हिम नंबर 117- फ़ादर ने प्रार्थना-पुस्तक खोलते हुए कहा। हॉल में प्रत्येक लड़की ने डेस्क पर रखी हुई हिम-बुक खोल ली। पन्नों के उलटने की खड़खड़ाहट फिसलती एक सिरे से दूसरे सिरे तक फैल गई।
आगे की बेंच से उठकर ह्यूबर्ट पियानो के सामने स्टूल पर बैठ गया। संगीत-शिक्षक होने के कारण हर साल स्पेशल सर्विस के अवसर पर उसे ‘कॉयर’ के संग पियानो बजाना पड़ता था। राबर्ट ने अपने रूमाल से नाक साफ़ की। अपनी घबराहट छिपाने के लिए ह्यूबर्ट हमेशा ऐसा ही किया करता था। कनखियों से हॉल की ओर देखते हुए उसने काँपते हाथों से हिम-बुक खोली। लीड काइंडली लाइट…
पियानो के सुर दबे, झिझकते से मिलने लगे। घने बालों से ढँकी ह्यूबर्ट की लंबी, पीली उँगलियाँ खुलने-सिमटने लगी। ‘कॉयर’ में गाने वाली लड़कियों के स्वर एक-दूसरे से गुँथकर कोमल-स्निग्ध लहरों में बिंध गए। लतिका को लगा, उसका जूड़ा ढीला पड़ गया है, मानो गरदन के नीचे झूल रहा है। मिस वुड की आँख बचा लतिका ने चुपचाप बालों में लगे क्लिपों को कस कर खींच दिया। ‘बड़ा झक्की आदमी है… सुबह मैंने ह्यूबर्ट को यहाँ आने से मना किया था, फिर भी चला आया।’ डॉक्टर ने कहा।
लतिका को करीमुद्दीन की बात याद हो गई। रात-भर ह्यूबर्ट को खाँसी का दौरा पड़ा था। कल जाने के लिए कह रहे थे। लतिका ने सिर टेढा करके ह्यूबर्ट के चेहरे की एक झलक पाने की विफल चेष्टा की। इतने पीछे से कुछ भी देख पाना असंभव था; पियानो पर झुका हुआ केवल ह्यूबर्ट का सिर दिखाई देता था।
लीड काइंडली लाइट, संगीत के सुर मानो एक ऊँची पहाड़ी पर चढ़कर हाँफती हुई साँसों को आकाश की अगाध शून्यता मे बिखेरते हुए नीचे उतर रहे हैं। बारिश की मुलायम धूप चैपल के लंबे चौकोर शीशों पर झलमला रही है, जिसकी एक महीन चमकीली रेखा ईसामसीह की प्रतिमा पर तिरछी होकर गिर रही है। मोमबत्तियों का धुआँ धूप में नीली-सी लकीर खींचता हुआ हवा में तिरने लगा है। पियानो के क्षणिक ‘पोज़’ में लतिका को पत्तों का मर्मर कहीं दूर अनजानी दिशा से आता हुआ सुनाई दे जाता है। एक क्षण के लिए उसे यह भ्रम हुआ कि चैपल का फीका-सा अँधेरा उस छोटे-से ‘प्रेयर-हॉल’ के चारों कोनों से सिमटता हुआ उसके आसपास घिर आया है- मानो कोई उसकी आँखों पर पट्टी बाँधकर उसे यहाँ तक ले आया हो और अचानक उसकी दोनों आँखें खोल दी हों। उसे लगा कि जैसे मोमबत्तियों के धूमिल आलोक में कुछ भी ठोस, वास्तविक न रहा हो। चैपल की छत, दीवारें, डेस्क पर रखा हुआ डॉक्टर का सुघड़-सुडौल हाथ, और पियानो के सुर अतीत की धुँध को भेदते हुए स्वयं उस धुँध का भाग बनते जा रहे हों
एक पगली-सी स्मृति, एक उद्भ्रांत भावना- चैपल के शीशों के परे पहाड़ी सूखी हवा, हवा में झुकी हुई वीपिंग विलोज़ की काँपती टहनियाँ, पैरों-तले चीड़ के पत्तों की धीमी-सी चिर-परिचित खड़…खड़…। वहीं पर गिरीश एक हाथ में मिलिट्री का ख़ाकी हैट लिए खड़ा है। चौड़े उठे हुए सबल कंधे, अपना सिर वहाँ टिका दो, तो जैसे सिमटकर खो जाएगा…चार्ल्स वोयर, यह नाम उसने रखा था। वह झेंपकर हँसने लगता। ‘तुम्हें आर्मी में किसने चुन लिया, मेजर बन गए हो, लेकिन लड़कियों से भी गए-बीते हो…ज़रा-ज़रा-सी बात पर चेहरा लाल हो जाता है।’ यह सब वह कहती नहीं, सिर्फ़ सोचती-भर थी- सोचा था कहूँगी, वह ‘कभी’ कभी नहीं आया, बुरुंस का लाल फूल लाए हो न झूठे ख़ाकी क़मीज़ की जिस जेब पर बैज चिपके थे, उसी में से मुसा हुआ बुरुंस का फूल निकल आया। छि:, सारा मुरझा गया अभी खिला कहाँ है? (हाऊ क्लम्ज़ी) उसके बालों में गिरीश का हाथ उलझ रहा है। फूल कहीं टिक नहीं पाता, फिर उसे क्लिप के नीचे फँसाकर उसने कहा- देखा
वह मुड़ी और इससे पहले कि वह कुछ कह पाती, गिरीश ने अपना मिलिट्री का हैट धप् से उसके सिर पर रख दिया। वह मंत्रमुग्ध-सी वैसे ही खड़ी रही। उसके सिर पर गिरीश का हैट है, माथे पर छोटी-सी बिंदी है। बिंदी पर उड़ते हुए बाल हैं। गिरीश ने उस बिंदी को अपने होंठों से छुआ है, उसने उसके नंगे सिर को अपने दोनों हाथों में समेट लिया है- लतिका
गिरीश ने चिढ़ाते हुए कहा- मैन ईटर ऑफ़ कुमाऊँ (उसका यह नाम गिरीश ने उसे चिढ़ाने के लिए रखा था), …वह हँसने लगी।
‘लतिका… ‘सुनो।’ गिरीश का स्वर कैसा हो गया था? ‘ना, मैं कुछ भी नहीं सुन रही।’ ‘लतिका…मैं कुछ महीनों में वापस लौट आऊँगा…’
‘ना… मैं कुछ भी नहीं सुन रही।’ किंतु वह सुन रही है- वह नहीं जो गिरीश कह रहा है, बल्कि वह, जो नहीं कहा जा रहा है, जो उसके बाद कभी नहीं कहा गया। लीड काइंडली लाइट…
लड़कियों का स्वर पियानो के स्वरों में डूबा हुआ गिर रहा है, उठ रहा है… ह्यूबर्ट ने सिर मोड़कर लतिका को निमिष भर देखा- आँखें मूँदे ध्यानमग्ना प्रस्तर-मूर्ति-सी वह स्थिर निश्चल खड़ी थी। क्या यह भाव उसके लिए? क्या लतिका ने ऐसे क्षणों में उसे अपना साथी बनाया है? ह्यूबर्ट ने एक गहरी साँस ली और उस साँस मे ढेर-सी थकान उमड़ आई। ‘देखो…मिस वुड कुर्सी पर बैठे-बैठे सो रही हैं।’ डॉक्टर होंठों में ही फुस-फुसाया। यह डॉक्टर का पुराना मज़ाक़ था कि मिस वुड प्रार्थना करने के बहाने आँखें मूँदे हुए नींद की झपकियाँ लेती हैं।
फ़ादर एल्मंड ने कुर्सी पर फैले अपने गाउन को समेट लिया और प्रेयर-बुक बंद करके मिस वुड के कानों में कुछ कहा। पियानो का स्वर क्रमशः मंद पड़ने लगा, ह्यूबर्ट की उँगलियाँ ढीली पड़ने लगी। सर्विस के समाप्त होने से पूर्व मिस वुड ने ऑर्डर पढ़कर सुनाया। बारिश होने की आशंका से आज के कार्यक्रम में कुछ आवश्यक परिवर्तन करने पड़े थे।
पिकनिक के लिए झूला देवी के मंदिर जाना संभव नहीं हो सकेगा। इसलिए स्कूल से कुछ दूर ‘मीडोज़’ में ही सब लड़कियाँ नाश्ते के बाद जमा होंगी। सब लड़कियों को दोपहर का ‘लंच’ होस्टल-किचन से ही ले जाना होगा, केवल शाम की चाय ‘मीडोज़’ में बनेगी।
पहाड़ों की बारिश का क्या भरोसा! कुछ देर पहले धुआँधार बादल गरज रहे थे, सारा शहर पानी में भीगा ठिठुर रहा था। अब धूप में नहाता नीला आकाश धुँध की ओट से बाहर निकलता हुआ फैल रहा था। लतिका ने चैपल से बाहर आते हुए देखा- विपिंग बिलोज़ की भीगी शाख़ाओं से धूप में चमकती हुई बारिश की बूँदें टपक रही थीं… लड़कियाँ चैपल से बाहर निकलकर छोटे-छोटे झुँड बनाकर कॉरीडोर में जमा हो गई हैं। नाश्ते के लिए अभी पौना घंटा पड़ा था और उनमें से कोई लड़की होस्टल जाने के लिए इच्छुक नहीं थी। छुट्टियाँ अभी शुरू नहीं हुई थी। किंतु शायद इसीलिए वे इन चंद बचे-खुचे क्षणों में अनुशासन के घेरे के भीतर भी मुक्त होने का भरपूर आनंद उठा लेना चाहती थीं।
मिस वुड को लड़कियों का यह गुल-गपाड़ा अखरा, किंतु फ़ादर एल्मंड के सामने वह उन्हें डाँट-फटकार नहीं सकी। अपनी झुँझलाहट दबाकर वह मुस्कुराते हुए बोली, ‘कल सब चली जाएँगी, सारा स्कूल वीरान हो जाएगा!’ फ़ादर एल्मंड का लंबा ओजपूर्ण चेहरा चैपल की घुटी हुई गरमाई से लाल हो उठा था। कॉरीडोर के जंगले पर अपनी छड़ी लटकाकर वह बोले, ‘छुट्टियों में पीछे होस्टल में कौन रहेगा?’
‘पिछले दो-तीन सालों से मिस लतिका ही रह रही हैं…।’ ‘और डॉक्टर मुकर्जी?’ फ़ादर का ऊपरी होंठ तनिक खिंच आया। ‘डॉक्टर तो सर्दी-गर्मी यहीं रहते हैं।’ मिस वुड ने विस्मय से फ़ादर की ओर देखा। वह समझ नहीं सकी कि फ़ादर ने डॉक्टर का प्रसंग क्यों छेड़ दिया है।
‘डॉक्टर मुकर्जी छुट्टियों में कहीं नहीं जाते?’ ‘दो महीने की छुट्टियों में बर्मा जाना काफ़ी कठिन है, फ़ादर!’ मिस वुड हँसने लगीं।
‘मिस वुड, पता नहीं आप क्या सोचती हैं। मुझे तो मिस लतिका का होस्टल में अकेले रहना कुछ समझ में नहीं आता।’ ‘लेकिन फ़ादर’, मिस वुड ने कहा, ‘यह तो कान्वेंट स्कूल का नियम है कि कोई भी टीचर छुट्टियों में अपने ख़र्चे पर होस्टल में रह सकती है।’ ‘मैं फ़िलहाल स्कूल के नियमों की बात नहीं कर रहा…मिस लतिका डॉक्टर के संग यहाँ अकेली ही रह जाएँगी और सच पूछिए मिस वुड, डॉक्टर के बारे में मेरी राय कुछ बहुत अच्छी नहीं है। ‘फ़ादर, आप कैसी बात कर रहे हैं। मिस लतिका बच्ची थोड़े ही हैं…।’ मिस वुड को ऐसी आशा नहीं थी कि फ़ादर एल्मंड अपने दिल में दक़ियानूसी भावना को स्थान देंगे।
फ़ादर एल्मंड कुछ हतप्रभ से हो गए। बात टालते हुए बोले, ‘मिस वुड, मेरा मतलब यह नहीं था। आप तो जानती हैं, मिस लतिका और उस मिलिट्री अफ़सर को लेकर एक अच्छा-ख़ासा स्कैंडल बन गया था,
स्कूल की बदनामी होने में क्या देर लगती है!’ ‘वह बेचारा तो अब नहीं रहा। मैं उसे जानती थी फ़ादर! ईश्वर उसकी आत्मा को शांति दे!’
मिस वुड ने धीरे-से अपनी दोनों बाँहों से क्रॉस किया।
फ़ादर एल्मंड को मिस वुड की मूर्खता पर इतना अधिक क्षोभ हुआ कि उनसे आगे और कुछ नहीं बोला गया। डॉक्टर मुकर्जी से उनकी कभी नहीं पटती थी, इसलिए मिस वुड की आँखों में वह डॉक्टर को नीचा दिखाना चाहते थे। किंतु मिस वुड लतिका का रोना ले बैठी। आगे बात बढ़ाना व्यर्थ था। उन्होंने छड़ी को जंगले से उठाया और ऊपर साफ़ खुले आकाश को देखते हुए बोले, ‘प्रोग्राम आपने यूँ ही बदला; मिस वुड, अब क्या बारिश होगी!’
ह्यूबर्ट जब चैपल से बाहर निकला तो उसकी आँखें चकाचौंध-सी हो गईं। उसे लगा जैसे किसी ने अचानक ढेर-सी चमकीली उचलती हुई रौशनी मुट्ठी में भरकर उसकी आँखों में झोंक दी हो। पियानो के संगीत के सुर रुई के छुई-मुई रेशों की भाँति अब तक उसके मस्तिष्क की थकी-माँदी नसों पर फड़फड़ा रहे थे। वह काफ़ी थक गया था। पियानो बजाने से फेफड़ों पर हमेशा भारी दबाव पड़ता, दिल की धड़कन तेज़ हो जाती थी। उसे लगता था कि संगीत के एक नोट को दूसरे नोट में उतारने के प्रयत्न में वह एक अँधेरी खाई पार कर रहा है।
आज चैपल में मैंने जो महसूस किया, वह कितना रहस्यमय, कितना विचित्र था, ह्यूबर्ट ने सोचा। मुझे लगा, पियानो का हर नोट चिरंतन ख़ामोशी की अँधेरी खोह में निकलकर बाहर फैली नीली धुँध को काटता, तराशता हुआ एक भूला-सा अर्थ खींच लाता है। गिरता हुआ हर ‘पोज़’ एक छोटी-सी मौत है, मानो घने छायादार वृक्षों की काँपती छायाओं में कोई पगडंडी गुम हो गई हो, एक छोटी-सी मौत जो आने वाले सुरों को अपनी बची-खुची गूँजों की साँसें समर्पित कर जाती है…जो मर जाती है, किंतु मिट नहीं पाती, मिटती नहीं इसलिए मरकर भी जीवित है, दूसरे सुरों में लय हो जाती है…
‘डॉक्टर, क्या मृत्यु ऐसे ही आती है? अगर मैं डॉक्टर से पूछूँ तो वह हँसकर टाल देगा। मुझे लगता है, वह पिछले कुछ दिनों से कोई बात छिपा रहा है। उसकी हँसी में जो सहानुभूति का भाव होता है, वह मुझे अच्छा नहीं लगता। आज उसने मुझे स्पेशल सर्विस में आने से रोका था- कारण पूछने पर वह चुप रहा था। कौन-सी ऐसी बात है, जिसे मुझसे कहने में डॉक्टर कतराता है। शायद मैं शक्की मिज़ाज होता जा रहा हूँ, और बात कुछ भी नहीं है।
ह्यूबर्ट ने देखा, लड़कियों की क़तार स्कूल से होस्टल जाने वाली सड़क पर नीचे उतरती जा रही है। उजली धूप में उनके रंग-बिरंगे रिबन, हल्की आसमानी रंग की फ़्रॉकें और सफ़ेद पेटियाँ चमक रही हैं। सीनियर कैम्ब्रिज़ की कुछ लड़कियों ने चैपल की वाटिका से गुलाब के फूलों को तोड़कर अपने बालों में लगा लिया है। कैंटोनमेंट के तीन-चार सिपाही लड़कियों को देखते हुए अश्लील मज़ाक़ करते हुए हँस रहे हैं और कभी-कभी किसी लड़की की ओर ज़रा-सा झुककर सीटी बजाने लगते हैं।
‘हलो मिस्टर ह्यूबर्ट…’ ह्यूबर्ट ने चौंककर पीछे देखा। लतिका एक मोटा-सा रजिस्टर बग़ल में दबाए खड़ी थी। ‘आप अभी यहीं हैं?’ ह्यूबर्ट की दृष्टि लतिका पर टिकी रही। वह क्रीम रंग की पूरी बाँहों की ऊनी जैकट पहने हुई थी। कुमाऊँनी लड़कियों की तरह लतिका का गला गोल था, धूप की तपन से पका गेहुँआ रंग कहीं-कहीं हल्का-सा गुलाबी हो आया था, मानो बहुत धोने पर भी गुलाब के कुछ धब्बे इधर-उधर बिखरे रह गए हों। ‘उन लड़कियों के नाम नोट करने थे, जो कल जा रही हैं… सो पीछे रुकना पड़ा! आप भी तो कल जा रहे हैं मिस्टर ह्यूबर्ट?’ ‘अभी तक तो यही इरादा है। यहाँ रुककर भी क्या करूँगा? आप स्कूल की ओर जा रही हैं?’ ‘चलिए…’
पक्की सड़क पर लड़कियों की भीड़ जमा थी, इसलिए वे दोनों पोलो-ग्राउंड का चक्कर काटती हुई पगडंडी से नीचे उतरने लगे। हवा तेज़ हो चली। चीड़ के पत्ते हर झोंके के संग टूट-टूटकर पगडंडी पर ढेर लगाते जाते थे। ह्यूबर्ट रास्ता बनाने के लिए अपनी छड़ी से उन्हें बुहारकर दोनों ओर बिखेर देता था। लतिका पीछे खड़ी हुई देखती रहती थी। अल्मोड़ा की ओर से आते हुए छोटे-छोटे बादल रेशमी रूमालों-से उमड़ते हुए सूरज के मुँह पर लिपटे-से जाते थे, फिर हवा में बह निकलते थे। इस खेल मे धूप कभी मंद, फीकी-सी पड़ जाती थी, कभी अपना उजला आँचल खोलकर समूचे शहर को अपने में समेट लेती थी।
लतिका तनिक आगे निकल गई। ह्यूबर्ट की साँस चढ़ गई थी और वह धीरे-धीरे हाँफता हुआ पीछे से आ रहा था। जब वे पोलो-ग्राउंड के पवेलियन को छोड़कर मिलिट्री के दार्इं ओर मुड़े, तो लतिका ह्यूबर्ट की प्रतीक्षा करने के लिए खड़ी हो गई। उसे याद आया, छुट्टियों के दिनों में जब कभी कमरे में अकेले बैठे-बैठे उसका मन ऊब जाता था, तो वह अक्सर टहलते हुए मिलिट्री तक चली जाती थी। उससे सटी पहाड़ी पर चढ़कर वह बर्फ़ में ढँके देवदार वृक्षों को देखा करती थी, जिनकी झुकी हुई शाख़ों से रुई के गालों-सी बर्फ़ नीचे गिरा करती थी। नीचे बाज़ार जाने वाली सड़क पर बच्चे स्लेज़ पर फिसला करते थे। वह खड़ी-खड़ी बर्फ़ में छिपी हुई उस सड़क का अनुमान लगाया करती थी जो फ़ादर एल्मंड के घर से गुज़रती हुई मिलिट्री अस्पताल और डाकघर से होकर चर्च की सीढ़ियों तक जाकर गुम हो जाती थी। जो मनोरंजन एक दुर्गम पहेली को सुलझाने में होता है, वही लतिका को बर्फ़ में खोए रास्तों को खोज निकालने में होता था।
‘आप बहुत तेज़ चलती हैं, मिस लतिका’- थकान से ह्यूबर्ट का चेहरा कुम्हला गया था। माथे पर पसीने की बूँदें छलक आई थी। ‘कल रात आपकी तबीयत क्या कुछ ख़राब हो गई थी? ‘आपने कैसे जाना? क्या मैं अस्वस्थ दिख रहा हूँ?’ ह्यूबर्ट के स्वर में हल्की-सी खीझ का आभास था। सब लोग मेरी सेहत को लेकर क्यों बात शुरू करते हैं, उसने सोचा। ‘नहीं, मुझे तो पता भी नहीं चलता, वह तो सुबह करीमुद्दीन ने बातों-ही-बातों में ज़िक्र छेड़ दिया था।’ लतिका कुछ अप्रतिभ-सी हो आई। ‘कोई ख़ास बात नहीं, वह पुराना दर्द शुरू हो गया था- अब बिल्कुल ठीक है।’ अपने कथन की पुष्टि के लिए ह्यूबर्ट छाती सीधी करके तेज़ क़दम बढ़ाने लगा। ‘डॉक्टर मुकर्जी को दिखलाया था?’ ‘वह सुबह आए थे। उनकी बात कुछ समझ में नहीं आती। हमेशा दो बातें एक-दूसरे से उलटी कहते हैं। कहते थे कि इस बार मुझे छ:-सात महीने की छुट्टी लेकर आराम करना चाहिए। लेकिन अगर मैं ठीक हूँ तो भला इसकी क्या ज़रूरत है?
ह्यूबर्ट के स्वर में व्यथा की छाया लतिका से छिपी न रह सकी। बात को टालते हुए उसने कहा, ‘आप तो नाहक़ चिंता करते हैं, मि. ह्यूबर्ट! आज-कल मौसम बदल रहा है, अच्छे-भले आदमी तक बीमार हो जाते हैं।’ ह्यूबर्ट का चेहरा प्रसन्नता में दमकने लगा। उसने लतिका को ध्यान से देखा। वह अपने दिल का संशय मिटाने के लिए निश्चिंत हो जाना चाहता था कि कहीं लतिका उसे केवल दिलासा देने के लिए ही तो झूठ नहीं बोल रही। ‘यही तो मैं सोच रहा था, मिस लतिका! डॉक्टर की सलाह सुनकर तो मैं डर ही गया। भला छः महीने की छुट्टी लेकर मैं अकेला क्या करूँगा? स्कूल में तो बच्चों के संग मन लगा रहता है। सच पूछो तो दिल्ली में ये दो महीनों की छुट्टियाँ काटना भी दूभर हो जाता है…।’
‘मिस्टर ह्यूबर्ट…कल आप दिल्ली जा रहे हैं…?’ लतिका चलते-चलते हठात् ठिठक गई। सामने पोलो-ग्राउंड फैला था, जिसके दूसरी ओर मिलिट्री की ट्रकें कैंटोनमेंट की ओर जा रही थी। ह्यूबर्ट को लगा, जैसे लतिका की आँखें अधमुँदी-सी खुली रह गई है, मानो पलकों पर एक पुराना-भूला-सा सपना सरक आया है।
‘मिस्टर ह्यूबर्ट…आप दिल्ली जा रहे हैं। इस बार लतिका ने प्रश्न नहीं दुहराया- उसके स्वर में केवल एक असीम दूरी का भाव घिर आया। ‘बहुत अर्सा पहले मैं भी दिल्ली गई थी, मि. ह्यूबर्ट! तब मैं बहुत छोटी थी- न जाने कितने बरस बीत गए। हमारी मौसी का ब्याह वहीं हुआ था। बहुत-सी चीज़ें देखी थीं, लेकिन अब तो सब कुछ धुँधला-सा पड़ गया है। इतना याद है कि हम क़ुतुब पर चढ़े थे। सबसे ऊँची मंज़िल से हमने नीचे झाँका था- न जाने कैसा लगा था। नीचे चलते हुए आदमी चाभी भरे हुए खिलौनों-से लगते थे। हमने ऊपर से उन पर मूँगफलियाँ फेंकी थी, लेकिन हम बहुत निराश हुए थे क्योंकि उनमें से किसी ने हमारी तरफ़ नहीं देखा। शायद माँ ने मुझे डाँटा था, और मैं सिर्फ़ नीचे झाँकते हुए डर गई थी। सुना है, अब तो दिल्ली इतना बदल गया है कि पहचाना नहीं जाता…
वे दोनों फिर चलने लगे। हवा का वेग ढीला पड़ने लगा। उड़ते हुए बादल अब सुस्ताने-से लगे थे, उनकी छायाएँ नंदादेवी और पंचचूली की पहाड़ियों पर गिर रही थी। स्कूल के पास पहुँचते-पहुँचते चीड़ के पेड़ पीछे छूट गए, कहीं-कहीं ख़ुबानी के पेड़ों के आस-पास बुरुंस के लाल फूल धूप में चमक जाते थे। स्कूल तक आने में उन्होंने पोलो-ग्राउंड का लंबा चक्कर लगा लिया था। ‘मिस लतिका, आप कहीं छुट्टियों में जाती क्यों नहीं- सर्दियों में तो यहाँ सब कुछ वीरान हो जाता होगा?’
‘अब मुझे यहाँ अच्छा लगता है’, लतिका ने कहा, ‘पहले साल अकेलापन कुछ अखरा था- अब आदी हो गई हूँ। क्रिसमस से एक रात पहले क्लब में डाँस होता है, लाटरी डाली जाती है और रात को देर तक नाच-गाना होता रहता है। नए साल के दिन कुमाऊँ रेजीमेंट की ओर से परेड-ग्राउंड में कार्नीवाल किया जाता है, बर्फ़ पर स्केटिंग होती है, रंग-बिरंगे ग़ुब्बारों के नीचे फ़ौजी बैंड बजता है, फ़ौजी अफ़सर फैंसी ड्रेस में भाग लेते हैं हर साल ऐसा ही होता है, मिस्टर ह्यूबर्ट । फिर कुछ दिन बाद विंटर स्पोर्ट्स के लिए अँग्रेज़ टूरिस्ट आते हैं। हर साल मैं उनसे परिचित होती हूँ, वापस लौटते हुए वे हमेशा वादा करते हैं कि अगले साल भी आएँगे, पर मैं जानती हूँ कि वे नहीं आएँगे, वे भी जानते हैं कि वे नहीं आएँगे, फिर भी हमारी दोस्ती में कोई अंतर नहीं पड़ता। फिर…फिर कुछ दिनों बाद पहाड़ों पर बर्फ़ पिघलने लगती है, छुट्टियाँ ख़त्म होने लगती हैं, आप सब लोग अपने-अपने घरों से वापस लौट आते हैं और मिस्टर ह्यूबर्ट, पता भी नहीं चलता कि छुट्टियाँ कब शुरू हुई थीं, कब ख़त्म हो गईं…’
लतिका ने देखा कि ह्यूबर्ट उसकी ओर आतंकित भयाकुल दृष्टि से देख रहा है। वह सिटपिटाकर चुप हो गई। उसे लगा, मानो वह इतनी देर में पागल-सी अनर्गल प्रलाप कर रही हो। ‘मुझे माफ़ करना मिस्टर ह्यूबर्ट…कभी-कभी मैं बच्चों की तरह बातों में बहक जाती हूँ।’ ‘मिस लतिका…’ ह्यूबर्ट ने धीरे से कहा। वह चलते-चलते रुक गया था। लतिका ह्यूबर्ट के भारी स्वर से चौंक-सी गई। ‘क्या बात है मिस्टर ह्यूबर्ट?’ ‘वह पत्र…उसके लिए मैं लज्जित हूँ। उसे आप वापस लौटा दें, समझ लें कि मैंने उसे कभी नहीं लिखा था।’
लतिका कुछ समझ न सकी, दिग्भ्रांत-सी खड़ी हुई ह्यूबर्ट के पीले, उद्विग्न चेहरे को देखती रही। ह्यूबर्ट ने धीरे से लतिका के कंधे पर हाथ रख दिया। ‘कल डॉक्टर ने मुझे सब कुछ बता दिया। अगर मुझे पहले से मालूम होता तो…तो… ह्यूबर्ट हकलाने लगा। ‘मिस्टर ह्यूबर्ट …किंतु लतिका से आगे कुछ भी नहीं कहा गया। उसका चेहरा सफ़ेद हो गया था।
दोनों चुपचाप कुछ देर तक स्कूल के गेट के बाहर खड़े रहे। मीडोज़… पगडंडियों, पत्तों, छायाओं से घिरा छोटा-सा द्वीप, मानो कोई घोंसला दो हरी घाटियों के बीच आ दबा हो। भीतर घुसते ही पिकनिक की काली आग से झुलसे हुए पत्थर, अधजली टहनियाँ, बैठने के लिए बिछाए गए पुराने अख़बारों के टुकड़े इधर-उधर बिखरे दिखाई दे जाते हैं। अक्सर टूरिस्ट पिकनिक के लिए यहाँ आते हैं। मीडोज़ को बीच में काटता हुआ टेढ़ा-मेढ़ा बरसाती नाला बहता है, जो दूर से धूप में चमकता हुआ सफ़ेद रिबन-सा दिखाई देता है।
यहीं पर काठ के तख़्तों का बना हुआ टूटा-सा पुल है, जिस पर लड़कियाँ हिचकोले खाती हुई चल रही हैं। ‘डॉक्टर मुकर्जी, आप तो सारा जंगल जला देंगे’- मिस वुड ने अपनी ऊँची एड़ी के सैंडल में जलती हुई दियासलाई को दबा डाला, जो डॉक्टर ने सिगार सुलगाकर चीड़ के पत्तों के ढेर पर फेंक दी थी। वे नाले से कुछ दूर हटकर चीड़ के दो पेड़ों की गुँथी हुई छाया के नीचे बैठे थे। उनके सामने एक छोटा-सा रास्ता नीचे पहाड़ी गाँव की ओर जाता था, जहाँ पहाड़ की गोद में शकरपारों के खेत एक-दूसरे के नीचे बिछे हुए थे। दोपहर के सन्नाटे में भेड़-बकरियों के गलों में बँधी हुई घंटियों का स्वर हवा मे बहता हुआ सुनाई दे जाता था। घास पर लेटे-लेटे डॉक्टर सिगार पीते रहे। ‘जंगल की आग कभी देखी है, मिस वुड… एक अलमस्त नशे की तरह धीरे-धीरे फैलती जाती है।’
‘आपने कभी देखी है डॉक्टर?’ मिस वुड ने पूछा, ‘मुझे तो बड़ा डर लगता है।’
‘बहुत साल पहले शहरों को जलते हुए देखा था।’ डॉक्टर लेटे हुए आकाश की ओर ताक रहे थे। ‘एक-एक मकान ताश के पत्तों की तरह गिरता जाता है। दुर्भाग्यवश ऐसे अवसर देखने में बहुत कम आते हैं।’
‘आपने कहाँ देखा, डॉक्टर?’
‘लड़ाई के दिनों में अपने शहर रंगून को जलते हुए देखा था।’ मिस वुड की आत्मा को ठेस लगी, किंतु फिर भी उनकी उत्सुकता शांत नहीं हुई।
‘आपका घर- क्या वह भी जल गया था?
डॉक्टर कुछ देर तक चुपचाप लेटा रहा।
‘हम उसे ख़ाली छोड़कर चले आए थे। मालूम नहीं, बाद में क्या हुआ?’ अपने व्यक्तिगत जीवन के संबंध में कुछ भी कहने में डॉक्टर को कठिनाई महसूस होती है।
‘डॉक्टर, क्या आप कभी वापस बर्मा जाने की बात नहीं सोचते?’ डॉक्टर ने अँगड़ाई ली और करवट बदलकर औंधे मुँह लेट गए। उनकी आँखें मुँद गई और माथे पर बालों की लटें झूल आई।
‘सोचने से क्या होता है मिस वुड’ ‘जब बर्मा में था, तब क्या कभी सोचा था कि यहाँ आकर उम्र काटनी होगी?’
‘लेकिन डॉक्टर, कुछ भी कह लो, अपने देश का-सा सुख कहीं और नहीं मिलता। यहाँ तुम चाहे कितने वर्ष रह लो, अपने को हमेशा अजनबी ही पाओगे।’
डॉक्टर ने सिगार के धुएँ को धीरे-धीरे हवा में छोड़ दिया- ‘दरअसल अजनबी तो मैं वहाँ भी समझा जाऊँगा, मिस वुड। इतने वर्षो बाद वहाँ मुझे कौन पहचानेगा? इस उम्र में नए सिरे में रिश्ते जोड़ना काफ़ी सिरदर्द का काम है। कम-से-कम मेरे बस की बात नहीं है।’
‘लेकिन डॉक्टर, आप कब तक इस पहाड़ी क़स्बे में पड़े रहेंगे। इसी देश में रहना है तो किसी बड़े शहर मे प्रैक्टिस शुरू कीजिए?’
‘प्रैक्टिस बढ़ाने के लिए कहाँ-कहाँ भटकता फिरूँगा, मिस वुड। जहाँ रहो, वहीं मरीज़ मिल जाते हैं। यहाँ आया था कुछ दिनों के लिए- फिर मुद्दत हो गई और टिका रहा। जब कभी जी ऊबेगा। कहीं चला जाऊँगा। जड़ें कहीं नहीं जमती, तो पीछे भी नहीं छूट जाता। मुझे अपने बारे में कोई ग़लतफ़हमी नहीं है मिस वुड, मैं सुखी हूँ।’
मिस वुड ने डॉक्टर की बात पर विशेष ध्यान नहीं दिया! दिल में वह हमेशा डॉक्टर को उच्छृंखल, लापरवाह और सनकी समझती रही है, किंतु डॉक्टर के चरित्र में उसका विश्वास है- न जाने क्यों, क्योंकि डॉक्टर ने जाने-अनजाने में उसका कोई प्रमाण दिया हो, यह उसे याद नहीं पड़ता।
मिस वुड ने एक ठंडी साँस भरी। वह हमेशा यह सोचती थी कि यदि डॉक्टर इतना आलसी और लापरवाह न होता, तो अपनी योग्यता के बल पर काफ़ी चमक सकता था। इसीलिए उन्हें डॉक्टर पर क्रोध भी आता था और दुःख भी होता था। मिस वुड ने अपने बैग से ऊन का गोला और सलाइयाँ निकाली, फिर उसके नीचे से अख़बार में लिपटा हुआ चौड़ा कॉफ़ी का डिब्बा उठाया, जिसमें अंडों की सैंडविचें और हैम्बर्गर दबे हुए थे। थर्मस से प्यालों में कॉफ़ी उँडेलते मिस वुड ने कहा, ‘डॉक्टर, कॉफ़ी ठंडी हो रही है।’
जय हिंद