‘रश्मिरथी’ एक प्रसिद्ध ‘खण्डकाव्य’ है। यह 1952 ई० में प्रकाशित हुआ था। रश्मिरथी का अर्थ होता है ‘सूर्य का सारथी’ यह खड़ीबोली में लिखा गया है। इसमें कर्ण के चरित्र के सभी पक्षों का चित्रण किया गया है। दिनकर ने कर्ण को महा भारतीय कथानक से ऊपर उठाकर नैतिकता और विश्वसनीयता की नई भूमि पर… Continue reading ‘रश्मिरथी’ रामधारी सिंह ‘दिनकर’कथावस्तु और भूमिका
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‘उर्वशी’ खंडकाव्य पर आधारित प्रश्नोत्तरी
1. ‘उर्वशी’ खंडकाव्य का प्रकाशन वर्ष क्या है? A. 1960 ई. B. 1961 ई. C. 1962 ई. D. 1963 ई. 2. निम्न में से ‘उर्वशी’ का काव्य रूप क्या है? A. खंडकाव्य B. महाकाव्य C. चरितकाव्य D. मुक्तककाव्य 3. “पुरुरवा:! पुनरस्तं परेहि, दुरापना बात इवाहमस्मि।” ‘उर्वशी’ का तृतीय अंक किस बीज भाव पर केद्रित है।… Continue reading ‘उर्वशी’ खंडकाव्य पर आधारित प्रश्नोत्तरी
रामधारी सिंह ‘दिनकर’‘उर्वशी’ (तीसरा अंक) संक्षिप्त कथा
ऋग्वेद में आई वैदिक संस्कृति की पहली कथा ‘उर्वशी’ और राजा ‘पुरुरवा’ की कथा है। इसका काल विद्वानों ने 1600 ई.पू. माना है। साहित्य और पुराण में उर्वशी सौंदर्य की प्रतिमूर्ति थी। स्वर्ग की इस अप्सरा की उत्पत्ति नारायण की जंघा से मानी जाती है। पद्मपुराण के अनुसार इनका जन्म कामदेव के ‘उरु’ से हुआ था। श्रीमद्भागवत के अनुसार यह स्वर्ग की सर्वसुंदरी अप्सरा थी। एक बार इंद्र की… Continue reading रामधारी सिंह ‘दिनकर’‘उर्वशी’ (तीसरा अंक) संक्षिप्त कथा
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ‘उर्वशी’ भूमिका
‘उर्वशी’ रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा रचित एक काव्य नाटक है। यह 1961 ई० में प्रकाशित हुआ था। इस काव्य में दिनकर ने ‘उर्वशी’ और ‘पुरुरवा’ के प्राचीन आख्यान को एक नये अर्थ से जोड़ना चाहा है। इसके लिए 1972 ई० में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था। इस कृति में ‘पुरुरवा’ और ‘उर्वशी’ दोनों अलग-अलग तरह की प्यास लेकर आये हैं। पुरुरवा धरती पुत्र है और उर्वशी देवलोक… Continue reading रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ‘उर्वशी’ भूमिका
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ समग्र परिचय
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जन्म- 23 सितंबर 1908 ई. सिमरिया, मुंगेर बिहार निधन- 24 अप्रैल 1974 ई. पिता- रविसिंह और माता- मनरूप देवी थी। काव्य गुरु- महावीर प्रसाद द्विवेदी आध्यात्मिक गुरु- ये रामकृष्ण परमहंस को मानते थे। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के उपनाम 1. इन्होंने स्वयं को कहा- ‘दिनकर’ 2. अज्ञेय- ‘समय सूर्य’ 3. मुक्तिबोध- ‘राग व… Continue reading रामधारी सिंह ‘दिनकर’ समग्र परिचय
पुरुष विमर्श
सब कहते हैं कि लडकियाँ परायी होती हैं कोई माने या न माने, लडकियाँ नहीं लड़के पराये होते हैं। कुछ कहते हैं, मर्द को दर्द नहीं होता कौन कहता है? मर्द को दर्द नहीं होता? दर्द होता है, लेकिन किससे कहे वो कौन मानता है उसकी? इसीलिए कहा जाता है कि कानून अंधा… Continue reading पुरुष विमर्श
‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक प्रश्नोत्तरी
1. ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक का प्रकाशन वर्ष क्या था? A. 1931 ई. B. 1932 ई. C. 1933 ई. D. 1934 ई. 2. ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक में कितने अंक हैं? A. तीन B. चार C. पाँच D. छह 3. ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक की पात्र कोमा किसकी पालित पुत्री थी? A. शिखरस्वामी B. शकराज C. खिंगिल D. मिहिरदेव 4. ‘ध्रुवस्वामिनी’… Continue reading ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक प्रश्नोत्तरी
‘चंद्रगुप्त’ नाटक प्रशोत्तरी
1. ‘चंद्रगुप्त’ नाटक का प्रकाशन वर्ष क्या था? A. 1928 ई. B. 1929 ई. C. 1930 ई. D. 1931 ई. 2. जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ‘चंद्रगुप्त’ नाटक में अंकों की संख्या कितनी है? A. तीन B. चार C. पाँच D. छह 3. जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ‘चंद्रगुप्त’ नाटक में कुल कितने दृश्य हैं? A. 42… Continue reading ‘चंद्रगुप्त’ नाटक प्रशोत्तरी
भारत की एकता और अखंडता में हिंदी भाषा का महत्व
भारतेंदु, मैथिली, महावीर का अखिल संसार है हिंदी। सुशोभित वीणावादिनी के सुरों का हार है हिंदी। भुला रहे हैं जिसे हम पाश्चत्य के मोह में फँसकर। उसी जननी स्वरुप भूमि का श्रृंगार है हिंदी। हिंदी ‘स्वयंप्रभा’ है वह सत्ता की नहीं जनता की भाषा है और व्यापक जनसमर्थन से संपन्न है। भाषा मानव समाज की… Continue reading भारत की एकता और अखंडता में हिंदी भाषा का महत्व
‘स्कंदगुप्त’ नाटक प्रश्नोत्तरी
1. जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ‘स्कंदगुप्त’ नाटक का प्रकाशन वर्ष हैं? A. 1927 ई. B. 1928 ई. C. 1929 ई. D. 1930 ई. 2. स्कंदगुप्त नाटक में कुल कितने अंक हैं? A. तीन B. चार C. पाँच D. छह 3. स्कंदगुप्त नाटक में कुल कितने दृश्य हैं? A. 33 B. 34 C. 35 D. 36… Continue reading ‘स्कंदगुप्त’ नाटक प्रश्नोत्तरी