स्वामी विवेकानंद : आज्ञा माँ शारदा की

एक बार स्वामी विवेकानंद ने माँ शारदे से पूछा, “माँ क्या मैं दुनिया को धर्म का उपदेश देने जा सकता हूँ?” माँ शारदे ने उनकी तरफ देख कर कहा- “बेटा, तुम्हारा कार्य दुनिया के लिए है। जब तक तुम दूसरों के लिए नहीं जिओगे, तुम्हारी साधना अधूरी रहेगी।” इसी प्रेरणा ने उन्हें जीवन भर समाजसेवा और मानवता सेवा के लिए प्रेरित किया।

स्वामी विवेकानंद : ‘आज्ञा माँ शारदा की’

स्वामी विवेकानंद का जीवन केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं था, बल्कि वह सेवा, करुणा और मानवता के प्रति समर्पण का जीवंत आदर्श था। उनके जीवन की दिशा निर्धारित करने में माँ शारदा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।

एक बार स्वामी विवेकानंद ने माँ शारदे से पूछा, “माँ क्या मैं दुनिया को धर्म का उपदेश देने जा सकता हूँ?” माँ शारदे ने उनकी तरफ देख कर कहा-

“बेटा, तुम्हारा कार्य केवल तुम्हारे लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए है। जब तक तुम दूसरों के लिए नहीं जियोगे, तब तक तुम्हारी साधना अधूरी ही रहेगी।”

माँ शारदा के ये शब्द साधारण वाक्य नहीं थे, बल्कि एक महामंत्र थे, जिसने स्वामी विवेकानंद के जीवन को नई दिशा दे दी। उन्होंने समझ लिया कि सच्चा धर्म केवल ध्यान और तपस्या में नहीं, बल्कि पीड़ित मानवता की सेवा में निहित है। इसके बाद उनका जीवन आत्मोद्धार से आगे बढ़कर समाज और राष्ट्र-कल्याण के लिए समर्पित हो गया।

स्वामी विवेकानंद ने गरीबों, शोषितों और वंचितों को ‘नारायण’ मानकर उनकी सेवा को ईश्वर-सेवा का सर्वोच्च रूप माना। उन्होंने युवाओं को आत्मविश्वास, चरित्र-निर्माण और कर्मयोग का संदेश दिया। उनके अनुसार, वही साधना पूर्ण है जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है और समाज को जाग्रत करती है।

जय हिन्द

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