- आचार्य रामचंद्र शुक्ल के ग्रंथ का आरंभ सिद्धों की वाणियों से हुआ है।
- आचार्य शुक्ल जी को इतिहास ग्रंथ लेखन में केदारनाथ पाठक से बहुत सहयोग मिला है।
- ”विलक्षण बात यह है कि आधुनिक गद्य साहित्य की परंपरा का प्रवर्तन नाटक से हुआ।” (आचार्य रामचन्द्र शुक्ल)
- “इस वेदना को लेकर उन्होंने ह्रदय की ऐसी अनुभूतियाँ सामने रखीं, जो लोकोत्तर हैं। कहाँ तक वे वास्तविक अनुभूतियाँ हैं और कहाँ तक अनुभूतियों की रमणीय कल्पना, यह नहीं कहा जा सकता।” (आचार्य रामचंद्र शुक्ल, महादेवी वर्मा के बारे में)
- छायावाद का केवल पहला अथार्त मूल अर्थ लिखकर तो हिंदी काव्य-क्षेत्र में चलने वाली सुश्री महादेवी वर्मा ही हैं।
- ”इनकी रहस्यवादी रचनाओं को देख चाहे तो यह कहें कि इनकी मधुवर्षा के मानस प्रचार के लिए रहस्यवाद का परदा मिल गया अथवा यों कहें कि इनकी सारी प्रणयानूभूति ससीम पर से कूदकर असीम पर जा रही।” (जयशंकर प्रसाद के बार में)
- शुक्ल जी ने जयशंकर प्रसाद की कृति आँसू को ‘श्रृंगारी विप्रलम्भ’ कहा है।
- प्रसाद जी ने अपना क्षेत्र प्राचीन हिंदू काल के भीतर चुना और प्रेमी जी में मुस्लिम काल के भीतर। प्रसाद के नाटकों में स्कंदगुप्त श्रेष्ठ है और प्रेमी (हरिकृष्ण प्रेमी) के नाटकों में रक्षाबंधन।
- कबीर की अपेक्षा ख़ुसरो का ध्यान भाषा की ओर अधिक था।
- जायसी के श्रृंगार में मानसिक पक्ष प्रधान है, शारीरिक गौण हैं।
- भारतेन्दु ने जिस प्रकार हिन्दी गद्य की भाषा का परिष्कार किया, उसी प्रकार काव्य की ब्रजभाषा का भी।
- ‘इसमें कोई संदेह नहीं कि कबीर को राम नाम रामानन्द जी से ही प्राप्त हुआ पर आगे चलकर कबीर के राम रामानन्द से भिन्न हो गए।’
- काव्य की पूर्ण अनुभूति के लिए कल्पना का व्यापार कवि और श्रोता दोनों के लिए अनिवार्य है।
- वैर क्रोध का अचार है, या मुरब्बा है।
- काव्यानुभूति की जटिलता चित्तवृत्तियों की संख्या पर निर्भर नहीं, बल्कि संवादी-विसंवादी वृत्तियों के द्वंद्व पर आधारित है।
- ‘आधुनिक काल में गद्य का आविर्भाव सबसे प्रधान घटना है।’
- करुणा दुखात्मक वर्ग में आनेवाला मनोविकार है।
- नाद सौन्दर्य से कविता की आयु बढ़ती है।
- भक्ति धर्म की रसात्मक अनुभूति है।
- करुणा सेंत (मुफ्त में, बिना दाम चुकाए) का सौदा नहीं है।
- ‘प्रकृति के नाना रूपों के साथ केशव के हृदय का सामंजस्य कुछ भी न था।’
- ‘विरुद्धों का सामंजस्य कर्मश्रेत्र का सौन्दर्य है।’
- ‘हिंदी रीति-ग्रंथों की परंपरा चिन्तामणि त्रिपाठी से चली। अतः रीतिकाल का आरम्भ उन्हीं से मानना चाहिए।’
- हरिश्चन्द्र का प्रभाव भाषा और साहित्य दोनों पर बड़ा गहरा पड़ा। उन्होंने जिस प्रकार गद्य की भाषा को परिमार्जित करके उसे बहुत चलता, मधुर और स्वच्छ रूप दिया, उसी प्रकार हिंदी साहित्य को भी नए मार्ग पर लाकर खड़ा कर दिया।
- सौंदर्य की वस्तुगत सत्ता होती है, इसलिए शुद्ध सौंदर्य नाम की कोई चीज़ नहीं होती।
- यह सूचित करने की आवश्यकता नहीं है कि न तो सूर का अवधी पर अधिकार था और न जायसी का ब्रजभाषा पर।
- धर्म का प्रवाह कर्म, ज्ञान और भक्ति- इन तीन धाराओं में चलता है। इन तीनों के सामंजस्य से धर्म अपनी पूर्ण सजीव दशा से रहता है। किसी एक के भी अभाव से वह विकलांग रहता है।
- “इनकी भाषा ललित और सानुप्रास होती थी।” (चिंतामणि त्रिपाठी के बारे में)
- “भाषा चलती होने पर भी अनुप्रासयुक्त होती थी।” (बेनी के बारे में)
- “इस ग्रंथ को इन्होंने वास्तव में आचार्य के रूप में लिखा है, कवि के रूप में नहीं।” (महाराजा जसवंत सिंह के ग्रंथ ‘भाषा भूषण’ के बारे में)
- “इसका एक-एक दोहा हिन्दी साहित्य में एक-एक रत्न माना जाता है।”
- “इसमें तो रस के ऐसे छींटे पड़ते हैं जिनसे हृदय-कलिका थोड़ी देर के लिए खिल उठती है।” (बिहारी और बिहारी सतसई के बारे में)
- “जिस कवि में कल्पना की समाहार शक्ति के साथ भाषा की समाहार शक्ति जितनी अधिक होगी उतनी ही वह मुक्तक की रचना में सफल होगा।” (बिहारी और बिहारी सतसई के बारे में)
- “बिहारी की भाषा चलती होने पर भी साहित्यिक है।”
- “कविता उनकी श्रृंगारी है, पर प्रेम की उच्च भूमि पर नहीं पहुँचती, नीचे ही रह जाती है।” (बिहारी और बिहारी सतसई के बारे में)
- “भाषा इनकी बड़ी स्वाभाविक, चलती और व्यंजना पूर्ण होती थी।” (मंडन मिश्र के बारे में)
- “इनका सच्चा कवि हृदय था।” (मतिराम के बारे में)
- “रीतिकाल के प्रतिनिधि कवियों में पद्माकर को छोड़ और किसी कवि में मतिराम की-सी चलती भाषा और सरल व्यंजना नहीं मिलती।” (भूषण के बारे में)
- “उनके प्रति भक्ति और सम्मान की प्रतिष्ठा हिंदू जनता के हृदय में उस समय भी थी और आगे भी बराबर बनी रही या बढ़ती गई।”
- “भूषण के वीर रस के उद्गार सारी जनता के हृदय की संपत्ति हुए।”
- “जिसकी रचना को जनता का हृदय स्वीकार करेगा उस कवि की कीर्ति तब तक बराबर बनी रहेगी, जब तक स्वीकृति बनी रहेगी।”
- “शिवाजी और छत्रसाल की वीरता का वर्णनों को कोई कवियों की झूठी ख़ुशामद नहीं कह सकता।”
- “वे हिंदू जाति के प्रतिनिधि कवि हैं।” (सुखदेव मिश्र के बारे)
- “छंदशास्त्र पर इनका-सा विशद निरूपण और किसी कवि ने नहीं किया है।” (देव कवि के बारे में)
- “ये (देव) आचार्य और कवि दोनों रूपों में हमारे सामने आते हैं।”
- “कवित्व शक्ति और मौलिकता देव में खूब थी पर उनके सम्यक स्फूर्ण में उनकी रुचि विशेष प्रायः बाधक हुई है।”
- “रीतिकाल के कवियों में ये बड़े ही प्रगल्भ और प्रतिभासंपन्न कवि थे, इसमें संदेह नहीं।” (श्रीपति के बारे में)
- “श्रीपति ने काव्य के सब अंगों का निरूपण विशद रीति से किया है।” (भिखारीदास के बारे में)
- “इनकी रचना कलापक्ष में संयत और भावपक्ष में रंजनकारिणी है।” (पद्माकर के बारे में)
- “ऐसा सर्वप्रिय कवि इस काल के भीतर बिहारी को छोड दूसरा नहीं हुआ है। इनकी रचना की रमणीयता ही इस सर्वप्रियता का एकमात्र कारण है।” (ग्वाल कवि के बारे में)
- “रीतिकाल की सनक इनमें इतनी अधिक थी कि इन्हें ‘यमुना लहरी’ नामक देव-स्तुति में भी नवरस और षट् ऋतु सुझाई पड़ी है।”
- “षट् ऋतुओं का वर्णन इन्होंने विस्तृत किया है पर वही श्रृंगारी उद्दीपन के ढंग का।”
- “ग्वाल कवि ने देशाटन अच्छा किया था और उन्हें भिन्न-भिन्न प्रांतों की बोलियों का अच्छा ज्ञान हो गया था।”
- “इन कालों की रचनाओं की विशेष प्रवृत्ति के अनुसार ही उनका नामकरण किया गया है।”
- “हिन्दी साहित्य का आदिकाल संवत् 1050 से लेकर संवत् 1375 तक अर्थात महाराज भोज के समय से लेकर हम्मीरदेव के समय के कुछ पीछे तक माना जा सकता है।”
- “जब तक भाषा बोलचाल में थी तब तक वह ‘भाषा’ या ‘देशभाषा’ ही कहलाती रही, जब वह साहित्य की भाषा हो गई तब उसके लिए ‘अपभ्रंश’ शब्द का व्यवहार होने लगा।”
- “नाथपंथ के जोगियों की भाषा ‘सधुक्कड़ी भाषा’ थी।”
- “सिद्धों की उद्धृत रचनाओं की भाषा ‘देशभाषा’ मिश्रित अपभ्रंश या ‘पुरानी हिन्दी’ की काव्य भाषा है।”
- “सिद्धों में ‘सरह’ सबसे पुराने अर्थात विक्रम संवत् 690 के हैं।
- “कबीर आदि संतों को नाथपंथियों से जिस प्रकार ‘साखी’ और ‘बानी’ शब्द मिले उसी प्रकार साखी और बानी के लिए बहुत कुछ सामग्री और ‘सधुक्कड़ी’ भाषा भी।”
- “वीरगीत के रूप में हमें सबसे पुरानी पुस्तक ‘बीसलदेवरासो’ मिलती है।”
- “बीसलदेवरासो में ‘काव्य के अर्थ में ‘रसायण’ शब्द बार-बार आया है। अतः हमारी समझ में इसी ‘रसायण’ शब्द से होते-होते ‘रासो’ हो गया है।”
- “बीसलदेव रासो में आए ‘बारह सै बहोत्तरा’ का स्पष्ट अर्थ 1212 (विक्रमी संवत्) है।” (ई.1155)
- बीसलदेव रासो के बारे में आचार्य शुक्ल ने कहा है, “यह घटनात्मक काव्य नहीं है, वर्णनात्मक है।”
- बीसलदेव रासो के बारे में आचार्य शुक्ल ने कहा है, “भाषा की परीक्षा करके देखते हैं तो वह साहित्यिक नहीं है, राजस्थानी है।”
- आचार्य शुक्ल ने इसकी नायिका के संबंध में कहा है कि- “समूचे मध्यकालीन साहित्य में जबान की इतनी तेज व मन की खरी अन्य नायिका दुर्लभ है।”
- शुक्ल ने इसकी भाषा साहित्यिक हिंदी नहीं मानकर राजस्थानी + ब्रज + मध्यदेशीय मिश्रित मानी है।
- “अपभ्रंश के योग से शुद्ध राजस्थानी भाषा का जो साहित्यिक रूप था वह ‘डिंगल’ कहलाता था।”
- “चन्दरबरदाई के बारे में आचार्य शुक्ल ने कहा है, “ये हिन्दी के ‘प्रथम महाकवि’ माने जाते हैं और इनका ‘पृथ्वीराज रासो’ हिन्दी का ‘प्रथम महाकाव्य’ है।”
- “पृथ्वीराज रासो के बारे में आचार्य शुक्ल ने कहा है, “भाषा की कसौटी पर यदि ग्रंथ को कसते हैं तो और भी निराश होना पड़ता है क्योंकि वह बिल्कुल बेठिकाने हैं- उसमें व्याकरण आदि की कोई व्यवस्था नहीं है।”
- “विद्यापति के पद अधिकतर श्रृंगार के ही है, जिनमें नायिका और नायक राधा-कृष्ण है।”
- “विद्यापति को कृष्ण भक्तों की परम्परा में न समझना चाहिए।”
- “मोटे हिसाब से वीरगाथाकाल महाराज हम्मीर की समय तक ही समझना चाहिए।”
- “कबीर ने अपनी झाड़-फटकार के द्वारा हिंदुओं और मुसलमानों की कट्टरता को दूर करने का जो प्रयास किया। वह अधिकतर चिढ़ाने वाला सिद्ध हुआ, हृदय को स्पर्श करने वाला नहीं।”
- “इस कहानी के द्वारा कवि ने प्रेममार्ग के त्याग और कष्ट का निरूपण करके साधक के भगवत प्रेम का स्वरूप दिखाया है।” (कुतबन कृत मृगावती के बारे में)
- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार, मलिक मुहम्मद जायसी के गुरु थे- शेख मोहिदी (मुहीउद्दीन)
- “प्रेमगाथा की परंपरा में पद्मावत सबसे प्रौढ़ और सरस है।”
- “यहीं प्रेममार्गी सूफी कवियों की प्रचुरता की समाप्ति समझनी चाहिए।” (शेख नबी के बारे में)
- “सूफ़ी आख्यान काव्यों की अखंडित परम्परा की यही समाप्ति मानी जा सकती है।” (नूर मुहम्मद कृत अनुराग बांसुरी के बारे में)
- “नूर मुहम्मद को हिन्दी भाषा में कविता करने के कारण जगह-जगह इसका सबूत देना पड़ा है कि वे इस्लाम के पक्के अनुयायी थे।”
- “इस परम्परा में मुसलमान कवि हुए हैं। केवल एक हिन्दू मिला है।” (आचार्य शुक्ल ने सूरदास की तरफ़ इशारा किया है)
- “जनता पर चाहे जो प्रभाव पड़ा हो पर उक्त गद्दी के भक्त शिष्यों ने सुन्दर-सुन्दर पदों द्वारा जो मनोहर प्रेम संगीत धारा बहाई उसने मुरझाते हुए हिंदू जीवन को सरस और प्रफुल्लित किया।” (श्री बल्लभाचार्य जी के लिए)
- “सूर की बड़ी भारी विशेषता है नवीन प्रसंगों की उद्भावना।”
- “ये बड़े भारी कृष्णभक्त और गोस्वामी विट्ठलनाथ जी के बड़े कृपापात्र शिष्य थे।” (रसखान के बारे में)
- “इन भक्तों का हमारे साहित्य पर बड़ा भारी उपकार है।” (कृष्णभक्त कवियों के लिए)
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने केशवदास को भक्तिकाल में सम्मिलित किया है।
- रामचरितमानस को ‘लोगों के हृदय का हार’ कहा है। (आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने)
- “गोस्वामी जी की भक्ति पद्धति की सबसे बड़ी विशेषता है उसकी सर्वांगपूर्णता।”
- “रामचरितमानस में तुलसी केवल कवि रूप में ही नहीं, उपदेशक के रूप में भी सामने आते हैं।”
- “प्रेम और श्रृंगार का ऐसा वर्णन जो बिना किसी लज्जा और संकोच के सबके सामने पढ़ा जा सके, गोस्वामी जी का ही है।”
- “हम निसंकोच कह सकते हैं कि यह एक कवि (तुलसीदास) ही हिंदी को प्रौढ़ साहित्यिक भाषा सिद्ध करने के लिए काफी है।”
- “अब तक पाई गई पुस्तकों में यह “भाषा योगवासिष्ठ” ही सबसे पुराना है, जिसमें गद्य अपने परिष्कृत रूप में दिखाई पड़ता है।” (रामप्रसाद निरंजनी के बारे में)
- “भाषा योगवासिष्ठ को परिमार्जित गद्य की प्रथम पुस्तक और रामप्रसाद निरंजनी को प्रथम प्रौढ़ गद्य लेखक मान सकते हैं।” (रामप्रसाद निरंजनी के बारे में)
- “जिस प्रकार वे अपनी अरबी-फारसी मिली हिंदी को ही उर्दू कहते थे, उसी प्रकार संस्कृत मिली हिंदी को भाखा।” (इंशा अल्ला ख़ाँ के बारे में)
- “आरंभिक काल के चारों लेखकों में इंशा की भाषा सबसे चटकीली, मटकीली, मुहावरेदार और चलती है।”
- ‘अपनी कहानी का आरम्भ ही उन्होंने इस ढंग से किया है, जैसे लखनऊ के भाँड़ घोड़ा कुदाते हुए महफ़िल में आते हैं।’ (आचार्य रामचन्द्र शुक्ल- इंशा अल्ला ख़ाँ के बारे में)
- “असली हिंदी का नमूना लेकर उस समय राजा लक्ष्मणसिंह ही आगे बढ़े।” (राजा लक्षमणसिंह)
- “इससे भी बड़ा काम उन्होंने यह किया कि साहित्य को नवीन मार्ग दिखाया और वे उसे शिक्षित जनता के सहचर्य में ले आए।” (भारतेंदु हरिश्चंद्र के बारे में)
- “प्रेमघन में पुरानी परंपरा का निर्वाह अधिक दिखाई पड़ता है।” यहां पुरानी परंपरा से मतलब भाषा से हैं। (प्रेमघन के बारे में)
- “अंग्रेजी ढंग का मौलिक उपन्यास पहले-पहले हिन्दी में लाला श्रीनिवास दास का ‘परीक्षागुरु’ निकला था।” (श्रीनिवास दास के परीक्षा गुरु के बारे में)
- हरिश्चन्द्र की भाषा को ‘हरिश्चन्द्री हिन्दी’ कहा है शुक्ल जी ने।
- “वे सिद्ध वाणी के अत्यंत सरल हृदय कवि थे।” (भारतेंदु हरिश्चंद्र)
- “प्राचीन और नवीन का ही सुंदर सामंजस्य भारतेंदु की कला का विशेष माधुर्य है।”
- “अपनी सर्वतोन्मुखी प्रतिभा के बल से एक ओर तो वे पद्माकर, द्विजदेव की परम्परा में दिखाई पड़ते थे, दूसरी ओर बंगदेश के मायकेल एवं हेमचन्द्र की श्रेणी में।”
- “श्रीयुत पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी ने पहले पहल विस्तृत आलोचना का रास्ता निकाला।”
- “आलस्य का जैसा त्याग उपन्यासकारों में देखा गया है वैसा और किसी वर्ग के हिंदी लेखकों में नहीं।” (बाबू देवकीनंदन)
- “पहले मौलिक उपन्यास लेखक जिनके उपन्यासों की सर्वसाधारण में धूम हुई काशी के बाबू देवकीनन्दन खत्री थे।”
- “ये वास्तव में घटना-प्रधान कथानक या क़िस्से हैं, जिनमें जीवन के विविध पक्षों के चित्रण का कोई प्रयत्न नहीं, इससे ये साहित्य कोटि में नहीं आते हैं।”
- “उन्होंने साहित्यिक हिंदी ना लिखकर हिन्दुस्तानी लिखी जो केवल इसी प्रकार की हल्की रचनाओं में काम दे सकती है।” (पंडित किशोरीलाल गोस्वामी के बारे में)
- “उपन्यासों का ढेर लगा देने वाले दूसरे मौलिक उपन्यासकार पंडित किशोरीलाल गोस्वामी हैं, जिनकी रचनाएँ साहित्य कोटि में आती है।”
- “साहित्य की दृष्टि से उन्हें हिंदी का पहला उपन्यासकार कहना चाहिए।”
- “यदि ‘इन्दुमती’ किसी बंगला कहानी की छाया नहीं है, तो हिन्दी की यही पहली मौलिक कहानी ठहरती है। इसके उपरांत ‘ग्यारह वर्ष का समय’, फिर ‘दुलाई वाली’ का नंबर आता है।” (हिन्दी की पहली मौलिक कहानी)
- “यदि गद्य कवियों या लेखकों की कसौटी है, तो निबन्ध गद्य की कसौटी है।”
- “भाषा की पूर्ण शक्ति का विकास निबन्धों में ही सबसे अधिक संभव होता है।”
- आचार्य शुक्ल ने ‘उसने कहा था’ कहानी को अद्वितीय कहानी माना है।
- “इसके पक्के यथार्थवाद के बीच, सुरुचि की चरम मर्यादा के भीतर, भावुकता का चरम उत्कर्ष अत्यंत निपुणता के साथ सम्पुटित है। घटना इसकी ऐसी है जैसे बराबर हुआ करती है, पर उसमें भीतर से प्रेम का एक स्वर्गीय स्वरूप झाँक रहा है- केवल झाँक रहा है, निर्लज्जता के साथ पुकार या कराह नहीं रहा है।”
- “इसकी घटनाएँ ही बोल रही है, पात्रों के बोलने की अपेक्षा नहीं।”
- “यह बेधड़क कहा जा सकता है कि शैली कि जो विशिष्टता और अर्थगर्भित, वक्रता गुलेरी जी में मिलती है और किसी लेखक में नहीं।”
- आचार्य शुक्ल ने महावीरप्रसाद द्विवेदी के लेखों को “बातों का संग्रह” कहा है।
- “द्विवेदी जी के लेखों को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है कि लेखक बहुत मोटी अक़्ल के पाठकों के लिए लिख रहे है।”
- “पंडित गोविंदनारायण मिश्र के गद्य को समास अनुप्रास में गुँथे शब्द-गुच्छों का एक अटाला समझिए।”
- “उनके (पंडित जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी के) अधिकांश लेख भाषण मात्र हैं, स्थायी विषयों पर लिखे हुए निबंध नहीं।”
- “इन पुस्तकों (महावीर प्रसाद द्विवेदी की आलोचनात्मक पुस्तकों) को एक मुहल्ले में फैली बातों से दूसरे मुहल्ले वालों को कुछ परिचित कराने के प्रयत्न के रूप में समझना चाहिए, स्वतंत्र समालोचना के रूप में नहीं।”
- “यद्यपि द्विवेदी जी ने हिन्दी के बड़े-बड़े कवियों को लेकर गम्भीर साहित्य समीक्षा का स्थायी साहित्य नहीं प्रस्तुत किया, पर नई निकली पुस्तकों की भाषा आदि की खरी आलोचना करके हिंदी साहित्य का बड़ा भारी उपकार किया। यदि द्विवेदी जी न उठ खड़े होते तो जैसी अव्यवस्थित व्याकरण विरुद्ध और उटपटांग भाषा चारों ओर दिखाई पड़ती थी, उसकीपरंपरा जल्दी ना रुकती। उसके प्रभाव से लेखक सावधान हो गए और जिनमें भाषा की समझ और योग्यता थी उन्होंने अपना सुधार किया।”
- आचार्य शुक्ल ने ‘मिश्रबन्धु विनोद’ को बड़ा ‘भारी इतिवृत्त संग्रह’ कहा है।
- “केवल प्रो. नगेंद्र की ‘सुमित्रानन्दन पन्त’ पुस्तक ही ठिकाने की मिली।”
- “काव्य अधिकतर भावव्यंजनात्मक और वर्णनात्मक है।” (अयोध्यासिंह हरिऔंध के बारे में)
- “गुप्त जी (मैथिलीशरण गुप्त) वास्तव में सामंजस्यवादी कवि है; प्रतिक्रिया का प्रदर्शन करने वाले अथवा मद में झूमाने वाले कवि नहीं हैं। सब प्रकार की उच्चता से प्रभावित होने वाला हृदय उन्हें प्राप्त है। प्राचीन के प्रति पूज्य भाव और नवीन के प्रति उत्साह दोनों इनमें है।”
- “उनका (पंडित सत्यनारायण कविरत्न का) जीवन क्या था; जीवन की विषमता का एक छाँटा हुआ दृष्टान्त था।”
- “उसका (छायावाद का) प्रधान लक्ष्य काव्य-शैली की ओर था, वस्तु विधान की ओर नहीं। अर्थभूमि या वस्तुभूमि का तो उसके भीतर बहुत संकोच हो गया।”
- “हिंदी कविता की नई धारा का प्रवर्तक इन्हीं को- विशेषतः मैथिलीशरण गुप्त और मुकुटधर पांडेय को समझना चाहिए।”
- “असीम और अज्ञात प्रियतम के प्रति अत्यंत चित्रमय भाषा में अनेक प्रकार के प्रेमोद्गारों तक ही काव्य की गतिविधि प्रायः बंध गई।”
- “छायावाद शब्द का प्रयोग रहस्यवाद तक ही न रहकर काव्य-शैली के सन्बन्ध में भी प्रतीकवाद (सिंबालिज्म) के अर्थ में होने लगा।”
- “छायावाद को चित्रभाषा या अभिव्यंजन-पद्धति कहा है।”
- “छायावाद शब्द का प्रयोग दो अर्थों में समझना चाहिए। एक तो रहस्यवाद के अर्थ में, जहाँ उसका सम्बन्ध काव्य वस्तु से होता है अर्थात जहाँ कवि उस अनंत और अज्ञात प्रियतम को आलम्बन बनाकर अत्यन्त चित्रमयी भाषा में प्रेम की अनेक प्रकार से व्यंजना करता है। छायावाद शब्द का दूसरा प्रयोग काव्य-शैली या पद्धति विशेष की व्यापक अर्थ में हैं।”
- “छायावाद का सामान्यतः अर्थ हुआ प्रस्तुत के स्थान पर उसकी व्यंजना करने वाली छाया के रूप में अप्रस्तुत का कथन।”
- “छायावाद का केवल पहला अर्थात मूल अर्थ लिखकर तो हिन्दी काव्य-क्षेत्र में चलने वाली सुश्री महादेवी वर्मा ही हैं।”
- “पंत, प्रसाद, निराला इत्यादि और सब कवि प्रतीक-पद्धति या चित्रभाषा शैली की दृष्टि से ही छायावादी कहलाए।”
- “अन्योक्ति-पद्धति का अवलम्बन भी छायावाद का एक विशेष लक्षण हुआ।”
- “छायावाद का चलन द्विवेदी काल की रूखी इतिवृत्तात्मकता की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था।”
- “लाक्षणिक और व्यंजनात्मक पद्धति का प्रगल्भ और प्रचुर विकास छायावाद की काव्य-शैली की असली विशेषता है।
- “छायावाद की प्रवृत्ति अधिकतर प्रेमगीतात्मक है।”
- शुक्ल जी जयशंकर प्रसाद की कृति ‘आँसू’ को ‘श्रृंगारी विप्रलम्भ’ कहा है।
- “यद्यपि यह छोटा है, पर इसकी रचना बहुत सरस और हृदयग्राहिणी है और कवि की भावुकता का परिचय देती है।” (नरोत्तमदास की कृति सुदामा चरित के बारे में)
A. ‘छायावाद की शाखा के भीतर धीरे-धीरे काव्य शैली का बहुत
अच्छा विकास हुआ, इसमें संदेह नहीं।’ (2024 जून)
C. ‘छायावाद जहाँ तक आध्यात्मिक प्रेम लेकर चला वहाँ तक तो
रहस्यवाद के ही अंतर्गत रहा।’ (2024 जून)
E. ‘छायावाद के पहले नये मार्मिक विषयों की ओर हिंदी कविता
प्रवृत्त होती रही थी।’ (2024 जून)
जय हिंद