निर्मल वर्मा: ‘परिंदे’ कहानी भाग-1

अँधियारे गलियारे में चलते हुए लतिका ठिठक गई। दीवार का सहारा लेकर उसने लैंप की बत्ती बढ़ा दी। सीढ़ियों पर उसकी छाया एक बेडौल फटी-फटी आकृति खींचने लगी। सात नंबर कमरे से लड़कियों की बातचीत और हँसी-ठहाकों का स्वर अभी तक आ रहा था। लतिका ने दरवाज़ा खटखटाया। शोर अचानक बंद हो गया।

‘कौन है?’

लतिका चुपचाप खड़ी रही। कमरे में कुछ देर तक घुसुर-पुसुर होती रही, फिर दरवाज़े की चटखनी के खुलने का स्वर आया। लतिका कमरे की देहरी से कुछ आगे बढ़ी, लैंप की झपकती लौ में लड़कियों के चेहरे सिनेमा के पर्दे पर ठहरे हुए क्लोज़-अप की भाँति उभरने लगे।

‘कमरे में अँधेरा क्यों कर रखा है?’ लतिका के स्वर में हल्की-सी झिड़क का आभास था। ‘लैंप में तेल ही ख़त्म हो गया, मैडम!’

यह सुधा का कमरा था, इसलिए उसे ही उत्तर देना पड़ा। होस्टल में शायद वह सबसे अधिक लोकप्रिय थी। क्योंकि सदा छुट्टी के समय या रात के डिनर के बाद आस-पास के कमरों में रहने वाली लड़कियों का जमघट उसी के कमरे में लग जाता था। देर तक गपशप, हँसी-मज़ाक़ चलता रहता। ‘तेल के लिए करीमुद्दीन से क्यों नहीं कहा?’

‘कितनी बार कहा मैडम, लेकिन उसे याद रहे तब तो!’

कमरे में हँसी की फुहार एक कोने में दूसरे कोने तक फैल गई। लतिका के कमरे में आने से अनुशासन की जो घुटन घिर आई थी, वह अचानक बह गई। करीमुद्दीन होस्टल का नौकर था। उसके आलस और काम में टालमटोल करने के क़िस्से होस्टल की लड़कियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आते थे। लतिका को हठात् कुछ स्मरण हो आया। अँधेरे में लैंप घुमाते हुए चारों ओर निगाहें दौड़ाई। कमरे में चारों ओर घेरा बनाकर वे बैठी थी-पास-पास एक-दूसरे से सटकर। सबके चेहरे परिचित थे, किंतु लैंप के पीले मद्धिम प्रकाश में मानो कुछ बदल गया था, या जैसे वह उन्हें पहली बार देख रही थी। ‘जूली, अब तक तुम इस ब्लॉक में क्या कर रही हो?’

जूली खिड़की के पास पलंग के सिरहाने बैठी थी। उसने चुपचाप आँखें नीची कर ली। लैंप का प्रकाश चारों ओर से सिमटकर अब केवल उसके चेहरे पर गिर रहा था।

‘नाइट-रजिस्टर पर दस्तख़त कर दिए?’

‘हाँ, मैडम।’

‘फिर…?’ लतिका का स्वर कड़ा हो आया।

जूली सकुचाकर खिड़की से बाहर देखने लगी।

जब से लतिका इस स्कूल में आई है, उसने अनुभव किया है कि होस्टल के इस नियम का पालन डाँट-फटकार के बावजूद नहीं होता।

‘मैडम, कल से छुट्टियाँ शुरू हो जाएँगी, इसलिए आज रात हम सबने मिलकर…” और सुधा पूरी बात न कहकर हेमंती की ओर देखते हुए मुस्कुराने लगी। ‘हेमंती के गाने का प्रोग्राम है; आप भी कुछ देर बैठिए न!’

लतिका को उलझन मालूम हुई। इस समय यहाँ आकर उसने उनके मज़े को किरकिरा कर दिया। इस छोटे-से हिल स्टेशन पर रहते उसे ख़ासा अर्सा हो गया, लेकिन कब समय पतझड़ और गर्मियों का घेरा पार कर सर्दी की छुट्टियों की गोद में सिमट जाता है, उसे कभी याद नहीं रहता। चोरों की तरह चुपचाप वह देहरी से बाहर हो गई। उसके चेहरे का तनाव ढीला पड़ गया। वह मुस्कुराने लगी।

‘मेरे संग स्नो-फ़ॉल देखने कोई नहीं ठहरेगा?’

‘मैडम, छुट्टियों में क्या आप घर नहीं जा रही है?’ सब लड़कियों की आँखें उस पर जम गईं। ‘अभी कुछ पक्का नहीं है-आई लव द स्नो-फॉल!’ लतिका को लगा कि यही बात उसने पिछले साल भी कही थी और शायद पिछले-से-पिछले साल भी। उसे लगा, मानो लड़कियाँ उसे संदेह की दृष्टि से देख रही हैं, मानो उन्होंने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया। उसका सिर चकराने लगा। मानो बादलों का स्याह झुरमुट किसी अनजाने कोने से उठकर उसे अपने में समा लेगा। वह थोड़ा-सा हँसी, फिर धीरे से उसने अपने सिर को झटक दिया।

‘जूली, तुमसे कुछ काम है, अपने ब्लॉक में जाने से पहले मुझसे मिल लेना—वेल, गुड नाइट!’ लतिका ने अपने पीछे दरवाज़ा बंद कर दिया।

‘गुड नाइट मैडम, गुड नाइट, गुड नाइट…!’

गलियारे की सीढ़ियाँ न उतरकर लतिका रेलिंग के सहारे खड़ी हो गई। लैंप की बत्ती को नीचे घुमाकर कोने में रख दिया। बाहर धुँध की नीली तहें बहुत घनी हो चली थीं। लॉन पर लगे हुए चीड़ के पत्तों की सरसराहट हवा के झोंकों के संग कभी तेज़, कभी धीमी होकर भीतर वह आती थी। हवा में सर्दी का आभास पाकर लतिका के दिमाग़ में कल से शुरू होने वाली छुट्टियों का ध्यान भटक आया। उसने आँखें मूँद ली। उसे लगा कि जैसे उसकी टाँगें बाँस की लकड़ियों की तरह उसके शरीर से बँधी हैं जिनकी गाँठें धीरे-धीरे खुलती जा रही हैं। सिर की चकराहट अभी मिटी नहीं थी, मगर अब जैसे वह भीतर न होकर बाहर फैली हुई धुँध का हिस्सा बन गई थी।

सीढ़ियों पर बातचीत का स्वर सुनकर लतिका जैसे सोते से जगी। शॉल को कंधों पर समेटा और लैंप उठा लिया। डॉक्टर मुकर्जी मिस्टर ह्यूबर्ट के संग एक अँग्रेज़ी धुन गुनगुनाते हुए ऊपर आ रहे थे। सीढ़ियों पर अँधेरा था और ह्यूबर्ट को बार-बार अपनी छड़ी से रास्ता टटोलना पड़ता था। लतिका ने दो-चार सीढ़ियाँ उतरकर लैंप को नीचे झुका दिया। ‘गुड इवनिंग डॉक्टर, गुड इवनिंग मिस्टर ह्यूबर्ट!’ ‘थैंक यू मिस लतिका’- ह्यूबर्ट के स्वर में कृतज्ञता का भाव था। सीढ़ियाँ चढ़ने से उनकी साँस तेज़ हो रही थी और वह दीवार से लगे हुए हाँफ रहे थे। लैंप की रौशनी में उनके चेहरे का पीलापन कुछ ताँबे के रंग-जैसा हो गया था।

‘यहाँ अकेली क्या कर रही हो मिस लतिका?’ डॉक्टर ने होंठों के भीतर से सीटी बजाई। ‘चेकिंग करके लौट रही थी। आज इस वक़्त ऊपर कैसे आना हुआ मिस्टर ह्यूबर्ट?’ ह्यूबर्ट ने मुस्कुराकर अपनी छड़ी डॉक्टर के कंधों से छुआ दी- ’इनसे पूछो, यही मुझे ज़बरदस्ती घसीट लाए हैं।’

‘मिस लतिका, हम आपको निमंत्रण देने आ रहे थे। आज रात मेरे कमरे में एक छोटा-सा कंसर्ट होगा, जिसमें मि. ह्यूबर्ट शोपाँ और चाइकोव्स्की के कंपोज़ीशन बजाएँगे और फिर क्रीम-कॉफ़ी पी जाएगी। और उसके बाद अगर समय रहा, तो पिछले साल हमने जो गुनाह किए हैं उन्हें हम मिलकर कन्फ़ेस करेंगे।’ डॉक्टर मुकर्जी के चेहरे पर उभरी मुस्कान खेल गई। ‘डॉक्टर, मुझे माफ़ करें, मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है।’

‘चलिए, यह ठीक रहा। फिर तो आप वैसे भी मेरे पास आती।’ डॉक्टर ने धीरे से लतिका के कंधों को पकड़कर अपने कमरे की तरफ़ मोड़ दिया। डॉक्टर मुकर्जी का कमरा ब्लॉक के दूसरे सिरे पर छत से जुड़ा हुआ था। वह आधे बर्मी थे, जिसके चिह्न उनकी थोड़ी दबी हुई नाक और छोटी-छोटी चंचल आँखों से स्पष्ट थे। बर्मा पर जापानियों का आक्रमण होने के बाद वह इस छोटे से पहाड़ी शहर में आ बसे थे। प्राइवेट प्रैक्टिस के अलावा वह कान्वेंट स्कूल में हाईजीन-फ़िज़ियालॉजी भी पढ़ाया करते थे और इसलिए उनको स्कूल के होस्टल में ही एक कमरा रहने के लिए दे दिया गया था। कुछ लोगों का कहना था कि

बर्मा से आते हुए रास्ते में उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई, लेकिन इस संबंध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि डॉक्टर स्वयं कभी अपनी पत्नी की चर्चा नहीं करते।

बातों के दौरान डॉक्टर अक्सर कहा करते हैं- ‘मरने से पहले मैं एक बार बर्मा ज़रूर जाऊँगा’- और तब एक क्षण के लिए उनकी आँखों में एक नमी-सी आ जाती। लतिका चाहने पर भी उनसे कुछ पूछ नहीं पाती। उसे लगता कि डॉक्टर नहीं चाहते कि कोई अतीत के संबंध में उनसे कुछ भी पूछे या सहानुभूति दिखलाए। दूसरे ही क्षण अपनी गंभीरता को दूर ठेलते हुए वह हँस पड़ते- एक सूखी, बुझी हुई हँसी।

होम-सिक्नेस ही एक ऐसी बीमारी है जिसका इलाज किसी डॉक्टर के पास नहीं है। छत पर मेज़-कुर्सियाँ डाल दी गई और भीतर कमरे से पर्कोलेटर में कॉफ़ी का पानी चढ़ा दिया गया। ‘सुना है अगले दो-तीन वर्षों में यहाँ पर बिजली का इंतिज़ाम हो जाएगा—’ डॉक्टर ने स्प्रिट-लैंप जलाते हुए कहा। ‘यह बात तो पिछले सालों से सुनने में आ रही है। अँग्रेज़ों ने भी कोई लंबी-चौड़ी स्कीम बनाई थी पता नहीं उसका क्या हुआ’- ह्यूबर्ट ने कहा। वह आराम-कुर्सी पर लेटा हुआ बाहर लॉन की ओर देख रहा था।

लतिका कमरे से दो मोमबत्तियाँ ले आई। मेज़ के दोनों सिरों पर टिकाकर उन्हें जला दिया गया। छत का अँधेरा मोमबत्ती की फीकी रौशनी के इर्द-गिर्द सिमटने लगा। एक घनी नीरवता चारों ओर घिरने लगी। हवा में चीड़ के वृक्षों की साँय-साँय दूर-दूर तक फैली पहाड़ियों और घाटियों में सीटियों की गूँज-सी छोड़ती जा रही थी। ‘इस बार शायद बर्फ़ जल्दी गिरेगी, अभी से हवा में एक सर्द ख़ुश्की-सी महसूस होने लगी है’- डॉक्टर का सिगार अँधेरे में लाल बिंदी-सा चमक रहा था। पता नहीं, मिस वुड को स्पेशल सर्विस का गोरखधंधा क्यों पसंद आता है। छुट्टियों में घर जाने से पहले क्या यह ज़रूरी है कि लड़कियाँ फ़ादर एल्मंड का सर्मन सुनें?’ ह्यूबर्ट ने कहा।

‘पिछले पाँच साल से मैं सुनता आ रहा हूँ- फ़ादर एल्मंड के सर्मन में कही हेर-फेर नहीं होता।’

डॉक्टर को फ़ादर एल्मंड एक आँख नहीं सुहाते थे। लतिका कुर्सी पर आगे झुककर प्यालों में कॉफ़ी उँड़ेलने लगी। हर साल स्कूल बंद होने के दिन यही दो प्रोग्राम होते हैं- चैपल में स्पेशल सर्विस और उसके बाद दिन में पिकनिक। लतिका को पहला साल याद आया जब डॉक्टर के संग पिकनिक के बाद वह क्लब गई थी। डॉक्टर बार में बैठे थे। बॉल-रूम कुमाऊँ रेजीमेंट अफ़सरों से भरा हुआ था। कुछ देर तक बिलियर्ड का खेल देखने के बाद जब वह वापस बार की ओर आ रहे थे, तब उन्होंने दाई ओर क्लब की लाइब्रेरी में देखा- मगर उसी समय डॉक्टर मुकर्जी पीछे से आ गए थे। ‘मिस लतिका, यह मि.गिरीश नेगी हैं?’ बिलियर्ड-रूम से आते हुए हँसी-ठहाकों के बीच वह कुछ ठहर गया था। वह किसी किताब के बीच में उँगली रखकर लाइब्रेरी की खिड़की से बाहर देख रहा था। ‘हलो डॉक्टर’ वह पीछे मुड़ा। तब उस क्षण…

उस क्षण न जाने क्यों लतिका का हाथ काँप गया और कॉफ़ी की गर्म बूँदें उसकी साड़ी पर छलक आई। अँधेरे में किसी ने नहीं देखा कि लतिका के चेहरे पर एक उनींदा रीतापन घिर आया है। हवा के झोंके से मोमबत्तियों की लौ फड़कने लगी। छत से भी ऊँची काठ-गोदाम जाने वाली सड़क पर यू. पी. रोडवेज़ की आख़िरी बस डाक लेकर जा रही थी। बस की हैड-लाइट्स में आस-पास फैली हुई झाड़ियों की छायाएँ घर की दीवार पर सरकती हुई ग़ायब होने लगी।

‘मिस लतिका, आप इस साल भी छुट्टियों में यहीं रहेंगी?’ डॉक्टर ने पूछा। डॉक्टर का सवाल हवा में टँगा रहा। उसी क्षण पियानो पर शोपाँ का नौक्टर्न ह्यूबर्ट की उँगलियों के नीचे से फिसलता हुआ धीरे-धीरे छत के अँधेरे में घुलने लगा- मानो जल पर कोमल स्वप्निल ऊर्मियाँ भँवरों का झिलमिलाता जाल बुनती हुई दूर-दूर किनारों तक फैलती जा रही हो। लतिका को लगा कि जैसे कहीं बहुत दूर बर्फ़ की चोटियों से परिंदों के झुंड नीचे अनजान देशों की ओर उड़े जा रहे हैं। इन दिनों अक्सर उसने अपने कमरे की खिड़की से उन्हें देखा है—धागे में बँधे चमकीले लट्टुओं की तरह वे एक लंबी टेढ़ी-मेढ़ी क़तार में उड़े

जाते हैं, पहाड़ों की सुनसान नीरवता से परे, उन विचित्र शहरों की ओर जहाँ शायद वह कभी नहीं जाएगी।

लतिका आर्म-चेयर पर ऊँघने लगी। डॉक्टर मुकर्जी का सिगार अँधेरे में चुपचाप जल रहा था। डॉक्टर को आश्चर्य हुआ कि लतिका न जाने क्या सोच रही है और लतिका सोच रही थी- क्या वह बूढ़ी होती जा रही है? उसके सामने स्कूल की प्रिंसिपल मिस वुड का चेहरा घूम गया- पोपला मुँह, आँखों के नीचे झूलती हुई माँस की थैलियाँ, ज़रा-ज़रा-सी बात पर चिढ़ जाना, कर्कश आवाज़ में चीख़ना- सब उसे ‘ओल्डमेड’ कहकर पुकारते हैं। कुछ वर्षों बाद वह भी हू-ब-हू वैसी ही बन जाएगी…लतिका के समूचे शरीर में झुरझुरी-सी दौड़ गई, मानो अनजाने में उसने किसी ग़लीज़ वस्तु को छू लिया हो। उसे याद आया, कुछ महीने पहले अचानक उसे ह्यूबर्ट का प्रेमपत्र मिला था-भावुक, याचना से भरा हुआ पत्र, जिसमें उसने न जाने क्या कुछ लिखा था, जो कभी उसकी समझ में नहीं आया। उसे ह्यूबर्ट की इस बचकाना हरकत पर हँसी आई थी, किंतु भीतर-ही-भीतर प्रसन्नता भी हुई थी उसकी उम्र अभी बीती नहीं है, अब भी वह दूसरों को अपनी ओर आकर्षित कर सकती है। ह्यूबर्ट का पत्र पढ़कर उसे क्रोध नहीं आया, आई थी केवल ममता। वह चाहती तो उसकी ग़लतफ़हमी को दूर करने में देर न लगती, किंतु कोई शक्ति उसे रोके रहती है, उसके कारण अपने पर विश्वास रहता है, अपने सुख का भ्रम मानो ह्यूबर्ट की ग़लतफ़हमी से जुड़ा है…।

ह्यूबर्ट ही क्यों, वह क्या किसी को भी चाह सकेगी, उस अनुभूति के संग, जो अब नहीं रही, जो छाया-सी उस पर मंडराती रहती है, न स्वयं मिटती है, न उसे मुक्ति दे पाती है। उसे लगा, जैसे बादलों का झुरमुट फिर उसके मस्तिष्क पर धीरे-धीरे छाने लगा है, उसकी टाँगे फिर निर्जीव, शिथिल-सी हो गई हैं। वह झटके से उठ खड़ी हुई, ‘डॉक्टर, माफ़ करना, मुझे बहुत थकान-सी लग रही है’… बिना वाक्य पूरा किए ही वह चली गई। कुछ देर तक टैरेस पर निस्तब्धता छाई रही। मोमबत्तियाँ बुझने लगी थी। डॉक्टर मुकर्जी ने सिगार का नया कश लिया-’सब लड़कियाँ एक-जैसी होती हैं- बेवक़ूफ़ और सेंटीमेंटल!’

ह्यूबर्ट की उँगलियों का दबाव पियानो पर ढीला पड़ता गया—अंतिम धुनों की झिझकी-सी गूँज कुछ क्षणों तक हवा में तिरती रही।

‘डॉक्टर, आपको मालूम है ‘मिस लतिका का व्यवहार पिछले कुछ अर्से से अजीब-सा लगता है।’- ह्यूबर्ट के स्वर में लापरवाही का भाव था। वह नहीं चाहता था कि डॉक्टर को लतिका के प्रति उसकी भावनाओं का आभास मात्र भी मिल सके। जिस कोमल अनुभूति को वह इतने समय से सँजोता आया है, ह्यूबर्ट उसे हँसी के एक ही ठहाके में उपहासास्पद बना देगा। ‘क्या तुम नियति में विश्वास करते हो, ह्यूबर्ट?’ डॉक्टर ने कहा। ह्यूबर्ट दम रोके प्रतीक्षा करता रहा। वह जानता था कि कोई भी बात कहने से पहले डॉक्टर को फ़िलॉसोफाइज़ करने की आदत थी। डॉक्टर टैरेस के जंगले से सटकर खड़ा हो गया। फीकी-सी चाँदनी में चीड़ के पेड़ों की छायाएँ लॉन पर गिर रही थी। कभी-कभी कोई जुगनू अँधेरे में हरा प्रकाश छिड़कता हवा में ग़ायब हो जाता था।

‘मैं कभी-कभी सोचता हूँ, इंसान ज़िंदा किसलिए रहता है- क्या उसे कोई और बेहतर काम करने को नहीं मिलता? हज़ारों मील अपने मुल्क से दूर मैं यहाँ पड़ा हूँ। यहाँ कौन मुझे जानता है…यहीं शायद मर भी जाऊँगा। ह्यूबर्ट, क्या तुमने कभी महसूस किया है कि एक अजनबी की हैसियत से पराई ज़मीन पर जाना काफ़ी खौफ़नाक बात है…?’

ह्यूबर्ट विस्मित- सा डॉक्टर की ओर देखने लगा। उसने पहली बार डॉक्टर मुकर्जी के इस पहलू को देखा था। अपने संबंध में वह अक्सर चुप रहते थे। ‘कोई पीछे नहीं है, यह बात मुझ में एक अजीब क़िस्म की बेफ़िक्री पैदा कर देती है। लेकिन कुछ लोगों की मौत अंत तक पहेली बनी रहती है…शायद वे ज़िंदगी में बहुत उम्मीद लगाते थे। उसे ट्रैजिक भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि आख़िरी दम तक उन्हें मरने का एहसास नहीं होता…।’ ‘डॉक्टर, आप किसका ज़िक्र कर रहे हैं?’ ह्यूबर्ट ने परेशान होकर पूछा। डॉक्टर कुछ देर तक चुपचाप सिगार पीता रहा। फिर मुड़कर वह मोमबत्तियों की बुझती हुई लौ को देखने लगा।

‘तुम्हें मालूम है, किसी समय लतिका बिला नागा क्लब जाया करती थी। गिरीश नेगी से उसका परिचय वहीं हुआ था। कश्मीर जाने से एक रात पहले उसने मुझे सब कुछ बता दिया था। मैं अब तक लतिका से उस मुलाक़ात के बारे में कुछ नहीं कह सका हूँ। किंतु उस रोज़ कौन जानता था कि वह वापस नहीं लौटेगा। और अब…अब क्या फ़र्क़ पड़ता है। लेट द डेड डाई…।’ डॉक्टर की सूखी सर्द हँसी में खोखली-सी शून्यता भरी थी।

‘कौन गिरीश नेगी?’

‘कुमाऊँ-रेजीमेंट का कैप्टन था।’

‘डॉक्टर तथा लतिका…’ ह्यूबर्ट से आगे कुछ नहीं कहा गया।

उसे याद आया वह पत्र, जो उसने लतिका को भेजा था…कितना अर्थहीन और उपहासास्पद, जैसे उसका एक-एक शब्द उसके दिल को कचोट रहा हो! उसने धीरे-से पियानो पर सिर टिका लिया। लतिका ने उसे क्यों नहीं बताया, क्या वह इसके योग्य भी नहीं था? ‘लतिका… वह तो बच्ची है, पागल! मरने वाले के संग ख़ुद थोड़े ही मरा जाता है।’

कुछ देर चुप रहकर डॉक्टर ने अपने प्रश्न को फिर दुहराया।

‘लेकिन ह्यूबर्ट, क्या तुम नियति पर विश्वास करते हो?’ हवा के हल्के झोंके से मोमबत्तियाँ एक बार प्रज्ज्वलित होकर बुझ गईं। टैरेस पर ह्यूबर्ट और डॉक्टर अँधेरे में एक-दूसरे का चेहरा नहीं देख पा रहे थे, फिर भी वे एक-दूसरे की ओर देख रहे थे। कान्वेंट स्कूल से कुछ दूर मैदान में बहते पहाड़ी नाले का स्वर आ रहा था। जब बहुत देर बाद कुमाऊँ-रेजीमेंट सेंटर का बिगुल सुनाई दिया, तो ह्यूबर्ट हड़बड़ा कर खड़ा हो गया। ‘अच्छा चलता हूँ, डॉक्टर, गुडनाइट!’

‘गुडनाइट ह्यूबर्ट…मुझे माफ़ करना, मैं सिगार ख़त्म करके उठूँगा…।’ सुबह बदली छायी थी। लतिका के खिड़की खोलते ही धुँध का ग़ुब्बारा-सा भीतर घुस आया, जैसे रात-भर दीवार के सहारे सर्दी में ठिठुरता हुआ वह भीतर आने की प्रतीक्षा कर रहा हो। स्कूल में ऊपर चैपल जाने वाली सड़क बादलों में छिप गई थी, केवल चैपल का ‘क्रास’ धुँध के पर्दे पर एक-दूसरे को काटती हुई पेंसिल की रेखाओं-सा दिखाई दे जाता था।

लतिका ने खिड़की से आँखें हटाई, तो देखा कि करीमुद्दीन चाय की ट्रे लिए खड़ा है। करीमुद्दीन मिलिट्री में अर्दली रह चुका था, इसलिए ट्रे मेज़ पर रखकर ‘अटेंशन’ की मुद्रा में खड़ा हो गया। लतिका झटके से उठ बैठी। सुबह से आलस करके कितनी बार जागकर वह सो चुकी है। अपनी खिसियाहट मिटाने के लिए लतिका ने कहा, ‘बड़ी सरदी है आज, बिस्तर छोड़ने को जी नहीं चाहता।’

‘अजी मेम साहब, अभी क्या सरदी आई है—बड़े दिनों में देखना, कैसे दाँत कटकटाते हैं’- और करीमुद्दीन अपने हाथों को बग़लों में डाले हुए इस तरह सिकुड़ गया जैसे उन दिनों की कल्पना मात्र से उसे जाड़ा लगना शुरू हो गया हो। गंजे सिर पर दोनों तरफ़ के उसके बाल ख़िज़ाब लगाने से कत्थई रंग के भूरे हो गए थे। बात चाहे किसी विषय पर हो रही हो, वह हमेशा खींचतान कर उसे ऐसे क्षेत्र में घसीट लाता था, जहाँ वह बेझिझक अपने विचारों को प्रकट कर सके।

‘एक बार तो यहाँ लगातार इतनी बर्फ़ गिरी कि भुवाली से लेकर डाक-बँगले तक सारी सड़कें जाम हो गई। इतनी बर्फ़ थी मेम साहब, कि पेड़ों की टहनियाँ तक सिकुड़कर तनों से लिपट गई थी- बिलकुल ऐसे’, और करीमुद्दीन नीचे झुक कर मुर्गी-सा बन गया।

‘कब की बात है?’ लतिका ने पूछा।

‘अब यह तो जोड़-हिसाब करके ही पता चलेगा, मेम साहब…लेकिन इतना याद है कि उस वक़्त अँग्रेज़ बहादुर यहीं थे। कैंटोनमेंट की इमारत पर क़ौमी झंडा नहीं लगा था। बड़े जबर थे ये अँग्रेज़, दो घंटों में ही सारी सड़कें साफ़ करवा दी। उन दिनों एक सीटी बजाते ही पचास घोड़े वाले जमा हो जाते थे। अब तो सारे शैड ख़ाली पड़े हैं। वे लोग अपनी ख़िदमत भी करवाना जानते थे, अब उजाड़ हो गया है’, करीमुद्दीन उदास भाव से बाहर देखने लगा।

आज यह पहली बार नहीं है जब लतिका करीमुद्दीन से उन दिनों की बातें सुन रही है जब ‘अँग्रेज़ बहादुर’ ने इस स्थान को स्वर्ग बना रखा था। ‘आप छुट्टियों में इस साल भी यहीं रहेंगी, मेमसाहब?’

‘दिखता तो कुछ ऐसा ही है करीमुद्दीन- तुम्हें फिर तंग होना पड़ेगा।’

‘क्या कहती हैं मेमसाहब! आपके रहने से हमारा भी मन लग जाता है, वरना छुट्टियों में तो यहाँ कुत्ते लोटते हैं।’

‘तुम ज़रा मिस्त्री से कह देना कि इस कमरे की छत की मरम्मत कर जाए। पिछले साल बर्फ़ या पानी दरारों से टपकता रहता था।’ लतिका को याद आया कि पिछली सर्दियों में जब कभी बर्फ़ गिरती थी, तो उसे पानी से बचने के लिए रात भर कमरे के कोने में सिमटकर सोना पड़ता था।

करीमुद्दीन चाय की ट्रे उठाता हुआ बोला, ‘ह्यूबर्ट साहब तो कल ही चले जाएँगे- कल रात उनकी तबीयत फिर ख़राब हो गई। आधी रात के वक़्त मुझे जगाने आए थे। कहते थे, छाती में तकलीफ़ है। उन्हें यह मौसम नहीं रास आता। कह रहे थे, लड़कियों की बस में वह भी कल ही चले जाएँगे।’ करीमुद्दीन दरवाज़ा बंद करके चला गया। लतिका की इच्छा हुई कि वह ह्यूबर्ट के कमरे मे जाकर उनकी तबीयत की पूछताछ कर आए। किंतु फिर न जाने क्यों स्लीपर पैरों में टँगे रहे और वह खिड़की के बाहर बादलों को उमड़ता हुआ देखती रही। ह्यूबर्ट का चेहरा जब उसे देखकर सहमा-सा दयनीय हो जाता है, तब लगता है कि वह अपनी मूक निरीह याचना में उसे कोस रहा है। न वह उसकी ग़लतफ़हमी को दूर करने का प्रयत्न कर पाती है, न उसे अपनी विवशता की सफ़ाई देने का साहस होता है। उसे लगता है कि इस जाले से बाहर निकलने के लिए वह धागे के जिस सिरे को पकड़ती है, वह ख़ुद एक गाँठ बनकर रह जाता है…।

बाहर बूँदाबाँदी होने लगी थी। कमरे की टिन की छत ‘खट-खट’ बोलने लगी। लतिका पलंग से उठ खड़ी हुई। बिस्तर को तह कर बिछाया। फिर पैरों में स्लीपरों को घसीटते हुए वह बड़े आईने तक आई और उसके सामने स्टूल पर बैठ कर बालों को खोलने लगी। किंतु कुछ देर तक कंघी बालों में ही उलझी रही और वह गुमसुम हो शीशे में अपना चेहरा तकती रही। करीमुद्दीन को यह कहना याद ही नहीं रहा कि धीरे-धीरे आग जलाने की लकड़ियाँ जमा कर लें। इन दिनों सस्ते दामों पर सूखी लकड़ियाँ मिल जाती हैं। पिछले साल तो कमरा धुएँ से भर जाता था जिसके कारण कँपकँपाते जाड़े में भी उसे खिड़की खोलकर ही सोना पड़ता था।

आईने में लतिका ने अपना चेहरा देखा- वह मुस्कुरा रही थी। पिछले साल अपने कमरे की सीलन और ठंड से बचने के लिए कभी-कभी वह मिस वुड के ख़ाली कमरे में चोरी-चुपके सोने चली जाया करती थी। मिस वुड का कमरा बिना आग के भी गर्म रहा करता था, उनके गदोले सोफ़े पर लेटते ही आँख लग जाती थी। कमरा छुट्टियों में ख़ाली पड़ा रहता है, किंतु मिस वुड से इतना नहीं होता कि दो महीनों के लिए उसके हवाले कर जाएँ। हर साल कमरे में ताला ठोंक जाती हैं। वह तो पिछले साल ग़ुसलख़ाने में भीतर की साँकल देना भूल गई थी, जिसे लतिका चोर-दरवाज़े के रूप में इस्तेमाल करती रही थी।

पहले साल अकेले में उसे बड़ा डर-सा लगा था। छुट्टियो में सारे स्कूल और होस्टल के कमरे साँय-साँय करने लगते हैं। डर के मारे उसे जब कभी नींद नहीं आती थी, तब वह करीमुद्दीन को रात में देर तक बातों में उलझाए रखती। बातों में जब वह खोई-सी सो जाती, तब करीमुद्दीन लैंप बुझाकर चला जाता। कभी-कभी बीमारी का बहाना करके वह डॉक्टर को बुलावा भेजती थी और बाद में बहुत ज़िद करके दूसरे कमरे में उनका बिस्तर लगवा देती।

लतिका ने कंधे से बालों का गुच्छा निकाला और उसे बाहर फेंकने के लिए वह खिड़की के पास आ खड़ी हुई। बाहर छत की ढलान से बारिश के जल की मोटी-सी धार बराबर लॉन पर गिर रही थी। मेघाच्छन्न आकाश मे सरकते हुए बादलों के पीछे पहाड़ियों के झुंड कभी उभर आते थे, कभी छिप जाते थे, मानो चलती ट्रेन से कोई उन्हें देख रहा हो। लतिका ने खिड़की से सिर बाहर निकाल लिया—हवा के झोंके से उसकी आँखें झप गई। उसे जितने काम याद आते हैं, उतना ही आलस घना होता जाता है! बस की सीटें रिज़र्व करवाने के लिए चपरासी को रुपए देने हैं। जो सामान होस्टल की लड़कियाँ पीछे छोड़े जा रही है, उन्हें गोदाम में रखवाना होगा। कभी-कभी तो छोटी क्लास की लड़कियों के साथ पैकिंग करवाने के काम में भी उसे हाथ बँटाना पड़ता था।

वह इन कामों से ऊबती नहीं। धीरे-धीरे सब निबटते जाते है। कोई ग़लती इधर-उधर रह जाती है, जो बाद में सुधर जाती है। हर काम में किचकिच रहती है, परेशानी और दिक़्क़त होती है, किंतु देर-सबेर इससे छुटकारा मिल ही जाता है। किंतु जब लड़कियों की आख़िरी बस चली जाती है, तब मन उचाट-सा हो जाता है। ख़ाली कॉरीडोर में घूमती हुई वह कभी इस कमरे में जाती है और कभी उसमें। वह नहीं जान पाती कि अपने से क्या करे- दिल कहीं भी नहीं टिक पाता, हमेशा भटका-भटका-सा रहता है।

इस सबके बावजूद जब कोई सहज भाव से पूछ बैठता है, ‘मिस लतिका, छुट्टियों में आप घर नहीं जा रही?’ तब वह क्या कहे?

डिंग-डांग-डिंग…स्पेशल सर्विस के लिए स्कूल चैपल के घंटे बजने लगे थे। लतिका ने अपना सिर खिड़की के भीतर कर लिया। उसने झटपट साड़ी उतारी और पेटीकोट में ही कंधे पर तौलिया डाल ग़ुसलख़ाने में घुस गई। लेफ़्ट-राइट-लेफ़्ट…लेफ़्ट…

कैंटोनमेंट जाने वाली पक्की सड़क पर चार-चार की पंक्ति में कुमाऊँ-रेजीमेंट के सिपाहियों की एक टुकड़ी मार्च कर रही थी। फ़ौजी बूटों की भारी और खुरदरी आवाज़ें स्कूल चैपल की दीवारों से टकराकर भीतर ‘प्रेयर-हॉल’ में गूँज रही थी।

‘ब्लसेड आर द मीक’…फ़ादर एल्मंड एक-एक शब्द चबाते हुए खँखारते स्वर में ‘सर्मन ऑफ़ द माउंट’ पढ़ रहे थे। ईसा मसीह की मूर्ति के नीचे ‘कैंडल-ब्रियम’ के दोनों ओर मोमबत्तियाँ जल रही थी, जिनका प्रकाश आगे बैठी हुई लड़कियों पर पड़ रहा था। पिछली लाइनों की बेंचे अँधेरे में डूबी हुई थी, जहाँ लड़कियाँ प्रार्थना की मुद्रा में बैठी हुई सिर झुकाए एक-दूसरे से घुसर-पुसर कर रही थी। मिस वुड स्कूल सीज़न के सफलतापूर्वक समाप्त हो जाने पर विद्याथियों और स्टाफ़-सदस्यों को बधाई का भाषण दे चुकी थी। और अब फ़ादर के पीछे बैठी हुई अपने में ही कुछ बुड़बुड़ा रही थी मानो धीरे-धीरे फ़ादर को ‘प्रौम्ट’ कर रही हो।

‘आमीन’…फ़ादर एल्मंड ने बाइबल मेज़ पर रख दी और ‘प्रेयर-बुक’ उठा ली। हॉल की ख़ामोशी क्षण-भर के लिए टूट गई। लड़कियों ने खड़े होते हुए जान-बूझकर बेंचो को पीछे धकेला- बेंचें फ़र्श पर रगड़ खाकर सीटी बजाती हुई पीछे खिसक गई­ । हॉल के कोने से हँसी फूट पड़ी। मिस वुड का चेहरा तन गया, माथे पर भृकुटियाँ चढ़ गई। फिर अचानक निस्तब्धता छा गई- हॉल के उस घुटे हुए धुँधलके में फ़ादर का तीखा फटा हुआ स्वर सुनाई देने लगा-‘जीसस सेड, आई एम द लाइट ऑफ़ द वर्ल्ड- ही दैट फ़ालोएथ मी शैल नॉट वाक इन डार्कनेस, बट शैल हैव द लाइट ऑफ़ द लाइट…।’

डॉक्टर मुकर्जी ने ऊब और अकुलाहट से भरी जम्हाई ली, ‘कब यह क़िस्सा ख़त्म होगा?’ उसने इतने ऊँचे स्वर में लतिका से पूछा कि वह सकुचाकर दूसरी ओर देखने लगी। स्पेशल सर्विस के समय डॉक्टर मुकर्जी के होंठों पर व्यंग्यात्मक मुस्कान खेलती रही और वह धीरे-धीरे अपनी मूँछों को खींचता रहा। फ़ादर एल्मंड की वेश-भूषा देखकर लतिका के दिल में गुदगुदी-सी दौड़ गई। जब वह छोटी थी, तो अक्सर यह बात सोचकर विस्मित हुआ करती थी कि क्या पादरी लोग सफ़ेद चोग़े के नीचे कुछ नहीं पहनते, अगर धोखे से वह ऊपर उठ जाए तो?

लेफ़्ट…लेफ़्ट…लेफ़्ट… मार्च करते फ़ौजी बूट चैपल से दूर होते जा रहे थे—केवल उनकी गूँज हवा में शेष रह गई थी।

जय हिंद

Leave a comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.