शबरी के राम

शबरी एक भील कुल की कन्या थी। उनका वास्तविक नाम ‘श्रमणा’ था। ‘श्रमणा’ ‘भील समुदाय’ के ‘शबरी’ जाती की थी। शबरी प्रभु ‘राम’ की भक्त थी। परिवार के लोगों को शबरी का इस तरह से पूजा-पाठ करना अच्छा नहीं लगता था। कुछ समय के बाद उनके पिता शबरी का विवाह निश्चित कर दिये। आदिवासियों के प्रथा के अनुसार- कोई भी शुभ कार्य करने से पहले जानवरों की बली दी जाती थी। इसी प्रथा को पूरा करने के लिए शबरी के पिता विवाह के एक दिन पहले कुछ भेड़-बकरियां लाये थे। शबरी पिता से पूछी, पिताजी हम इतनी सारी भेड़- बकरियों का क्या करेगें? पिता ने कहा, कल तुम्हारे विवाह से पहले इन सब की बली दी जाएगी। यह सुनकर शबरी बहुत दुखी हुई और सोंच में पड़ गई कि इन निर्दोष जानवरों को कैसे बचाया जाये। शबरी के मन में ख्याल आया क्यों न वह सुबह होने से पहले ही घर छोड़ दे। यह सोंच कर उसने घर छोड़ दिया जिससे की उन जीवों की हत्या का पाप उस पर न लगे। सबरी को पता था कि एक बार घर छोड़ने के बाद वह फिर वापस नहीं आ सकती है। उन निर्दोष पशुओं की रक्षा करने के लिए शबरी ने यह कठोर कदम उठाया था। शबरी अकेले उन जंगलों में भटक रही थी। वो शिक्षा प्राप्ति के उद्देश्य से कई गुरुओं के आश्रम में गई लेकिन शबरी को शिक्षा देने से गुरुओं ने इनकार कर दिया क्योंकि वह एक ‘तुच्छ’ जाती की कन्या थी।

शबरी भटकती हुई ‘मतंग’ ऋषि के आश्रम में पहुँची और उनसे शिक्षा प्राप्ति के लिए याचना किया। मतंग ऋषि ने उसे अपने गुरुकुल में स्थान दे दिया। मतंग ऋषि के इस फैसले से अन्य सभी ऋषिओं ने उनका तिरस्कार कर दिया। शबरी दिन-रात अपने गुरु की सेवा करने लगी। आश्रम के सभी कार्यों की देख-रेख के साथ-साथ गुरुकुल वासियों के लिए भोजन बनाने का भी उसने कार्यभार सम्भाल लिया। शबरी की गुरुभक्ति से मतंग ऋषि बहुत प्रसन्न थे। एक दिन मतंग ऋषि ने शबरी से कहा, पुत्री अब मैं अपना देह त्याग करना चाहता हूँ। मैं तुम्हें आशिर्वाद देना चाहता हूँ बोलो तुम्हें क्या चाहिए। शबरी बोली, हे गुरुवर आप ही मेरे पिता हैं। आज मैं आप के कारण ही जिन्दा हूँ अतः आप मुझे अपने साथ ही ले जाएँ। तब ऋषि बोले नहीं पुत्री मेरे बाद तुम्हें ही इस आश्रम का ध्यान रखना होगा। तुम्हारे जैसी गुरु भक्त शिष्या को उचित फल मिलना चाहिए। मतंग ऋषि ने कहा, एक दिन भगवान राम तुमसे मिलने यहाँ आयेंगें उस दिन तुम्हरा उद्धार होगा और तुम्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी। यह कह कर मतंग ऋषि ने अपना देह त्याग दिया। उसी दिन से शबरी प्रभु राम के इंतजार में रोज फल-फूल लाती और आश्रम को सजाती थी क्योंकि भगवान के आने का कोई निश्चित दिन पता नहीं था। केवल उसे अपने गुरु के बात का विश्वास था। इसलिए वह प्रतिदिन राम के आने की प्रतीक्षा करती थी। एक दिन शबरी आश्रम के पास के तालाब से पानी लेने गई। वहाँ एक ऋषि तपस्या कर रहे थे। शबरी को तालाब से जल लेते हुए देखकर ऋषि क्रोधित हो गए और अछूत बोलकर उसे पत्थर से मार दिए जिससे उसको चोट लगी और खून बहने लगा। वही खून का एक बूंद तालाब में गिर गया जिससे तालाब का पूरा पानी लाल हो गया। यह देखकर ऋषि शबरी को भला-बुरा कह कर चिल्लाने लगे। शबरी रोती हुई अपने आश्रम में चली गई। ऋषि ने कई प्रकार से तालाब के पानी को साफ करने का उपाय किया लेकिन पानी का रंग नहीं बदला। कई वर्षो बाद सीता हरण के पश्चात् भगवान राम सीता माता की खोज में वहाँ आये तब वहाँ के लोगों ने भगवान राम से प्रार्थना किया कि कृपया वे अपने चरणों के स्पर्श से इस तालाब के लाल पानी को पुनः पानी का रूप दे दें। भगवान राम के चरण स्पर्श के पश्चात् भी पानी का रंग नहीं बदला तब भगवान श्री राम ने ऋषि से पूछा कि इस तालाब का रंग लाल कैसे हुआ? इस बात पर ऋषि ने शबरी की कहानी सुनाई और बोले भगवन् इस जल का रंग उसी शुद्र शबरी के कारण लाल हुआ है। प्रभु राम बोले शबरी को बुलाइए। शबरी प्रभु राम का नाम सुनते ही पागलों की तरह भागती हुई आई। हे प्रभु राम! मेरे प्रभु राम! कहती हुई तालाब के पास पहुंची तभी उसके पैर का धुल तालाब में उड़ कर चला गया और तालाब के पानी का रंग साफ पानी में बदल गया। राम ने गुरुवर से कहा, यह शबरी के पैरों के धुल से हुआ है। शबरी प्रभु को अपने आश्रम में ले गई। उस दिन भी शबरी रोज की तरह आश्रम को फूलों से सजाई थी और भगवान श्रीराम के लिए जंगल से मीठे-मीठे बेर चुन कर लाई थी। शबरी प्रभु को चख-चख कर मीठे बेर खिलाइ और प्रभु राम प्रेम से जूठे बेर खाये। लक्ष्मण को इस तरह बड़े भाई को बुढ़िया शबरी के जूठे बेर खाना अच्छा नहीं लगा। उनहोंने राम जी को रोककर कहा, भैया ये बेर जूठे हैं, इसे मत खाइए।  भगवान श्री राम ने प्रसन्न होकर बोला लक्ष्मण ! ये फल बहुत मीठे हैं लो तुम भी खाओ लेकिन लक्षमण जी जूठे बेर नहीं खाये। बड़े भाई के सामने  इंकार भी नहीं कर सकते थे फिर वे छुपा कर बेरों को पीछे फेंक देते थे। माना जाता है कि लक्षमण द्वरा फेका गया वही जूठा बेर संजीवनी बना और रावण युद्ध में शक्ति बाण लगने पर लक्षमण जी के लिए प्राण रक्षक बना। मतंग ऋषि का कथन सत्य हुआ। शबरी की भक्ति सफल हुई और भक्त वत्सल भगवान स्वयं आकर शबरी को दर्शन दिए। इस प्रकार शबरी को मोक्ष की प्राप्ति हुई। भगवन राम ‘शबरी के राम’ कहलाए। कहा जाता है कि सच्चे और शुद्ध मन से प्रार्थना की जाए तो भक्त वत्सल भगवान अपने भक्तों की प्रार्थना अवश्य सुनते हैं।

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