दर्द का हिसाब (कविता)

दर्दों का कारवां, साथ चलता ही रहा,

आँखें नम हुई, दिल थम सा गया।

अब इतना भी, दर्द न दे ऐ जिंदगी!

कि हिसाब भी, इसका कर न सकूँ।

कुछ देकर दर्द, इतराते हैं,

कुछ लेकर दर्द, हिम्मत बढ़ाते हैं।

बस आदत अपनी कुछ ऐसी है,

जो दर्द में भी दर्द सहती है।

अब हिम्मत नहीं है, मुझमे ऐ जिंदगी,

कि कर सकूँ दर्द से दर्द का हिसाब।

4 thoughts on “दर्द का हिसाब (कविता)”

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