सुंदर विचार

क्षणिकाएँ (सावन)

1. अंबर नाचे झूम-झूम   ओढ़े चुनरियाँ बूंदों की   धरती नाचे घूम-घूम   सावन की हरियाली में 2. साजन में बगिया महके   लगी मेहंदी हथेलियों पर   सावन आया संग सखी   गाएँ गीत हम बगियन में 3. बादल जब गाए प्रेम राग   नाचे मोर बगियन में   सावन में हर पत्ता… Continue reading क्षणिकाएँ (सावन)

बहुत जी ली, औरों की जिंदगी (कविता)

बहुत जी ली, औरों की जिंदगी अब अपनी जिंदगी जीती हूँ मेरा जो मन कहता है, मैं वही करती हूँ दिखावें की जिंदगी न तब जीति थी और न अब जीति हूँ बीती हुई जिंदगी को भूल नई जिंदगी जीने की कोशिश करती हूँ। कभी किसी की जीवनी, संस्मरण पढ़ने लगती हूँ, कभी-कभी कुछ लिखने… Continue reading बहुत जी ली, औरों की जिंदगी (कविता)

गजल – 1

दिल के पन्नों में यादों की कहानी लिखी, उन यादों को दिल में सहेजकर रखी। विधू ने कहा, तुमसे शिकायत कर दूं, तेरी स्मृति को हमने छिपाकर रखी। दिल की बगिया ने देखते रहे सपने तेरे, हर पल सूरत तेरी अनुरागी रखी। वेदना जो दिल में थे हमने छुपाकर रखे, पर होठों पर तेरी हँसी… Continue reading गजल – 1

गम न कर जिंदगी (कविता)

अब और न गम कर जी ले जिंदगी हर पल को अपना सनम (प्रिय) कर जिंदगी गम ना कर जी ले जिंदगी कल किसने देखा है यूँ ना सिसक तू   आज की ख़ुशी को   मरहम कर जिंदगी गम ना कर जी ले जिंदगी छिपा है सबक हर आँसू में डर मत जाना टूटे… Continue reading गम न कर जिंदगी (कविता)

वो कौन थी? मैं नहीं जानती (कविता)

रोज की तरह उस दिन भी मैं बस अड्डे पर खड़ी थी, बार-बार उस ओर देख रही थी जिस ओर से बस आती थी। अचानक मेरी नजर थोड़ी दूर से आ रही  उस अधेड़ बुजुर्ग पर पड़ी जिसकी झुरियों की रेखाएँ उसके जीवन की गाथा सुना रही थी पता नहीं वो कौन थी ? तन… Continue reading वो कौन थी? मैं नहीं जानती (कविता)

पुरुष विमर्श (कविता)

सब कहते हैं कि लडकियाँ परायी होती हैं लेकिन समय बदल गया है कोई माने या न माने,  लडकियाँ नहीं लड़के पराये होते हैं। कुछ कहते हैं, मर्द को दर्द नहीं होता कौन कहता है? मर्द को दर्द नहीं होता? दर्द होता है, लेकिन किससे कहे वह  कौन सुनता है उसकी? इसीलिए कहा जाता है… Continue reading पुरुष विमर्श (कविता)

मैं गांधारी नहीं हूँ ! (कविता)

गांधारी नहीं मैं कि  सत्य का अपमान करूँ, पत्थर की मूर्ति नहीं मैं  जो अपनी आँखों पर पट्टी बाँध लूँ।   हर अन्याय को सहती रहूँ, यह मेरा धर्म नहीं सिर्फ आँसू बहाती रहूँ,    यह मेरा कर्म नहीं। हर अन्याय से लड़ने की रखती हूँ मैं साहस। झूठ के आगे नहीं झुकने की रखती हूँ मैं… Continue reading मैं गांधारी नहीं हूँ ! (कविता)

नालंदा (कविता)

जहाँ कभी जलता था ज्ञान का दीप आज खड़ा है वीरान खंडहरों के बीच लिखी है पत्थरों पर समय की कहानी झलकती है संस्कृति, दिखती है निशानी।  जहाँ गूँजा करते थे ज्ञान के गीत वहाँ गूँजते हैं अब सन्नाटे की गूँज थी चहल-पहल जहाँ विद्यार्थियों की अब उड़ते हैं सन्नाटे में मिट्टी और धूल। जहाँ… Continue reading नालंदा (कविता)

हाथों की लकीरें (कविता)

माथे की लकीरों को देखते ही उसने कहा, ओह! तुम्हारे तो भाग्य ही नहीं है!! कैसे रहोगी? कैसे जियोगी? खैर! दुखी होकर भी हमेशा तुम मुस्कुराती रहोगी मैं सोंची, उसे क्या पता, मैं भी जिद्दी हूँ, माथे की लकीरों को आत्मशक्ति से बदल सकती हूँ, मैं जानती थी, अपने आपको मन में दर्द था, आत्मशक्ति… Continue reading हाथों की लकीरें (कविता)

हमारी ‘हिन्दी’ (कविता)

सरस भाषा हिन्दी है, सरल भाषा हिन्दी है, सरस, सरल  और रुचिर  भाषा  हिन्दी है। मृदुल भाषा हिन्दी है, मधुर भाषा हिन्दी है, मृदुल, मधुर  और  कोमल भाषा हिन्दी है। कर्म भाषा हिन्दी है, धर्म भाषा हिन्दी है, कर्म, धर्म और  काव्य  भाषा  हिन्दी है। संस्कार भाषा हिन्दी है, संस्कृति भाषा हिन्दी है, संस्कार, संस्कृति… Continue reading हमारी ‘हिन्दी’ (कविता)