुःखवाद पर चोट की गई है।

“हम ही क्यों यह तकलीफ उठाते जाएँ?

दुःख देने वाले दुःख दे

और हमारे उस दुःख के गौरव की कविताएँ गाएँ।”

‘क्षणवाद’ का उपहास-

“हम क्षण की महिमा से मंडित

हम वैज्ञानिक हैं, हम पंडित हैं, हम खंडित हैं।”

अनाहत जिजीविसा, मध्यवर्गीय जीवन के दबाव व लोकतांत्रिक विडंबनाओं का चित्रण-

“तुमने जो दी है अनाहत जिजीविसा, उसे क्या करे?”

महत्वपूर्ण संकलित कविताएँ-

1. हमने यह देखा

2. बसंत आया

3. पदिए गीता

4. नारी

(ii) आत्महत्या के विरुद्ध (1967 ई.)

इसमें मुख्यतया अ-कविता की प्रतिक्रिया में लिखी गई कविताएँ हैं। इसमें कई कविताएँ प्रकृति के नाना दृश्यों से संबंद्ध हैं। जबकि रघुवीर सहाय प्रकृति के सहज कवि नहीं हैं। प्रकृति उनकी कविता में संश्लिष्ट मानवीय अनुभव बनकर ही आती है। जैसे-

‘देखो वृक्ष को देखो, कुछ कह रहा है/ किताबी होगा वह कवि जो कहेगा/ हाय पत्ता झर रहा है।’

भ्रष्टाचार पर प्रहार इन्होंने मुसदीलाल मंत्री के माध्यम से किया है। (यहाँ मुसदीलाल भ्रष्टाचार का प्रतीक है)।

“दर्द, खैराती अस्पताल में डॉक्टर ने कहा

वह मेरा काम नहीं, वह मुसद्दी का है

वही भेजता है मुझे लिखकर इसे अच्छा करों।”

आत्महत्या के विरुद्ध’ में संकलित प्रमुख कविताएँ-

1. मेरा प्रतिनिधि

2. एक अधेड़ भारतीय आत्मा 

3. आत्महत्या के विरुद्ध (इसे नंदकिशोर नवल ने ‘स्वातंत्र्योत्तर भारत का चित्रपट’ कहा है।)

इस रचना के बारे में डॉ. बच्चन सिंह ने लिखा है-

“यह संग्रह जीवन में होने वाली आत्महत्याओं के विरुद्ध ही नहीं है, बल्कि साहित्य की हत्या करने वाले बीटनिकों और अकवितावादियों के विरुद्ध भी है।”

बीट पीढ़ी – राजकमल चौधरी, इनके कविताओं में बीट पीढ़ी का गहरा प्रभाव था।

‘अ-कविता’ – आंदोलन के प्रवर्तक जगदीश चतुर्वेदी थे। (1963 में प्रारंभ काव्य संग्रह से)

(iii) 3. हँसो-हँसो जल्दी हँसो (1975 ई.)

यह कविता संग्रह आपातकाल की पूर्वपीठिका पर आधारित है। आपातकाल के पूर्व के सन्नाटे और चुप्पी कि इसमें पूरी तरह उजागर किया है।

इसमें संकलित प्रमुख कविताएँ हैं-

1. आनेवाला खतरा

2. आपकी हँसी

3. रामदास

4. राष्ट्रीय प्रतिज्ञा

(iv) लोग भूल गए हैं (1982 ई.)

1984 ई. में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ।

यह कविता तत्कालीन शासक वर्ग की सांस्कृतिक नीति का पर्दाफाश करती है, जिसमें कला और साहित्य में लोक रूपों, लोक नाटकों, लोक नृत्यों के साथ ही पुराने साहित्य-रूपों को बढ़ावा दिया जा रहा था।

इसमें संकलित प्रमुख कविताएँ हैं- 1. मुआवजा 2. दयाशंकर

(v) कुछ पते कुछ चिट्ठियाँ (1989 ई.)

यह काव्य संग्रह आजादी के बाद टूटते हुए सपनों की चिंता व्यक्त करता है। ‘उनहार’ शीर्षक कविता में अप्रस्तुत का स्वरुप इस प्रकार व्यक्त होता है-

“क्या ये स्मृतियाँ हैं विचारों की जो

अपने साथ कोई आदमी लिए हुए

हल्की सी कोशिश करती है पहचान की

यह किताब कुछ अनुभव ऐसे बताती है

दस बरस पहले हुए थे जो।”  

इसमें संकलित प्रमुख कविताएँ-

1. खड़ी बोली

2. अध्यापक से

3. घिसी पैंसिल

4. मंत्री के घर में

(vi) एक समय था (1994 ई.), मरणोपरांत

यह रघुवीर सहाय की अंतिम प्रकाशित काव्य संग्रह है।

इस संग्रह में संकलित प्रमुख कविताएँ-

1. डर 2. नई पीढ़ी 3. हँसी जहाँ खत्म होती है

रघुवीर सहाय की महत्वपूर्ण पंक्तियाँ:

1. निर्धन जनता का शोषण है

   कहकर आप हँसे

   लोकतंत्र का अंतिम क्षण है… आपकी हँसी कविता से

2. अगर कहीं मैं तोता होता,

   तोता होता तो क्या होता… ‘सीढियों और धूप’ कविता से

3. मैं अपनी एक मूर्ति बनाता हूँ

   और एक ढहाता हूँ

   और आप कहते हैं कि कविता की है…

4. कुछ होगा कुछ होगा अगर मैं बोलूँगा

   न टूटे न टूटे तिलस्म सत्ता का

   मेरे अंदर एक कायर टूटेगा…

5. अगर फिर शुरू हुआ जीवन

  आज मैंने एक छोटी सी सरल सी कविता पढ़ी

  (NET जून, 2013)

6. ‘कितना अकेला हूँ मैं इस समाज में’ (NET दिसंबर 2013)

7. राष्ट्रगीत में भला वह कौन भाग्य विधाता है

   फटा सुथन्ना पहने जिसका गुन हरचरना गाता है…

8. दुखी मन में उतर आती है पिता की छवि

   अभी तक जिन्हें कष्टों से नहीं निष्कृति….

9. कितना अच्छा था छायावादी

   एक दुःख लेकर एक गान देता था

   कितना कुशल था प्रगतिवादी

   हर दुःख का कारण पहचान लेता था।

10. भारत हर संकट में एक गाय होता है…

कविता के संबंध में रघुवीर सहाय के कथन:

सहाय जी व्यर्थ बोलने में विश्वास नहीं करते थे बल्कि कर्म को ही वे प्रधान रूप में स्वीकार करते थे परिवार की जिम्मेदारियों ने उन्हें समय से पहले ही युवा बना दिया इस कारण मनोहर श्याम जोशी ने उनको “पैदायसी बुजुर्ग” कहा है।

“विचार वस्तु का कविता में खून की तरह दौड़ते रहना कविता को जीवन और शक्ति देता है और यह तभी संभव है जब हमारी कविता की जड़े यथार्थ में हो।”

“रचना के लिए किसी न किसी रूप में वर्तमान से पलायन आवश्यक है।”

रघुवीर सहाय के संबंध में आलोचकों के महत्वपूर्ण कथन:

“मनुष्य जीवन की नियति को उसके समूचे विस्तार में देखना और प्रासंगिक बनाए रखना रघुवीर सहाय के कवि कर्म का केंद्रीय तत्त्व है।” -रामस्वरूप चतुर्वेदी

“राजनीति जैसे अखबारी विषय को कवि ने अनुभूतियों में ढाला है, यह समकालीन कविता की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।”

-रामस्वरूप चतुर्वेदी

“भाषा का रचना ऐसा लगता है कि या तो भाषा ही भाषा लगती है या फिर अनुभूति का सीधा संस्पर्श होता है।”

-रामस्वरूप चतुर्वेदी

“रघुवीर सहाय ने एक बड़ा काम वह किया है कि उन्होंने कविता के पुराने प्रभामंडल से कविता को मुक्त किया है उससे कुछ अद्भुत अपूर्व की उम्मीद करने के बदले उसे सहज साधारण जिंदगी की छोटी-छोटी घटनाओं और स्थितियों का आत्मीय साक्षी बनाया है।” – मैनेजर पांडेय

जय हिंद

Leave a comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.