वो कौन थी? मैं नहीं जानती (कविता)

रोज की तरह उस दिन भी

मैं बस अड्डे पर खड़ी थी,

बार-बार उस ओर देख रही थी

जिस ओर से बस आती थी।

अचानक मेरी नजर

थोड़ी दूर से आ रही 

उस अधेड़ बुजुर्ग पर पड़ी

जिसकी झुरियों की रेखाएँ

उसके जीवन की

गाथा सुना रही थी

पता नहीं वो कौन थी ?

तन पर मैले-कुचैले,

फटे-पुराने कपड़े

परिवार और समाज से

मिले दुःख-दर्द की

कथा सुना रही थी

पता नहीं, वह कौन थी?

अपने पीठ पर लादे

उस मैले-कुचैले बोरी में

न जाने क्या रखी थी?

जिसे बार-बार निहार रही थी

पता नहीं, वह कौन थी?

हर आने-जाने वालों को

वह घूर-घूर कर देख

कुछ-कुछ बोलना

चाह रही थी,

बिना किसी को जाने-पहचाने

पता नहीं, वह कौन थी? 

वह हर किसी से

कुछ-कुछ कह रही थी,

लेकिन किसी को फुर्सत कहाँ

उसकी सुनने की

पता नहीं, वह कौन थी?

अचानक मेरा ध्यान

फिर बस की ओर चला गया

उसे पास आते देख,

मैं थोड़ी सी खिसक गई

पता नहीं, वह कौन थी?

इसी बीच उसने एक थप्पड़

मझे जोड़ से मार दी  

और कुछ बोलते हुए

आगे बढ़ गई,

मैं स्तब्ध, हतप्रद, अवाक् हो

उसे देखती रह गई

पता नहीं, वह कौन थी?

वहाँ खड़े हुए कुछ लोग बोले!

उसने आपको क्यों मारा?

मैंने इशारे में कहा…

पता नहीं!

पता नहीं, वह कौन थी?

किसी ने कहा!

आपने उसे कुछ कहा क्यों नहीं

मैंने उन खड़े लोगों से कहा

उसे क्या कहना और करना

जो खुद को नहीं पहचानती

कि वो कौन है?

पता नहीं, वह कौन थी?

इतने में बस आ गई…

रास्ते भर मैं सोचती रही?

आखिर किसने की होगी 

उसकी ये हालत!

शायद अपनों ने ही

कहाँ रहती होगी वह?

कौन होगा उसका सहारा

पता नहीं, वह कौन थी?

मैंने मन ही मन उसके लिए

ईश्वर से मौत की भीख मांगी

हे ईश्वर! बदल दे उसकी चोला

उसे मुक्त कर इस कठोर जीवन से!

पता नहीं, वह कौन थी?

उसे मैं नहीं जानती….

पता नहीं, वह कौन थी?

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