पत्थर भी ध्यान नहीं तोड़ सके
स्वामी विवेकानंद को ध्यान और साधना से विशेष लगाव था। वे प्रायः एकांत स्थानों में बैठकर ध्यान किया करते थे। एक बार की बात है, वे नदी के किनारे शांत वातावरण में ध्यानमग्न होकर बैठे थे। उसी समय कुछ शरारती युवक वहाँ से गुज़रे। उन्होंने स्वामी जी को ध्यान में लीन देखा और उनके धैर्य की परीक्षा लेने का विचार किया।
युवकों ने उनका ध्यान भंग करने के उद्देश्य से उन पर छोटे-छोटे पत्थर फेंकने शुरू कर दिए। किंतु स्वामी विवेकानंद ने उनकी इस हरकत पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। वे पूर्ण एकाग्रता और शांत भाव से ध्यान में लीन रहे। उनकी इस अद्भुत सहनशीलता और धैर्य को देखकर युवक आश्चर्यचकित रह गए।
कुछ समय बाद युवकों को अपनी गलती का एहसास हुआ। वे स्वामी जी के पास आए, उनसे क्षमा माँगी और उनकी महान शांति एवं आत्मसंयम से प्रभावित होकर उनसे शिक्षा लेने का आग्रह किया।
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि धैर्य, आत्मसंयम और शांत स्वभाव से ही हम दूसरों के हृदय को बदल सकते हैं।
जय हिन्द