Category: poems
मेरी कविताएँ
जीने की राह
जिन सपनों में जीना चाहीवे सपने बिखर गएदिल के अरमान अबआंसू बन बह गए। राह कौन सा अपनाऊं?यह सोचकर थक गई।दुनिया की भीड़ देखजीने की राह मिल गई।
रामनरेश त्रिपाठी जीवन परिचय
फिर लौटूंगी (कविता)
सतरंगी रंगों की निशां देकर चली गई होली। अपनी निशान छोड़कर चली गई होली। दो दिन की खुशियाँ देकर चली गई होली। अगले वर्ष फिर आउंगी कह गई होली। ‘कोरोना’ से बचकर रहना फिर खेलने आऊँगी होली।
कैसे कहूँ? (कविता)
हँसकर आँसू छुपा लेती हूँ मुस्कुराकर दर्द सह लेती हूँ रात गम में गुजार लेती हूँ दिल को कैसे समझाऊं? सुनते तो सब हैं मुझे अपनी बात को कैसे बताऊँ? कोशिश तो की थी सुनाने की लेकिन किसी को कैसे सुनाऊं?
हाथ की लकीरें (कविता)
माथे की लकीरों को देखते ही, उसने कहा! ओह! तुम्हारे तो भाग्य ही नही है कैसे रहोगी? कैसे जियोगी? खैर! दुखी होकर भी हमेशा, तुम मुस्कुराती रहोगी उसे क्या पता, मैं क्या हूँ? मैं भी मानव हूँ माथे के लकीरों को, आत्मशक्ति से बदल सकती हूँ मैं, मैं जानती थी, अपने आपको मन में दर्द… Continue reading हाथ की लकीरें (कविता)
दर्द का हिसाब (कविता)
दर्दों का कारवां, साथ चलता ही रहा, आँखें नम हुई, दिल थम सा गया। अब इतना भी, दर्द न दे ऐ जिंदगी! कि हिसाब भी, इसका कर न सकूँ। कुछ देकर दर्द, इतराते हैं, कुछ लेकर दर्द, हिम्मत बढ़ाते हैं। बस आदत अपनी कुछ ऐसी है, जो दर्द में भी दर्द सहती है। अब हिम्मत… Continue reading दर्द का हिसाब (कविता)
अदृश्य ‘कोरोना’ (कविता) (Invisible Corona – Poem)
वक्त (कविता)
वक्त वक्त की बात है भईया वक्त बड़ा ही है बलवान । वक्त के आगे सब कोई हारा दुर्बल हो या हो पहलवान। वक्त बदलता रहता सबका गरीब हो या हो धनवान । वक्त वक्त पर भारी है अब वक्त बड़ा ही है बलवान।। बदला वक्त जब हरिश्चन्द्र का पहुँचा दिया उनको श्मशान।… Continue reading वक्त (कविता)
निःशब्द ‘युवा’ (कविता)
बेरोजगार हैं युवा, किंतु निःशब्द नहीं प्रशिक्षित है किंतु बोलते नहीं। किसे कहे अपनी पीड़ा, यह प्रशिक्षित वर्ग उसकी आवाज कोई सुनता नहीं। बीमार नहीं ये, आरक्षण के मारे हैं स्वार्थ का सितम, ढाया है सरकार ने तीस प्रतिशत वाले, हो गए अब आगे नब्बे प्रतिशत वाले, हो गए अब पीछे। चंद वोटों के… Continue reading निःशब्द ‘युवा’ (कविता)


