
स्वामी विवेकानंद बचपन से ही अत्यंत निडर, साहसी और तर्कशील स्वभाव के थे। उनका बाल्यकाल का नाम नरेंद्रनाथ था। वे किसी भी बात को बिना सोचे-समझे स्वीकार नहीं करते थे, बल्कि हर बात को तर्क और अनुभव की कसौटी पर परखते थे।
एक बार की बात है, नरेंद्र अपने मित्रों के साथ एक पेड़ पर चढ़कर खेल रहे थे। उसी समय एक बुजुर्ग व्यक्ति वहाँ आए और उन्हें डराते हुए बोले, “इस पेड़ पर भूत रहता है। यदि तुम लोग इस पर चढ़ोगे तो गिर जाओगे और मर जाओगे।”
यह सुनकर अन्य बच्चे डर गए, लेकिन नरेंद्र ने साहस और आत्मविश्वास के साथ उत्तर दिया, “भूत जैसी कोई चीज़ नहीं होती। यदि सच में भूत होता, तो मैं स्वयं उसे देख लेता।”
यह कहकर वे और भी निडरता के साथ पेड़ पर चढ़ गए। उनके इस साहस और तर्कपूर्ण विचार ने यह सिद्ध कर दिया कि वे बचपन से ही अंधविश्वासों से दूर रहते थे और सत्य को स्वयं परखने में विश्वास करते थे।
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि मनुष्य को भय और अंधविश्वास से मुक्त होकर शेर की तरह साहसी तथा तर्कशील बनना चाहिए।
जय हिन्द