प्रकृति की गोद में रहती,
नन्ही-सी प्यारी गौरइया।
सबेरे गीत सुनाती सबको,
जगाती अपने नौनिहालों को।
था पेड़ों पर उसका घरौंदा,
फूलों से महका था आँगन।
मानव ने जब कटवाए पेड़,
लूट गया उसका मधुर जीवन।
रोकर फिर, बोली गौरइया —
“अब घर मैं कहाँ बनाऊँगी?
कहाँ मिलेगा ठिकाना मुझको,
अपने बच्चे कैसे पालूँगी?”
बच्चों ने दी उसको हिम्मत —
“मत रो, हम लाएँगे हरियाली।
हम घरौंदा तुम्हारा बनाएँगे,
रखेंगे उसमें दाना-पानी।”
यह सुन मुस्कुराई गौरइया,
गूँज उठा वन, हुआ उजियारा।
पेड़, पौधे, नदियाँ, पंछी —
सबने गाया गीत दोबारा।
पेड़-पौधे और नदियाँ, पंछी —
जीवन के सच्चे साथी हैं।
इन्हें बचाना, इन्हें सँभालना —
हम सबकी जिम्मेदारी है।