भारतेंदु ‘दिल्ली दरबार दर्पण’ (निबंध) भाग-1

जयति राजराजेश्वरी जय युवराज कुमार।

जय नृप-प्रतिनिधि कवि लिटन जय दिल्ली दरबार।

स्नेह भरन तम हरन दोउ प्रजन करन उजियार।

भयो देहली दीप सो यह देहली दरबार॥

सब राजाओं की मुलाक़ातों का हाल अलग-अलग लिखना आवश्यक नहीं, क्योंकि सबके साथ वही मामूली बातें हुईं। सब बड़े-बड़े शासनाधिकारी राजाओं को एक-एक रेशमी झंडा और सोने का तगमा मिला। झंडे अत्यंत सुंदर थे। पीतल के चमकीले मोटे-मोटे डंडों पर राजराजेश्वरी का एक मुकुट बना था और एक पट्टी लगी थी, जिस पर झंडा पाने वाले राजा का नाम लिखा था और फरहरे पर जो डंडे से लटकता था, स्पष्ट रीति पर उनके शस्त्र आदि के चिह्न बने हुए थे। झंडा और तगमा देने के समय श्रीयुत् वायसराय ने हर एक राजा से ये वाक्य कहे…

“मैं श्रीमती महारानी की तरफ़ से यह झंडा ख़ास आपके लिए देता हूँ, जो उनके हिंदुस्तान की राजराजेश्वरी की पदवी लेने का यादगार रहेगा। श्रीमती को भरोसा है, जब कभी यह झंडा खुलेगा, आपको उसे देखते ही केवल इसी बात का ध्यान न होगा कि इंगलिस्तान के राज्य के साथ आपके ख़ैरखाह राजसी घराने का कैसा दृढ़ संबंध है, वरन् यह भी कि सरकार की यही बड़ी भारी इच्छा है कि आपके कुल को प्रतापी, प्रारब्धी और अचल देखे। मैं श्रीमती महारानी हिंदुस्तान की राजराजेश्वरी की आज्ञानुसार आपको यह तगमा भी पहनाता हूँ। ईश्वर करे आप इसे बहुत दिन तक पहिनें और आपके बाद यह आपके कुल में बहुत दिन तक रहकर, इस शुभ दिन की याद दिलावे जो इस पर छपा है।”

शेष राजाओं को उनके पद के अनुसार सोने या चाँदी के केवल तगमे ही मिले। किलात के खाँ को भी झंडा नहीं मिला, पर उन्हें एक हाथी, जिस पर 4000 की लागत का हौदा था, जड़ाऊ गहने, घड़ी, कार, चोबी, कपड़े, कमख़ाब के थान वग़ैरह सब मिलाकर 25000 की चीजें तुहफ़े में मिलीं। यह बात किसी दूसरे के लिए नहीं हुई थी। इसके सिवाय जो सरदार उनके साथ आए थे, उन्हें भी किश्तियों में लगाकर दस हज़ार रुपए की चीज़ें दी गईं। प्रायः लोगों को इस बात के जानने का उत्साह होगा कि खाँ का रूप और वस्त्र कैसा था।

निस्संदेह जो कपड़ा खाँ पहने थे। वह उनके साथियों से बहुत अच्छा था, तो भी उनकी या उनके किसी साथी की शोभा उन मुग़लों से बढ़कर न थी जो बाज़ार में मेवा लिए घूमा करते हैं। हाँ, कुछ फ़र्क़ था तो इतना था कि लंबी घनी दाड़ी के कारण खाँ साहिब का चेहरा बड़ा भयानक लगता था। इन्हें झंडा न मिलने का कारण यह समझना चाहिए कि यह बिलकुल स्वतंत्र हैं। इन्हें आने और जाने के समय श्रीयुत् वायसराय गलीचे के किनारे तक पहुँचा गए थे, पर बैठने के लिए इन्हें भी वायसराय के चबूतरे के नीचे वही कुर्सी मिली थी, जो और राजाओं को। खाँ साहिब के मिज़ाज में रूखापन बहुत है। एक प्रतिष्ठित बंगाली इनके डेरे पर मुलाक़ात के लिए गए थे। खाँ ने पूछा, क्यों आए हो? बाबू साहिब ने कहा, आपकी मुलाक़ात को। इस पर खाँ बोले कि अच्छा, आप हमको देख चुके और हम आपको, अब जाइए।

बहुत से छोटे-छोटे राजाओं की बोलचाल का ढंग भी, जिस समय वे वायसराय से मिलने आए थे, संक्षेप के साथ लिखने के योग्य है। कोई तो दूर ही से हाथ जोड़ आए, और दो एक ऐसे थे कि जब एडिकांग के बदन झुका कर इशारा करने पर भी उन्होंने सलाम न किया तो एडिकांग ने पीठ पकड़कर उन्हें धीरे से झुका दिया। कोई बैठकर उठना जानते ही न थे, यहाँ तक कि एडिकांग को ‘उठो’ कहना पड़ता था। कोई झंडा, तगमा, सलामी और खिताब पाने पर भी एक शब्द धन्यवाद का नहीं बोल सके और कोई बिचारे इनमें से दो ही एक पदार्थ पाकर ऐसे प्रसन्न हुए कि श्रीयुत् वायसराय पर अपनी जान और माल निछावर करने को तैयार थे। सबसे बढ़कर बुद्धिमान हमें एक महात्मा दिखाई पड़े जिनसे वायसराय ने कहा कि आपका नगर तो तीर्थ गिना जाता है, पर हम आशा करते हैं कि आप इस समय दिल्ली को भी तीर्थ ही के समान पाते हैं। इसके जवाब में वह बेधड़क बोल उठे कि यह जगह तो सब तीर्थों से बढ़कर है, जहाँ आप हमारे ‘ख़ुदा’ मौजूद हैं। नवाब लुहारू की भी अँग्रेज़ी में बातचीत सुनकर ऐसे बहुत कम लोग होंगे जिन्हें हँसी न आई हो। नवाब साहिब बोलते तो बड़े धड़ाके से थे, पर उसी के साथ क़ायदे और मुहावरे के भी ख़ूब हाथ पाँव तोड़ते थे कितने वाक्य ऐसे थे जिनके कुछ अर्थ ही नहीं हो सकते, पर नवाब साहिब को अपनी अँग्रेज़ी का ऐसा कुछ विश्वास था कि अपने मुँह से केवल अपने ही को नहीं वरन् अपने दोनों लड़कों को भी अँग्रेज़ी, अरबी, ज्योतिष, गणित आदि ईश्वर जाने कितनी विद्याओं का पंडित बखान गए। नवाब साहिब ने कहा कि हमने और रईसों की तरह अपनी उमर खेल कूद में नहीं गँवाई, वरन् लड़कपन ही से विद्या के उपार्जन में चित्त लगाया और पूरे पंडित तथा कवि हुए। इसके सिवाय नवाब साहिब ने बहुत से राजभक्ति के वाक्य भी कहे। वायसराय ने उत्तर दिया कि हम आपकी अँग्रेज़ी विद्या पर इतना मुबारकबाद नहीं देते जितना अँग्रेज़ों के समान आपका चित्त होने के लिए। फिर नवाब साहिब ने कहा कि मैंने इस भारी अवसर के वर्णन में अरबी और फ़ारसी का एक पद्य ग्रंथ बनाया है, जिसे मैं चाहता हूँ कि किसी समय श्रीयुत् को सुनाऊँ। श्रीयुत् ने जवाब दिया कि मुझे भी कविता का बड़ा अनुराग है और मैं आप-सा एक भाई-कवि (Brother-Poet) देखकर बहुत प्रसन्न हुआ तथा आपकी कविता सुनने के लिए कोई अवकाश का समय निकालूँगा।

29 तारीख़ को सत्र के अंत में महारानी तंजौर वायसराय से मुलाक़ात को आईं। ये तास का सब वस्त्र पहने थीं और मुँह पर तास का नकाब पड़ा हुआ था। इसके सिवाय उनके हाथ पाँव दस्ताने और मोजे से ऐसे ढके थे कि सबके जी में उन्हें देखने की इच्छा ही रह गई। महारानी के साथ में उनके पति राजा सखाराम साहिब और दो लड़कों के सिवाय उनकी अनुवादक मिसेज फर्थ भी थीं महारानी ने पहले आकर वायसराय से हाथ मिलाया और अपनी कुर्सी पर बैठ गई। श्रीयुत् वायसराय ने उनके दिल्ली आने पर अपनी प्रसन्नता प्रकट की और पूछा कि आप को इतनी भारी यात्रा में अधिक कष्ट तो नहीं हुआ? महारानी अपनी भाषा की बोलचाल में बेगम भूपाल की तरह चतुर नहीं थीं, इसलिए ज़्यादा बातचीत मिसेज फर्थ से हुई, जिन्हें श्रीयुत् ने प्रसन्न होकर ‘मनभावनी अनुवादक’ कहा। वायसराय की किसी बात के उत्तर में एक बार महारानी के मुँह से ‘यस’ निकल गया, जिस पर श्रीयुत् ने बड़ा हर्ष प्रकट किया कि महारानी अँग्रेज़ी भी बोल सकती हैं, पर अनुवादक मेम साहिब ने कहा कि वे अँग्रेज़ी में दो चार शब्द से अधिक नहीं जानतीं।

इस वर्णन के अंत में यह लिखना आवश्यक है कि श्रीयुत् वायसराय लोगों से इतनी मनोहर रीति पर बातचीत करते थे, जिससे सब मगन हो जाते थे और ऐसा समझते थे कि वायसराय ने हमारा सबसे बढ़कर आदर सत्कार किया। भेंट होने के समय श्रीयुत् ने हर एक से कहा कि आप से दोस्ती करके हम अत्यंत प्रसन्न हुए और तगमा पहिनाने के समय भी बड़े स्नेह से उनकी पीठ पर हाथ रखकर बात की।

एक जनवरी को दरबार का महोत्सव हुआ यह दरबार, जो हिंदुस्तान के इतिहास में सदा प्रसिद्ध रहेगा, एक बड़े भारी मैदान में नगर से पाँच मील पर हुआ था। बीच में श्रीयुत् वायसराय का षट्कोण चबूतरा था, जिसकी गुंबदनुमा छत पर लाल कपड़ा चढ़ा और सुनहला रूपहला तथा शीशे का काम बना था। कंगूरे के ऊपर कलसे की जगह श्रीमती राजराजेश्वरी का सुनहला मुकुट लगा था। इस चबूतरे पर श्रीयुत् अपने राजसिंहासन में सुशोभित हुए थे। उनके बगल में एक कुर्सी पर लेडी साहिब बैठीं थीं और ठीक पीछे ख़ास लोग हाथों में चैंबर लिए और श्रीयुत् के ऊपर कारचोबी छत्र लगाए खड़े थे। वायसराय के सिंहासन के दोनों तरफ़ दो पेज (दामन वरदान), जिनमें एक श्रीयुत् महाराज जंबू का अत्यंत सुंदर सबसे छोटा राजकुमार और दूसरा कर्नल बर्न का पुत्र था, खड़े थे और उनके दाएँ, बाएँ तथा पीछे मुसाहिब और सेक्रेटरी लोग अपने-अपने स्थान पर खड़े थे। वायसराय के इस चबूतरे के ठीक सामने कुछ दूर पर उससे नीच एक अर्द्धचंद्राकार चबूतरा था। जिस पर शासनाधिकारी राजा लोग और उनके मुसाहिब, मदरास और बंबई के गवर्नर, पंजाब, बंगाल और पश्चिमोत्तर देश के लेफ्टिनेंट गवर्नर और हिंदुस्तान के कमांडर इन चीफ़ अपने-अपने अधिकारियों समेत सुशोभित थे। इस चबूतरे की छत बहुत सुंदर नीले रंग के साटन की थी, जिसके आगे लहरियादार छज्जा बहुत सजीला लगता था। लहरिए के बीच-बीच में सुनहले काम के चाँद तारे बने थे। राजाओं की कुर्सियाँ भी नीली साटन से मढ़ी थीं और हर एक के सामने वे झंडे गड़े थे, जो उन्हें वायसराय ने दिए थे और पीछे अधिकारियों की कुर्सियाँ लगी थीं, जिन पर नीली साटन चढ़ी थी। हर एक राजा के साथ एक-एक पोलिटिकल अफ़सर भी था। इनके सिवाय गवर्नमेंट के भारी-भारी अधिकारी भी यहीं बैठे थे। राजा लोग अपने-अपने प्रांतों के अनुसार बैठाए गए थे, जिससे ऊपर नीचे बैठने का बखेड़ा बिलकुल निकल गया था। सब मिलाकर तिरसठ शासनाधिकारी राजाओं को इस चबूतरे पर जगह मिली थी। जिनके नाम नीचे लिखे हैं:—

महाराज अजयगढ़, बड़ौदा, बिजावर, भरतपुर, चरखारी, दतिया, ग्वालियर, इंदौर, जयपुर, जंबू, जोधपुर, करौली, किशुनगढ़, पन्ना, मैसूर, रीवां, उछ, महाराना उदयपुर, महाराव राजा अलवर, बूँदी, महाराज राना झालावाड़, राना धौलपुर, राजा बिलासपुर, बमरा, बिरोंदा, चबा, छतरपुर, देवास, धार, फरीदकोट, जींद, खरोंद, कूचविहार, मंडी, नामा, नाहन, राजपीपला, रतलाम, समथर, सुकेत, टिहरी, राव जिगनी, टोरी, नवाब टोंक, पटौदी, मलेरकोटला, लुहारू, जूनागढ़, जौरा, दुलाना, बहावलपुर जागीरदार, अलीपुरा, बेगम भूपाल, निज़ाम हैदराबाद, सरदार कलसिया, ठाकुर साहिब भावनगर, मुर्वी, पिपलोदा, जागीरदार पालदेव, मीर खैरपुर, महंत कोंदका, नंदगाँव और जाम नवानगर।

वायसराय के सिंहासन के पीछे, परंतु राजसी चबूतरे की अपेक्षा उससे अधिक पास, धनुषखंड के आकार की दो श्रेणियाँ चबूतरों की और बनी थीं, जो दस भागों में बाँट दी गई थीं। इन पर आगे की तरफ़ थोड़ी-सी कुर्सियाँ और पीछे सीढ़ीनुमा बेंचें लगी थीं, जिन पर नीला कपड़ा मढ़ा था यहाँ ऐसे राजाओं को जिन्हें शासन का अधिकार नहीं है और दूसरे सरदारों, रईसों, समाचारपत्रों के संपादकों और यूरोपियन तथा हिंदुस्तानी अधिकारियों को, जो गवर्नमेंट के नेवते में आए थे या जिन्हें तमाशा देखने के लिए टिकट मिले थे, बैठने की जगह दी गई थी। ये 3000 के लगभग होंगे। किलात के खाँ, गोआ के गवर्नर जनरल, विदेशी राजदूत, बाहरी राज्यों के प्रतिनिधि समाज और अन्य देश संबंधी कांसल लोगों की कुर्सियाँ भी श्रीयुत् वायसराय के पीछे सरदारों और रईसों की चौकियों के आगे लगी थीं।

दरबार की जगह दक्खिन तरफ़ 15000 से ज़्यादा सरकारी फ़ौज हथियार बाँधे लैस खड़ी थी और उत्तर तरफ़ राजा लोगों की सजी पलटनें भाँति-भाँति की वरदी पहने और चित्र-विचित्र शस्त्र धारण किए परा बाँधे खड़ी थीं। इन सब की शोभा देखने से काम रखती थी। इसके सिवाय राजा लोगों के हाथियों के परे जिन पर सुनहली अमारियाँ कसी थीं और कारचोबी झूलें पड़ी थीं, तोपों की कतार, सवारों की नंगी तलवारों और भालों की चमक, फरहरों का उड़ना, और दो लाख के लगभग तमाशा देखने वालों की भीड़, जो मैदान में डटी थी, ऐसा समा दिखलाती थी, जिसे देख जो जहाँ था, वहीं हक्का-बक्का ही खड़ा रह जाता था। वायसराय के सिंहासन के दोनों तरफ़ हाइलैंडर लोगों को गार्ड ऑव ऑनर और बाजे वाले थे। शासनाधिकारी राजाओं के चबूतरे पर जाने के जो रास्ते बाहर की तरफ़ थे। उनके दोनों ओर भी गार्ड ऑफ ऑनर खड़े थे। पौने बारह बजे तक सब दरबारी लोग अपनी-अपनी जगहों पर आ गए थे। ठीक बारह बजे श्रीयुत् वायसराय की सवारी पहुँची और धनुषखंड आकार के चबूतरों की श्रेणियों के पास एक छोटे से खंभे के दरवाज़े पर ठहरी सवारी पहुँचते ही बिलकुल फ़ौज ने शस्त्रों से सलामी उतारी पर तोपें नहीं छोड़ी गई। खंभे में श्रीयुत् ने जाकर स्टार ऑफ इंडिया के परम प्रतिष्ठित पद के ग्रांड मास्टर का वस्त्र धारण किया। यहाँ से श्रीयुत् राजसी छत्र के तले अपने राजसिंहासन की ओर बढ़े। श्री लेडी लिटन श्रीयुत् के साथ थीं और दोनों दामनबरदार बालक, जिनका हाल ऊपर लिखा गया है, पीछे दो तरफ़ से दामन उठाए हुए थे। श्रीयुत् के चलते ही बंदीजन (हेरल्ड लोगों) ने अपनी तुरहियाँ एक साथ बहुत मधुर रीति पर बजाई और फ़ौजी बाजे से ग्रांड मार्च बजने लगा। जब श्रीयुत् राजसिंहासन वाले मनोहर चबूतरे पर चढ़ने लगे तो ग्रांडमार्च का बाजा बंद हो गया और नेशनल एन्थम (गौड सेव दि क्वीन- ईश्वर महारानी को चिरंजीवी रखे) का बाजा बजने लगा और गार्डस ऑफ ऑनर ने प्रतिष्ठा के लिए अपने शस्त्र झुका दिए। ज्यों ही श्रीयुत् राजसिंहासन पर सुशोभित हुए, बाजे बंद हो गए और सब राजा महाराजा, जो वायसराय के आने के समय खड़े हो गए थे, बैठ गए। इसके पीछे श्रीयुत् ने मुख्य बंदी (चीफ़ हेरल्ड) को आज्ञा की कि श्रीमती महारानी के राजराजेश्वरी की पदवी लेने के विषय में अँग्रेज़ी में राजाज्ञापत्र पढ़ो। यह आज्ञा होते ही बंदीजनों ने, जो दो पाँती में राज्यसिंहासन के चबूतरे के नीचे खड़े थे, तुरही बजाई और उसके बंद होने पर मुख्य बंदी ने नीचे की सीढ़ी पर खड़े होकर बड़े ऊँचे स्वर से राजाज्ञापत्र पढ़ा। जिसका उल्था यह है—

महारानी विक्टोरिया- ऐसी अवस्था में कि हॉल में पार्लियामेंट की जो सभा हुई उसमें एक ऐक्ट पास हुआ है, जिसके द्वारा परम कृपालु महारानी को यह अधिकार मिला है कि ‘यूनाइटेड किंगडम’ और उसके अधीन देशों की राजसंबंधी पदवियों और प्रशस्तियों में श्रीमती जो कुछ चाहें बढ़ा लें और इस ‘ऐक्ट’ में यह भी वर्णन है कि ग्रेटब्रिटेन और आयरलैंड के एक में मिल जाने के लिए जो नियम बने थे। उनके अनुसार भी यह अधिकार मिला था कि यूनाइटेड किंगडम और उसके अधीन देशों की राजसंबंधी पदवी और प्रशस्ति इस संयोग के पीछे वही होगी जो श्रीमती ऐसे राजाज्ञापत्र के द्वारा प्रकाशित करेंगी, जिस पर राज की मुहर छपी रहे और इस ‘ऐक्ट’ में यह भी वर्णन है कि ऊपर लिखे हुए नियम और उस राजाज्ञापत्र के अनुसार जो 1 जनवरी सन् 1801 को राजसी मुहर होने के बाद प्रकाशित किया गया, हमने यह पदवी ली “विक्टोरिया ईश्वर की कृपा से ग्रेटब्रिटेन और आयरलैंड के संयुक्तराज्य की महारानी स्वधर्मरक्षिणी”, और इस ऐक्ट में यह भी वर्णन है कि उस नियम के अनुसार जो हिंदुस्तान के उत्तम शासन के हेतु बनाया गया था। हिंदुस्तान के राजा का अधिकार जो उस समय तक हमारी ओर से ईस्ट इंडिया कंपनी को सपुर्द था, अब हमारे निज अधिकार में आ गया और हमारे नाम से उसका शासन होगा। इस नए अधिकार की कि हम कोई विशेष पदवी लें और इन सब वर्णनों के अनंतर इस ऐक्ट में यह नियम सिद्ध किया गया है कि ऊपर लिखी हुई बात के स्मरण निमित्त हमने अपने मुहर किए हुए राजाज्ञापत्र के द्वारा हिंदुस्तान के शासन का अधिकार अपने हाथ में ले लिया, हमको यह योग्यता होगी कि यूनाइटेड किंगडम और उसके अधीन देशों की राजसंबंधी पदवियों और प्रशस्तियों में जो कुछ उचित समझें बढ़ा लें। इसलिए अब हम अपने प्रीवी काउंसिल की सम्मति से योग्य समझकर यह प्रचलित और प्रकाशित करते हैं कि आगे को, जहाँ सुगमता के साथ हो सके, सब अवसरों में और संपूर्ण राजपत्रों पर जिनमें हमारी पदवियाँ और प्रशस्तियाँ लिखी जाती हैं, सिवाय सनद, कमीशन, अधिकारदायक पत्र, दानपत्र, आज्ञापत्र, नियोगपत्र, और इसी प्रकार के दूसरे पत्रों के, जिनका प्रचार यूनाइटेड किंगडम के बाहर नहीं है, यूनाइटेड किंगडम उसके अधीन देशों की राजसंबंधी पदवियों में नीचे लिखा हुआ मिला दिया जाए, अर्थात् लैटिन भाषा में ‘इंडिई एम्परेट्रिक्स’ (हिंदुस्तान की राजराजेश्वरी) और अँग्रेज़ी भाषा में ‘एम्प्रेस ऑव इंडिया।’ हमारी यह इच्छा और प्रसन्नता है कि उन राजसंबंधी पत्रों में जिनका वर्णन ऊपर हुआ है यह नई पदवी न लिखी जाए। हमारी यह भी इच्छा और प्रसन्नता है कि सोने चाँदी और ताँबे के सब सिक्के, जो आज कल यूनाइटेड किंगडम में प्रचलित हैं और नीतिविरुद्ध नहीं गिने जाते और इसी प्रकार तथा आकार के दूसरे सिक्के जो हमारी आज्ञा से अब छापे जाएँगे, हमारी नई पदवी लेने से भी नीतिविरुद्ध न समझे जाएँगे और जो सिक्के यूनाइटेड किंगडम के अधीन देशों में छापे जाएँगे और जिनका वर्णन राजाज्ञापत्र में उन जगहों के नियमित और प्रचलित द्रव्य करके किया गया है और जिन पर हमारी संपूर्ण पदवियाँ या प्रशस्तियाँ या उनका कोई भाग रहे, और वे सिक्के जो राजाज्ञापत्र के अनुसार अब छापे और चलाए जाएँगे इस नई पदवी के बिना भी उस देश के नियमित और प्रचलित द्रव्य समझे जाएँगे, जब तक कि इस विषय में हमारी कोई दूसरी प्रसन्नता न प्रगट की जाएगी। हमारी विंडसर की कचहरी से 28 अप्रैल को एक हज़ार आठ सौ छिहत्तर के सन् में हमारे राज के उनतालीसवें बरस में प्रसिद्ध किया गया।

ईश्वर महारानी को चिरंजीव रखे!

जब चीफ़ हेरल्ड राजाज्ञापत्र को अँग्रेज़ी में पढ़ चुका तो हेरल्ड लोगों ने फिर तुरही बजाई, इसके पीछे फॉरेन सेक्रेटरी ने उर्दू में तर्जुमा पढ़ा। इसके समाप्त होते ही बादशाही झंडा खड़ा किया गया और तोपखाने से, जो दरबार के मैदान में मौजूद था। 101 तोपों की सलामी हुई। चौंतीस-चौंतीस सलामी होने के बाद बंदूकों की बाढ़ें दगीं और 101 सलामियाँ तोपों से हो चुकीं, तब फिर बाढ़ छूटी और नेशनल एन्थम  का बाजा बजने लगा। इसके अनंतर श्रीयुत् वायसराय समाज को एड्रेस करने के अभिप्राय से खड़े हुए। श्रीयुत् वायसराय के खड़े होते ही सामने के चबूतरे पर जितने बड़े-बड़े राजा लोग और गवर्नर आदि अधिकारी थे, खड़े हो गए पर श्रीयुत् ने बड़े आदर के साथ दोनों हाथों से हिंदुस्तानी रीति पर कई बार सलाम करके सबसे बैठ जाने का इशारा किया। यह काम श्रीयुत् का, जिससे हम लोगों की छाती दूनी हो गई, पायोनीयर सरीखे अँग्रेज़ी के संपादकों को बहुत बुरा लगा जिनकी समझ में वायसराय का हिंदुस्तानी तरह पर सलाम करना बड़े हेठाई और लज्जा की बात थी। ख़ैर, यह तो इन अँग्रेज़ी अख़बारवालों की मामूली बातें हैं। श्रीयुत् वायसराय ने जो उत्तम ऐड्रेस पड़ा उसका तर्जुमा हम नीचे लिखते हैं:— जय हिंद

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