- “वात्सल्य और शृंगार के क्षेत्रों का जितना अधिक उद्घाटन सूर ने अपनी बंद आँखों से किया उतना किसी और कवि ने नहीं। मानो इन क्षेत्रों के वे कोना-कोना झाँक आए है।”
- “सूरदास किसी आती हुई गीति परंपरा का चाहे वह मौखिक ही क्यों नहीं रही हो पूर्ण विकास का प्रतीक होता है।”
- “शृंगार और वात्सल्य के क्षेत्र में जहाँ तक इनकी दृष्टि पहुँची वहाँ तक और किसी कवि की नहीं। बालक चेष्टाओं के स्वाभाविक मनोहर चित्रों का इतना बड़ा भंडार कही नहीं।”
- “आचार्यों की छाप लगी हुई आठ वीणाएँ श्री कृष्ण की प्रेम लीला का कीर्तन करने उठी जिनमे सबसे ऊँची सुरीली और मधुर झंकार अंधे कवि सूरदास की वीणा की थी।”
- “मीरा का समस्त काव्य आँसुओं से सना एवं वीरह में पगा था।
- “इनके (मीरा) पद कुछ तो राजस्थानी मिश्रित ब्रज भाषा में है कुछ विशुद्ध साहित्यिक ब्रजभाषा में पर सब में प्रेम की तल्लीनता सामान रूप से पाई जाती है।”
- “कृष्ण भक्तों के सामान इन्होंने (रसखान) गीति काव्य का आश्रय न लेकर कवित्त-सवैयों के माध्यम से ही सच्चे प्रेम की व्यंजना की है।”
- “अनुप्रास की सुंदर छटा होते हुए भी भाषा की चुस्ती और सफाई कहीं नहीं जाने पाई है। बीच-बीच में भावों की सुंदर व्यंजना है।”
- “प्रेम के ऐसे सुंदर उद्गार रसखान के सवैये से निकले कि जन साधारण प्रेम या शृंगार संबंधी इनके कवित्त और सवैयों को ही रसखान कहने लगे – ‘जे कोई रसखानि सुनाओं।”
- “वास्तव में इस रचना (विज्ञान गीता) में केशवदास एक आचार्य और धर्मगुरु के रूप में सामने आते है।”
- “केशव केवल उक्ति वैचित्र्य व शब्द क्रीडा के प्रेमी थे। जीवन में नाना गंभीर एवं मार्मिक पक्षों पर उनकी दृष्टि नहीं थी। अतः वे मुक्तक रचना के उपयुक्त थे प्रबंध रचना के नहीं। प्रबंध पटुता उनमें कुछ न थी। प्रबंध काव्य रचना के योग्य न तो केशव में अनुभूति थी न शक्ति।”
- आचार्य शुक्ल ने घनानन्द को ‘साक्षात रस मूर्ति’ कहा है। (घनानन्द के बारे में)
- “प्रेम मार्ग का ऐसा प्रवीण और वीर पथिक तथा ज़बांदानी का दावा रखने वाला ब्रजभाषा का दूसरा कवि नहीं हुआ।” (घनानन्द के बारे में)
- “भाषा के लक्षक एवं व्यंजक बल की सीमा कहाँ तक है, इसकी पूरी परख इन्हीं को थी।” (घनानन्द के बारे में)
- “रीतिकाल के कवियों में यह बड़े ही प्रतिभा सम्पन्न कवि थे।” (देव के बारे में)
- आचार्य शुक्ल के अनुसार बोधा एक रसिक कवि थे। (बोधा के बारे में)
- हिन्दी रीति ग्रंथों की अखंड परम्परा एवं रीति काल का आरम्भ आचार्य शुक्ल चिन्तामणि से मानते हैं।
- शुक्ल ने प्रथम आचार्य चिन्तामणि को माना है।
- केशव को ‘कठिन काव्य का प्रेत’ शुक्ल ने उनकी क्लिष्टता के कारण कहा है। (केशवदास के बारे में)
- “आलोचना का कार्य है, किसी साहित्यिक रचना की अच्छी तरह परीक्षा करके उसके रूप, गुण और अर्थव्यवस्था का निर्धारण करना।”
- “हिन्दी के पुराने कवियों को समालोचना के लिए सामने लाकर मिश्र बन्धुओं ने बेशक बड़ा ज़रूरी काम किया, उनकी बातें समालोचना कही जा सकती है या नहीं, यह दूसरी बात है।”
- “आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी के गौरव थे। समीक्षा क्षेत्र में उनका कोई प्रतिद्वंदी न उनके जीवनकाल में था, न अब कोई उनके समकक्ष आलोचक है। आचार्य शब्द ऐसे ही कर्त्ता साहित्यकारों के योग्य हैं।” (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी)
- भारतीय काव्यालोचन शास्त्र का इतना गम्भीर और स्वतंत्र विचारक हिन्दी में तो दूसरा हुआ ही नहीं, अन्यान्य भारतीय भाषाओं में भी हुआ है या नहीं, ठीक नहीं कह सकते, शायद नहीं हुआ।” (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी)
- आज तक की हिन्दी समीक्षा में शुक्ल जी आधार स्तम्भ है। (डॉ. भगवतस्वरूप मिश्र)
- ‘छायावाद’ को ‘श्रृंगारी कविता’ आचार्य शुक्ल ने कहा है।
- आचार्य शुक्ल “रस को हृदय की मुक्तावस्था” मानते हैं।
- “जिस प्रकार आत्मा की मुक्त अवस्था ज्ञान दशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्त अवस्था रस दशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती है, उसे कविता कहते हैं।” (कविता क्या है)
- शुक्ल ने काव्य को कर्मयोग एवं ज्ञानयोग के समकक्ष रखते हुए ‘भावयोग’ कहा, जो मनुष्य के हृदय को मुक्तावस्था में पहुँचाता है।
- ‘शुक्ल जी भारतीय पुनरूत्थान युग की उन परिस्थितयों की उपज थे, जिन्होंने राजनीति में महात्मा गांधी, कविता में रवीन्द्रनाथ ठाकुर, जयशंकर प्रसाद आदि को उत्पन्न किया।’- (नामवर सिंह)
- “कविता का उद्देश्य हृदय को लोक-सामान्य की भावभूमि पर पहुंचा देना है।”
- ‘प्रत्यय बोध, अनुभूति और वेग युक्त प्रवृत्ति इन तीनों के गूढ़ संश्लेषण का नाम भाव है।’
- ‘भक्ति के लिए ब्रह्म का सगुण होना अनिवार्य हैं।’
- भ्रमरगीत का महत्व एक बात से और बढ़ गया है। भक्तशिरोमणि सूर ने इसमें सगुणोपासना का निरूपण बड़े ही मार्मिक ढंग से- हृदय की अनुभूति के आधार पर तर्क पद्धति पर नहीं किया है।
- “तुलसीदास उत्तरी भारत की समग्र जनता के हृदय मंदिर में पूर्ण प्रेम प्रतिष्ठा के साथ विराज रहे हैं।”
- ”इनका हृदय कवि का, मस्तिष्क आलोचक का और जीवन अध्यापक का था।” (आचार्य शुक्ल के लिए)
- “हिन्दी समीक्षा को शास्त्रीय और वैज्ञानिक भूमि पर प्रतिष्ठित करने में शुक्ल जी ने युग प्रवर्तक का कार्य किया है। उनका यह कार्य हिन्दी के इतिहास में सदैव स्मरणीय रहेगा।” (नन्ददुलारे वाजपेयी)
- ‘रस मीमांसा’ में आचार्य शुक्ल ने स्पष्ट लिखा है, “अध्यात्म शब्द की मेरी समझ में काव्य या कला के क्षेत्र में कहीं कोई ज़रूरत नहीं है।” इसी प्रकार जब वे धार्मिक अन्धविश्वासों का खण्डन करते हैं, तो उनका लहजा कबीर की तरह आक्रामक दिखाई देता है, “ईश्वर साकार है कि निराकार, लम्बी दाढ़ी वाला है कि चार हाथ वाला, अरबी बोलता है कि संस्कृत, मूर्ति पूजने वालों से दोस्ती रखता है कि आसमान की ओर हाथ उठाने वालों से, इन बातों पर विवाद करने वाले अब केवल उपहास के पात्र होंगे। इसी प्रकार सृष्टि के जिन रहस्यों को विज्ञान खोल चुका है, उनके सम्बन्ध में जो पौराणिक कथाएँ और कल्पनाएँ (छः दिनों में सृष्टि की उत्पत्ति, आदम-हौवा का जोड़ा, चौरासी लाख योनि, आदि) हैं, वे अब काम नहीं दे सकतीं।” वस्तुतः शुक्ल जी ने विकासवाद के सिद्धान्त के तहत साहित्य को व्यक्ति के सामाजिक जीवन से अविछिन्न बताते हुए उसके समाजोन्मुख रूप पर बल दिया। अपनी इसी भूमिका में उन्होंने लिखा, “विकास परम सत्य है, बड़े महत्व का सिद्धान्त है। सामाजिक उन्नति के लिए हमारे प्रयत्न इसलिए रचित हैं कि हम समष्टि के अंग हैं, अंग भी ऐसे कि चेतन हो गए हैं। अतः समष्टि में उद्देश्य-विधान का अभाव नहीं हो सकता, क्योंकि हम उसके एक अंग होकर अपने-आपमें उसका हिंदी को प्रौढ़ साहित्यिक भाषा सिद्ध करने के लिए काफी हैं।” (तुलसीदास के लिए)
- ‘रस मीमांसा’ में शुक्ल जी ने लिखा, “दीन और असहाय जनता को निरन्तर पीड़ा पहुँचाते चले जाने वाले क्रूर आततायियों को उपदेश देने, उनसे दया की भिक्षा माँगने और प्रेम जताने तथा उनकी सेवा-सुश्रूषा करने में ही कर्तव्य की सीमा नहीं मानी जा सकती… मनुष्य के शरीर में जैसे दक्षिण और वाम दो पक्ष हैं, वैसे ही उसके हृदय के भी कोमल और कठोर, मधुर और तीक्ष्ण, दो पक्ष हैं और बराबर रहेंगे। काव्य-कला की पूरी रमणीयता इन दोनों पक्षों के समन्वय के बीच मंगल या सौंदर्य के विकास में दिखाई पड़ती है।”
- “ऐसी तुच्छ वृत्तिवालों का अपवित्र हृदय कविता के निवास के योग्य नहीं। कविता देवी के मंदिर ऊँचे, खुले, विस्तृत और पुनीत हृदय हैं। सच्चे कवि राजाओं की सवारी, ऐश्वर्य की सामग्री में ही सौंदर्य नहीं ढूँढ़ा करते, वे फूस के झोपड़ों, धूल-मिट्टी में सने किसानों, बच्चों के मुँह में चारा डालते पक्षियों, दौड़ते हुए कुत्तों और चोरी करती हुई बिल्लियों में कभी-कभी ऐसे सौंदर्य का दर्शन करते हैं, जिसकी छाया महलों और दरबारों तक नहीं पहुँच सकती।”
- “मनुष्य लोकबद्ध प्राणी है। उसकी अपनी सत्ता का ज्ञान तक लोकबद्ध है। लोक के भीतर ही कविता क्या किसी कला का प्रयोजन और विकास होता है।”
- “कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ संबंधों के संकुचित मंडल से ऊपर उठाकर लोक-सामान्य की भावभूमि पर ले जाती है। इस भूमि पर पहुँचे हुए मनुष्य को कुछ काल के लिए अपना पता ही नहीं रहता। वह अपनी सत्ता को लोकसत्ता में लीन किए रहता है।”
- “रीतिग्रंथों की बदौलत रसदृष्टि परिमित हो जाने से उसके संयोजक विषयों में से कुछ तो उद्दीपन में डाल दिए गए और कुछ भावक्षेत्र से निकाले जाकर अलंकार के खाते में हाँक दिए गए। …हमारे यहाँ के कवियों को रीतिग्रंथों ने जैसा चारों ओर से जकड़ा, वैसा और कहीं के कवियों को नहीं। इन ग्रंथों के कारण उनकी दृष्टि संकुचित हो गई, लक्षणों की कवायद पूरी करके वे अपने कर्तव्य की समाप्ति मानने लगे। वे इस बात को भूल चले की किसी वर्णन का उद्देश्य श्रोता के हृदय पर प्रभाव डालना है।”
- “केशव को कवि हृदय नहीं मिला था। उनमें वह सहृदयता और भावुकता भी न थी, जो एक कवि में होनी चाहिए। …प्रबंधकाव्य रचना के योग्य न तो केशव में अनुभूति ही थी, न शक्ति। …वे वर्णन वर्णन के लिए करते थे, न कि प्रसंग या अवसर की अपेक्षा से। …केशव की रचना को सबसे अधिक विकृत और अरुचिकर करने वाली वस्तु है आलंकारिक चमत्कार की प्रवृत्ति, जिसके कारण न तो भावों की प्रकृत व्यंजना के लिए जगह बचती है, न सच्चे हृदयग्राही वस्तुवर्णन के लिए।”
- “छायावाद नाम चल पड़ने का परिणाम यह हुआ कि बहुत से कवि रहस्यात्मकता, अभिव्यंजना के लाक्षणिक वैचित्र, वस्तुविन्यास की विश्रृंखलता, चित्रमयी भाषा और मधुमयी कल्पना को ही साध्य मानकर चले। शैली की इन विशेषताओं की दूरारूढ़ साधना में ही लीन हो जाने के कारण अर्थभूमि के विस्तार की ओर उनकी दृष्टि न रही। विभावपक्ष या तो शून्य अथवा अनिर्दिष्ट रह गया। इस प्रकार प्रसरोन्मुख काव्यक्षेत्र बहुत कुछ संकुचित हो गया।”
- “पंतजी की रहस्यभावना स्वाभाविक है, साम्प्रदायिक (डागमेटिक) नहीं। ऐसी रहस्यभावना इस रहस्यमय जगत् के नाना रुपों को देख प्रत्येक सहृदय व्यक्ति के मन में कभी-कभी उठा करती है। …’गुंजन’ में भी पन्तजी की रहस्यभावना अधिकतर स्वाभाविक पथ पर पाई जाती है।”
- “जगत अनेक रूपात्मक है और हमारा हृदय अनेक भावात्मक है।”
- “अध्यात्म शब्द की मेरी समझ में काव्य या कला के क्षेत्र में कोई ज़रूरत नहीं है। …इस आनन्द शब्द ने काव्य के महत्व को बहुत कुछ कम कर दिया है… उसे नाच-तमाशे की तरह बना दिया है।”
- “करुण रस प्रधान नाटक के दर्शकों के आँसुओं के संबंध में यह कहना कि आनंद में भी तो आँसू आते हैं, केवल बात टालना है। दर्शक वास्तव में दुख का ही अनुभव करते हैं। हृदय की मुक्त दशा में होने के कारण वह दुख भी रसात्मक होता है।”
- “जैसे वीरकर्म से पृथक वीरत्व कोई पदार्थ नहीं, वैसे ही सुंदर वस्तु से अलग सौंदर्य कोई पदार्थ नहीं।”
- “सौंदर्य न तो मात्र चेतना में होता है और न ही सिर्फ़ वस्तु में, दोनों के सम्बन्ध से ही सौंदर्यानुभूति होती है।”
- ‘विफलता में भी एक निराला विषण्ण सौंदर्य होता है।’
- रामविलास शर्मा ने सही लिखा है कि “प्राचीन साहित्यशास्त्री स्थायी भावों को रसरूप में प्रकट करके साहित्यिक प्रक्रिया का अंत निष्क्रियता में कर देते थे। शुक्ल जी ने भाव की मौलिक व्याख्या करके निष्क्रिय रस-निष्पत्ति की जड़ काट दी है।”
- रामस्वरूप चतुर्वेदी ने शुक्लजी के बारे में लिखा है, “आचार्य का विषय प्रतिपादन जैसा गुरु गम्भीर है उसके बीच उनका सूक्ष्म व्यंग्य और तीव्र तथा पैना हो गया है, घनी-बड़ी मूँछों के बीच हल्की मुस्कान की तरह।”
- “यह एक कवि ही हिन्दी को प्रौढ़ साहित्यिक भाषा सिद्ध करने के लिए काफ़ी है।” (तुलसीदास के लिए)
- “इसमें कोई सन्देह नहीं कि कबीर ने ठीक मौके पर जनता के उस बड़े भाग को सम्भाला जो नाथ पंथियों के प्रभाव से प्रेम भाव और भक्ति रस से शून्य, शुष्क पड़ता जा रहा था।”
- आचार्य शुक्ल ने अनुसार सिद्धों की उद्धृत रचनाओं की भाषा प्लीज भाषा मिश्रित अपभ्रंश या पुरानी हिंदी की काव्य भाषा है।
- ‘सूरसागर’ में जगह-जगह दृष्टिकूट वाले पद मिलते हैं। यह भी विद्यापति का अनुकरण है।
- शब्द शक्ति, रस और अलंकार ये विषय- विभाग काव्य-समीक्षा के लिए, इतने उपयोगी हैं कि इनको अंतर्भूत करके संसार की नई-पुरानी सब प्रकार की कविताओं की बहुत ही सूक्ष्म, मार्मिक और स्वच्छ आलोचना हो सकती है। (काव्य में अभिव्यंजनावाद, चिंतामणि, भाग-2)
- हमें अपने दृष्टि से दूसरे देशों के साहित्य को देखना होगा, दूसरे देशों की दृष्टि से अपने साहित्य को नहीं। (चिंतामणि- भाग 2)
- हृदय की अनुभूति ही साहित्य में ‘रस’ और ‘भाव’ कहलाती है। (चिंतामणि- भाग 2)
- हृदय के प्रभावित होने का नाम ही रसानुभूति है। (चिंतामणि- भाग 2)
- जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान दशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रस दशा कहलाती है। (रस मीमांसा)
- यह सब आलोचना अधिकतर बहिरंग बातों तक ही रही। भाषा के गुण, दोष, रस, अलंकार आदि की समीचीनता इन्हीं सब परंपरागत विषयों तक पहुँची। स्थायी साहित्य में परिणित होनेवाली समालोचना जिसमे किसी कवि की अंतर्वृत्ति का सूक्ष्म व्यवच्छेदन होता है, उसकी मानसिक प्रवृत्ति की विशेषताएँ दिखाई जाती है, बहुत कम दिखाई पड़ी। (हिंदी साहित्य का इतिहास)
- प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की शिक्षित जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरुप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अंत तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परम्परा को परखते हुए साहित्य-परम्परा के साथ उनका सामंजस्य दिखाना ही ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ कहलाता है। (हिन्दी साहित्य का इतिहास)
- इसमें कोई संदेह नहीं कि कबीर को ‘राम नाम’ रामानन्द जी से ही प्राप्त हुआ। पर आगे चलकर कबीर के ‘राम’ रामानन्द के ‘राम’ से भिन्न हो गए।
- जिस प्रकार हिन्दी गद्य की भाषा का परिष्कार किया, उसी प्रकार काव्य की ब्रज भाषा का भी।
- काव्य की पूर्ण अनुभूति के लिए कल्पना का व्यापार कवि और श्रोता दोनों के अनिवार्य है।
- “यदपि इन्होंने (दूल्ह कवि) छोटा सा अलंकार ग्रंथ लिखा परन्तु इनकी प्रसिद्धि सरस और मधुर युक्तियों के कारण है।”
- “इनमे (सोमनाथ) भावुकता व सहृदयता पूरी थी। इनकी भाषा में कृत्रिमता नहीं आने पाई। इनकी रचनाओं में अन्योक्ति एवं कल्पना की मार्मिकता परिलक्षित होती है।”
- “रीतिकालीन कवि होते हुए भी देव रीतिकाल के एक मात्र ऐसे कवि है, जिन्होंने दरबारी संस्कृति का विरोध किया।”
- “देव आचार्य और कवि दोनों रूपों में सामने आते है।”
- “प्रेमचंद्रिका, रस विलास, प्रेम पच्चीसी आदि पुस्तकों में देव बहुत उत्तम कवि के रूप में विराजमान है।”
- “रस परिपाक और व्यंग्य की दृष्टि से प्रताप साही का काव्य विशिष्ट है। प्रताप शाही के उपरांत रीतिकाल में कवित्व का चरमोत्कर्ष नहीं मिलता है।”
- ये (अमीरदास) आचार्य, भक्त तथा कवि तीनों थे।”
- “भाषा की सब प्रकार की शक्तियों पर इस (पद्माकर) कवि का अधिकार दिखाई पड़ता है।”
- हृदय के प्रभावित होने का नाम ही रसानुभूति है। (चिन्तामणि, भाग-2)
- यह सब आलोचना अधिकतर बहिरंग बातों तक ही रही। भाषा के गुण-दोष, रस, अलंकार आदि की समीचीनता इन्हीं सब परम्परागत विषयों तक पहुँचीं। स्थायी साहित्य में परिगणित होने वाली समालोचना जिसमें किसी कवि की अंतर्वृत्ति का सूक्ष्म व्यवच्छेदन होता है, उसकी मानसिक प्रवृत्ति की विशेषताएँ दिखार्इ जाती हैं, बहुत कम दिखार्इ पड़ी। (हिन्दी साहित्य का इतिहास)
- भाषा के लक्ष्य एवं व्यंजक बल की सीमा कहाँ तक है इसकी पूरी परख घनानन्द को ही थी।
- इनके दोहे क्या हैं, रस के छोटे-छोटे छींटे हैं। (बिहारी के बारे में आचार्य शुक्ल)
- आचार्य शुक्ल ने छायावाद को ‘अभिव्यंजनावाद का विलायती संस्करण माना है।
- यदि प्रबन्ध काव्य एक विस्तृत वनस्थली है, तो मुक्तक एक चुना हुआ गुलदस्ता।
- हिन्दी साहित्य में कविता के क्षेत्र में जो स्थान ‘निराला’ का रहा और उपन्यास के क्षेत्र में जो स्थान ‘प्रेमचंद’ का रहा, आलोचना के क्षेत्रा में वही स्थान ‘आचार्य रामचन्द्र शुक्ल’ का है। (आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिंदी आलोचना डॉ. रामविलास शर्मा)
- भाव उनके लिए मन की वेगयुक्त अवस्था विशेष है, प्रत्यक्ष बोध् अनुभूति और वेगयुक्त प्रवृत्ति इन तीनों के गुण संश्लेष का नाम भाव है। मुक्त हृदय मनुष्य अपनी सत्ता को लोक सत्ता में लीन किए रहता है। लोक हृदय के लीन होने की दशा का नाम रस दशा है। (रस मीमांसा)
- काव्य के सम्बन्ध में भाव और कल्पना- ये दो शब्द बराबर सुनते-सुनते कभी-कभी यह जिज्ञासा होती है कि ये दोनों समकक्ष हैं या इनमें कोर्इ प्रधान है। यह प्रश्न या इसका उत्तर ज़रा टेढ़ा है, क्योंकि रस-काल के भीतर इनका युगपद अन्योन्याश्रित व्यापार होता है। (चितांमणि, भाग-2)
- इसके लिए सूक्ष्म विश्लेषण-बुद्धि और मर्म-ग्राहिणी प्रज्ञा अपेक्षित है। (हिन्दी साहित्य का इतिहास)
- जायसी का विरह-वर्णन हिन्दी साहित्य में एक अद्वितीय वस्तु है। (जायसी ग्रंथावली)
- प्रबंध क्षेत्र में तुलसीदास का जो सर्वोच्च आसन है, उसका कारण यह है कि वीरता, प्रेम आदि जीवन का कोई एक ही पक्ष न लेकर तुलसी ने संपूर्ण जीवन को लिया है। जायसी का क्षेत्र तुलसी की अपेक्षा में परिमित है, पर प्रेम वंदना उनकी अत्यन्त गूढ़ है। (जायसी ग्रंथावली’ की भूमिका)
- यह शील और शील का, स्नेह और स्नेह का तथा नीति और नीति का मिलन है। इस मिलन के संघटित उत्कर्ष की दिव्य प्रभा देखने योग्य, यह झाँकी अपूर्व है। (गोस्वामी तुलसीदास)
- शुक्ल जी ने तुलसी और जायसी के समकक्ष ही सूरदास को माना है। यदि हम मनुष्य जीवन के संपूर्ण क्षेत्र को लेते हैं तो सूरदास की दृष्टि परिमित दिखार्इ पड़ती है, पर यदि उनके चुने हुए क्षेत्रों (श्रृंगार तथा वात्सल्य) को लेते हैं, तो उनके भीतर उनकी पहुँच का विस्तार बहुत अधिक पाते हैं। उन क्षेत्रों में इतना अंतर्दृष्टि विस्तार और किसी कवि का नहीं है। (भ्रमरगीत सार की भूमिका)
- किसी साहित्य में केवल शहर की भददी नक़ल से अपनी उन्नति या प्रगति नहीं की जा सकती। बाहर से सामग्री आए ख़ूब आए, परन्तु वह कूड़ा-करकट के रूप में न इकटठी हो जाए। उसकी कड़ी परीक्षा हो, उस पर व्यापक दृष्टि से विवेचन किया जाय, जिससे हमारे साहित्य के स्वतंत्र और व्यापक विकास में सहायता पहुँचे। (हिन्दी साहित्य का इतिहास)
- हिन्दुओं के स्वातंत्र्य के साथ वीर गाथाओं की परम्परा भी काल के अँधेरे में जा छिपी है। अंतः पर गहरी उदासी छा गयी थी …… हृदय की अन्य वृत्तियों (उत्साह आदि) के रंजनकारी रूप भी यदि वे चाहते तो कृष्ण में ही मिल जाते, पर उनकी ओर वे न बढे। भगवान के यह व्यक्त स्वरुप यद्यपि एकदेशीये थे- केवल प्रेम था- पर उस समय नैराश्य के कारण जनता के हृदय में जीवन की ओर से एक प्रकार की जो अरुची सी उत्पन्न हो रही थी उसे हटाने में वह उपयोगी हुआ।
- आध्यात्मिक रंग के चश्में आजकल बहुत सस्ते हो गए हैं। उन्हें चढ़ाकर जैसे कुछ लोगों ने ‘गीत गोविंद’ के पदों को आध्यात्मिक संकेत बताया है, वैसे ही विद्यापति के इन पदों को भी। (विद्यापति के सम्बन्ध में कहा आचार्य रामचंद्र शुक्ल
- प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की शिक्षित जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब होता है तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरुप में भी परिवर्तन होता चला जाता है| आदि से अंत तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परम्परा को परखते हुए साहित्य-परम्परा के साथ उनका सामंजस्य दिखाना ही ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ कहलाता है। (हिन्दी साहित्य का इतिहास)
- उनकी (अध्यापक पूर्णसिंह की) लाक्षणिकता हिन्दी गद्य साहित्य में नयी चीज थी।……भाषा और भाव की एक नयी विभूति उन्होंने सामने रखी।’ वक्तृत्वकला का ओज एवं प्रवाह तथा चित्रात्मकता व मूर्तिमत्ता, इनकी शैली के दो विशिष्ट गुण हैं। —– संक्षेप में अतिअल्पमात्रा में निबंधों का लेखन करते हुए भी अध्यापक पूर्णसिंह ने हिन्दी निबन्धकला के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।
- रामचन्द्र शुक्ल से सर्वत्र सहमत होना सम्भव नहीं। ….. फिर भी शुक्ल जी प्रभावित करते हैं। नया लेखक उनसे डरता है, पुराना घबराता है, पंडित सिर हिलाता है। वे पुराने की ग़ुलामी पसन्द नहीं करते और नवीन की ग़ुलामी तो उनको एकदम असह्य है। शुक्ल जी इसी बात में बड़े हैं और इसी जगह उनकी कमज़ोरी है। (आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी)
- भारतीय काव्यलोचनशास्त्र का इतना गम्भीर और स्वतंत्र विचारक हिन्दी में तो दूसरा हुआ ही नहीं, अन्यान्य भारतीय भाषाओं में भी हुआ है या नहीं, ठीक से नहीं कह सकते। शायद नहीं हुआ। (आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी, हिन्दी साहित्य की भूमिका)
- ‘‘डिंगल कवियों की वीर-गाथाएँ निर्गुनिया संतों की वाणियाँ, कृष्ण भक्त या रागानुराग भक्तिमार्ग के साधकों के पद, राम-भक्त या वैधी भक्तिमार्ग के उपासकों की कविताएँ, सूफ़ी साधना से पुष्ट मुसलमान कवियों के तथा ऐतिहासिक हिन्दू कवियों के रोमांस और रीति-काव्य। ये छहों धाराएँ अपभ्रंश कविता का स्वाभाविक विकास है।’’ (आचार्य रामचंद्र शुक्ल)
- ‘‘कालदर्शी भक्त कवि जनता के हृदय को सम्भालने और लीन रखने के लिए दबी हुई भक्ति को जगाने लगे। क्रमशः भक्ति का प्रवाह ऐसा विकसित और प्रबल होता गया कि उसकी लपेट में केवल हिन्दू जनता ही नहीं आई, देश में बसने वाले सहृदय मुसलमानों में से भी न जाने कितने आ गए।’’
- भावों का छानबीन करने पर मंगल का विधान करने वाले दो भाव ठहरते हैं- ‘करुणा’ और ‘प्रेम’।
- ‘अष्टछाप में सूरदास के पीछे इन्हीं का नाम लेना पड़ता है। इनकी रचना भी बड़ी सरस और मधुर है। इनके सम्बन्ध में यह कहावत प्रसिद्ध है कि और कवि गढ़िया नंददास जड़िया।’’
- काव्य एक अखण्ड तत्त्व या शक्ति है जिसकी गति अमर है। (आचार्य शुक्ल)
- श्रद्धा और भक्ति के रोग का नाम भक्ति है। (आचार्य शुक्ल)
- धर्म रसात्मक अनुभूति का नाम भक्ति है। (आचार्य शुक्ल)
- “अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान् की शक्ति और करुणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था?
- “भक्ति का जो सोता दक्षिण भारत की ओर से धीरे-धीरे उत्तरी भारत की ओर पहले से ही चला आ रहा था। उसे राजनीतिक परिवर्तन के कारण शून्य पड़ते हुए जनता के हृदय क्षेत्र में फैलने का लिए पूरा स्थान मिला।”
- “देश में मुसलमानों का राज्य प्रतिष्ठित हो जाने पर पौरुष से निराश जनता भक्ति की ओर अग्रसर हुई।”
C. “वर्ण्य वस्तु और वर्णन प्रणाली बहुत दिनों से एक-दूसरे से अलग कर दी गई हैं।”
D. “उत्कर्ष की ओर उन्मुख समष्टि का चैतन्य अपने ही घर से बाहर कर दिया गया।”
E. “सुंदर अर्थ की शोभा बढ़ाने में जो अलंकार प्रयुक्त नहीं वे काव्यालंकार नहीं।”
उत्तर (C, D, E)
जय हिंद