भवभूति संस्कृत के महान कवि एवं सर्वश्रेष्ठ नाटककार थे। उन्होंने अपने नाटकों में संस्कृत और प्राकृत दोनों भाषाओँ का प्रयोग किया है। राजशेखर ने इन्हें वाल्मिकी का अवतार कहा है।
समय- 650 ई. से 750 के बीच माना जाता है। (7वीं शताब्दी का उतरार्द्ध)
जन्म स्थान- दक्षिणी भारत का पदमपुर नगर
मूलनाम- श्रीकंठ/भट्ट श्रीकंठ
दार्शनिक नाम- उदुम्बर / उम्बेक / उम्बिकाचार्य
दादा/ पितामह- भट्ट गोपाल
पिता- नीलकंठ, माता- जतुकरनी
गुरु- ज्ञानविधि व कुमारिल भट्ट दोनों हैं।
इनके आश्रयदाता ‘यशोवर्मा’ थे।
उपाधियाँ-
1. ‘पदवाक्यप्रमाणज्ञ’ (ऐसी मान्यता है कि यह उपाधि इन्हें इनके आश्रयदाता शासक यशोवार्मा ने दिया था )
2. ‘वश्यवाक’ (महावीर चरित में इन्होंने स्वयं अपने आप को कहा है)
3. ‘परिणतप्रज्ञ’ (उत्तररामचरितम में अपने आपको स्वयं कहा है)
4. इन्हें ‘शिखरिणी’ कवि कहा गया है।
विशेष तथ्य:
* इनकी प्रिय रीति ‘गौड़ी’ रीति है। (इनकी उत्तरराचरितम में गौड़ी एवं वेदर्भी दोनों रीतियों का समन्वय मिलता है।)
* इनका प्रिय रस- करुण है।
* प्रिय काव्य गुण- ओज है।
* इनके प्रिय छंद दो हैं- अनुष्टुप और शिखरिणी है।
क्षेमेन्द्र ने सुवृत्तितिलक में भवभूति के शिखरिणी छंद की प्रशंसा करते हुए लिखा है-
“भवभूते: शिखरिणी निरर्लगतरंगिणी, रुचिरा घनसंदर्भे या मयूरीव नृत्यति।।”
भवभूति के प्रमुख रचनाएँ:
1. ‘मालतीमाधवम’ (प्रकरण) प्रकरण में कथा काल्पनिक होता है। इसमें दस अंक है।
नायक-वणिक, नायिका सजातीय होती है। यह नाटक का लघु रूप है। शेष लक्षण रूपक के सामान है। यह शृंगार रस प्रधान रचना है।
कथानक- इसमें मालती एवं माधव के प्रेम एवं विवाह का चित्रण है।
2. महावीरचरितम (नाटक) यह महावीर पर आधारित नाटक है। यहाँ महावीर से अभिप्राय: इसके नायक श्रीरामचंद्र जी से है। यह सात खण्डों का नाटक है। इसमें रामचंद्र जी के राज्याभिषेक तक की घटनाओं का वर्णन है। इस नाटक में राम द्वारा शिव धनुष तोड़कर सीता वरण, रावन का क्रुद्ध होना, रावण द्वारा परशुराम को भड़काकर राम स्वयंवर में भेजना, सूपर्णखा को मंथरा के वेश में भेजना, बाली को भड़काना, बाली वध, सीता हरण, राम-रावण, राम का अयोध्या लौटना है। मालतिमाधवम की तुलना में यह प्रौढ़ नाटक है।
* उत्तररामचरितम (नाटक) इसमें कुल अंक सात है।
प्रथम अंक- राम को दुर्मुख नाम के दूत से सीतापवाद की सूचना मिलना, कराम द्वारा सीता का परित्याग करना
द्वितीय अंक- सीता के परित्याग के 12 वर्ष बाद द्वितीय अंक का आरंभ होता है। आत्रेयी व वासंती का संभासन, राम द्वारा अश्वमेध यज्ञ, वाल्मीकि द्वारा लव-कुश का पालन-पोषण, राम द्वारा दंडकारण्य में शंबूक का वध।
तृतीय अंक- इस अंक में ‘तमसा’ और ‘मरला’ दो नदियों के आपसी वार्तालाप से यह अंक आरंभ शुरू होता है। सीता का प्राण विसर्जन करने के लिए गंगा में कूदना, गंगा ध्वाएअ लव-कुश को वाल्मीकि को समर्पत करना, गंगा द्वारा सीता को सूर्य की उपासना के लिए कहना।
चतुर्थ अंक- वाल्मीकि के आश्रम में जनक, कौशल्या, वशिष्ठ का आगमन।
पंचम अंक- यज्ञश्व के रक्षक चंद्रकेतु द्वारा युद्ध का वर्णन।
षष्ठ अंक- विदद्याधर युगल द्वारा का वर्णन।
सप्तम अंक- गर्भांग नाटक का प्रयोग वाल्मीकि की योजना से राम व सीता का मिलन।
उत्तररामचरितम के प्रमुख पात्र- दशरथ. शांता (दशरथ की पुत्री), अष्टावक्र, उर्मिला, सीता, चित्रकार अर्जुन, चन्द्रकेतु (लक्षमण का पुत्र), शंबूक (एक शुद्र तपस्वी), वासंती (वनदेवी), अरुंधती (वाशिष्ठ की पत्नी), अगस्त्य, लोपामुद्रा (अगस्त्य की पत्नी) आत्रेयी (तपस्वीनी), तमसा, मुरला (दो नदियाँ)
उत्तररामचरितम विशेष तथ्य:
* इसमें नमस्कारात्मक मंगलाचरण हुआ है।
* रचनाकार- भवभूति, कुल अंक 07, विधा- नाटक, प्रधान रस- करुण,
* उपजीव्य ग्रंथ/ आधार ग्रंथ- 1.वाल्मीकिरामायण का उत्तरकांड 2. पदमपुराण का पातल खंड,
* इसमें 38 तरह के अलंकारों का प्रयोग हुआ है।
* प्रमुख अलंकार- उपमा, उत्प्रेक्षा, काव्यलिंग, अर्थान्तरन्यास
* इसमें 19 तरह के छंदों का प्रयोग हुआ है।
* इसमें कुल 256 श्लोक हैं।
* इसमें कुल 84 अनुष्टुप छंद, 30 शिखरिणी, 26, और 25 शार्दूल वीक्रीडित छंद का प्रयोग हुआ है।विशेष- कल्हण की राजतरंगिणी के अनुसार भवभूति और वक्यपतिराज कान्यकुब्ज (कन्नौज) के राजा यशोवार्मा के राजकवि थे। भवभूति की भाषा शैली पर बाणभट्ट का प्रभाव दिखाई देता है।