ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे !!ॐ!!
Author: इंदु सिंह
माता जी की आरती
आरती जगजननी मैं तेरी गाऊं ।।2।। तुम बिन कौन सुने वरदाती। मैं जाकर किसको विनय सुनाऊं। आरती जगजननी मैं तेरी गाऊं॥आरती॥
‘डोरिस लेसिगं’ (घर से नोबल तक)
मिटा दो अपनी हस्ती को, अगर कुछ मर्तबा-चाहो।कि दाना खाक में मिलकर गुल-ए-गुलजार होता है।। ‘डोरिस लेसिगं’ का जन्म पर्सिया (अब ईरान) में हुआ था। उनके माता-पिता दोनों ब्रिटिश थे। पिता पर्सिया के इम्पीरियल बैंक में कलर्क और माँ एक नर्स थी। लेसिंग का बचपन सुख और दुःख दोनों की छाया में बीता था,जिसमें सुख… Continue reading ‘डोरिस लेसिगं’ (घर से नोबल तक)
अटल (कविता)
यम को देख भू लोक में माँ धरती घबड़ाई! स्वर्ग लोक को छोड़ तुम, आज यहाँ क्यों आए।
हिंदी लोक साहित्य : सांस्कृतिक परिदृश्य
लोक साहित्य दो शब्दों के साथ मिलकर बना है ‘लोक’ और ‘साहित्य’ जिसका शाब्दिक अर्थ होता है ‘लोक का साहित्य’। लोक साहित्य मूलतः लोक की मौलिक अभिव्यक्ति है जो लोगों के सम्पूर्ण जीवन का नेतृत्व करती है। लोक साहित्य की परम्परा उतना ही प्राचीन है, जितना की मनुष्य। इसीलिए इसमे लोक जीवन की प्रत्येक अवस्था,… Continue reading हिंदी लोक साहित्य : सांस्कृतिक परिदृश्य
शबरी के राम
शबरी एक भील कुल की कन्या थी। उनका वास्तविक नाम ‘श्रमणा’ था। ‘श्रमणा’ ‘भील समुदाय’ के ‘शबरी’ जाती की थी। शबरी प्रभु ‘राम’ की भक्त थी। परिवार के लोगों को शबरी का इस तरह से पूजा-पाठ करना अच्छा नहीं लगता था। कुछ समय के बाद उनके पिता शबरी का विवाह निश्चित कर दिये। आदिवासियों के… Continue reading शबरी के राम
कवि भूषण
हिन्दी साहित्य में भक्तिकाल के उपरांत कविता में एक नया युग प्रारम्भ हुआ जिसे रीतिकाल के नाम से जाना जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार रीतिकाल का आरम्भ सन् 1700 ई० से सन् 1900 ई० तक माना जाता है। भूषण का जन्म संवत् 1670 में कानपुर जिले के तिकवापुर ग्राम में हुआ था। उनके… Continue reading कवि भूषण
वर्दी (कविता)
वर्दी के है अनेक प्रकार, वर्दी की है अपनी शान। अनेक रंगों की है ये वर्दी । जो पहने उसकी बढ़ती मान। कुछ वर्दी पहन इतराते हैं कुछ वर्दी पहन लोगों को डराते हैं। कुछ लोग वर्दी की रखते लाज, कुछ लोग वर्दी की लाज गंवाते हैं। कुछ लोग वर्दी को इजज्त दिलवाते हैं… Continue reading वर्दी (कविता)
भारत में किसानों की स्थिति
हो जाए अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहाँ आता महाजन के यहाँ वह अन्न सारा अंत में अधपेट खाकर फिर उन्हें काँपना हेमंत में – मैथिलीशरण गुप्त मैथिलीशरण गुप्त की ये पंक्तियाँ तत्कालीन किसानों की दयनीय दशा का चरित्र-चित्रण करती… Continue reading भारत में किसानों की स्थिति
चिरैया (कविता)
दिल में अरमां आँखों में सपने, बिटिया रानी कुछ सोच रही थी। मैं पूछी, क्या सोच रही हो? फिर वो मुझसे लिपट कर बोली, माँ! क्या मैं उड़ सकती हूँ? चिड़िया जैसी? माँ बोली, हाँ क्यों नहीं? बिटिया रानी कुछ सोच कर बोली, कैसे माँ? माँ बोली! तुम अपने सपनों से प्यार करो। सपनों को… Continue reading चिरैया (कविता)
