
साहित्य समाज का दर्पण है और साहित्यकार मानव-समाज का दर्पण। साहित्यकार के अंतस में युग चेतना होती है। यही युग चेतना साहित्य सृजन करने का आधार बनती है। श्रेष्ठ साहित्य भावनात्मक स्तर पर व्यक्ति और समाज को संस्कारित करता है और उसे युग चेतना से साक्षात्कार करवाता है। साहित्यकार जिस समाज में रहता है, उस समाज की छवि उसके साहित्य में दिखाई देती है। डॉ. अहिल्या मिश्र दक्षिण भारत में हिंदी की अलख जगाने वाली ओजस्वी महिला हैं।
स्वतंत्रता सेनानी ‘स्वर्गीय रामानंद मिश्र’ की सुपुत्री अहिल्या मिश्र का जन्म 16 सितंबर, 1948 ई. को सागरपुर सकरी, मधुबनी (मिथिला), बिहार में हुआ था। इनकी मातृभाषा मैथिली/बज्जिका है। अहिल्या मिश्र का बचपन राजनैतिक चहल-पहल के बीच गुजरा था। इनके पिताजी लोहियावादी थे। उसका प्रभाव इनके उपर पड़ना भी स्वाभाविक था। अपने बचपन के दिनों को वे याद करते हुए कहती हैं- “पिताजी सक्रिय राजनीति में….लोहियावादी थे। उनका प्रभाव मेरे ऊपर पड़ा है। अपने पिता से सीखी हुई बातों को ही इन्होंने अपने जीवन में उतारा और उनके पद चिह्नों पर चलने के लिए अग्रसर रहीं।
इन्होंने हैदराबाद के केंद्रीय विश्वविद्यालय से विद्यापति की काव्य भाषा पर अपना लघुशोध प्रबंध (एम् फिल) और उस्मानिया विश्वविद्यालय से डॉ. विष्णु स्वरुप के निर्देशन में ‘विद्यापति की पदावली का शैलीतात्विक अध्ययन’ पर पीएच. डी. शोध प्रबंध किया। पिछले चालीस-पचास दशकों से हैदराबाद में रहते हुए तेलंगाना में साहित्य लेखन के साथ-साथ समाज सेवा का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती रही हैं। इन्होंने दस हजार आर्थिक रूप से कमजोर एवं अल्पशिक्षित बालिकाओं एवं गृहिणियों को हिंदी प्रचार सभा की विभिन्न परीक्षाओं में सम्मिलित कराते हुए, उन्हें प्रशिक्षित करवाया और हिंदी शिक्षिका के लिए जीविकोपार्जन के योग्य बनाया है।
इन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध, नाटक, समीक्षा, अनुवाद और संपादकीय आदि के माध्यम से स्त्री व्यथा के साथ स्त्री सशक्तिकरण और समाज में व्याप्त अनेक विसंगतियों को उजागर किया है। साहित्य और नारी उत्थान के क्षेत्र में अहिल्या जी के कार्य अति सराहनीय हैं। जवलंत सामाजिक समस्याओं पर भी वे प्रश्न उठाने में चूकती नहीं हैं। अहिल्या जी हिंदी साहित्य एवं समाज सेवा के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त कर चुकी हैं। दक्षिण भारत में दीर्घकालीन हिंदी प्रचार-प्रसार एवं हिंदी भाषा और साहित्य सेवा के लिए ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ की ओर से इन्हें 2020 में ‘श्री ब्रजमोहन रावत पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया है।

भारतीय संस्कृति, संसार की अन्य संस्कृतियों में सर्वश्रेष्ठ है। इस संस्कृति की धरोहर नारी है। इस संस्कृति में नारी काफी उन्नत और सुदृढ़ थी। समाज में पुत्र-पुत्रियों को समान अधिकार प्राप्त थे। मनु स्मृति में पुत्री के लिए संपत्ति में चौथे हिस्से का विधान था। उपनिषद् काल में पुरुषों के साथ स्त्रियों को भी समान शिक्षित किया जाता था। लव-कुश के साथ अत्रेयी भी पढ़ती थी। नारी सैनिक शिक्षा भी प्राप्त करती थी। वेद, पुराण, लौकिक काव्य आदि सभी में नारी को वामांगी कहा गया है। वैदिक साहित्य में नारी का स्थान उच्च था। आज स्त्री शिक्षा बहुत बड़ी मुद्दा बना हुआ है लेकिन हजारों वर्ष पहले ‘मैत्रेयी’ ने अपनी विद्वता से स्त्री जाती का मान बढ़ाया था। उन्होंने यह सावित किया था कि पत्नी धर्म का निर्वाह करते हुए भी ज्ञान अर्जित किया जा सकता है। ब्रह्मवादिनी विश्ववारा, लोप मुद्रा, घोषा, इन्द्राणी, देवयानी आदि महिलाओं ने वेदों कि रचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हर्ष काल में हथियार धारण करने वाली स्त्रियाँ प्रतिहारी कहलाती थी। वैदिक साहित्य में नारी पूज्यनीय और स्वतंत्र रही। उनका स्थान ऊँचा था लेकिन हिंदी साहित्य के प्रारंभिक काल से ही नारी ने देवी के रूप में भोग्या का रूप धारण कर लिया था। यद्यपि इस युग में भी नारियों के वीरता में कोई कमी नहीं आई। कई रूपों में उनकी उपासना होती रही है। आजादी की लड़ाई में भी नारी की अहम् योगदान तथा भूमिका दिखाई देता है।
आधुनिक युग में छायावादी कवियों ने नारी के प्रति उदात्त दृष्टिकोण अपनाकर समाज में उसके सम्मानीय स्थान को प्रतिष्ठित किया। प्रसाद जी के हृदय में नारी का ऊँचा स्थान था। तभी तो उनकी लेखनी से यह निकला-
“नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास रजत नग पग तल में,
पीयूस स्रोत सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में।।”
पंत ने देवी, माँ, सहचरी, प्राण कहकर नारी के प्रति अपने आदर का परिचय दिया है-
“तुम देवी! आह कितनी उदार
वह मातृमूर्ति है निर्विकार।
हे सर्वमंगले! तुम महती
सबका दुःख अपने पर सहती।।”
नारी को सशक्त बनने के लिए पहले उसे अपने आत्मविश्वास को जगाना होगा। अहिल्या मिश्र जी की मान्यता है कि जब स्त्री “अपने भोग्या रूप के केंचुल को छोड़कर आगे बढ़ने की मानसिकता बना लेगी तो कोई ऐसा व्यक्ति नहीं होगा जो इसे अपंग व असहाय बना सके। अपनी अस्मिता को पहचानने की मानसिकता, ज्ञान के प्रकाश में ही संभव हो सकती है। अन्य कोई भी निरापद मार्ग नहीं है।” इसका यह मतलब नहीं है कि स्त्री घर परिवार छोड़कर आक्रामक तथा विद्वेषपूर्ण बने।
21वीं शताब्दी में डॉ. अहिल्या मिश्र जी की जो आत्मकथा आई है- ‘दरकती दीवारों से झाँकती जिंदगी’ यह आत्मकथा उनकी अभिव्यक्ति की सादगी, उनके जीवन के अनेक खट्टी-मिठ्ठी अनुभव, भावों को संप्रेषणीयता के साथ मानवीय मूल्यों को जीने की ललक सिखाती है। उन्होंने अनेक स्तरों पर पुरानी सामाजिक मान्यताओं के साथ नई की स्थापना करना, रिश्तों की नई परिभाषा गढ़ना, स्त्री शोषण, जमींदारी प्रथा आदि बंधन को तोड़कर विकास के रास्ते पर बढ़ते रहने का कार्य किया है। यही उनके जीवन का लक्ष्य है।
‘कादम्बिनी’ हिन्दुस्तान टाइम्स समूह की एक सामाजिक व साहित्यिक पत्रिका निकलती थी। उस पत्रिका के बारे में मैं जानती थी। किंतु ‘कादम्बिनी क्लब हैदराबाद’ के विषय में मुझे कुछ भी पता नहीं था। पाँच छह वर्ष पूर्व की बात है। कादम्बिनी क्लब हैदराबाद का कुछ प्रोग्राम मुझे सोशल मिडिया पर देखने को मिला था। मुझे बहुत ख़ुशी हुई थी। मन में इच्छा हुई कि मैं भी इस संस्था से जुड़ पाती लेकिन इसके बारे में मुझे कुछ भी जानकारी नहीं थी। मैं एक दिन डॉ. सुषमा मैडम जी से बातें करते हुए बोली। कोई साहित्यिक सभा वैगेरह हो तो मुझे बताइयेगा। उन्होंने तुरंत कहा, रविवार को कादम्बिनी क्लब का प्रोगाम है, वहाँ आइये। मैं बहुत खुश होकर बोली, ठीक है, आप मुझे उस जगह का पता भेज दीजियेगा। मैं समय से पहुँच जाऊँगी। उन्होंने पता भेज दिया। अगले दिन रविवार को मैं गंतव्य स्थान पर पहुँच गई। वहाँ जाने के बाद मुझे थोड़ा सा भी एहसास नहीं हुआ कि यहाँ मैं पहली बार आई हूँ। मैं डॉ. अहिल्या जी के पास जाकर उनसे मीली और अपना परिचय बताई। वे बहुत खुश हुईं और आशीर्वाद दिया। ‘बिन मांगे मोती मिले मांगे मिले न भीख’। किसी ने सच कहा है- ‘आप जिस चीज को जब दिल से चाहती है, वह जरुर मिलता है।’ भोजन का समय था, सभी भोजन कर रहे थे। पता चला कि उस दिन डॉ. अहिल्या मिश्र जी के घर पर विशेष कार्यक्रम था। उन्होंने बताया कि नये घर के गृहप्रवेश में मैं सभी को आमंत्रित नहीं कर पाई थी। इसलिए आपलोगों के लिए आज अलग से भोजन की व्यवस्था घर पर ही की गई है। उन्होंने मुझसे कहा कि पहले आप भोजन कर लो। मैं बोली, मैडम मैं भोजन करके आई हूँ। फिर उन्होंने कहा, कोई बात नहीं, थोड़ा प्रसाद खा लो। भोजन के बाद बहुत ही सुन्दर काव्य पाठ शुरू हुआ। उन्होंने मुझे भी मंच दिया। मैने भी अपनी एक छोटी सी कविता ‘लकीरें’ पढ़ी। मैं हैदराबाद में पंद्रह वर्षों से रह रही हूँ, लेकिन इस संस्था के विषय मैं अब तक नहीं जान पाई थी, इसका मुझे बहुत दुःख हुआ और साथ में ख़ुशी भी हुई कि ‘जब जागों तभी सबेरा’। डॉ. अहिल्या जी के विषय में मैने जितना जाना है, उसी में मैंने यहाँ कुछ लिखने का प्रयास किया है। इसके लिए मैं डॉ. अहिल्या मिश्र जी के प्रति कृतज्ञ रहूँगी।