रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में जयशंकर प्रसाद

* हिंदी साहित्य के इतिहास’ में जयशंकर प्रसाद जी की चर्चा आधुनिक काल, प्रकरण-4 के अंतर्गत, काव्य खंड, नई धारा, तृतीय उत्थान में किया गया है। तृतीय उत्थान के अंतर्गत शुक्ल जी ने जयशंकर प्रसाद को 11वें नंबर पर जगह दिया है।

* ये पहले ब्रजभाषा की कविताएँ लिखा करते थे जिनका संग्रह ‘चित्राधार’ में हुआ है।

* संवत् 1970 (1913 ई.) से वे खड़ीबोली की ओर आये और

कानन-कुसुम’, ‘महाराणा का महत्व’, ‘करुणालय’ और ‘प्रेम पथिक’ प्रकाशित हुए।

* ‘कानन-कुसुम’ में तो प्रायः उसी ढ़ंग की कविताएँ हैं जिस ढ़ंग की द्विवेदीकाल में निकला करती थीं।

* ‘महाराणा का महत्व’ और ‘प्रेमपथिक’ (संवत् 1970) 1913 ई. अतुकांत रचनाएँ हैं जिसका मार्ग पं. श्रीधर पाठक पहले  दिखा चुके थे।

* भारतेंदु काल में ही पं. अंबिकादत्त व्यास ने बांग्ला की देखा देखी कुछ अतुकांत पद्य आजमाये थे। पीछे पं. श्रीधर पाठक ने  ‘सांध्य अटन’ नाम की कविता खड़ीबोली के अतुकांत (तथा  चरण के बीच में पूर्ण विराम वाले) पद्दों में बड़ी सफलता के साथ प्रस्तुत की थी।

* सामान्य परिचय के अंतर्गत दिखाया जा चुका है कि किस प्रकार सर्वश्री मैथिलीशरण गुप्त, बदरीनारायण भट्ट और मुकुटधर पांडेय इत्यादि कई कवि अंतर्भावना की प्रगल्भ चित्रमयी व्यंजना के उपयुक्त स्वच्छंद नूतन पद्धति निकाल रहे थे।

* पीछे उस नूतन पद्धति पर प्रसाद जी ने भी कुछ छोटी-छोटी कविताएँ लिखीं जो संवत् 1975 (सन् 1918) में ‘झरना’ के भीतर संगृहित हुई।

* ‘झरना’ की उन 24 कविताओं में उस समय नूतन पद्धति पर निकलती हुई कविताओं में कोई ऐसी विशिष्टता नहीं थी  जिस पर ध्यान जाता।

* दूसरे संस्करण में जो बहुत पीछे संवत् 1984 में निकला,  पुस्तक का स्वरुप ही बदल गया। उसमें आधी से ऊपर अथार्त 33 रचनाएँ जोड़ी गयी जिनमें पूरा रहस्यवाद, अभिव्यंजना का अनूठापन, व्यंजक, चित्रविधान सब कुछ मिल जाता है।‘विषाद’, ‘बालू की बेला’, ‘खोलो द्वारा’, ‘बिखरा हुआ प्रेम’, ‘किरण’, ‘वसंत की प्रतीक्षा’, इत्यादि उन्हीं पीछे जोड़ी हुई  रचनाओं में है जो पहले (संवत् 1975 के) संस्करण में नहीं थी।

* द्वितीय संस्करण में कहीं छायावाद कहीं जाने वाली विशेषताएँ स्फुट रूप में दिखाई पड़ीं। इसके पहले भी सुमित्रानंदन पंत का ‘पल्लव’ बड़ी धूमधाम से निकल चुका था, जिसमें रहस्यभावना तो कहीं-कहीं पर अप्रस्तुत विधान, चित्रमयी भाषा और लाक्षणिक वैचित्र्य आदि विशेषताएँ अत्यंत प्रचुर परिणाम में दिखाई पड़ी थीं।

* प्रसाद जी में ऐसी मधुमयी प्रतिभा और ऐसी जागरूक भावुकता अवश्य थी कि उन्होंने इस पद्धति का अपने ढंग पर बहुत ही मनोरम विकास किया।

* संस्कृत की कोमल कांत पदावली का जैसा सुंदर चयन बंगभाषा के काव्यों में हुआ है वैसा अन्य देशभाषाओं के साहित्य में नहीं दिखाई पड़ता। उनके परिशीलन में पदलालित्य की जो गूँज प्रसाद जी के मन में समाई वह बराबर बनी रही।

* जीवन के प्रेमविलासमय मधुर पक्ष की ओर स्वाभाविक प्रवृत्ति होने के कारण वे उस ‘प्रियतम’ के संयोग-वियोग वाली रहस्यभावाना में- जिसे स्वाभाविक रहस्यभावाना से अलग समझना चाहिए- रमते प्रायः पाये जाते हैं।

* प्रेमचर्या के शारीरिक व्यापारों और चेष्टाओं (अश्रु, स्वेद, चुबंन, परिरंभण, लज्जा की दौड़ी हुई लाली इत्यादि) रंगरेलियों और अठखेलियों, वेदना की कसक और टीस इत्यादि की ओर इनकी दृष्टि विशेष जमती थी।

* इसी मधुमयी प्रवृत्ति के अनुरूप प्रकृति के अनंत रूप में भी वल्लरियों के दान, कलिकाओं की मंद मुस्कान, सुमनों के मधुपात्र पर मँडराते मलिंदों के गुंजार, सौरभहर समीर की झपक-लपक, पराग मकरंद की लूट, उषा के कपोलों पर लज्जा की लाली, आकाश और पृथ्वी के अनुरागमय परिरंभण, रजनी के आँसू से भीगे अंबर, चंद्रमुख पर शरद्घन के सरकते अवगुंठन, मधुमास की मधुवर्षा और झूमती मादकता इत्यादि पर अधिक दृष्टि जाती थी।  

* अतः इनकी रहस्यमय रचनाओं को देख चाहे तो यह कहें कि इनकी मधुवर्षा के मानस-प्रचार के लिए रहस्यवाद का परदा मिल गया अथवा यों कहें कि इनकी सारी प्रणयानूभूति ससीम पर से कूदकर असीम पर जा रही। इनकी (जयशंकर) पहली विशिष्ट रचना ‘आँसू’ (संवत् 1998) है। ‘आँसू’ वास्तव में तो है श्रृंगारी विप्रलंभ के, जिनमें अतीत संयोग सुख की खिन्न स्मृतियाँ रह-रहकर झलक मारती हैं, पर जहाँ प्रेमी की मादकता की बेसुधी प्रियतम नीचे से ऊपर आते और संज्ञा की दशा में चले जाते हैं जहाँ हृदय की तरंगें ‘उस अनंत कोने को नहलाने चलती है, वहाँ वे आँसू उस ‘अज्ञात प्रियतम’ के लिए बहते जान पड़ते हैं। फिर जहाँ कवि यह देखने लगता है कि ऊपर तो-

 अवकाश असीम सुखों से आकाशतरंग बनाता,

 हँसता-सा छायापथ में नक्षत्र समाज दिखाता।       

पर

      नीचे विपुला धरणी है दुखभार वहान-सी करती।

      अपने खारे आँसू से करुणासागर को भारती॥

* और इस ‘चिर दग्ध दुखी वसुधा’ को इस निर्मम जगती को, अपनी प्रेमवेदना की कल्याणी शीतल ज्वाला का मंगलमय, उजाला देना चाहता है, वहाँ से आँसू लोक-पीड़ा पर करुणा के आँसू के जान पड़ते हैं। पर वही पर जब हम कवि की दृष्टि अपनी सदा जगती हुई अखंड ज्वाला की प्रभविष्णुता पर इस प्रकार जमी पाते हैं कि ‘हे मेरी ज्वाला!’

       तेरे प्रकाश में चेतन संसार वेदनावाला।

       मेरे समीप होता है पाकर कुछ करूँण ज्वाला॥

* तब ज्वाला या प्रेमवेदना की अतिरंजित और दुरारुढ़ भावना ही- जो श्रृंगार की पुरानी रूढ़ि है- रह जाती है। कहने का तात्पर्य है कि वेदना की कोई एक निर्दिष्ट भूमि न होने से सारी पुस्तक का कोई एक समन्वित प्रभाव नहीं निष्पन्न होता।

* पर अलग-अलग लेने पर उक्तियों के भीतर बड़ी ही रंजनकारिणी कल्पना, व्यंजक चित्रों का बड़ा ही अनूठा विन्यास, भावनाओं की अत्यंत सुकुमार योजना मिलती है। प्रसाद जी की यह पहली काव्यरचना है जिसने बहुत लोगों को आकर्षित किया।

* अभिव्यंजना की प्रगल्भता और विचित्रता के भीतर प्रेमवेदना की दिव्य विभूति का, विश्व में उसके मंगलमय प्रभाव का सुख और दुःख दोनों को अपनाने की उसकी अपार शक्ति का और उसकी छाया में सौंदर्य और मंगल का भी आभास पाया जाता है।

* ‘नियतिवाद’ और ‘दुखवाद’ का विषण्ण स्वर भी सुनाई पड़ता है। इस चेतना को दूर हटाकर मदतंद्रा, स्वप्न और असंज्ञा की दशा का आह्वान रहस्यवाद की एक स्वीकृति-विधि है।

* इस विधि का पालन ‘आँसू’ से लेकर ‘कामायनी’ तक हुआ है। अपने ही लिए नहीं, उजाले में हाथ-पैर मारने वाली ‘चिर द्ग्ध दुखी वसुधा’ के लिए भी यही नींद लाने वाली दवा लेकर आने को कवि निशा से कहता है-

चिर दग्ध दुखी यह वसुधा आलोक माँगती, तब भी।

तुम तुहिन बरस दो कन-कन, यह पगली सोये अब भी।

* चेतना की शांति या विस्मृत की दशा में ही ‘कल्याण की वर्षा’ होती है, मिलनसुख प्राप्त होता है। अतः उसके लिए रात्रि की भावना को बढ़ाकर प्रसाद जी महारात्रि तक ले गये हैं, जो सृष्टि और प्रलय का संधिकाल है, जिसमें सारे नाम-रूपों का लय हो जाता है-

चेतना लहर न उठेगी जीवन समुद्र थिर होगा।

संध्या हो सर्ग प्रलय की विच्छेद मिलन फिर होगा॥

* ‘आँसू’ के उपरांत दूसरी रचना ‘लहर’ है, जो कई प्रकार की कविताओं का संग्रह है।

* ‘लहर’ पर एक छोटी-सी कविता सबसे पहले दी गयी है। इसी से समूचे संग्रह का नाम ‘लहर’ रखा गया।

‘लहर’ से कवि का अभिप्राय उस आनंद की लहर से है जो मनुष्य के मानस में उठा करती है और उसके जीवन को सरस करती रहती है। उसे ठहराने की पुकार अपने व्यक्तिगत नीरस जीवन को भी सरस करने के लिए कही जा सकती है और अखिल मानव जीवन को भी।

* यह जीवन की लहर भीतर उसी प्रकार स्मृतिचिह्न छोड़ जाती है जिस प्रकार जल की लहरें सुखी नदी की बालू बीच पसलियों की-सी उभरी रेखाएँ छोड़ जाती हैं-

उठ-उठ, गिर-गिर, फिर-फिर आती

नर्तित पदचिह्न बना जाती;

सिकता की रेखाएँ उभार

भर जाती अपनी तरल सिहर।

* इसमें भी उस प्रियतम की आँखमिचौनी खेलना, दबे पाँव आना, किरन उँगलियों से आँख मूँदना (या मूँदने की कोशिश करना, क्योंकि उस ज्योर्तिमय का कुछ आभास मिल ही जाता है), प्रियतम की ओर अभिसार इत्यादि रहस्यवाद की सब सामग्री है।

* प्रियतम अज्ञात रहकर भी किस प्रकार प्रेम का आलंबन करता है, यह भी दो-एक जगह सूचित किया गया है; जैसे-

तुम हो कौन और मैं क्या हूँ, इसमें क्या है धरा सुनो।

मानस जलधि रहे चिर चुंबित मेरे क्षितिज! उदार बनो॥

* इसी प्रकार ‘हे सागर संगम अरुण नील’ में यहाँ चित्र सामने रखा गया है कि सागर ने हिमालय से निकली नदी को कब देखा था, और नदी ने सागर को कब देखा था, पर नदी निकलकर स्वर्णस्वप्न देखती उसी की ओर चली और वह सागर भी बड़ी उमंग के साथ उससे मिला।

* क्षितिज, जिसमें प्रातः सायं अनुराग की लाली दौड़ा करती है, असीम (आकाश) और ससीम (पृथ्वी) का सहेट या मिलनस्थल-सा दिखाई पड़ा करता है। इस हलचल भरे संसार से हटाकर कवि ने अपने नाविक से वहीं ले चलने को कहता है-

ले चल वहाँ भुलावा देकर मेरे नाविक! धीरे-धीरे।

जिस निर्जन में सागर लहरी अंबर के कानों में गहरी

निश्छल प्रेमकथा कहती हो तज कोलाहल की अवनी रे॥

* वहाँ जाने पर वह इस सुख-दुखमय व्यापक प्रसार को अपने नित्य और सत्य रूप में देखने को भी, पारमार्थिक ज्ञान की झलक पाने की भी आशा करता है; क्योंकि श्रम और विश्राम के उस संधिस्थल पर ज्ञान की दिव्य ज्योति-सी जगती दिखाई पड़ा करती है-

जिस गंभीर मधुर छाया-विश्व चित्रपट चल माया में-

वीभता विभु-सी पड़े दिखाई दिख-सुख वाला सत्य बनी रे।

श्रम-विश्राम क्षितिज बेला से, जहाँ सृजन करते मेला रे

अमर जागरण, उषा नयन से-बिखराती हो ज्योति घनी रहे॥     

* ‘लहर’ में चार-पाँच ही रहस्यवाद की हैं। पर कवि की तंद्रा और स्वप्न वाली प्रिय भावना जगह-जगह व्यक्त होती है। रवि के उस सन्नाटे की कामना, जिसमें बाहर-भीतर की सब हलचल शांत, रहती है, केवल अभावों की पूर्ति करने वाले अतृप्त कामनाओं की तृप्ति का विधान करने वाले, स्वप्न ही जगा करते हैं, इस गीत से पूर्णतया व्यक्त होता हैं-

अपलक जगती हो एक रात!

सब सोए हों इस भूतल में;

अपनी निरीहता संबल में,

चलती हो कोई भी न बात।

वक्षस्थल में जो छिपे हुए

सोते हों हृदय अभाव लिये

उनके स्वप्नों का हो न प्रात।

* जैसा कि पहले सूचित कर चुके हैं, ‘लहर’ में कई प्रकार की रचनाएँ हैं। कहीं तो प्रकृति के रमणीय पक्ष को लेकर सुंदर और मधुर रूपकमय गान हैं, जैसे-

बीती विभावरी जाग री!

अंबर पनघट में डुबो रही

तारा घट उषा नागरी।

खगकुल ‘कुल-कुल’- सा बोल रहा

किसलय का अंचल डोल रहा,

लो, यह लतिका भी भर लाई

मधु मुकुल नवल रस गागरी॥

* कहीं उस यौवन काल की स्मृतियाँ हैं जिनमें मधु का आदान-प्रदान चलता था, कहीं प्रेम का शुद्ध स्वरुप यह कहकर बताया गया है कि प्रेम देने की चीज हैं, लेने की नहीं।

* पर इस पुस्तक में कवि अपने मधुमय जगत् से निकल और जीवन के कई पक्षों की ओर भी बढ़ा है। वह अपने भीतर इतना अपरिमित अनुराग समझता है कि अपने सान्निध्य से वर्तमान जगत् में उसके फैलने की आशा करता है।

* उषा का अनुराग (लाली) जब फैल जाता है तभी ज्योति की किरण फूटती है-

मेरा अनुराग फैलने दो, नभ के अभिनय कलरव में,

जाकर सूनेपन के तम में, बन किरण कभी आ जाना।  

* कवि अपने प्रियतम से अब वह ‘जीवनगीत’ सुनाने को कहता है जिसमें ‘करुणा का नवअभिनन्दन हो।’

* फिर इस जगत् की आज्ञानांधकारमयी अश्रुपूर्ण रात्रि के बीच ज्ञानज्योति की भिक्षा माँगता हुआ वह उससे प्रेमवेणु के स्वर में जीवनगीत सुनाने को कहती है जिसके प्रभाव से मनुष्य जाति लताओं के सामने स्नेहालिंगन में बद्ध हो जायेगी और इस संतप्त पृथ्वी पर शीतल छाया हो जायेगी-

जग की सजल कालिमा रजनी में मुखचंद्र दिखा जाओ

प्रेमवेणु की स्वर लहरी में जीवन गीत सूना जाओ

स्नेहालिंगन की लतिकाओं की झुरमुट छा जाने दो;

जीवनधन इस जले जगत को वृन्दावन बन जाने दो।

* जैसा कि पहले सूचित कर आये हैं, ‘लहर’ में प्रसाद जी ने प्रगल्भ कल्पना के रंग में इतिहास के कुछ खंडों को भी देखा है।

* जिस वरुण के शांत कछार में बुद्ध भगवान् ने धर्मचक्र का परिवर्तन किया था उसकी पुरानी झाँकी, अशोक की चिंता’, ‘शेरसिंह का शस्त्रसमर्पण’, ‘पेशोला की प्रतिध्वनि’, ‘प्रलय की छाया’ ये सब अतीत के भीतर कल्पना के प्रवेश के उदाहरण हैं। इस प्रकार ‘लहर’ में हम प्रसाद जी को वर्तमान और अतीत जीवन की प्रकृत ठोस भूमि पर अपनी कल्पना ठहराने का कुछ प्रयत्न करते पाते हैं।

जय हिंद

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