सहायक क्रिया के वे अंश जो क्रिया की अपूर्णता, पूर्णता किसी वस्तु या व्यक्ति की अवस्था या स्थिति आदि की सूचना देते हैं वे ‘पक्ष’ (Aspect)सूचक अंश (चिह्न) कहे जाते हैं।
प्रत्येक कार्य किसी कालावधि के बीच होता है जो प्रारंभ से अंत तक फैला रहता है। इस फैली हुई कालावधि में कार्य व्यापार को ‘पक्ष’ (Aspect)कहते हैं। दूसरे शब्दों में- क्रिया के जिस रूप क्रिया की प्रक्रिया गत अवस्था का बोध होता है, उसे ‘पक्ष’ (Aspect)कहते हैं।
हिंदी में निम्नलिखित ‘पक्ष’ (Aspect) पाए जाते हैं-
1. नित्यपक्ष/अवृत्तिमूलक पक्ष
2. सातत्यबोधक पक्ष/सातत्य बोधक पक्ष
3. पूर्ण पक्ष/ पूर्णताद्योतक पक्ष
4. स्थित्यात्मक पक्ष/नित्यबोधक पक्ष
5. आरंभ पक्ष
6. प्रगतिबोधक पक्ष
1. नित्यपक्ष/अवृत्तिमूलक पक्ष
इस पक्ष से किसी कार्य व्यापार के बार-बार होने (आवृत्ति) का पता चलता है। इसका चिह्न ‘त्’ है, जैसे-
1. बच्चा दौड़ता है।
2. मैं कक्षा में पढ़ता हूँ।
3. सूरज पश्चिम में डूबता है।
4. माँ खाना बनाती है।
इन सभी वाक्यों में क्रिया बार-बार नित्य संपादित होती है। ‘बच्चा दौड़ता है’ का अर्थ यह नहीं है कि वह एक बार दौड़कर रह जाता है। इसका अर्थ है कि वह दौड़ता है फिर, रुक जाता है, फिर दौड़ता है फिर रुक जाता है, फिर अगले दिन दौड़ता है और इस तरह से दौड़ने की क्रिया बार-बार की जाती है।
यह पक्ष वर्तमान काल तथा भूतकाल दोनों में हो सकता है। भूतकाल में कल से पता चलता है कि कार्य अब समाप्त हो चुका है और नित्य पक्ष यह बताता है कि हुआ यह कार्य बार-बार ही था, जैसे-
1. मैं कक्षा पढ़ता पढ़ता था।
2. वह दौड़ने जाता था।
3. वह गाना गाती है।
2. सातत्यबोधक पक्ष/ सातत्य बोधक पक्ष
सातत्य का अर्थ है ‘लगातार होना’। अंग्रेजी में इसे (Continuous Aspect) कहते हैं और इसका चिह्न ‘ing’ होता है। इस पक्ष में क्रिया लगातार चलती रहती है। हिंदी में इस पक्ष का चिह्न ‘रहू’। जैसे-
1. पतंग उड़ रही है।
2. बच्चे खेल रहे हैं।
3. वे कक्षा पढ़ा रहे हैं।
4. वायुयान उड़ रहा है।
इन सब वाक्यों में क्रिया के आरंभ होने की सूचना तो मिल रही है और यह भी पता चल रहा है कि क्रिया लगातार होती जा रही है लेकिन कब तक होगी हम नहीं जानते।
सातत्य पक्ष भी वर्तमान काल तथा भूतकाल दोनों में हो सकता है, जैसे–
1. पतंग उड़ रही थी।
2. बच्चे खेल रहे थे।
3. वह कक्षा पढ़ रहे थे।
4. वायुयान उड़ रहा था।
भूतकाल के वाक्य से पता चलता है कि यद्यपि कार्य व्यापार अब समाप्त हो चुका है (भूतकाल) लेकिन जब तक भी यह कार्य हुआ, लगातार हुआ है।
3. पूर्ण पक्ष/ पूर्णताद्योतक पक्ष-
पूर्ण पक्ष से कार्य के पूरा होने का बोध होता है। अंग्रेजी में इसे Perfect Aspect कहते हैं, जैसे-
1. तुलसीदास ने रामचरितमानस लिखी।
2. माता जी ने खाना बना लिया।
3. मैंने आपको पत्र भेजा था।
4. मोहन ने गृह कार्य पूरा कर लिया।
5. मैंने पुस्तक पढ़ ली है।
4. स्थित्यात्मक पक्ष/ नित्यबोधक पक्ष
क्रिया के जिस रूप से किसी वस्तु या व्यक्ति की स्थिति या अवस्था का बोध होता है। वह स्थित्यात्मक/नित्यबोधक पक्ष पक्ष कहलाता है। यह वर्तमान और भूतकाल दोनों में हो सकता है, जैसे-
1. सीता अध्यापिका है।
2. सीता अध्यापिका थी।
3. पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है।
4. सूरज पूर्व दिशा में उदय होता है।
5. किताब मेज पर है।
6. किताब मेज पर थी।
5. आरंभद्योतक पक्ष-
क्रिया के जिस रूप से क्रिया के आरंभ होने की सूचना मिलती है, उसे आरंभद्योतक पक्ष कहते हैं, जैसे-
1. मोहन नौकरी करने लगा है।
2. बच्चा पढ़ने लगा है।
3. वह पढ़ने लगा है।
4. बालक लिखने लगा है।
6. प्रगतिबोधक पक्ष-
1. इससे क्रिया में निरंतर प्रगति का बोध होता है, जैसे–
2. मेले में भीड़ बढती जा रही है।
3. वह तेजी से चलता आ रहा है।
4. बाँध में पानी बढ़ता का रहा है।
विशेष- मानक हिंदी व्याकरण में अनुसार निम्नलिखित चार ‘पक्ष’ हैं-
1. नित्यपक्ष/अवृत्तिमूलक पक्ष
2. सातत्यबोधक पक्ष/ सातत्य बोधक पक्ष
3. पूर्ण पक्ष/ पूर्णताद्योतक पक्ष
4. स्थित्यात्मक पक्ष/ नित्यबोधक पक्ष।
जय हिन्द