सुंदर विचार

“एकाग्रता की शक्ति” : स्वामी विवेकानंद

पत्थर भी ध्यान नहीं तोड़ सके स्वामी विवेकानंद को ध्यान और साधना से विशेष लगाव था। वे प्रायः एकांत स्थानों में बैठकर ध्यान किया करते थे। एक बार की बात है, वे नदी के किनारे शांत वातावरण में ध्यानमग्न होकर बैठे थे। उसी समय कुछ शरारती युवक वहाँ से गुज़रे। उन्होंने स्वामी जी को ध्यान… Continue reading “एकाग्रता की शक्ति” : स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद की बुद्धिमत्ता और मर्यादा

“सच्ची शिक्षा वही है जो मनुष्य के चरित्र, विचार और जीवन को महान बनाती है।” एक बार स्वामी विवेकानंद विदेश यात्रा पर थे। उनके तेजस्वी व्यक्तित्व, प्रभावशाली वाणी और उच्च विचारों से अनेक लोग प्रभावित होते थे। एक दिन एक विदेशी महिला उनसे अत्यंत प्रभावित होकर उनके पास आई और बोली— “मैं आपसे विवाह करना… Continue reading स्वामी विवेकानंद की बुद्धिमत्ता और मर्यादा

नेताजी सुभाषचंद्र बोस : तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा

भारत को अंग्रेजों के शासन से स्वतंत्र कराने के लिए अनेक क्रांतिकारियों ने अपना बलिदान दिया है। उन्हीं क्रांतिकारियों में से एक क्रांतिकारी थे नेताजी सुभाषचंद्र बोस। बालक सुभाष बचपन से ही राष्ट्राभिमानी थे। उन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने के लिए देश के युवकों को आवाहन कर नारा दिया था कि, ‘तुम मुझे खून दो,… Continue reading नेताजी सुभाषचंद्र बोस : तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा

स्वामी विवेकानंद : उत्तम सीख का महत्व

एक बार की बात है। स्वामी विवेकानंद खेतरी (राजस्थान) गए हुए थे। वहाँ के राजा ने उनके सम्मान में एक भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया। कार्यक्रम में मैनाबाई नामक एक प्रसिद्ध नृत्यांगना ने नृत्य प्रस्तुत किया। जब नृत्य आरंभ हुआ, तो स्वामी विवेकानंद उस वातावरण को अपने संन्यासी आदर्शों के अनुकूल नहीं समझ पाए… Continue reading स्वामी विवेकानंद : उत्तम सीख का महत्व

अज्ञेय की कविता ‘साँप’

अज्ञेय की कविता ‘साँप’ : विवेचना ‘साँप’ कविता में कवि साँप को प्रतीक बनाकर नगरीय सभ्यता में रहने वाले मनुष्य के दोगले और कुटिल चरित्र पर तीखा व्यंग्य करते हैं। कवि कहता है कि साँप नगर में तो बस गया है, पर वह सभ्य नहीं बन पाया। इसके माध्यम से कवि यह संकेत देता है… Continue reading अज्ञेय की कविता ‘साँप’

स्वामी विवेकानंद : धैर्य और विश्वास

स्वामी विवेकानंद का जीवन संघर्ष, साधना और आत्मविश्वास की अद्भुत गाथा है। उनका व्यक्तित्व हमें यह सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियाँ भी यदि धैर्य और विश्वास से सामना की जाएँ, तो सफलता स्वयं मार्ग खोज लेती है। एक बार की बात है जब स्वामी विवेकानंद अमेरिका में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भाग लेने गए।… Continue reading स्वामी विवेकानंद : धैर्य और विश्वास

स्वामी विवेकानंद : आज्ञा माँ शारदा की

एक बार स्वामी विवेकानंद ने माँ शारदे से पूछा, “माँ क्या मैं दुनिया को धर्म का उपदेश देने जा सकता हूँ?” माँ शारदे ने उनकी तरफ देख कर कहा- “बेटा, तुम्हारा कार्य दुनिया के लिए है। जब तक तुम दूसरों के लिए नहीं जिओगे, तुम्हारी साधना अधूरी रहेगी।” इसी प्रेरणा ने उन्हें जीवन भर समाजसेवा… Continue reading स्वामी विवेकानंद : आज्ञा माँ शारदा की

सार्वनामिक विशेषण के भेद

सार्वनामिक विशेषण के भेद: (मानक हिंदी व्याकरण तथा रचना के अनुसार) कुछ सर्वनाम जब किसी संज्ञा की विशेषता बताने के लिए विशेषण के रूप में प्रयुक्त होते हैं तब उन्हें ‘सार्वनामिक विशेषण’ कहा जाता है। जैसे- 1. मेरी किताब 2. अपना बेटा 3. किसी का मकान 4. कौन-सी कमीज 5. कोई लड़का आदि। यहाँ, मेरी,… Continue reading सार्वनामिक विशेषण के भेद

स्वामी विवेकानंद का ‘बच्चों से प्यार’

स्वामी विवेकानंद को बच्चों से बहुत लगाव था। एक बार उन्होंने कहा था- “बच्चों के हृदय में ईश्वर का वास होता है। अगर हम उन्हें सही दिशा दिखाएँगे, तो वे समाज का भविष्य बदल सकते है।” वे बच्चो के साथ खेलते और उन्हें शिक्षा के महत्व को समझाते थे। स्वामी विवेकानंद केवल एक महान संन्यासी… Continue reading स्वामी विवेकानंद का ‘बच्चों से प्यार’

नेताजी सुभाष चन्द्रबोस : ‘सेवा ही सच्चा राष्ट्र धर्म है’

सुभाषचंद्र बोस के घर के सामने एक बुढ़िया भिखारिन रहती थी। वे देखते थे कि वह हमेशा भीख मांगती थी। उसका दर्द साफ दिखाई देता था। उसकी ऐसी अवस्था देखकर उनका दिल दहल जाता था। भिखारिन से मेरी हालत कितनी अच्छी है यह सोचकर वे स्वयं शर्म महसूस करते थे। उन्हें यह देखकर बहुत कष्ट होता… Continue reading नेताजी सुभाष चन्द्रबोस : ‘सेवा ही सच्चा राष्ट्र धर्म है’