समय बलवान है

ऐ वक्त और कितना साधेगा चाहे तू जितना भी साध ले लेकिन याद रखना मैं भी जिद्दी हूं हार नही मानूंगी, कहीं किसी मोड़ पर तुझे बदलने के लिए मजबूर कर दूंगी विश्वास मुझे है तू मेरे साथ होगा। जय हिन्द

कहती हूँ मैं (कविता)

कहती हूँ मैं सबसे, मुझे कोई दुःख नहीं रहती हूँ मैं अकेले, मुझे कोई दुःख नहीं दुःख इतना है कि, बस दुःख पी जाती हूँ फिर भी कहती हूँ कि, मुझे कोई दुःख नहीं । मुस्कुराती हूँ तो अधर, जलने लग जाते हैं   पश्चाताप करती हूँ तो, दिल बैठ जाते है फिर भी कहती… Continue reading कहती हूँ मैं (कविता)

ध्वज वंदना (रामधारी सिंह ‘दिनकर’)

नमस्कार ! सतहत्तरर्वें स्वाधीनता दिवस के अवसर पर आप सभी देशवासियों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ। स्वतंत्र भारत का यह स्वतंत्रता दिवस हम भारतियों को यह याद दिलाता है कि आजादी एक यात्रा है, मंजिल नहीं। राष्ट्र अपनी उपलब्धियों का जायजा लेता है। अतीत के बलिदानों को याद रखना तथा और भी अधिक उर्जावान होकर… Continue reading ध्वज वंदना (रामधारी सिंह ‘दिनकर’)

भारवि (संस्कृत-रचनाकार)

भारवि कालिदास के ही समकालीन थे। भारवि का कीर्ति का आधार-स्तम्भ उनकी एक मात्र रचना ‘किरातार्जुनीयम’ महाकाव्य है। इसकी कथावस्तु महाभारत से ली गई। इसमें अर्जुन तथा ‘किरात’ वेशधारी ‘शिव’ के बीच युद्ध का वर्णन है।   भारवि (मूलनाम- दामोदर) समय- 560 ई. लगभग, रचनाकाल- 580 ई. के लगभग। (छठी शताब्दी का उत्तरार्द्ध या सातवीं शताब्दी… Continue reading भारवि (संस्कृत-रचनाकार)

भवभूति (संस्कृत-रचनाकार)

भवभूति संस्कृत के महान कवि एवं सर्वश्रेष्ठ नाटककार थे। उन्होंने अपने नाटकों में संस्कृत और प्राकृत दोनों भाषाओँ का प्रयोग किया है। राजशेखर ने इन्हें वाल्मिकी का अवतार कहा है।    समय- 650 ई. से 750 के बीच माना जाता है। (7वीं शताब्दी का उतरार्द्ध)  जन्म स्थान- दक्षिणी भारत का पदमपुर नगर मूलनाम- श्रीकंठ/भट्ट श्रीकंठ… Continue reading भवभूति (संस्कृत-रचनाकार)

समय समाज और साहित्य

समय ना ठहरा है कभी, बदली कभी न चाल। जिसके जैसे कर्म हैं, उसका  वैसा  हाल  ।।       समय 'लेटिन' भाषा का शब्द है। समयका निर्माण सृष्टि के निर्माण के साथ हुआ होगा। समय पिछले युगों में था, इस युग में है और आनेवाले युग में भी रहेगा। जब तक सृष्टि रहेगा समय भी साथ… Continue reading समय समाज और साहित्य

डॉ. अहिल्या मिश्र : मेरी पहली भेंट

साहित्य समाज का दर्पण है और साहित्यकार मानव-समाज का दर्पण। साहित्यकार के अंतस में युग चेतना होती है। यही युग चेतना साहित्य सृजन करने का आधार बनती है। श्रेष्ठ साहित्य भावनात्मक स्तर पर व्यक्ति और समाज को संस्कारित करता है और उसे युग चेतना से साक्षात्कार करवाता है। साहित्यकार जिस समाज में रहता है, उस… Continue reading डॉ. अहिल्या मिश्र : मेरी पहली भेंट

भक्ति आंदोलन और रैदास

"भक्ति द्रविड़ उपजी लाए रामानंद प्रकट किया कबीर ने सप्तद्वीप नव खंड।।"1       भक्ति आन्दोलन का उदय मध्यकालीन इतिहास की एक प्रमुख घटना है। इसका उदय अकस्मात् नहीं हुआ है बल्कि पहले से ही इसकी निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, युगीन परिस्थितियों ने इसे गति प्रदान किया। भक्ति भावना का उद्भव सबसे पहले… Continue reading भक्ति आंदोलन और रैदास