चढ़ा जेठ
तपी धरा
चहू दिशा
बही गर्म बयार
ताल-तलैया सूख रहे
भीषण ताप से
झूलस रहा है
जन-जीवन
अब तो करो
रहम की दान।
जय हिन्द
मेरी रचनाएँ
चढ़ा जेठ
तपी धरा
चहू दिशा
बही गर्म बयार
ताल-तलैया सूख रहे
भीषण ताप से
झूलस रहा है
जन-जीवन
अब तो करो
रहम की दान।
जय हिन्द