मानव हूँ मैं, इसलिए डरता हूँ, सपनों में भी सत्य से लड़ता हूँ। भीड़ में रहकर भी, अकेला रहता हूँ, अपने ही साये से, अक्सर मैं डरता हूँ। आँधियाँ मिटाना चाहती है मुझे, दीपक की तरह सदा कपकपाता हूँ। झूठ के बाजार में सत्य टिकता कहाँ, फिर भी सच कहने में काँपने लग जाता हूँ।… Continue reading मानव हूँ मैं (कविता)
Author: इंदु सिंह
हिंदी मानक ‘भाषा’ पर आधारित महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तरी (भाग-2)
1. दूसरे किस देश में हिंदी भाषा का प्रयोग लिखने व बोलने के लिए किया जाता है? A. दक्षिण अमेरिका B. मॉरीशस C. ऑस्ट्रेलिया D. पाकिस्तान 2. प्रारंभ में ‘पिंगल’ नाम किस बोली के लिए प्रयुक्त होता था? A. खड़ी बोली B. मारवाड़ी C. ब्रजभाषा D. अवधी 3. नीचे लिखे बोलियों में से कौन सी… Continue reading हिंदी मानक ‘भाषा’ पर आधारित महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तरी (भाग-2)
हिंदी मानक ‘भाषा’ पर आधारित महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तरी (भाग-1)
1. ‘खड़ी बोली’ शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख किसने किया था? A. इंशाअल्लाह खां B. लल्लूजी लाल (प्रेमसागर में) C. सदल मिश्र D. सदासुखलाल 2. मानकीकरण का सर्वप्रथम उल्लेख किसने किया? A. मैक्समूलर B. गिलक्रिस्ट C. ग्रियर्सन D. एथरिंगटन 3. द्वित व्यंजनों का प्रयोग किसमें होता है? A. कौरवी में B. भोजपुरी में C.… Continue reading हिंदी मानक ‘भाषा’ पर आधारित महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तरी (भाग-1)
रामचन्द्र शुक्ल की दृष्टि में ‘कामायनी’ का मूल्यांकन
* हिंदी साहित्य के इतिहास’ में जयशंकर प्रसाद जी की चर्चा आधुनिक काल, प्रकरण-4 के अंतर्गत, काव्य खंड, नई धारा, तृतीय उत्थान में किया गया है। तृतीय उत्थान के अंतर्गत शुक्ल जी ने जयशंकर प्रसाद को 11वें नंबर पर जगह दिया है। * किसी एक विशाल भावना को रूप देने की ओर भी अंत में प्रसाद जी… Continue reading रामचन्द्र शुक्ल की दृष्टि में ‘कामायनी’ का मूल्यांकन
रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में जयशंकर प्रसाद
* हिंदी साहित्य के इतिहास’ में जयशंकर प्रसाद जी की चर्चा आधुनिक काल, प्रकरण-4 के अंतर्गत, काव्य खंड, नई धारा, तृतीय उत्थान में किया गया है। तृतीय उत्थान के अंतर्गत शुक्ल जी ने जयशंकर प्रसाद को 11वें नंबर पर जगह दिया है। * ये पहले ब्रजभाषा की कविताएँ लिखा करते थे जिनका संग्रह ‘चित्राधार’ में… Continue reading रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में जयशंकर प्रसाद
छायावाद के प्रतिनिधि कवि सुमित्रानंदन ‘पंत’
जीवन परिचय- सुमित्रानंदन पंत जन्म- 20 मई 1900 ई. कौशाबी ग्राम, अल्मोड़ा, जिला उत्तराखंड (कुर्मांचल प्रदेश) में हुआ। बचपन का नाम- गोसाई दत्त था। माता का नाम- सुमित्रा था। माता-पुत्र दोनों का नाम मिलाकर इनका नाम पड़ा, ‘सुमित्रानंदन’ निधन- 28 दिसंबर, 1977 ई. इलाहबाद सुमित्रानंदन पंत के उपनाम: 1. छायावाद का विष्णु (कृष्णदेव… Continue reading छायावाद के प्रतिनिधि कवि सुमित्रानंदन ‘पंत’
छायावाद के प्रतिनिधि कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
जीवन परिचय: सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' जन्म – 21 फरवरी 1899 ई. को बंगाल के महिषादल रियासत (जिला-मिदनापुर) में हुआ था। बसंत पंचमी पर इनका जन्मदिन मनाने की परंपरा 1930 में शुरू हुई। इनके पिता पंडित रामसहाय त्रिपाठी उन्नाव (बैसवाड़ा) के रहने वाले थे और महिषादल में सिपाही की नौकरी करते थे। मूल रूप से वे… Continue reading छायावाद के प्रतिनिधि कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
छायावाद की प्रतिनिधि कवयित्री महादेवी वर्मा
जीवन परिचय- महादेवी वर्मा जन्म- 24 मार्च 1907 ई. को (होली के दिन) फर्रुखाबाद, उ.प्र. निधन- 11 सितंबर, 1987 ई. इलाहाबाद पिता- श्री गोविंद प्रसाद वर्मा और माता- हेमरानी देवी थी। पति- रुनारायण वर्मा थे। * 11 वर्ष की अवस्था में महादेवी वर्मा जी का विवाह रुनारायण वर्मा के साथ हुआ था। * महादेवी वर्मा… Continue reading छायावाद की प्रतिनिधि कवयित्री महादेवी वर्मा
गज़ल – 2
छिपा के नयनों में आँसू मुस्कुराना पड़ा दिल के दर्द को हँसी में सजाना पड़ा। जो अपना था, वही हमसे दूर हो गया भुलाने के लिए उसे, दिल को समझाना पड़ा। हमसे पूछता रहा, वो वफ़ा के मायने जबाब में मुझे, खुद को मिटाना पड़ा। अँधेरे में चले थे, साथ हम उजाला के लिए मुझे… Continue reading गज़ल – 2
बुझीं त जानी (भोजपुरी बुझौअल) : Riddles
लोक साहित्य की जब भी बात चलती है, तब मन लौट कर लोक जन-जीवन की ओर पहुँच जाता है। जहाँ जाकर लोकगीत, लोक-कला, कथा-कहावतों और लोकोक्तियों का दिव्य दर्शन होता है। मन आनंद विभोर हो जाता है। यह अलिखित लोक साहित्य जन-जीवन के जिह्वा पर होता है और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता रहता है।… Continue reading बुझीं त जानी (भोजपुरी बुझौअल) : Riddles