
मलेशिया का लंकावी समुद्र तट, सांझ की सुनहरी धूप लहरों पर नाच रही थी। हम दोनों कुछ देर सागर में तैरने के बाद तट के किनारे चादर बिछाकर बैठे हुए थे। हवा में सनसनाहट थी और समुद्र के किनारे पेड़ों की सरसराहट मिलकर एक अद्भुत संगीत सुना रही थी। समुद्र की लहरें जैसे अपने ही सुर में झूम-झूम कर कुछ कह रही थीं। लोग वहाँ के प्राकृतिक दृश्यों का आनंद ले रहे थे। वहाँ के चहल-पहल को देखकर हम भी आनंदित हो रहे थे। एक तरफ सागर अपनी धुन में हिलोरे लेकर मचल रहा था। वहीं दूसरी ओर मानव-महासागर में डूबकी लगा-लागाकर लहरों से खेल रहे थे। मानो रोज मर्रा की कार्य-कलापों से निश्चिंत कुछ समय अपने लिए निकाला हो। कुछ लोग किनारों पर बैठे आनंदित हो रहे थे तो कुछ लोग सागर में डूबकी लगा रहे थे। कुछ लोग तो सागर के किनारे लगी बड़े-बड़े छतरियों के नीचे लेट कर जीवन का आनंद ले रहे थे। नन्हें-नन्हें बच्चों को तो मानों स्वर्ग ही मिल गया हो। वे किनारों पर खुशी से उछल-कूद रहे थे मानों सागर रूपी बाग में रंग-बिरंगी तितलियाँ उड़ रही हो। कई लोग तट पर शांत मन से बैठे अपने आप में खोए थे तो कुछ लोग किनारे-किनारे टहल रहे थे। शीतल पवन के स्पर्श से पानी में भींगा बदन को सुख दे रहा था। शाम होने को चली थी। सूर्य भी अपने किरणों को समेट रहा था। जिससे सागर का जल सिंदूरी दिखाई दे रहा था।
लोग उन लहरों से खेलते हुए जीवन की थकान भूल चुके थे। सब लोग लौटने की तैयारी करने लगे, तभी मेरी नजर एक छोटी-सी बच्ची पर पड़ी। वह लगभग तीन वर्ष की होगी घुंघराले सुनहरे बाल, गुलाबी होंठ, नीली आँखें, और हाथ में एक खाली बोतल व पतली-सी लकड़ी की छड़ी लिए वह नन्ही परी बेखौफ़ समुद्र की ओर भागी जा रही थी।
मैंने अपने पति से कहा, “देखिए, वह बच्ची अकेली समुद्र की ओर जा रही है। इसके साथ कोई नहीं दिख रहा।” उन्होंने निश्चिंत भाव से कहा, “हो सकता है उसके माता-पिता यहीं आसपास हों।” पर मेरा मन बेचैन हो रहा था। मैं उसकी ओर देखती ही जा रही थी। वह समुद्र के बिल्कुल किनारे पहुँची और बड़ी निडरता से झुककर बोतल में पानी भर लिया। फिर तेजी से वह वापस लौटने लगी। उसकी मासूमियत और उत्साह देखकर मेरा हृदय पिघल गया।
जब वह मेरे पास से गुज़री, मैंने उसे पुकारा, “Hello dear!” उसने पलटकर मेरी ओर देखा- उसकी नीली आँखों में जैसे पूरा आकाश था। वह मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गई। कुछ देर बाद मैंने देखा कि वह रेत पर बैठकर कुछ बना रही थी। मेरा जिज्ञासु मन अब स्वयं को रोक नहीं सका। मैं उठी और उसके पास चली गई। मैं उससे बात करना चाहती थी। मैंने पूछा-
“Hi sweetheart, what are you doing?”
वह हल्की मुस्कुराते हुए बोली, “I am preparing food… for my mom and dad.”
“Where are your parents?” मैंने पूछा।
“They are living in the hotel,” उसने सहजता से कहा।
“Where are you from?”
“I am from Switzerland,” उसने बोतल में पानी डालते हुए कहा।
“Your name?”
“My name is Alisa.”
“How old are you?”
“I am three years old,” उसने गर्व से कहा।
“Do you have any brothers or sisters?” मैंने पूछा।
उसने सिर झुकाकर कहा, “No… I have no brother or sister. But I want one.”
उसकी यह मासूम बात सुनकर मैं एक पल के लिए निःशब्द रह गई। उस पल मुझे लगा। वास्तव में दुनिया की हर बच्ची, चाहे वह किसी भी देश, भाषा या रंग की क्यों न हो, उसकी कोमल भावनाएँ एक-सी होती हैं। प्रेम, अपनापन और स्नेह की भाषा सब जगह एक-सी है।
मैंने मुस्कुराकर उसके सिर पर हाथ फेरा।
“तुम सच में बहुत प्यारी हो, एक छोटी-सी परी जैसी,” मैंने कहा।
वह खिलखिलाकर हँसी और अपने छोटे-छोटे हाथों से रेत में एक गोला बनाते हुए बोली —
“This is my home… and this is my brother. He will play with me!” मेरी आँखें नम हो गईं। वह अपने कल्पना के संसार में कितनी प्रसन्न थी। उसी क्षण मुझे एहसास हुआ कि शायद “अंजान परी” केवल कोई बच्ची नहीं, बल्कि उस मासूमियत और प्रेम का प्रतीक थी जो हर हृदय में कहीं न कहीं जीवित है।