समय समाज और साहित्य

समय ना ठहरा है कभी, बदली कभी न चाल।

जिसके जैसे कर्म हैं, उसका  वैसा  हाल  ।।

      समय ‘लेटिन’ भाषा का शब्द है। समयका निर्माण सृष्टि के निर्माण के साथ हुआ होगा। समय पिछले युगों में था, इस युग में है और आनेवाले युग में भी रहेगा। जब तक सृष्टि रहेगा समय भी साथ रहेगा। समय परिवर्तनशील है। समय जीवन की सबसे कीमती चीज है। इसका न आदि है और न अंत। समय को न बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है। यह एक चक्र है, जो हमारे जीवन को प्रभावित करता है। समय किसी के साथ पक्षपात नहीं करता है। जो समय के साथ चलता है। उसकी कामयाबी निश्चित है। साहित्य ने भी अपने आप को समय के साथ जोड़ दिया। हिंदी साहित्य ने आदिकाल से लेकर अब तक कई परिवर्तनों को देखा है। साहित्य और साहित्यकारों ने कभी भी इसका साथ नहीं छोड़ा। इसलिए यह (साहित्य) कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा।

      समाज- ‘समाज’ शब्द संस्कृत के दो शब्दों ‘सम’ और ‘अज’ से बना है। ‘सम्’ का अर्थ ‘इक्कट्ठा या एक साथ रहना’ और ‘अज’ का अर्थ ‘साथ रहना’ है। अतः समाज शब्द का अर्थ एक साथ रहनेवाला समूह हुआ। साहित्य और समाज का घनिष्ट संबंध है। कोई भी साहित्यकार समाज में रहकर ही साहित्य की रचना करता है। बिना समाज के साहित्यकार का कोई महत्व नहीं है। साहित्यकार समाज में रहकर समाज में घटित होनेवाली अनेक घटनाओं को अपनी रचनाओं में व्यक्त करता है। साहित्य में जितने भी व्यक्तिक सुख-दुःख, राग-विराग सफलता-असफलता आदि का चित्रण होता है। वे सब समाज से ही आये है। समाज अपना पूर्ण स्वरुप तबतक नहीं पा सकता है, जबतक कि मनुष्यों में पारस्परिक संबंध न हो। उनके बीच किसी भी प्रकार का लेन-देन न हो या कोई क्रिया प्रतिक्रियाँ न हो। श्री संपूर्णानंद अपनी पुस्तक ‘समाजवाद’ में लिखते हैं- “समम् अजन्ति जनाः अस्मित् इति, यह समाज शब्द का अर्थ है। जिसमे लोग मिलकर एक साथ, एक गति-से चले।”1 यानी मनुष्य समाज की मूलभूत इकाई है।

      साहित्य- किसी भाषा के ‘वाचिक’ और ‘लिखित’ को साहित्य कहते हैं। दुनिया के सबसे पुराना वाचिक साहित्य, आदिवासी भाषाओं से प्राप्त होता है।

      साहित्य शब्द कि व्युत्पत्ति- ‘सहितस्य भाव साहित्य्’ अथार्त ‘सहित’ का भाव ‘साहित्य’ है। सहित- स+हित= अथार्त जिसमे सभी के हित का भाव हो वह साहित्य है। समाज के बिना साहित्य का कोई स्थान नहीं है। साहित्य का जन्म, समाज के बिना असंभव है। समाज को साहित्य से नये जीवन की प्राप्ति होती है। साहित्य किसी भी समाज, देश और राष्ट्र की नींव है। यदि नींव सुदृढ़ होगी तो उसका भवन भी सुदृढ़ होगा। देखा जाए तो साहित्य मनुष्य के मस्तिष्क से उत्पन्न होता है क्योंकि मनुष्य समाज का अभिन्न अंग है। जन्म से लेकर निधन तक मनुष्य समाज में ही रहता है। वह चाह कर भी समाज से अलग नहीं हो सकता है। समाज में रहकर मानव अनेक प्रकार का अनुभव ग्रहण करता है। उसी समाज से प्राप्त अनुभव को जब वह शब्द द्वारा व्यक्त करता है, तब वह साहित्य बन जाता है। समाज साहित्य को प्रभावित करता है और साहित्य समाज पर प्रभाव डालता है। दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं। साहित्य का समाज से वही संबंध है जो संबंध आत्मा का शरीर से होता है। साहित्य समाज रूपी शरीर की आत्मा है। साहित्य अजर-अमर है।

      महान विद्वान योननागोची के शब्दों में- “समाज नष्ट हो सकता है, राष्ट्र भी नष्ट हो सकता है, किन्तु साहित्य का नाश कभी नहीं होता।”

      साहित्य संस्कृत के ‘सहित’ शब्द से बना है. संस्कृत विद्वानों के अनुसार साहित्य का अर्थ है- “हितेन सह सहित तस्य भवः” अर्थात साहित्य लोककल्याण के लिए सृजित किया जाता है। साहित्य का उद्देश्य मनोरंजन करना मात्र नहीं है, अपितु इसका उद्देश्य समाज का मार्गदर्शन करना भी है।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में-

                  “केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए

                  उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए”2

साहित्य की परिभाषाएँ:

आचार्य भामह के शब्दों में- “शब्दार्थों सहितौ काव्यम् गद्दं पद्दं च तद्धिधा” (शब्द और अर्थसहित साहित्य काव्य है, जिसके गद्द एवं पद्य दो भेद हैं)

महावीर प्रसाद के शब्दों में- “ज्ञान राशि के संचित कोश का नाम साहित्य है।”

डॉ नगेन्द्र के शब्दों में- “साहित्य आत्माभिव्यक्त जीवन की अभिव्यक्ति है।”

प्रेमचंद के शब्दो में- “साहित्य जीवन की आलोचना है।”

प्रेमचंद के शब्दो में- “साहित्य उसी रचना को कहेंगे जिसमे कोई सच्चाई प्रकट की गई हो, जिसमे दिल और दिमाग पर असर डालने का गुण हो”

बालकृष्ण भट्ट के शब्दों में- “साहित्य जन समूह के हृदय का विकास है।”

श्यामसुन्दरदास के शब्दों में- “साहित्य वह है जिसमे जो कुछ लिख गया है। वह कला के उद्देश्यों की पूर्ति करता है।”

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में– “प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृति का संचित प्रतिबिंब होता है। तब यह निश्चित है कि जनता की चितवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरुप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अंत तक इन्हीं चित्तवृतियों की परंपरा को परखते हुए साहित्य परंपरा के साथ उनका सामंजस्य दिखाना ही साहित्य का इतिहास कहलाता है।”3  

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने साहित्य को ‘ज्ञानराशि का संचित कोश’ कहा है।

पंडित बालकृष्ण भट्ट ने- साहित्य को ‘जन समूह के हृदय का विकास’ मानते हैं।

      हिंदी साहित्य का आरंभ आठवीं शताब्दी से माना जाता है। प्राचीन समय से ही हमारी भारतीय सभ्यता अति उत्तम और समृद्ध थी। हमारी सभ्यता इतनी उन्नत थी कि हम आज भी उस पर गर्व करते हैं। भारतीय संस्कृत साहित्य ऋग्वेद से प्रारंभ होता है। व्यास, वाल्मीकि आदि अनेक ऋषियों-मुनियों ने महाभारत एवं रामायण जैसे महाकाव्यों की रचना किया। भास, कालिदास आदि आचार्यों ने संस्कृत में नाटक लिखे हैं। ये हमारे साहित्य के अमूल्य धरोहर हैं। भक्ति साहित्य में गोस्वामी तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई, कबीर, रसखान, मैथिली में विद्यापति आदि प्रमुख हैं। जिस देश और समाज का साहित्य जितना अधिक समृद्ध होगा, वह देश और समाज भी उतना ही समृद्ध होगा। किसी देश और समाज की पहचान उसकी समृद्ध साहित्य से होता है।

      मानव सभ्यता के विकास में साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। विचारों ने साहित्य को जन्म दिया तथा साहित्य ने मानव की विचारधारा को गतिशीलता प्रदान की और उसे सभ्य बनाने का कार्य किया। मानव की विचारधारा में परिवर्तन लाने का कार्य साहित्य द्वारा ही किया जाता है। इतिहास भी साक्षी है कि किसी भी देश या समाज में आज तक जितने भी परिवर्तन या बदलाव आए उसमे साहित्य का महतवपूर्ण योगदान रहा है। साहित्यकार समाज में फैली अनेक कुरीतियों, विसंगतियों, विकृतियों, अभावों, विसमताओं, असमानताओं आदि के बारे में लिखता है। साहित्यकार साहित्य के माध्यम से जनमानस को जागरूक करने का कार्य करता है। साहित्य समाज और जनहित के लिए है। जब सामाजिक जीवन में नैतिक मूल्यों का पतन होने लगता है तो साहित्य जनमानस का मार्गदर्शन करता है।

      मानव को जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन के हर क्षेत्र में समाज की आवश्यकता पड़ती है। मानव समाज का एक अभिन्न अंग है। जीवन में मानव के साथ क्या घटित होता है, उसे साहित्यकार शब्दों में सजाकर साहित्य की रचना करता है। अर्थात साहित्यकार जो समाज देखता है, अनुभव करता है, चिंतन करता है, उसे वह लिख देता है। साहित्य सृजन के लिए साहित्यकार को विषयवस्तु समाज के ही विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त हो जाती है। साहित्यकार साहित्य की रचना करते समय अपने विचारों और कल्पनाओं को भी सम्मिलित करता है।

साहित्य के तत्व-

      साहित्य के मुख्यत चार तत्व निर्धारित कए गए हैं-

            1. भाव तत्व 2. बुद्धि तत्व 3. कल्पना तत्व और 4. शैली तत्व

      1. भाव तत्व- साहित्य में भाव तत्व सबसे अधिक भाव उत्पन्न करनेवाला होता है। भारतीय साहित्यकारों ने इसे साहित्य की आत्मा कहा है। भाव तत्व के अभाव में साहित्य निष्प्राण व निर्जीव हो जाता है। यह पाठक और श्रोता का भी संस्कार करता है। भाव को साकार रूप देनेवाले शब्द, अर्थ और कल्पना है। बिना किसी उक्ति चमत्कार या बौद्धिक प्रयत्न के भी भाव तत्व का गहरा प्रभाव साहित्य में रहता है। साहित्य का प्रमुख लक्षण रागात्मकता है। जिसके लिए भावों का चित्रण अपेक्षित है। सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर जब साहित्यकार उदात्त भावभूमि में पहुँचकर कुछ सीखता है तभी वह रचना सत् साहित्य की महिमा से विभूषित होती है। भाव के संबंध में भारतीय आचार्यों ने तीन अंगों का विवेचन किया है- आलंबन, उद्दीपन और अनुभव। आधुनिक मनोवैज्ञानिकों ने भी इन्हें स्वीकार किया है। हमारे प्राचीन आचार्यों ने साहित्य की इस आत्मा-भाव को हजारों वर्ष पहले ही पहचान लिया था। आचार्य भरतमुनि ने स्पष्ट रूप से साहित्य का लक्ष्य भावानुभूति को घोषित करते हुए भावनाओं का वर्गीकरण और विश्लेषण किया है। उन्होंने भावों के दो वर्ग किये हैं- संचारी भाव और स्थायी भाव। भरतमुनि के भाव संबंधी इस विवेचना को आगे बढ़ाने का कार्य भोजराज, अभिनवगुप्त, विश्वनाथ, मम्मट आदि आचार्यों ने किया।      

      2. कल्पना तत्व- कल्पना साहित्य का दूसरा तत्व है। साहित्य में भावनाओं का चित्रण कल्पना शक्ति के प्रयोग द्वारा ही संपन्न होता है। रूप-सृष्टि करनेवाली शक्ति कल्पना है। दृश्यों को सामने प्रस्तुत करना कल्पना का ही काम है। काव्य में सौंदर्य चमत्कार की सृष्टि भी कल्पना के द्वारा ही की जाती है। “न जाने हमारे कितने कवियों ने नारी की सूक्ष्म छवि के अंकन में अपनी अद्भुत कल्पना का परिचय दिया है। सुन्दरियों के सामान्य रूप-वैभव को उन्होंने चंद्र की ज्योत्सना, दामिनी की चमक, रजनी की शीतलता, ओस की तरलता, पुष्प की प्रफुल्लता आदि से समन्वित कर अलौकिकता प्रदान कर दी है। यही नहीं, संसार के अनेक निर्जीव पदार्थों और प्रकृति के अनगिनत चेतना विहीन रूपों को भी कवि की कल्पना ने सजीवता और चेतना प्रदान की है। धरती की गोद में कल-कल प्रवाहिनी सरिता को कालिदास की कल्पना ने एक ऐसी मद-विह्वला रमणी का रूप प्रदान कर दिया जिसके अगाध जलरूपी नितंबों से लहरों के रूप में उद्वेलित वस्त्र बार-बार खिसकता जा रहा था। भर्तृहरि की कल्पना नारी के उरोज द्वय में एक ऐसी दुर्गम घाटी की रचना कर लेती है, जहाँ समरूपी तस्कर विराजमान है और जो मन रूपी पथिकों का सर्वस्व लूट लेता है। वह आगे चलकर केशव, बिहारी, पद्द्माकर, भारतेंदु, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा की कल्पना जो चमत्कार दिखाती है, उसका तो कहना ही क्या! वस्तुतः प्रत्येक युग और प्रत्येक भाषा का साहित्य कल्पना शक्ति की अपूर्व क्षमता, अद्भुत वैभव और आलौकिक चमत्कार की कहानियों से भरा पड़ा है।”4 साहित्य जगत का सम्राट भाव और कल्पना उसकी दासी है।

      कॉलरिज के शब्दों में- “कल्पना के माध्यम से हम अतीत एवं भविष्य की वस्तुओं का साक्षात्कार करते हैं।”

      3. बुद्धि तत्व- बुद्धि तत्व को विचार तत्व भी कहा जाता है। बुद्धि तत्व, भाव एवं कल्पना तत्व में समन्वय करता है। यह तत्व साहित्य को विश्वसनीय बनाता है। बुद्धि तत्व का महत्व इस बात से है कि यह भाव, कल्पना आदि का ठीक संयोजक और शब्द का प्रयोग औचित्यपूर्ण हो औचित्य के बिना विश्वसनीयता और प्रभाव नष्ट हो जाता है। साहित्य में वस्तुओं और घटनाओं का चित्रण उचित रूप में ही किया जाता है। कथावस्तु की सूक्ष्म रेखाओं के निर्माण के लिए, घटनाओं की श्रृंखला को मिलाने के लिए और उसे कार्य के अनुरूप फल दिखाने के लिए प्रत्येक रचनाकार, कहानीकार और उपन्यासकार को अपनी बुद्धि का प्रयोग करना होता है। अतः न्यूनाधिक मात्रा में ही सही, साहित्य में बुद्धितत्व सर्वत्र विद्यमान रहता है।

      विलियम ने बुद्धि तत्व के बारे लिखा है कि- “बुद्धि या विचार तत्व काव्य को ग्राह्य बनाता है।”

      4. शैली तत्व- काव्य के प्रथम तीन तत्व भाव पक्ष से संबंधित है तथा शैली तत्व का संबंध कला पक्ष से है। शैली के अंतर्गत भाषा, शब्द-चयन, अलंकारों का प्रयोग और छंदों का उपयोग तथा काव्य-रूप आदि का समावेश किया जाता है। साहित्य में भाव, कल्पना, बुद्धि ये तीन तत्व यदि उसके प्राण है तो ‘शैली’ उसका शरीर है। जैसे बिना शरीर के प्राण नहीं टिक सकता वैसे ही बिना ‘शैली’ के साहित्य सृजन नहीं हो सकता है। सर्वोत्तम साहित्य वह है जिसका भाव और शैली से भी काम चल सके। पाश्चात्य विद्वानों ने शैली का संबंध कवि के व्यक्तित्व से माना है। “साहित्य की आत्मा का तो पूर्ण साक्षात्कार तभी संभव है जबकि हमारे हृदय में भावनाओं और अनुभूतियों का प्रकाश हो। हमारे मस्तिष्क में गंभीर अध्ययन की ज्योति हो और हमारे व्यक्तित्व में साधन का बल हो।”5

      टी. एस. इलियट के शब्दों में- “कथन का विशिष्ट तरीका शैली है तथा शैली ही काव्य है।”

साहित्य के भेद- 1.पद्द 2. गद्द 3. चंपू

1.पद्द- पद्द के दो भाग है-

(i). प्रबंधकाव्य- प्रबंध काव्य के तीन भेद हैं- (क) महाकाव्य (ख) एकांतक काव्य

      (ग) खंडकाव्य 

(ii). मुक्तक काव्य- (चालीसा, सतसई, हजारा, पच्चीसी, दशक, बावनी, आदि)

2. गद्द- (गद्द विचार प्रधान रचना है)

गद्द के दो प्रकार हैं-

(क) दृश्य – नाटक, एकांकी, रूपक, भाण, डिम, वीथी, उप-रूपक, प्रहसन, समवकार, सट्टक ईहामृग आदि  

(ख) श्रव्य- निबंध, कहानी, उपन्यास, रेखाचित्र, संस्मरण, यात्रावृत्त, जीवनी, आत्मकथा, डायरी आदि   

3. चम्पू- गद्द-पद्द मिश्रित रचित चम्पू काव्य है।   

      साहित्य ने सदैव राष्ट्र और समाज को नई दिशा देने का कार्य किया है। साहित्य जनमानस को सकारात्मक सोच तथा लोक कल्याण के कार्यों के लिए प्रेरणा देने का कार्य करता है। साहित्य के विकास की कहानी मानव सभ्यता के विकास की गाथा है। इसलिए यह अति आवश्यक है कि साहित्य लेखन निरंतर जारी रहे, अन्यथा सभ्यता का विकास अवरुद्ध हो जाएगा। मानव और मानव समाज परिवर्तनशील है। परिवर्तन के इस दौर में हमें अतीत और वर्तमान को जोड़कर जो अच्छा है उसे ग्रहण करने की और जो अच्छा नहीं है उसे निर्भीक रूप से त्यागने की क्षमता रखना होगा। तभी मानव समाज का भविष्य बेहतर हो सकता है। “साहित्य का मुख्य प्रयोजन हित साधना है। साहित्य मनुष्य के जीवन और जगत, आत्मा और परमात्मा, देश और समाज, आनंद और विषाद, महानता और हीनता का एक सबल मापदंड है। साहित्य मानव जीवन के मनुष्य के अनुभव और अनुभूतियों का विराट रूप है। साहित्य मानव के विकास में जितना सहायक होता है उसी प्रकार समाज के विकास में भी उसका दायित्व उतना अधिक होता है। समाज में साहित्य के माध्यम विचार तरंगे प्रभावित होती है। इन तरंगों से समाज की गतिविधियाँ प्रभावित होती हैं। साहित्य समाज में पाए जानेवाले गुण-दोष, उचित-अनुचित, न्याय-अन्याय आदि का निर्णायक होता है।6       

      साहित्य समाज की आत्मा है। साहित्य के द्वारा ही एक सभ्य समाज का निर्माण संभव हो पाता है। वह मनुष्य को जीवन जीने की राह दिखाता है। साहित्य समाज की सूक्ष्म और विकट परिस्थितियों तथा विषमताओं को विश्लेषित करता है और समाज के लिए नई मार्ग का निर्माण करता है। साहित्य और समाज सूई धागे के सामान है जो एक दूसरे के बिना निरर्थक है। दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। साहित्य समाज की वह कृति है जो समाज और मनुष्य को मनुष्यता, सभ्यता और संस्कृति की ओर ले जाती है। साहित्य के हर पहलू समाज रूपी धागों से बुना हुआ है।    

सन्दर्भ ग्रंथ:

1. श्री संपूर्णानंद, ‘समाजवाद,’ पृष्ठ सं. 1 काशी विद्यापीठ बनारस, संवत् 2004

2. भारत भारती – मैथली शरण गुप्त

3. हिंदी साहित्य का इतिहास 1929 ई.

4. साहित्य निबंध- गंपतिचंद्र गुप्त, पृष्ठ सं. 08-09

5. साहित्य निबंध- गंपतिचंद्र गुप्त, पृष्ठ सं. 10

6. साहित्य में युग चेतना का महत्व- वी. गोविंद (‘विवरण’, मार्च, 2014, पृष्ठ सं, 09

7. हिन्दी विकीपीडिया

8. egyankosh.ac.in

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