आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी के महत्वपूर्ण कथन भाग-1

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के ग्रंथ का आरंभ सिद्धों की वाणियों से हुआ है। आचार्य शुक्ल जी को इतिहास ग्रंथ लेखन में केदारनाथ पाठक से बहुत सहयोग मिला है। ''विलक्षण बात यह है कि आधुनिक गद्य साहित्य की परंपरा का प्रवर्तन नाटक से हुआ।'' (आचार्य रामचन्द्र शुक्ल)  "इस वेदना को लेकर उन्होंने ह्रदय की ऐसी अनुभूतियाँ सामने रखीं, जो… Continue reading आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी के महत्वपूर्ण कथन भाग-1

रामवृक्ष बेनीपुरी रज़िया – रेखचित्र

कानों में चाँदी की बालियाँ, गले में चाँदी का हैकल, हाथों में चाँदी के कंगन और पैरों में चाँदी की गोड़ाई—भरबाँह की बूटेदार क़मीज़ पहने, काली साड़ी के छोर को गले में लपेटे, गोरे चेहरे पर लटकते हुए कुछ बालों को सँभालने में परेशान वह छोटी सी लड़की जो उस दिन मेरे सामने आकर खड़ी… Continue reading रामवृक्ष बेनीपुरी रज़िया – रेखचित्र

डॉ. नामवर के महत्वपूर्ण कथन

डॉ. नामवर सिंह का जन्म- 28 जुलाई 1927 को बनारस से तीस मिल दूर एक छोटे से गाँव जीवनपुर में हुआ था। इनका परिवार गहरवार राजपूत परिवार था। ‘छायावाद’ 1954 ई. में सरस्वती प्रेस से छपी थी। यह नामवर सिंह की पहली समीक्षात्मक पुस्तक है। इसमें बारह अध्याय है। नामवर सिंह ने इसकी भूमिका में… Continue reading डॉ. नामवर के महत्वपूर्ण कथन

रीतिकाल के महत्वपूर्ण रचनाएँ और रचनाकार

संस्कृत की वे रचनाएँ जो रीतिकाल का आधार बनी रचना और रचनाकार 1. कामसूत्र - वात्स्यायन 2. काव्य प्रकाश - मम्मट 3. चंद्रलोक एवं रतिमंजरी - जयदेव 4. साहित्य दर्पण - विश्वनाथ 5. वृत्त रत्नाकर - भट्ट केदार 6. छंदों मंजरी - गंगादास 7. शृंगार मंजरी - अकबर साह 8. शृंगार तिलक - रूद्र भट्ट… Continue reading रीतिकाल के महत्वपूर्ण रचनाएँ और रचनाकार

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’गैंग्रीन/रोज (कहानी)

गैंग्रीन/रोज - यह वास्तविक घटना पर आधारित कहानी है। रचनाकार- स. ही. वा. अज्ञेय रचनाकाल- मई, 1934 ई. (डलहौजी नामक स्थान पर रचित) पहले यह कहानी ‘रोज’ के नाम से प्रकाशित हुआ था। मार्च 1982 ई में रचनाकार द्वारा नाम परिवर्तित कर गैंग्रीन कर दिया गया। विपथगाह- 1937 ई. प्रथम संस्करण ‘रोज’ नाम से था।… Continue reading सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’गैंग्रीन/रोज (कहानी)

फणीश्वर नाथ रेणु लाल पान की बेगम (कहानी)

‘लालपान की बेगम’ 1957 में भावात्मक शैली में लिखी गई एक आँचलिक कहानी है। ठुमरी संग्रह में संकलित लालपान की बेगम 1956 की कहानी है। यह इलाहाबाद से प्रकाशित ‘कहानी’ पत्रिका के जनवरी 1957 के अंक में प्रकाशित हुई थी। पुंज प्रकाश ने इस कहानी का नाट्य रूपान्तरण भी किया है, जिसे सन् 1907 में… Continue reading फणीश्वर नाथ रेणु लाल पान की बेगम (कहानी)

काव्य आन्दोलन और उसके प्रवर्तक

काव्य आन्दोलन – प्रवर्तक 1. नयी कविता (1951) स. ही. वा.   अज्ञेय 2. नयी कविता आंदोलन (1954) - डॉ. जगदीश गुप्त 3. अकविता आंदोलन (1954) - डॉ. जगदीश चतुर्वेदी 4. प्रतिबद्ध कविता आंदोलन (1957) परमानंद श्रीवास्तव  . 5. ताज़ी कविता आंदोलन (1958) - लक्ष्मीकांत वर्मा 6. नवगीत आंदोलन (1958) - राजेंद्रप्रसाद सिंह 7. सनातन सुर्योदयी… Continue reading काव्य आन्दोलन और उसके प्रवर्तक

नयी कविता प्रश्नोत्तरी

नयी कविता से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य: नयी कविता का समय (1953-1960 ई.) 'नयी कविता' शब्द का प्रयोग सबसे पहले अज्ञेय ने 'प्रतीक पत्रिका' के जून 1951 के अंक में किया था। उसके बाद अज्ञेय ने 1952 ई. में इलाहबाद के ऑल इंडिया 'रेडियों स्टेशन' से एक भेटवार्ता में इस 'नयी कविता' के अवधारणा को स्पष्ट… Continue reading नयी कविता प्रश्नोत्तरी

प्रयोगवाद के महत्वपूर्ण तथ्य और कथन

प्रयोगवाद का समय: 1943- 1952 1943 ई. में अज्ञेय द्वारा ‘तारसप्तक’ का प्रकाशन हुआ था। 1952 ई. में अज्ञेय ने ‘नई कविता’ का प्रवर्तन किया था। अतः अज्ञेय ‘प्रयोगवाद’ और ‘नई कविता’ दोनों के प्रवर्तक है। प्रयोगवाद का अर्थ: 1943 से 1952 के बीच अज्ञेय और उनके समर्थक कवियों द्वारा काव्य के क्षेत्र में भाषा,… Continue reading प्रयोगवाद के महत्वपूर्ण तथ्य और कथन

रामस्वरूप चतुर्वेदी जी के महत्वपूर्ण कथन

हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास (1986) संसार को समझना दर्शन का काम है, उसे बदलना राजनीति का और उसकी पुनर्रचना साहित्य का दायित्व है। इसी रूप में यहाँ साहित्य का विकास समझने का यत्न हुआ है। भाषा, साहित्य और संस्कृति के संपृक्त सन्दर्भ में यह हिंदी साहित्य के साथ संवेदना का इतिहास भी होने… Continue reading रामस्वरूप चतुर्वेदी जी के महत्वपूर्ण कथन