डॉक्टर लेटे-लेटे बुड़बुड़ाया। मिस वुड ने नीचे झुककर देखा, वह कुहनी पर सिर टिकाए चुपचाप सो रहा था। ऊपर का होंठ ज़रा-सा फैलकर मुड़ गया था, मानो किसी से मज़ाक़ करने से पहले मुस्कुरा रहा हो।
उसकी उँगुलियों में दबा हुआ सिगार नीचे झुका हुआ लटक रहा था। ‘मेरी, मेरी, व्हाट डू यू वान्ट-’ दूसरे स्टैंडर्ड में पढ़ने वाली मेरी ने अपनी चंचल-चपल आँखें ऊपर उठाई- लड़कियों का दायरा उसे घेरे हुए, कभी पास आता था, कभी खिंचता चला जाता था।
‘आई वान्ट-आई वान्ट ब्लू—’ दोनों हाथों को हवा में घुमाते हुए, मेरी चिल्लाई। दायरा पानी की तरह टूट गया। सब लड़कियाँ एक-दूसरे पर गिरती-पड़ती किसी नीली वस्तु को छूने के लिए भाग-दौड़ करने लगीं। लंच समाप्त हो चुका था। लड़कियों के छोटे-छोटे दल मीडोज़ में बिखर गए थे। ऊँची क्लास की कुछ लड़कियाँ चाय का पानी गर्म करने के लिए पेड़ों पर चढ़-कर सूखी टहनियाँ तोड़ रही थीं।
दोपहर की उस घड़ी में मीडोज़ अलसाया ऊँघना-सा जान पड़ता था। हवा का कोई भूला-भटका झोंका- चीड़ के पत्ते खड़खड़ा उठते थे। कभी कोई पक्षी अपनी सुस्ती मिटाने झाड़ियों से उड़कर नाले के किनारे बैठ जाता था, पानी में सिर डुबोता था, फिर ऊबकर हवा में दो-चार निरुद्देश्य चक्कर काटकर दुबारा झाड़ियों में दुबक जाता था।
किंतु जंगल की ख़ामोशी शायद कभी चुप नहीं रहती। गहरी नींद में डूबी सपनों-सी कुछ आवाज़ें नीरवता के हल्के-झीने पर्दे पर सलवटें बिछा जाती हैं- मूक लहरों-सी हवा में तिरती हैं- मानो कोई दबे-पाँव झाँककर अदृश्य संकेत कर जाता है-‘देखो मैं यहाँ हूँ-’ लतिका ने जूली के ‘बॉब हेयर’ को सहलाते हुए कहा, ‘तुम्हें कल रात बुलाया था।’
‘मैडम, मैं गई थी- आप अपने कमरे में नहीं थीं।’ लतिका को याद आया कि कल रात वह डॉक्टर के कमरे के टैरेस पर देर तक बैठी रही थी- और भीतर ह्यूबर्ट पियानो पर शोपाँ का नौक्टर्न बजा रहा था। ‘जूली, तुमसे कुछ पूछना था।’ उसे लगा, वह जूली की आँखों से अपने को बचा रही है। जूली ने अपना चेहरा ऊपर उठाया। उसकी भूरी आँखों से कौतूहल झाँक रहा था।
‘तुम ऑफ़िसर्स मेस में किसी को जानती हो?’ जूली ने अनिश्चित भाव से सिर हिलाया। लतिका कुछ देर तक जूली को अपलक घूरती रही। ‘जूली, मुझे विश्वास है, तुम झूठ नहीं बोलोगी।’ कुछ क्षण पहले जूली के आँखों में जो कौतुहल था, वह भय में परिणत होने लगा। लतिका ने अपनी जैकट की जेब से एक नीला लिफ़ाफ़ा निकालकर जूली की गोद में फेंक दिया। ‘यह किसकी चिट्ठी है?
जूली ने लिफ़ाफ़ा उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, किंतु फिर एक क्षण के लिए उसका हाथ काँपकर ठिठक गया- लिफ़ाफ़े पर उसका नाम और होस्टल का पता लिखा हुआ था।
‘थैंक यू मैडम, मेरे भाई का पत्र है, वह झाँसी में रहते है!’ जूली ने घबराहट में लिफ़ाफ़े को अपनी स्कर्ट की तहों में छिपा लिया। ‘जूली, ज़रा मुझे लिफ़ाफ़ा दिखलाओ।’ लतिका का स्वर तीखा, कर्कश-सा हो आया।
जूली ने अनमने भाव से लतिका को पत्र दे दिया। ‘तुम्हारे भाई झाँसी में रहते है?’ जूली इस बार कुछ नहीं बोली। उसकी उद्भ्रांत उखड़ी-सी आँखें लतिका को देखती रही। ‘यह क्या है?’
जूली का चेहरा सफ़ेद, फक पड़ गया। लिफ़ाफ़े पर कुमाऊँ रेजीमेंटल सेंटर की मुहर उसकी ओर घूर रही थी। ‘कौन है यह-’ लतिका ने पूछा। उसने पहले भी होस्टल में उड़ती हुई अफ़वाह सुनी थी कि जूली को क्लब में किसी मिलिट्री अफ़सर के संग देखा गया था, किंतु ऐसी अफ़वाहें अक्सर उड़ती रहती थी, और उसने उस पर विश्वास नहीं किया था। ‘जूली, तुम अभी बहुत छोटी हो- जूली के होंठ काँपे-उसकी आँखों में निरीह याचना का भाव घिर आया।
‘अच्छा अभी जाओ- तुमसे छुट्टियों के बाद बातें करूँगी।’ जूली ने ललचाई दृष्टि से लिफ़ाफ़े की ओर देखा, कुछ बोलने को उद्यत हुई, फिर बिना कुछ कहे चुपचाप वापस लौट गई।
लतिका देर तक जूली को देखती रही, जब तक वह आँखों से ओझल नहीं हो गई। क्या मैं किसी खूसट बुढ़िया से कम हूँ! अपने अभाव का बदला क्या मैं दूसरों से ले रही हूँ?
शायद- कौन जाने- शायद जूली का यह प्रथम परिचय हो, उस अनुभूति से, जिसे कोई भी लड़की बड़े चाव से संजोकर, सँभालकर अपने में छिपाए रहती है एक अनिर्वचनीय सुख, जो पीड़ा लिए है, पीड़ा और सुख को डुबोती हुई उमड़ते ज्वार की ख़ुमारी- जो दोनों को अपने में समा लेती है- एक दर्द, जो आनंद से उपजा है और पीड़ा देता है।
यहीं इसी देवदार के नीचे उसे भी यही लगा था, जब गिरीश ने पूछा था, ‘तुम चुप क्यों हो?’ वह आँखें मूँदे सोच रही थी, सोच कहाँ रही थी, जी रही थी, उस क्षण को जो भय और विस्मय के बीच भिंचा था- बहका-सा पागल क्षण! वह अभी पीछे मुड़ेगी तो गिरीश की ‘नर्वस’ मुस्कुराहट दिखाई दे जाएगी, उस दिन से आज दोपहर तक का अतीत एक दुःस्वप्न की मानिंद टूट जाएगा। वही देवदार है, जिस पर उसने अपने बालों के क्लिप से गिरीश का नाम लिखा था।
पेड़ की छाल उतरती नहीं थी, क्लिप टूट-टूट जाता था, तब गिरीश ने अपने नाम के नीचे उसका नाम लिखा था। जब कभी कोई अक्षर बिगड़कर टेढ़ा-मेढ़ा हो जाता था, तब वह हँसती थी, और गिरीश का काँपता हाथ और भी काँप जाता था।
लतिका को लगा कि जो वह याद करती है, वही भूलना भी चाहती है, लेकिन जब सचमुच भूलने लगती है, तब उसे भय लगता है कि जैसे कोई उसकी किसी चीज़ को उसके हाथों से छीने लिए जा रहा है, ऐसा कुछ जो सदा के लिए खो जाएगा। बचपन में जब कभी वह अपने किसी खिलौने को खो देती थी, तो वह गुमसुम-सी होकर सोचा करती थी, कहाँ रख दिया मैंने। जब बहुत दौड़-धूप करने पर खिलौना मिल जाता, तो वह बहाना करती कि अभी उसे खोज ही रही है कि वह अभी मिला नहीं है। जिस स्थान पर खिलौना रखा होता, जान-बूझकर उसे छोड़कर घर के दूसरे कोनों में उसे खोजने का उपक्रम करती। तब खोई हुई चीज़ याद रहती, इसलिए भूलने का भय नहीं रहता था।
आज वह उस बचपन के खेल का बहाना क्यों नहीं कर पाती? ‘बहाना’ शायद करती है, उसे याद करने का बहाना, जो भूलता जा रहा है दिन, महीने बीत जाते हैं, और वह उलझी रहती है, अनजाने में गिरीश का चेहरा धुँधला पड़ता जाता है, याद वह करती है, किंतु जैसे किसी पुरानी तस्वीर के धूल-भरे शीशे को साफ़ कर रही हो। अब वैसा दर्द नहीं होता, सिर्फ़ उसको याद करती है, जो पहले कभी होता था, तब उसे अपने पर ग्लानि होती है। वह फिर जान-बूझ-कर उस घाव को कुरेदती है, जो भरता जा रहा है, ख़ुद-ब-ख़ुद, उसकी कोशिशों के बावजूद भरता जा रहा है। देवदार पर खुदे हुए अधमिटे नाम लतिका की ओर निस्तब्ध-निरीह भाव से निहार रहे थे। मीडोज़ के घने सन्नाटे में नाले पार से खेलती हुई लड़कियों की आवाजें गूँज जाती थी… व्हाट डू यू वान्ट…व्हाट डू यू वान्ट?
तितलियाँ, झींगुर, जुगनू…मीडोज़ पर उतरती हुई साँझ की छायाओं में पता नहीं चलता, कौन आवाज़ किसकी है? दोपहर के समय जिन आवाज़ों को अलग-अलग करके पहचाना जा सकता था, अब वे एकस्वरता की अविरल धारा में घुल गई थी। घास से अपने पैरों को पोंछता हुआ कोई रेंग रहा है। झाड़ियों के झुरमुट से परों को फडफड़ाता हुआ झपटकर कोई ऊपर में उड़ जाता है, किंतु ऊपर देखो तो कहीं कुछ भी नहीं है। मीडोज़ के झरने का गड़गड़ाता स्वर, जैसे अँधेरी सुरंग में झपाटे से ट्रेन गुज़र गई हो, और देर तक उसमें सीटियों और पहियों की चीत्कार गूँजती रही हो।
पिकनिक कुछ देर तक और चलती, किंतु बादलों की तहें एक-दूसरे पर चढ़ती जा रही थी। पिकनिक का सामान बटोरा जाने लगा। मीडोज़ के चारों ओर बिखरी हुई लड़कियाँ मिस वुड के इर्द-गिर्द जमा होने लगी। अपने संग वे अजीब-ओ-ग़रीब चीज़ें लाई थी। कोई किसी पक्षी के टूटे पंख को बालों में लगाए हुए थी, किसी ने पेड़ की टहनी को चाकू से छीलकर छोटी-सी बेंत बना ली थी। ऊँची क्लास की कुछ लड़कियों ने अपने-अपने रूमालों में नाले से पकड़ी हुई छोटी-छोटी बालिश्त-भर की मछलियों को दबा रखा था जिन्हें मिस वुड से छिपाकर वे एक-दूसरे को दिखा रही थीं।
मिस वुड लड़कियों की टोली के संग आगे निकल गईं। मीडोज़ से पक्की सड़क तक तीन-चार फर्लांग की चढ़ाई थी। लतिका हाँफने लगी। डॉक्टर मुकर्जी सबसे पीछे आ रहे थे। लतिका के पास पहुँचकर वह ठिठक गए। डॉक्टर ने दोनों घुटनों को ज़मीन पर टेकते हुए सिर झुकाकर एलिजाबेथ-युगीन अँग्रेज़ी मे कहा- ‘मैडम, आप इतनी परेशान क्यों नज़र आ रही हैं?’ और डॉक्टर की नाटकीय मुद्रा को देखकर लतिका के होंठों पर एक थकी-सी ढीली-ढीली मुस्कुराहट बिखर गई। “प्यास के मारे गला सूख रहा है और यह चढ़ाई है कि ख़त्म होने में नहीं आती।”
डॉक्टर ने अपने कंधे पर लटकते हुए थर्मस को उतारकर लतिका के हाथों में देते हुए कहा- ‘थोड़ी-सी कॉफ़ी बची है, शायद कुछ मदद कर सके।’ “पिकनिक में तुम कहाँ रह गए डॉक्टर, कहीं दिखाई नहीं दिए?” ‘दोपहर-भर सोता रहा- मिस वुड के संग। मेरा मतलब है, मिस वुड पास बैठी थीं।’ ‘मुझे लगता है, मिस वुड मुझसे मोहब्बत करती हैं। कोई भी मज़ाक़ करते समय डॉक्टर अपनी मूँछों के कोनों को चबाने लगता है।’ ‘क्या कहती थी?’ लतिका ने थर्मस से कॉफ़ी को मुँह में उड़ेल लिया। ‘शायद कुछ कहती, लेकिन बद-क़िस्मती से बीच में ही मुझे नींद आ गई। मेरी ज़िंदगी के कुछ ख़ूबसूरत प्रेम-प्रसंग कम्बख़्त इस नींद के कारण अधूरे रह गए हैं।’ और इस दौरान में जब दोनों बातें कर रहे थे, उनके पीछे मीडोज़ और मोटर रोड के संग चढ़ती हुई चीड़ और बाँज के वृक्षों की क़तारें साँझ के घिरते अँधेरे में डूबने लगी, मानो प्रार्थना करते हुए उन्होंने चुपचाप अपने सिर नीचे झुका लिए हों। इन्हीं पेड़ों के ऊपर बादलों में गिरजे का क्रॉस कहीं उलझा पड़ा था। उसके नीचे पहाड़ों की ढलान पर बिछे हुए खेत भागती हुई गिलहरियों से लग रहे थे, मानो किसी की टोह मे स्तब्ध ठिठक गई हों। ‘डॉक्टर, मिस्टर ह्यूबर्ट पिकनिक पर नहीं आए?’ डॉक्टर मुकर्जी टार्च जलाकर लतिका के आगे-आगे चल रहे थे। ‘मैंने उन्हें मना कर दिया था।’ ‘किसलिए?’
`अँधेरे में पैरों के नीचे दबे हुए पत्तों की चरमराहट के अतिरिक्त कुछ सुनाई नहीं देता था। डॉक्टर मुकर्जी ने धीरे से खाँसा। ‘पिछले कुछ दिनों से मुझे संदेह होता जा रहा है कि ह्यूबर्ट की छाती का दर्द मामूली दर्द नहीं है।’ डॉक्टर थोड़ा-सा हँसा, जैसे उसे अपनी यह गंभीरता अरुचिकर लग रही हो।
डॉक्टर ने प्रतीक्षा की, शायद लतिका कुछ कहेगी। किंतु लतिका चुपचाप उसके पीछे चल रही थी। ‘यह मेरा महज़ शक है, शायद मैं बिलकुल ग़लत होऊँ, किंतु यह बेहतर होगा कि वह अपने एक फेफड़े का एक्स-रे करा लें’- इससे कम-से-कम कोई भ्रम तो नहीं रहेगा।’ ‘आपने मिस्टर ह्यूबर्ट से इसके बारे में कुछ कहा है?’ ‘अभी तक कुछ नहीं कहा। ह्यूबर्ड ज़रा-सी बात पर चिंतित हो उठता है, इसलिए कभी साहस नहीं हो पाता’ डॉक्टर को लगा, उसके पीछे आते हुए लतिका के पैरों का स्वर सहसा बंद हो गया है। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा, लतिका बीच सड़क पर अँधेरे में छाया-सी चुपचाप निश्चल खड़ी है।
‘डॉक्टर…’ लतिका का स्वर भर्राया हुआ था।
‘क्या बात है मिस लतिका…आप रुक क्यों गई?’
‘डॉक्टर…क्या मिस्टर ह्यूबर्ट…’
‘डॉक्टर ने अपनी टार्च की मद्धिम रौशनी लतिका पर दी’-उसने देखा लतिका का चेहरा एकदम पीला पड़ गया है और वह रह-रहकर पत्ते-सी काँप जाती है। ‘मिस लतिका, क्या बात है, आप तो बहुत डरी-सी जान पड़ती है?’ ‘कुछ नहीं डॉक्टर… मुझे…मुझे कुछ याद आ गया था’ वे दोनों फिर चलने लगे। कुछ दूर जाने पर उनकी आँखें ऊपर उठ गई। पक्षियों का एक बेड़ा धूमिल आकाश में त्रिकोण बनाता हुआ पहाड़ों के पीछे से उनकी ओर आ रहा था। लतिका और डॉक्टर सिर उठाकर इन पक्षियों को देखते रहे। लतिका को याद आया, हर साल सर्दी की छुट्टियों से पहले ये परिंदे मैदानों की ओर उड़ते हैं, कुछ दिनों के लिए बीच के इस पहाड़ी स्टेशन पर बसेरा करते हैं, प्रतीक्षा करते है बर्फ़ के दिनों की, जब वे नीचे अजनबी, अनजाने देशों में उड़ जायेंगे।
क्या वे सब भी प्रतीक्षा कर रहे हैं? वह, डॉक्टर मुकर्जी, मिस्टर ह्यूबर्ट, लेकिन कहाँ के लिए, हम कहाँ जायेंगे।
किंतु उसका कोई उत्तर नहीं मिला- उस अँधेरे में मीडोज़ के झरने के भुतैले स्वर और चीड़ के पत्तों की सरसराहट के अतिरिक्त कुछ सुनाई नहीं देता था। लतिका हडबड़ाकर चौक गई। अपनी छड़ी पर झुका डॉक्टर धीरे-धीरे सीटी बजा रहा था।
‘मिस लतिका, जल्दी कीजिए, बारिश शुरू होने वाली है।’ होस्टल पहुँचते-पहुँचते बिजली चमकने लगी थी। किंतु उस रात बारिश देर तक नहीं हुई। बादल बरसने भी नहीं पाते थे कि हवा के थपेड़ों से धकेल दिए जाते थे। दूसरे दिन तड़के ही बस पकड़नी थी, इसलिए डिनर के बाद लड़कियाँ सोने के लिए अपने-अपने कमरों में चली गई थी। जब लतिका अपने कमरे में गई, उस समय कुमाऊँ रेजीमेंटल सेंटर का बिगुल बज रहा था। उसके कमरे में करीमुद्दीन कोई पहाड़ी धुन गुनगुनाता हुआ लैंप में गैस पंप कर रहा था। लतिका उन्हीं कपड़ों में, तकिए को दोहरा करके लेट गई। करीमुद्दीन ने उड़ती हुई निगाह से लतिका को देखा, फिर अपने काम में जुट गया। ‘पिकनिक कैसी रही मेम साहब?’ ‘तुम क्यों नहीं आए, सब लड़कियाँ तुम्हें पूछ रही थी?’ लतिका को लगा, दिन-भर की थकान धीरे-धीरे उसके शरीर की पसलियों पर चिपटती जा रही है। अनायास उसकी आँखें नींद के बोझ से झपकने लगी।
‘मैं चला आता तो ह्यूबर्ट साहब की तीमारदारी कौन करता? दिन-भर उनके बिस्तरे से सटा हुआ बैठा रहा और अब वह ग़ायब हो गए हैं।’
करीमुद्दीन ने कंधे पर लटकते हुए मैले-कुचैले तौलिए को उतारा और लैंप के शीशों की गर्द पोंछने लगा।
लतिका की अधमुँदी आँखें खुल गईं। ‘क्या ह्यूबर्ट साहब अपने कमरे में नहीं हैं?’ ‘ख़ुदा जाने, इस हालत में कहाँ भटक रहे हैं! पानी गर्म करने कुछ देर के लिए बाहर गया था, वापस आने पर देखता हूँ कि कमरा ख़ाली पड़ा है।’
करीमुद्दीन बड़बड़ाता हुआ बाहर चला गया। लतिका ने लेटे-लेटे पलंग के नीचे चप्पलों को पैरों से उतार दिया।
ह्यूबर्ट इतनी रात कहाँ गए? किंतु लतिका की आँखें फिर झपक गई। दिन भर की थकान ने सब परेशानियों, प्रश्नों पर कुँजी लगा दी थी, मानो दिन-भर आँखमिचौनी खेलते हुए उसने अपने कमरे में ‘दय्या’ को छू लिया था। अब वह सुरक्षित थी, कमरे की चहारदीवारी के भीतर उसे कोई नहीं पकड़ सकता। दिन के उजाले में वह गवाह थी, मुजरिम थी, हर चीज़ का उसमें तक़ाज़ा था, अब इस अकेलेपन में कोई गिला नहीं, उलाहना नहीं, सब खींचातानी ख़त्म हो गई है, जो अपना है, वह बिलकुल अपना-सा हो गया है, उसका दुःख नहीं, अपनाने की फ़ुर्सत नहीं…
लतिका ने दीवार की ओर मुँह घुमा लिया। लैंप के फीके आलोक में हवा में काँपते पर्दों की छायाएँ हिल रही थीं। बिजली कड़कने से खिड़कियों के शीशे चमक-चमक जाते थे, दरवाज़े चटखने लगते थे, जैसे कोई बाहर से धीमे-धीमे खट-खटा रहा हो। कॉरीडोर से अपने-अपने कमरों में जाती हुई लड़कियों की हँसी, बातों के कुछ शब्द- फिर सब कुछ शांत हो गया, किंतु फिर भी देर तक कच्ची नींद में वह लैंप का धीमा-सा ‘सी-सी’ स्वर सुनती रही। कब वह स्वर भी मौन का भाग बनकर मूक हो गया, उसे पता न चला। कुछ देर बाद उसको लगा, सीढ़ियों से कुछ दबी आवाज़ें ऊपर आ रही है, बीच-बीच में कोई चिल्ला उठता है, और फिर सहसा आवाज़ धीमी पड़ जाती है। ‘मिस लतिका, ज़रा अपना लैंप ले आइए।’ कॉरीडोर के ज़ीने से डॉक्टर मुकर्जी की आवाज़ आई थी।
कॉरीडोर में अँधेरा था। वह तीन-चार सीढ़ियाँ नीचे उत्तरी, लैंप नीचे किया। सीढ़ियों से सटे जंगले पर ह्यूबर्ट ने अपना सिर रख दिया था। उसकी एक बाँह जंगले के नीचे लटक रही थी और दूसरी डॉक्टर के कंधे पर झूल रही थी, जिसे डॉक्टर ने अपने हाथों में जकड़ रखा था। ‘मिस लतिका, लैंप ज़रा और नीचे झुका दीजिए…ह्यूबर्ट…ह्यूबर्ट…’ डॉक्टर ने ह्यूबर्ट को सहारा देकर ऊपर खींचा। ह्यूबर्ट ने अपना चेहरा ऊपर किया। ह्विस्की की तेज़ बू का झोंका लतिका के सारे शरीर को झिंझोड़ गया। ह्यूबर्ट की आँखों में सुर्ख़ डोरे खिंच आए थे, क़मीज़ का कॉलर उलटा हो गया था और टाई की गाँठ ढीली होकर नीचे खिसक आई थी। लतिका ने काँपते हाथों से लैंप सीढ़ियों पर रख दिया और आप दीवार के सहारे खड़ी हो गई। उसका सिर चकराने लगा था।
‘इन ए बैक लेन ऑफ़ द सिटी, देयर इज़ ए गर्ल, हू लव्ज़ मी…’ ह्यूबर्ट हिचकियों के बीच गुनगुना उठता था।
‘ह्यूबर्ट, प्लीज़… प्लीज़,’ डॉक्टर ने ह्यूबर्ट के लड़खड़ाते शरीर को अपनी मज़बूत गिरफ़्त में ले लिया।
‘मिस लतिका, आप लैंप लेकर आगे चलिए… लतिका ने लैंप उठाया। दीवार पर उन तीनों की छायाएँ डगमगाने लगी।
‘इन ए बैक लेन ऑफ़ द सिटी देयर इज़ ए गर्ल हू लव्ज़ मी…’ ह्यूबर्ट
डॉक्टर मुकर्जी के कंधे पर सिर टिकाए अँधेरी सीढ़ियों पर उल्टे-सीधे पैर रखता चढ़ रहा था।
‘डॉक्टर! हम कहाँ हैं?’ ह्यूबर्ट सहसा इतने ज़ोर से चिल्लाया कि उसकी लड़खड़ाती आवाज़ सुनसान अँधेरे में कॉरीडोर की छत से टकराकर देर तक हवा में गूँजती रही।
‘ह्यूबर्ट …’ डॉक्टर को एकदम ह्यूबर्ट पर ग़ुस्सा आ गया, फिर अपने ग़ुस्से पर ही उसे खीझ-सी हो आई और वह ह्यूबर्ट की पीठ थपथपाने लगा। ‘कुछ बात नहीं है ह्यूबर्ट डियर, तुम सिर्फ़ थक गए हो।’ ह्यूबर्ट ने अपनी आँखें डॉक्टर पर गड़ा दी, उनमें एक भयभीत बच्चे की-सी कातरता झलक रही थी, मानो डॉक्टर के चेहरे से वह किसी प्रश्न का उत्तर पा लेना चाहता हो। ह्यूबर्ट के कमरे में पहुँचकर डॉक्टर ने उसे बिस्तरे पर लिटा दिया। ह्यूबर्ट ने बिना किसी विरोध के चुपचाप जूते मोज़े उतरवा दिए। जब डॉक्टर ह्यूबर्ट की टाई उतारने लगा, तो ह्यूबर्ट अपनी कुहनी के सहारे उठा, कुछ देर तक डॉक्टर को आँखें फाड़ते हुए घूरता रहा, फिर धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।’
‘डॉक्टर, क्या मैं मर जाऊँगा?’ ‘कैसी बात करते हो ह्यूबर्ट!’ डॉक्टर ने हाथ छुड़ाकर धीरे से ह्यूबर्ट का सिर तकिए पर टिका दिया। ‘गुड नाइट ह्यूबर्ट…!’ ‘गुड नाइट डॉक्टर,’ ह्यूबर्ट ने करवट बदल ली। ‘गुड नाइट मिस्टर ह्यूबर्ट’ लतिका का स्वर सिहर गया। किंतु ह्यूबर्ट ने कोई उत्तर नहीं दिया। करवट बदलते ही उसे नींद आ गई थी।
कॉरीडोर में वापिस आकर डॉक्टर मुकर्जी रेलिंग के सामने खड़े हो गए। हवा के तेज़ झोंकों से आकाश में फैले बादलों की परतें जब कभी इकहरी हो जाती, तब उनके पीछे से चाँदनी बुझती हुई आग के धुएँ-सी आसपास की पहाड़ियों पर फैल जाती थी। ‘आपको मिस्टर ह्यूबर्ट कहाँ मिले?’ लतिका कॉरीडोर के दूसरे कोने में रेलिंग पर झुकी हुई थी। ‘क्लब की बार में उन्हें देखा था, मैं न पहुँचता तो न जाने कब तक बैठे रहते,’ डॉक्टर मुकर्जी ने सिगरेट जलाई। उन्हें अभी एक-दो मरीज़ों के घर जाना था। कुछ देर तक उन्हें टाल देने के इरादे से वह कॉरीडोर में खड़े रहे।
नीचे अपने क्वार्टर में बैठा हुआ करीमुद्दीन माउथ आर्गन पर कोई पुरानी फ़िल्मी धुन बजा रहा था।
‘आज दिन-भर बादल छाए रहे, लेकिन खुलकर बारिश नहीं हुई’ ‘क्रिसमस तक शायद मौसम ऐसा ही रहेगा। कुछ देर तक दोनों चुपचाप खड़े रहे। कान्वेंट स्कूल के बाहर फैले लॉन से झींगुरों का अनवरत स्वर चारों ओर फैली निःस्तब्धता को और भी अधिक घना बना रहा था। कभी-कभी ऊपर मोटर रोड पर किसी कुत्ते की रिरियाहट सुनाई पड़ जाती थी।
‘डॉक्टर…कल रात आपने मिस्टर ह्यूबर्ट से कुछ कहा था- मेरे बारे में?’ ‘वही जो सब लोग जानते हैं और ह्यूबर्ट, जिसे जानना चाहिए था,
लेकिन नहीं जानता था’ डॉक्टर ने लतिका की ओर देखा, वह जड़वत् अविचलित रेलिंग पर झुकी हुई थी।
‘वैसे हम सबकी अपनी-अपनी ज़िद होती है, कोई छोड़ देता है, कोई आख़िर तक उससे चिपका रहता है। डॉक्टर मुकर्जी अँधेरे में मुस्कुराए। उनकी मुस्कुराहट में सूखा-सा विरक्ति का भाव भरा था। ‘कभी-कभी मैं सोचता हूँ मिस लतिका, किसी चीज़ को न जानना यदि ग़लत है, तो जानबूझकर न भूल पाना, हमेशा जोंक की तरह उससे चिपटे रहना- यह भी ग़लत है। बर्मा से आते हुए जब मेरी पत्नी की मृत्यु हुई थी, मुझे अपनी ज़िंदगी बेकार-सी लगी थी।
आज इस बात को अर्सा गुज़र गया और जैसा आप देखती हैं, मैं जी रहा हूँ; उम्मीद है कि काफ़ी अर्सा और जीऊँगा। ज़िंदगी काफ़ी दिलचस्प लगती है; और यदि उम्र की मजबूरी न होती तो शायद मैं दूसरी शादी करने में भी न हिचकता। इसके बावजूद कौन कह सकता है कि मैं अपनी पत्नी से प्रेम नहीं करता था- आज भी करता हूँ’ ‘लेकिन डॉक्टर…’
लतिका का गला रुँध आया था। ‘क्या मिस लतिका…’
‘डॉक्टर- सब कुछ होने के बावजूद वह क्या चीज़ है जो हमें चलाए चलती है, हम रुकते हैं तो भी अपने रेले में वह हमें घसीट ले जाती है।’ लतिका को लगा कि वह जो कहना चाह रही है कह नहीं पा रही, जैसे अँधेरे में कुछ खो गया है, जो मिल नहीं पा रहा, शायद कभी नहीं मिल पाएगा। ‘यह तो आपको फ़ादर एल्मंड ही बता सकेंगे मिस लतिका,’ डॉक्टर की खोखली हँसी में उनका पुराना सनकीपन उभर आया था। ‘अच्छा, चलता हूँ, मिस लतिका, मुझे काफ़ी देर हो गई है,’ डॉक्टर ने दियासलाई जलाकर घड़ी को देखा। ‘गुड नाइट मिस लतिका!’ ‘गुड नाइट डॉक्टर!’
डॉक्टर के जाने पर लतिका कुछ देर तक अँधेरे में रेलिंग से सटी खड़ी रही। हवा चलने से कॉरीडोर में जमा हुआ कुहरा सिहर उठता था। शाम को सामान बाँधते हुए लड़कियों ने अपने-अपने कमरे के सामने जो पुरानी कापियों, अख़बार और रद्दी के ढेर लगा दिए थे वे सब, अब अँधेरे कॉरीडोर में हवा के झोंकों से इधर-उधर बिखरने लगे थे।
लतिका ने लैंप उठाया और अपने कमरे की ओर जाने लगी। कॉरीडोर में चलते हुए उसने देखा, जूली के कमरे से प्रकाश की एक पतली रेखा दरवाज़े के बाहर खिंच आई है। लतिका को कुछ याद आया। वह कुछ क्षणों तक साँस रोके जूली के कमरे के बाहर खड़ी रही। कुछ देर बाद उसने दरवाज़ा खटखटाया। भीतर से कोई आवाज़ नहीं आई। लतिका ने दबे हाथों से हलका-सा धक्का दिया दरवाज़ा खुल गया। जूली लैंप बुझाना भूल गई थी। लतिका धीरे-धीरे दबे पाँव जूली के पलंग के पास चली आई। जूली का सोता हुआ चेहरा लैंप के फीके आलोक में पीला-सा दिख रहा था। लतिका ने अपनी जेब से वही नीला लिफ़ाफ़ा निकाला और उसे धीरे से जूली के तकिए के नीचे दबाकर रख दिया।
डॉ. गोपालराय के अनुसार- “परिंदे एक प्रतीकात्मक कहानी है ‘परिंदे’ टूटते हुए प्रेम का प्रतीक है।”
जय हिंद