जहाँ कभी जलता था ज्ञान का दीप
आज खड़ा है वीरान खंडहरों के बीच
लिखी है पत्थरों पर समय की कहानी
झलकती है संस्कृति, दिखती है निशानी।
जहाँ गूँजा करते थे ज्ञान के गीत
वहाँ गूँजते हैं अब सन्नाटे की गूँज
थी चहल-पहल जहाँ विद्यार्थियों की
अब उड़ते हैं सन्नाटे में मिट्टी और धूल।
जहाँ बसा करता था आशिर्वाद गुरुओं का
वहाँ बस गया है इतिहास अब पुरखों का
तू तक्षशिला की बहन ज्ञान की गाथा है
जो खो सी गई है, उसकी सुंदर परिभाषा है।
है शांत सी खड़ी, पर है दीवारों में गूँज आज भी
आज भी पुकारता है जो अतीत का राज
कोई तो लौटा दे बीते हुए समय का साज
जहाँ बसा करते थे विचारों के राज।
नालंदा तू सिर्फ इंटों की ढाँचा नहीं
ज्ञान की साँचा है तू, भारत के धरोहर का
तेरे खंडहरों में आज भी बसा है ज्ञान का प्रकाश यह यों ही पुकारता है, नई पीढ़ी को आज।