'मणिकर्णिका' दलित समाज की त्रासदी और भारतीय समाज की विडम्बना का सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आख्यान है। यह कृति समाज, संस्कृति, इतिहास और राजनीति की उन परतों को उघाड़ती है, जो अभी तक अनकहा और अनछुआ था। यह आत्मकथा बुद्धिजीवियों और भारतीय समाज को सच का आइना दिखाती है। आज 21वीं सदी में भी भारत की तस्वीर बदली… Continue reading ‘मणिकर्णिका’ आत्मकथा की समीक्षा
सुंदर विचार
भारतीय भाषाओं के राष्ट्रीय कवियों में राष्ट्रीय एकता की भावना
'राष्ट्रीय एकता' भारत की 'आत्मा' है और 'राष्ट्रीयता' भारतियों की 'भावना'। राष्ट्रीयता शब्द अंग्रेजी भाषा के 'नैशनलिटी' (Nationality) शब्द का हिंदी रूपांतर है। जिसकी उत्पत्ति लैटिन भाषा के 'नेशियो' (Natio) शब्द से हुई है। इस शब्द से 'जन्म' और 'जाति' का बोध होता है। राष्ट्रीयता सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक भावना है जो लोगों को एक सूत्र… Continue reading भारतीय भाषाओं के राष्ट्रीय कवियों में राष्ट्रीय एकता की भावना
ईश्वर के नाम पत्र
हे ईश्वर!मेरा चरण स्पर्श स्वीकार करे हे ईश्वर! बहुत दिनों से मेरे मन में अनेक प्रश्न उमड़-घुमड़ रहे थे। मन अत्यंत व्याकुल और चिंतित था। समझ नहीं पा रही थी कि अपने अंतर्मन की बातें किससे कहूँ। लोगों से कहूँ तो वे शायद हँसेंगे, उपहास करेंगे या फिर उसे क्षणिक संवेदना समझकर भूल जाएँगे। तभी… Continue reading ईश्वर के नाम पत्र
वर्तमान युग में ‘अंधा युग’ गीतिनाट्य की प्रासंगिकता
वर्तमान युग में ‘अंधा युग’ गीतिनाट्य की प्रासंगिकता ‘अंधा युग’ अतीत, वर्तमान और भविष्य को एक सूत्र में बाँधते हुए यह संकेत देता है कि क्रोध, घृणा, स्वार्थ और लालच जैसे गुण किसी भी सभ्यता को भीतर से खा जाता है। नाटक हमें यह समझाता है कि इतिहास बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, लेकिन मनुष्य… Continue reading वर्तमान युग में ‘अंधा युग’ गीतिनाट्य की प्रासंगिकता
स्मृतियों की छाँह में ‘एक और बचपन’
मनुष्य का जीवन एक वृत्त की भाँति है- जहाँ से यह आरंभ होता है, अंततः वहीं लौट आता है। बचपन से युवावस्था, फिर प्रौढ़ावस्था और उसके बाद जीवन जब ढलान की ओर बढ़ने लगता है, तब बुढ़ापा आता है, जिसे प्रायः लोग कहते हैं बच्चा और बूढ़ा एक जैसे होते हैं अथार्त दूसरा बचपन कहा… Continue reading स्मृतियों की छाँह में ‘एक और बचपन’
डॉ. अहिल्या मिश्र : मेरी पहली भेंट
साहित्य समाज का दर्पण है और साहित्यकार मानव-समाज का दर्पण। साहित्यकार के अंतस में युग चेतना होती है। यही युग चेतना साहित्य सृजन करने का आधार बनती है। श्रेष्ठ साहित्य भावनात्मक स्तर पर व्यक्ति और समाज को संस्कारित करता है और उसे युग चेतना से साक्षात्कार करवाता है। साहित्यकार जिस समाज में रहता है, उस… Continue reading डॉ. अहिल्या मिश्र : मेरी पहली भेंट
लोकजीवन की लेखिका : मृदुला सिन्हा से विशेष वार्ता
बात सन् 2018 की है 'दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा' हैदराबाद से मैं लघु शोध के लिए प्रवेश-परीक्षा पास कर चुकी थी। अब शोध विषय के चयन करने की बारी थी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि किस विषय का चुनाव करूँ। मैं परेशान और चिंतित थी। मैंने अपने गाइड से सम्पर्क किया… Continue reading लोकजीवन की लेखिका : मृदुला सिन्हा से विशेष वार्ता
हिन्दी व्याकरण – संधि : (भाग-1) स्वर संधि
संधि शब्द का अर्थ है- ‘मेल’। ‘संधि’ संस्कृत का शब्द है। संधि का व्युत्पति- यह दो शब्दों के योग से बना है। सम् + धि = ‘सम्’ का अर्थ होता है, ‘पूर्णतया’ और ‘धि’ का अर्थ होता है, ‘मिलना’ अथार्त दो ध्वनियों या वर्णों का पूर्णतया मिलना ‘संधि’ कहलाता है। दूसरे शब्दों में कहे… Continue reading हिन्दी व्याकरण – संधि : (भाग-1) स्वर संधि
भारतीय संस्कृति में नारी का स्थान
भारतीय संस्कृति में प्राचीन वैदिक काल से ही नारी का स्थान अत्यंत सम्माननीय और गौरवपूर्ण रहा है। शास्त्रों में कहा गया है— “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥” अर्थात् जहाँ स्त्रियों का सम्मान और सत्कार किया जाता है, वहाँ देवताओं का वास होता है तथा जहाँ उनका आदर नहीं होता, वहाँ… Continue reading भारतीय संस्कृति में नारी का स्थान
क्या बिहारी होना गुनाह है?
बिहारी होना कोई गुनाह नहीं है। किसी भी व्यक्ति की पहचान- चाहे वह बिहारी हो, पंजाबी हो, तमिल हो, बंगाली हो या किसी भी राज्य से हो- उसके खिलाफ हिंसा, भेदभाव या अन्याय का कारण कभी नहीं बन सकती है। अगर किसी को केवल उसकी क्षेत्रीय पहचान के कारण निशाना बनाया गया है, तो यह… Continue reading क्या बिहारी होना गुनाह है?