बहुत जी ली, औरों की जिंदगी (कविता)

बहुत जी ली, औरों की जिंदगी

अब अपनी जिंदगी जीती हूँ

मेरा जो मन कहता है,

मैं वही करती हूँ

दिखावें की जिंदगी न तब जीति थी

और न अब जीति हूँ

बीती हुई जिंदगी को भूल

नई जिंदगी जीने की कोशिश करती हूँ।

कभी किसी की जीवनी, संस्मरण पढ़ने लगती हूँ,

कभी-कभी कुछ लिखने बैठ जाती हूँ

अपने दिल की बात सिर्फ

अपने हमसफर से कहती हूँ।

हमें वो सूनते भी है, सुनाते भी हैं

कभी-कभी झिझककर, ‘चुप’ कह देते हैं

दिल की बात किससे कहूँ,

यह सोचकर चुप भी हो जाती हूँ।

राम का स्मरण करते हुए

हनुमान चालीसा का पाठ करती हूँ,  

जिस काम में उलझन ना हो

अब वही काम करती हूँ।

नहीं जीती हूँ सभी रिश्तों को अब

हाँ एक संबंध को भरपूर जीती हूँ

खाना मन पसंद का बनाती हूँ

वैसे मैं थोड़ी जीभ चटोर हूँ।

खाना बदल-बदलकर पकाती हूँ

व्यस्त रहने की कोशिश करती हूँ 

सच कहूँ, तो अब हम सखा बन कर जीने लगे हैं।

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