* हिंदी साहित्य के इतिहास’ में जयशंकर प्रसाद जी की चर्चा आधुनिक काल, प्रकरण-4 के अंतर्गत, काव्य खंड, नई धारा, तृतीय उत्थान में किया गया है। तृतीय उत्थान के अंतर्गत शुक्ल जी ने जयशंकर प्रसाद को 11वें नंबर पर जगह दिया है।
* किसी एक विशाल भावना को रूप देने की ओर भी अंत में प्रसाद जी ने ध्यान दिया जिसका परिणाम है ‘कामायनी’। इसमें उन्होंने अपने ‘प्रिय ‘आनंद’ की प्रतिष्ठा दार्शनिकता के ऊपरी आभास के साथ कल्पना की मधुमती भूमिका बनाकर दी है। यह ‘आनंदवाद’ बल्लभाचार्य के ‘काया’ या आनंद के ढंग का न होकर, तांत्रिकों और योगियों की अंतर्भूमि पद्धति पर है।
* प्राचीन जलप्लावन के उपरांत मनु द्वारा मानवी सृष्टि के पुनः विधान का आख्यान लेकर इस प्रबंध काव्य की रचना हुई है। काव्य का आधार है मनु का पहले श्रद्धा को फिर इड़ा को पत्नी के रूप में ग्रहण करना तथा इड़ा को बंदनी या सर्वथा अधीन बनाने का प्रयत्न करने पर देवताओं का उनपर कोप करना।
* ‘रूपक’ की भावना के अनुसार श्रद्धा विश्वासमन्वित रागात्मिका वृत्ति है और इड़ा व्यावसायत्मिका बुद्धि। कवि ने श्रद्धा को मृदुता, प्रेम और करुणा का प्रवर्तन करने वाली और सच्चे आनंद तक पहुँचने वाली चित्रित किया है। इड़ा या बुद्धि अनेक प्रकार के वर्गीकरण और व्यवस्थाओं में प्रवृत्ति करती हुई कर्मों में उलझाने वाली चित्रित की गई है।
* कथा इस प्रकार चलती है। जलप्रलय के बाद मनु की नाव हिमवान् की चोटी पर लगती है और मनु वहाँ चिताग्रस्त बैठे हैं। मनु पिछली सृष्टि कि बातें और आगे की दशा सोचते-सोचते शिथिल और निराश हो जाते हैं। यह ‘चिंता बुद्धि मति या मनीषा’ का ही रूप कही गई है जिससे आरंभ में ही ‘बुद्धिवाद’ के विरोध का किंचित् आभास मिल जाता है। धीरे-धीरे आशा का रमणीय उदय होता है और श्रद्धा की मनु से भेंट होती है। श्रद्धा के साथ मनु शांतिपूर्वक कुछ दिन रहते हैं। पर पूर्व संस्कारवश कर्म की ओर फिर मनु की प्रवृत्ति होती है। आसुरी प्रेरणा से पशुहिंसापूर्ण काम्य यज्ञ करने लगते हैं जिससे श्रद्धा को विरक्ति होती है। वह यह देखकर दुखी होती है कि मनु अपने ही सुख की भावना में मग्न होते जा रहे हैं, उनके हृदय में सुख के, सब प्राणियों में, प्रसार का लक्ष्य नहीं जग रहा है जिससे मानवता का नूतन विकास होता। मनु चाहते है कि श्रद्धा का सारा सद्भाव, सारा प्रेम एक मात्र उन्हीं पर स्थिर रहे, तनिक भी इधर-उधर बँटने न पाये। इससे जब वह देखते हैं कि श्रद्धा पशुओं के बच्चों को प्रेम से पुचकारती है और अपने गर्भस्थ संतति की सुखक्रीड़ा का आयोजन करती है तब उनके मन में ईर्ष्या होती है और उसे हिमालय की उसी गुफा में छोड़कर वे अपनी सुखवासना लिए चल देते हैं।
* मनु उजड़े हुए सारस्वत प्रदेश में उतरते हैं जहाँ कभी श्रद्धा से हीन होकर सुर और असुर लड़े थे, इंद्र की विजय हुई थी। वे खिन्न होकर सोचते हैं कि क्या मैं भी उन्हीं के समान श्रद्धाहीन हो रहा हूँ। इसी बीच में अंतरिक्ष से ‘काम’ की अभिशाप भरी वाणी सुनायी पड़ती है कि-
मनु तुम श्रद्धा को गये भूल।
उस पूर्ण आत्म विश्वासमयी को उड़ा दिया था समझ तूल॥
तुम भूल गये पुरुषत्व मोह में, कुछ सत्ता है नारी की।
समरसता है संबंध बनी अधिकार और अधिकारी की॥
यह अभिनव मानव प्रजा सृष्टि।
द्वयता में लगी निरंतर ही वर्णों की करती हरे वृष्टि॥
अनजान समस्याएँ ही गढ़ती, रचती हों अपनी ही विनष्टि।
कोलाहल कलह अनंत चले, एकता नष्ट हो, बढ़े भेद।
अभिलाषित वस्तु तो दूर रहे, हाँ मिले अनिच्छिद दुखद खेद॥
प्रभात होता है। मनु अपने सामने एक सुंदरी खड़ी पाते हैं-
बिखरी अलकें ज्यों तर्क जाल
यह विश्व मुकुट-सा उज्जवलतम शशिखंड सदृश्य था स्पष्ट भाल।
गुंजरित मधुप से मुकुल सदृश वह आनन जिसमें भरा गान।
वक्षस्थल पर एकत्र धरे संसृति के सब विज्ञान ज्ञान॥
था एक हाथ में कर्म कलश वसुधा जीवन रस सार लिये।
दूसरा विचारों के नभ को था मधुर अभय अवलंब दिये॥
* यह इड़ा (बुद्धि) थी? इसके साथ मनु सारस्वत प्रदेश में रह गये। मनु के मन में जब जगत् और उसके नियामक के संबंध में जिज्ञासा उठती है और उससे कुछ सहाय पाने का विचार आता है तब इड़ा कहती है-
हाँ! तुम ही हो अपने सहाय।
जो बुद्धि कहे उसको न मानकर फिर किसकी नर शरण जाए?
यह प्रकृति परम रमणीय अखिल ऐश्वर्य भरी शोधकविहीन।
तुम उसका पटल खोलने में परिकर कसकर बन कर्मलीन॥
सबका नियमन शासन करते बस बढ़ा चलो अपनी क्षमता।
तुम जड़ता को चैतन्य करो, विज्ञान सहज साधन उपाय॥
* मनु वहाँ इड़ा के साथ प्रजा के शासन की पूरी व्यवस्था करते हैं। नगर की श्रीवृद्धि होती है। प्रकृति बुद्धि बल से वश में की जाती है। खेती धूमधाम से होने लगती है। अनेक प्रकार के उद्योग धंधे खड़े होते हैं। धातुओं के नये-नये अस्त्र-शस्त्र बनते हैं। मनु अनेक प्रकार के नियम प्रचलित करके, जनता का वर्णों या वर्गों में विभाग करके लोक का संचालन करते हैं।
* ‘अहं’ का भाव जोर पकड़ता है। वे अपने को स्वतंत्र नियामक और प्रजापति मानकर सब नियमों से परे रहना चाहते हैं। इड़ा उन्हें नियमों की पालन की सलाह देती है, पर वे नहीं मानते। इड़ा खिन्न होकर जाना चाहती है, पर मनु अपना अधिकार जताते हुए पकड़ लेते हैं। पकड़ते ही द्वार गिर पड़ता है। प्रजा जो दुर्व्यवहारों से क्षुब्ध होकर राजभवन घेरे थी, भीतर घुस पड़ती है। देवशक्तियाँ भी कुपित हो उठती हैं। शिव का तीसरा नेत्र खुल जाता है। प्रजा का रोष बढ़ता है। मनु युद्ध करते हैं और मूर्छित होकर गिर जाते हैं।
* उधर श्रद्धा इसी प्रकार के विप्लव का भयंकर स्वप्न देखकर अपने कुमार को लेकर मनु को ढूँढ़ती वहाँ पहुँचती है। मनु उसे देखकर क्षोभ और पश्चाताप से भर जाते हैं। फिर उन सुंदर दिनों को याद करते हैं जब श्रद्धा के मिलने से उनका जीवन सुंदर और प्रफुल्ल हो गया था; जो जगत् पीड़ा और हलचल से व्यथित था वही विश्वास से पूर्ण, शांत, उज्जवल और मंगलमय बन गया था। मनु उससे चटपट अपने को वहाँ से निकाल ले चलने को कहते हैं। जब रात हुई तब मनु उठकर चुपचाप वहाँ से न जाने कहाँ चल दिये। उनके चले जाने पर श्रद्धा और इड़ा की बातचीत होती है और इड़ा अपनी बाँधी हुई अधिकार व्यवस्था के इस भयंकर परिणाम को देख अपना साहस छूटने की बात कहती है-
श्रम भाग बन गया जिन्हें।
अपने बल का है गर्व उन्हें॥
अधिकार न सीमा में रहते।
पावस निर्झर से वे बहते॥
सब पिये मत्त लालसा घूँट।
मेरा साहस अब गया छूट॥
इस पर श्रद्धा बोली-
वन विषय ध्वांत
सिर चढ़ी रही पाया न ह्रदय, तू विकल कर रही है अभिनय।
सुख-दुख की मधुमय धूप-छाँह, तूने छोड़ी यह सरल राह।
चेतनता का भौतिक विभाग-कर, जग को बाँट दिया विराग।
चिति का स्वरुप यह नित्य जगत्, यह रूप बदलता है शत-शत।
कण विरह मिलन मय नृत्य निरत, उल्लासपूर्ण आनंद सतत॥
* अंत में श्रद्धा अपने कुमार को इड़ा के हाथों में सौंप मनु को ढूँढ़ने निकली और उन्हें उसने सरस्वती तट पर एक गुफा में पाया। मनु उस समय आँखें बंद किये चित्त् शक्ति का अंतर्नाद सुन रहे थे। ज्योतिर्मय पुरुष का आभास पा रहे थे, अखिल विश्व के बीच नटराज का नृत्य देख रहे थे। श्रद्धा को देखते ही हतचेत पुकार उठे कि ‘श्रद्धे उन चरणों तक ले चल।’ श्रद्धा आगे-आगे और मनु पीछे-पीछे हिमालय पर चलते चले जाते हैं। यहाँ तक कि वे ऐसे महादेश में अपने को पाते हैं जहाँ वे निराधार ठहरे जान पड़ते हैं। भूमंडल की रेखा का कहीं पता नहीं। यहाँ अब कवि पूरे रहस्यदर्शी का बाना धारण करता है और मन के भीतर एक नयी चेतना (इस चेतना से भिन्न) का उदय बतलाता है। अब मनु को त्रिदिक् (थ्रीडाइमेंशन) विश्व और त्रिभुवन के प्रतिनिधि अलग-अलग तीन आलोकबिंदु दिखाई पड़ते हैं जो ‘इच्छा’, ‘ज्ञान’ और ‘क्रिया’ के केंद्र से हैं। श्रद्धा एक-एक का रहस्य समझाती है।
* पहले ‘इच्छा’ का मधु मादकता और अँगड़ाई वाला माया राज्य है जो रागारुण उषा के कंदुक-सा सुंदर है और जिसमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध की पारर्दर्शिनी पुतलियाँ रंग-बिरंगी तितलियों के समान नाच रही हैं। यहाँ चलचित्रों की संसृतिछाया चारों ओर घूम रही है और आलोक बिंदु को घेरकर बैठी हुई माया मुस्कुरा रही है। यहाँ चिर बसंत का उद्गम भी है और एक ओर पतझड़ भी अथार्त सुख और दुख एक सूत्र में बंधे हैं। यहीं पर मनोमय विश्व रागारुण चेतना की उपासना कर रहा है।
* फिर कर्म का श्यामल लोक सामने आता है जो धुएँ सा धुँधला है, जहाँ क्षण भर विश्राम नहीं है, और संघर्ष और विफलता का कोलाहल रहता है, आकांक्षा की तीव्र पिपासा बनी रहती है, भाव राष्ट्र के नियम दंड बने हुए हैं सारा समाज मतवाला हो रहा है।
* सबके पीछे ‘ज्ञानक्षेत्र’ आता है जहाँ सदा बुद्धिचक्र चलता रहता है, सुख-दुख से उदासीनता रहती है। यहाँ के निरंकुश अणु तर्कयुक्ति से अस्ति-नास्ति का भेद करते रहते हैं और निस्संग होकर भी मोक्ष से संबंध जोड़े रहते हैं। यहाँ केवल प्राप्य (मोक्ष या छूटकारा भर) मिलता है, तृप्ति (आनंद) नहीं, जीवनरस अछूता छोड़ा रहता है जिसमें बहुत-सा इकठ्ठा होकर एक साथ मिले। इससे तृषा-ही तृषा दिखाई देती है
* अंत में इन तीनों ज्योतिर्मय बिंदुओं को दिखाकर श्रद्धा कहती है कि यही त्रिपुर है जिसमें इच्छा, कर्म और ज्ञान एक दूसरे से अलग-अलग अपने केंद्र आप ही बने हुए हैं। इसका परस्पर न मिलना ही जीवन की असली विडंबना है। ज्ञान अलग पड़ा है, कर्म अलग। अतः इच्छा पूरी कैसे हो सकती है। यह कहकर श्रद्धा मुस्कराती है जिससे ज्योति की एक रेखा तीनों में दौड़ जाती है और चट तीनों एक में मिलकर प्रज्वलित हो उठते हैं और सारे विश्व में श्रृंग और डमरू का निनाद फैल जाता है। उन अनाहद नाद में मनु लीन हो जाते हैं।
* इस रहस्य को पार करने में फिर आनंदभूमि दिखाई गयी है। वहाँ इड़ा भी कुमार (मानव) को लिए अंत में पहुँचती है और देखती है कि पुरुष पुरातन प्रकृति से मिला हुआ अपनी ही शक्ति से लहरें मारता हुआ आनंदसागर-सा उमर रहा है। यह सब देख इड़ा श्रद्धा के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करती हुई कहती है कि ‘मैं अब समझ गई कि मुझमें कुछ भी समझ नहीं थी। व्यर्थ लोगों को भुलाया करती थी; यही मेरा काम था।’ फिर मनु कैलास की ओर दिखाकर उस आनंदलोक का वर्णन करते हैं जहाँ पापताप कुछ भी नहीं है; सब समरस है और ‘अभेद में भेद’ वाले प्रसिद्ध का कथा करके कहते हैं-
अपने दुख-सुख से पुलकित या मूर्त्त विश्व सचराचर।
चिति का विराट वपु मंगल यह सत्य सतत चिर सुन्दर॥
अंत में प्रसाद जी वही प्रकृति से सारे सुख, भोग, क्रांति, दीप्ति की सामग्री जुटाकर लीन हो जाते हैं- वे ही वल्लरियाँ, पराग, मधु, मकरंद, अप्सराएँ बनी हुई रश्मियाँ।
* यह काव्य बड़ी विशद कल्पनाओं और मार्मिक उक्तियों से पूर्ण है। इसका विचारात्मक आधार या अर्थभूमि केवल इतनी ही है कि श्रद्धा या विश्वासमयी रागात्मिका वृत्ति ही मनुष्य को इस जीवन में शांतिमय आनंद का अनुभव और चारों ओर प्रसार करती हुई कल्याण मार्ग पर ले चलती है और निर्मिशेष आनंदधाम तक पहुँचाती है। इड़ा या बुद्धि मनुष्य को सदा चंचल रखती है, अनेक प्रकार के तर्क-वितर्क और निर्मम कर्मजाल में फँसाये रहती है और तृप्ति या संतोष के आनंद से दूर रखती है। अंत में पहुँचकर कवि ने इच्छा, कर्म और ज्ञान के सामंजस्य पर तीनों के मेल पर जोर दिया है। एक दूसरे से अलग रहने पर ही जीवन में विषमता आती है।
* जिस समन्वय का पक्ष कवि ने अंत में सामने रखा है उसका निर्वाह रहस्यवाद की प्रवृत्ति के कारण काव्य के भीतर नहीं होने पाया है। पहले कवि ने कर्म को बुद्धि या ज्ञान की प्रवृत्ति के रूप में दिखाया है, फिर अंत में कर्म और ज्ञान के बिंदुओं को अलग-अलग रखा है। पीछे आया हुआ ज्ञान भी बुद्धि व्यावसायात्मक ज्ञान ही है (योगियों या रहस्यवादियों का परज्ञान नहीं) यह बात ‘सदा चलता है बुद्धि चक्र’ से स्पष्ट है। जहाँ रागारुण कंदुक-सा भावमयी प्रतिभा मंदिर इच्छाबिंदु मिलता है वहाँ इच्छा रागात्मिका वृत्ति के अंतर्गत है; अतः रति काम से उत्पन्न श्रद्धा की ही प्रवृत्ति ठहरती है। पर श्रद्धा उससे अलग क्या तीनों बिंदुओं से परे रखी गई है। रहस्यवाद की परंपरा में चेतना से असंतोष की रूढ़ि चली आ रही है। प्रसाद जी काव्य के आरंभ में ही चिंता से कहते हैं-
मनु का मन था विकल हो उठ संवेदन से खाकर चोट।
संवेदन! जीवन जगती को जो कटुता से देता घोट॥
संवेदन का और ह्रदय का यह संघर्ष न हो सकता।
फिर अभाव असफलताओं की गाथा कौन कहाँ बकता॥
* इन पंक्तियों में तो ‘संवेदन’ बोध वृत्ति के अर्थ में व्यवहृत जान पड़ता है, क्योंकि सुख-दुखात्मक अनुभूति के अर्थ में लें तो ह्रदय के साथ उसका संघर्ष कैसा? बोध के एकदेशीय अर्थ में भी यदि हम संवेदन को ले तो भी उसे भावभूमि से खारिज नहीं कर सकते। प्रत्येक ‘भाव’ का प्रथम अवयव विषयबोध ही होता है। स्वप्नदशा मे भी, जिसका रहस्य क्षेत्र में कड़ा महात्म्य है यह विषयबोध रहता है। श्रद्धा जिस करुणा, दया आदि की प्रवर्तिका कही गयी है, उसमें दूसरों की पीड़ा की बोध मिला रहता है। आगे चलकर यह ‘संवेदन’ शब्द अपने वास्तविक या अवास्तविक दुःख पर कष्टानुभव के क्षेत्र में आया। मनु की बिगड़ी हुई प्रजा उनसे कहती है-
हम संवेदनशील हो चले, यही मिला सुख।
कष्ट समझने लगे बनाकर निज कृत्रिम दुःख॥
* मतलब यह कि अपनी किसी स्थिति को लेकर दुःख का अनुभव करना ही संवेदन है। दुःख को अपने पास न फटकने देना अपनी मौज में-मधुमकरंद में–मस्त रहना ही वांछनीय स्थिति है। असंतोष से उत्पन्न अवास्तविक कष्टकल्पना के दुखानुभव के अर्थ में ही इस शब्द को जकड़ रखना भी व्यर्थ प्रयास कहा जायेगा।
* श्रद्धा जिस करुणा दया आदि की प्रवर्तिका कही गयी है, वह दूसरों की पीड़ा का संवेदन ही तो है। दूसरों के दुख का अपना दुख हो जाना ही तो करुणा है। पर दुखानुभव अपनी ही सत्ता का प्रसार तो सूचित करता है। चाहे जिस अर्थ में लें, संवेदन का तिरस्कार कोई अर्थ नहीं रखता।
* संवेदन, चेतना, जागरण आदि के परिहार का जो बीच-बीच में अभिलाष है उसे रहस्यवाद का तकाजा समझना चाहिए। ग्रंथ के अंत में जो ह्रदय, बुद्धि और कर्म के मेल या सामंजस्य का पक्ष रखा गया है, वह बहुत समीचीन है। उसे हम गोस्वामी तुलसीदास में, उनके भक्तिमार्ग की सबसे बड़ी विशेषता के रूप में दिखा चुके हैं। अपने कई निबंधों में जगत् की वर्तमान अशांति और अव्यवस्था का कारण इसी सामंजस्य का अभाव कह चुके हैं। पर इस सामंजस्य का स्वर हम ‘कामायनी’ में और कहीं नहीं पाते हैं। श्रद्धा जब कुमार को लेकर प्रजाविद्रोह के उपरांत सारस्वत नगर में पहुँचती है तब ‘इड़ा’ से कहती है कि ‘सिर चढ़ी रही पाया न ह्रदय’। क्या श्रद्धा के संबंध में नहीं कहा जा सकता था कि ‘रस पगी रही पाई न बुद्धि?’ जब दोनों अलग-अलग सत्ताएँ करके रखी गयी हैं तब एक को दूसरी से शून्य कहना, और दूसरी को पहली से शून्य न कहना, गड़बड़ में डालता है। पर श्रद्धा से किसी प्रकार की कमी की भावना कवि की एकांतिक मधुर भावना के अनुकूल न थी।
* बुद्धि की विगर्हणा द्वारा ‘बुद्धिवाद’ के विरुद्ध उस आधुनिक आन्दोलन का आभास भी कवि को इष्ट जान पड़ता है जिनके प्रवर्तक अनातोले फ़्रांस ने कहा है कि ‘बुद्धि के द्वारा सत्य को छोड़कर और सब कुछ सिद्ध हो सकता है। बुद्धि पर मनुष्य को विश्वास नहीं होता। बुद्धि या तर्क का सहारा तो लोग अपनी भली-बुरी प्रवृत्तियों को ठीक प्रमाणिक करने के लिए लेते हैं।’
* विज्ञान द्वारा सुखसाधनों की वृद्धि के साथ-साथ विलासिता और लोभ भी असीम वृद्धि तथा यंत्रों के परिचालन से जनता के बीच फैली हुई घोर अशक्तता, दरिद्रता आदि के कारण वर्तमान जगत् की जो विषम स्थिति हो रही है उसका भी थोड़ा सा आभास मनु की विद्रोही प्रजा के इन वचनों द्वारा दिया गया है-
प्रकृति शक्ति तुमने यंत्रों से सबकी छिनी।
शोषण कर जीवनी बना दी जर्जर झीनी॥
* वर्गहीन समाज की साम्यवादी पुकार की भी दबी-सी गुँज दो-तीन जगह है। ‘विद्युत कण (इलेक्ट्रांस) मिले झलकते से’ में विज्ञान की भी झलक है।
* यदि मधुचर्या का अतिरेक और रहस्य की प्रवृत्ति बाधक न होती तो इस काव्य के भीतर मानवता की योजना शायद अधिक पूर्ण और सुव्यवस्थित रूप में चित्रित होती। कर्म को कवि ने या तो काम्ययज्ञों के बीच दिखाया है अथवा उद्योग धंधों या शासनविधानों के बीच। श्रद्धा के मंगलमय योग से किस प्रकार कर्म धर्म का रूप धारण करता है, यह भावना कवि से दूर ही रही। इस भव्य और विशाल भावना के भीतर उग्र और प्रचंड भाव भी लोक के मांगलिक विधान के अंग हो जाते हैं।
* श्रद्धा और धर्म का संबंध अत्यंत प्राचीनकाल से प्रतिष्ठित है। महाभारत में श्रद्धा धर्म की पत्नी कही गयी है। ह्रदय के आधे पक्ष को अलग रखने से केवल कोमल भावों की शीतलछाया के भीतर आनंद का स्वप्न देखा जा सकता है; व्यक्त जगत् के बीच उसका आविर्भाव और अवस्थान नही दिखाया जा सकता।
* यदि हम इस विशद काव्य की अंतर्योजना पर न ध्यान दे, समष्टि रूप में कोई समन्वित प्रभाव न ढूंढें, श्रद्धा, काम, लज्जा, इड़ा इत्यादि को अलग-अलग लें तो हमारे सामने बड़ी रमणीय चित्रमयी कल्पना, अभिव्यंजना की अत्यंत मनोरम पद्धति आती है। इन वृत्तियों की आभ्यंतर प्रेरणाओं और बाह्य प्रवृत्तियों को बड़ी मार्मिकता से परखकर इनके स्वरूपों की नराकर उद्भावना की गयी है। स्थान-स्थान पर प्रकृति की मधुर, भव्य और आकर्षक विभूतियों की योजना का तो कहना ही क्या है। प्रकृति के ध्वंसकारी भीषण रूपवेग का भी अत्यंत व्यापक परिधि के बीच चित्रण हुआ है। इस प्रकार प्रसाद जी प्रबंध क्षेत्र में भी जो छायावाद की चित्रविधान और लाक्षणिक शैली की सफलता की आशा बँधा गये हैं।
जय हिंद