भारवि कालिदास के ही समकालीन थे। भारवि का कीर्ति का आधार-स्तम्भ उनकी एक मात्र रचना ‘किरातार्जुनीयम’ महाकाव्य है। इसकी कथावस्तु महाभारत से ली गई। इसमें अर्जुन तथा ‘किरात’ वेशधारी ‘शिव’ के बीच युद्ध का वर्णन है।
भारवि (मूलनाम- दामोदर)
समय- 560 ई. लगभग, रचनाकाल- 580 ई. के लगभग। (छठी शताब्दी का उत्तरार्द्ध या सातवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध)
जन्म स्थान- नासिक का अचलपुर (एलिचपुर) नामक स्थान पर हुआ था।
अवंतिसुंदरी कथा के अनुसार- ‘धारा नगरी’ और एन.सी. चटर्जी ने इनका जन्म त्रावणकोर का निवासी माना है
पिता का नाम– श्रीधर (सर्वमान्य), अवंतिसुंदरी कथा के अनुसार- नारायण स्वामी
माता का नाम- सुशीला, पत्नी का नाम- रसिकवती या रसिका, पुत्र का नाम- मनोरथ
गोत्र- कुशिक, उपाधि- आत्रपत्र भारवि (सोने का छाता), भारवि शैव संप्रदाय से है।
आश्रयदाता-
विष्णुवर्धन- (पुलकेशिन द्वितीय के अनुज)
सिंहविष्णु- (अवंतिसुंदरी कथा के अनुसार)
महेंद्र विक्रम- (सिंहविष्णु पुत्र)
दुर्विनीत है।
भारवि दंडी के प्रपितामह (परदादा) हैं।
भारवि की वाणी को ‘प्रकृति मधुरा’ कहा जाता है।
मल्लिनाथ ने भारवि की कविता को ‘नारिकेल फल’ की उपमा दी है।
दक्षिण में ‘ऐहोल’ शिलालेख में भारवि का उल्लेख है।
भारवि के बारे में विशेष तथ्य:
इनकी काव्य शैली- अलंकृत काव्य शैली/ रीति शैली है।
इनके काव्य मार्ग को ‘विचित्र मार्ग’ कहा जाता है।
भारवि अपने ‘अर्थ गौरव’ के लिए प्रसिद्ध है।
कथन: “भारवि की वर्णन शक्ति के विषय में संदेह का अवसर नहीं है। उनकी शैली उत्कृष्ट रूप में शांत गौरवमयी है, जो निश्चय ही आकर्षक है। वे प्रकृति और प्रमदाओं के सौन्दर्य निरीक्षण एवं उन्हें चित्रित करने में सर्वश्रेष्ठ है।” प्रो. बी. कीथ
इनकी एकमात्र रचना है- ‘किरातर्जुनियम’ (किरात वेशधारी शिव और अर्जुन है)
इसके 18 सर्ग है।
काव्यरूप- महाकाव्य
श्लोक= 1040/ 1030, उपजीव्य/ आधार ग्रंथ- महाभारत का वनपर्व
रीति- पांचाली, काव्य- ओज गुण
नायक- अर्जुन (धीरोदात्त)
प्रतिनायक- किरात वेशधारी शिव
नायिका- द्रोपदी
मुख्य रस- वीर, गौण रस- शृंगार
प्रथम सर्ग- इसमें 46 श्लोक है। इसमें वैदर्भी रीति का प्रयोग हुआ है। इसमें पद 1 से पद 44 तक वंशस्थ, 45वाँ पुष्पिताग्रा, 46वाँ मालिनी छंद है।
किरातर्जुनियम का आरंभ ‘श्री’ शब्द से हुआ है। भारवि का प्रिय छंद- वंशस्थ है।
किरातर्जुनियम में एकाक्षरी श्लोकों की संख्या = 7 है।
किरातर्जुनियम में कुल 25 तरह के और मुख्यतः तेरह तरह के छंदों का प्रयोग हुआ है।
भारवि ने 3 शब्दालंकारों, 60 अर्थालंकारों एवं 7 चित्राक्षर अलंकारों का प्रयोग किया है। सर्वाधिक प्रयुक्त अलंकार उपमा हैं।
प्रत्येक सर्ग के अंतिम पद में ‘लक्ष्मी’ पद का प्रयोग हुआ है। इसलिए इसे महाकाव्य ‘लक्ष्मीपदांक’ भी कहा जाता है।
श्रीकृष्णमा चरियम ने किरातर्जुनियम की 34 टीकाओं का उल्लेख किया है।
इसकी सर्वाधिक प्रामाणिक एवं प्रसिद्ध टीका- घंटापथ (अर्थ-राजमार्ग) मल्लिनाथ की है।
किरातर्जुनियम का 15वाँ सर्ग चित्रकाव्य के लिए प्रसिद्ध है।
भारवि का प्रसिद्ध एकाक्षरी श्लोक- 15वें सर्ग में आया है।
“न नोन नुन्नों नुन्नानो नाना नानानना ननु।
नुन्नोsनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुत।”
अर्थ- हे नाना मुख वाले! वह निश्चित ही मनुष्य नहीं है जो अपने से कमजोर से भी पराजित हो जाए। और वह भी मनुष्य नहीं है जो अपने से कमजोर को मारे। जिसका नेता पराजित न हुआ हो वह हार जाने के बाद भी अपराजित है। जो पूर्णतः पराजित को भी मार देता है वह पापरहित नहीं है।
कथानक- कौरवों पर विजय प्राप्त करने के लिए अर्जुन हिमालय पर्वत पर जाकर तपस्या करता है। किरात वेशधारी शिव से युद्ध और शिव द्वारा प्रसन्न होकर अर्जुन को पाशुपत अस्त्र प्रदान कर दिया जाता है।
पहला सर्ग- हस्तिनापुर भेजे गए वनेचर का द्वैतवन में आकर युधिष्ठिर से मिलना दुर्योधन के शासन प्रबंध का वर्णन तथा युधिष्ठिर के द्रौपदी के उत्तेजनापूर्ण कथन।
दूसरा सर्ग- युधिष्ठिर भीम का संवाद और व्यास जी का आगमन।
तीसरा सर्ग- युधिष्ठिर व्यास संवाद, व्यास द्वारा अर्जुन को पाशुपत अस्त्र की प्राप्ति के लिए हिमालय पर जाकर तपस्या करने का आदेश व अर्जुन का प्रस्थान।
चौथा सर्ग- इसमें शरद ऋतु का वर्णन है
पाँचवाँ सर्ग- हिमालय पर्वत का वर्णन
छठा सर्ग- हिमालय पर अर्जुन की तपस्या, तपस्या में बाधा उत्पन्न करने के लिए इंद्र द्वारा अप्सराओं को भेजना
सातवाँ सर्ग – इंद्र द्वारा भेजे गए गंधर्वों और अप्सराओं का आना और उनके विलासों का वर्णन
आठवाँ सर्ग- गंधर्वों एवं अप्सराओं द्वारा उद्दयान विहार एवं जल क्रीड़ा
नौवाँ सर्ग- सांयकाल,चंद्रोदय एवं प्रभात का वर्णन
दसवाँ सर्ग- वर्षा का वर्णन, अप्सराओं की चेष्टा का वर्णन, तपस्या में बाधा करने में विफल होना
ग्यारहवाँ सर्ग- मुनि रूप में इंद्र का आगमन, इंद्र अर्जुन संवाद, इंद्र द्वारा अर्जुन से शिवाराना के लिए कहना
बारहवाँ सर्ग- अर्जुन की तपस्या, शूकर के वेश में अर्जुन वध के लिए मूक नामक राक्षस का आगमन तथा किरात वेश में शिव का भी आगमन
तेरहवाँ सर्ग- शुकर रूपधारी मूक दानव पर शिव एवं अर्जुन द्वारा एक साथ प्रहार वराह की मृत्यु बाण के विषय में शिव के अनुचर एवं अर्जुन में विवाद
चौदहवाँ सर्ग- सेना सहित शिव का अगमन और अर्जुन से युद्ध
पंद्रहवाँ सर्ग- चित्रयुद्ध/ चित्र काव्य
सोलहवाँ सर्ग- शिव और अर्जुन में अस्त्र युद्ध
सत्रहवाँ सर्ग- शिव की सेना के साथ अर्जुन का युद्ध, शिव के साथ भी युद्ध
अट्ठारहवाँ सर्ग- शिव एवं अर्जुन में बाहुयुद्ध (द्वन्द्वयुद्) शिव का वास्तविक रूप में प्रकट होना अर्जुन को पाशुपत अस्त्र की प्राप्ति इन्द्रादि देवताओं द्वारा अर्जुन को विभिन्न दिव्यास्त्र देना अर्जुन का युधिष्ठिरके पास पहुँचना
संस्कृत की वृहत्त्रयी में शामिल रचनाएँ:
1. भारवि का किरातर्जुनियम
2. माघ का शिशुपालवधम
3. श्रीहर्ष का नैषधीयचरितम
संस्कृत में लघुत्रयी में शामिल रचनाएँ: 1. कुमारसंभवम 2. मेघदूतम 3. रघुवंशम अतः निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि महाकवि भारवि की साहित्य साधना अप्रतिम है।