स्मृति (कविता)

निकली थी घर से अकेले, जीने को जिंदगी

लेकिन आपकी यादें, और याद आने लगी ।

मन से आपकी स्मृति, कभी निकलती नहीं

सुगंध आपके एहसास की, कभी कम होती नहीं ।

बरसों बीत गए आपके साथ रहकर, एक ही घर में

उन यादों की प्रतिबिम्ब, नयनों से ओझल होती नहीं ।

हुलस कर लिखती हूँ प्रतिदिन, आपको पाती

ये आदत पुरानी है, जो छोड़ने से भी छुटती नहीं ।

मिलती हूँ आपसे नींद में, हर रोज रात को

फिर भी मिलने की चाह, ख़त्म होती नहीं ।

एहसास भी दिल से, आपकी जाती नहीं

तस्वीर आपकी मेरे मन से, हटती नहीं ।

2 thoughts on “स्मृति (कविता)”

  1. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति !
    आपने याद दिला दिया वो शेर : 
    दिल के आईने में है तस्वीर-ऐ-यार   
    जब ज़रा गर्दन झुकाई देख ली

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