फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफाम (कहानी) भाग-1

  • उनकी (‘रेणु’) की रचनाओं में कटिहार रेलवे स्टेशन का उल्लेख मिलता है।
  • ‘रेणु’ की पहली कहानी ‘नटबावा’ 1936 ई. के साप्ताहिक पत्रिका ‘विश्वामित्र’ में छपी थी।
  • ‘मैला आँचल’ का प्रकाशन 1954 ई. में हुआ था। उसी की भूमिका में ‘रणु’ ने ‘अंचल’ और ‘आँचलिक’ शब्द का प्रयोग किया था। तब से आंचलिक को एक कथा-प्रकार के रूप में स्वीकार कर उसकी प्रभूत चर्चा हुई।
  • ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफान’ कहानी का प्रकाशन 1956 में हुआ था।
  • यह कहानी ‘ठुमरी’ कहानी संग्रह में संकलित है।
  •  इस कहानी पर फिल्म बनी जिसका संवाद लेखन का काम ‘रेणु’ जी ने किया था। इसके डायरेक्टर ‘बासु भट्टाचार्य’ और निर्माता ‘शैलेन्द्र’ थे। इसके मुख्य रोल में ‘राज कपूर’ और ‘वहीदा रहमान’ थे।
  • इस फिल्म को 1967 में सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फीचर फिल्म के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला।

इस कहानी में हिरामन तीन कसमे खाता है- 

  • पहला वह गाड़ी पर तस्करी का माल नहीं लादेगा।
  • दूसरा बाँस की लदनी नहीं करेगा और
  • तीसरी कसम यह खाता है कि वह नौटंकी की किसी नर्तकी को गाड़ी में नहीं बैठाएगा।   
  • कहानी के पात्रहीरामन- नायक, हीराबाई- नायिका
  • अन्य पात्र- पलटन दास, लालमोहर, धुन्निराम, मुनीम 

कहानी तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम: 

हिरामन गाड़ीवान की पीठ में गुदगुदी लगती है।
पिछले बीस साल से गाड़ी हाँकता है। हिरामन बैलगाड़ी सीमा के उस पार मोरंग राज नेपाल से धान और लकड़ी ढो चुका है। कंट्रोल के ज़माने में चोरबाज़ारी का माल इस पार से उस पार पहुँचाया है, लेकिन कभी तो ऐसी गुदगुदी नहीं लगी पीठ में!

कंट्रोल का ज़माना! हिरामन कभी भूल सकता है। उस ज़माने को! एक बार चार खेप सीमेंट और कपड़े की गाँठों से भरी गाड़ी जोगबानी में विराटनगर पहुँचने के बाद हिरामन का कलेजा पोख्ता हो गया था। फारबिसगंज का हर चोर-व्यापारी उसको पक्का गाड़ीवान मानता है। उसके बैलों की बड़ाई बड़ी गद्दी के बड़े सेठ जी ख़ुद करते है, अपनी भाषा में।

गाड़ी पकड़ी गई पाँचवीं बार सीमा के इस पार तराई में। महाजन का मुनीम उसी की गाड़ी पर गाँठों के बीच चुक्की-मुक्की लगा कर छिपा हुआ था। दारोगा साहब की डेढ़ हाथ लंबी चोरबत्ती की रौशनी कितनी तेज़ होती है, हिरामन जानता है। एक घंटे के लिए आदमी अंधा हो जाता है, एक छटक भी पड़ जाए चोरबत्ती आँखों पर! रौशनी के साथ कड़कती हुई आवाज ‘ऐ-य! गाड़ी रोको! साले, गोली मार देंगे?’

बीसों गाड़ियाँ एक साथ कचकचा कर रुक गईं। हिरामन ने पहले ही कहा था, ‘यह बीस विषावेगा!’ दारोगा साहब उसकी गाड़ी में दुबके हुए मुनीम जी पर रौशनी डाल कर पिशाची हँसी हँसे ‘हा-हा-हा! मुनीम जी-ई-ई-ई! ही-ही-ही! ऐ-य, साला गाड़ीवान, मुँह क्या देखता है रे-ए-ए! कंबल हटाओ। इस बोरे के मुँहवा पर से!’ हाथ की छोटी लाठी से मुनीम जी के पेट में खोंचा मारते हुए कहा था। ‘इस बोरे को! स-स्साला!’

बहुत पुरानी अखज-अदावत होगी दारोगा साहब और मुनीम जी में। नहीं तो उतना रुपया क़बूलने पर भी पुलिस-दरोगा का मन न डोले भला! चार हज़ार तो गाड़ी पर बैठा ही दे रहा है। लाठी से दूसरी बार खोंचा मारा दारोगा ने। ‘पाँच हज़ार!’ फिर खोंचा ‘उतरो पहले…’

मुनीम को गाड़ी से नीचे उतार कर दारोगा ने उसकी आँखों पर रौशनी डाल दी। फिर दो सिपाहियों के साथ सड़क से बीस-पच्चीस रस्सी दूर झाड़ी के पास ले गए। गाड़ीवान और गाड़ियों पर पाँच-पाँच बंदूकवाले सिपाहियों का पहरा! हिरामन समझ गया, इस बार निस्तार नहीं, जेल? हिरामन को जेल का डर नहीं। लेकिन उसके बैल? न जाने कितने दिनों तक बिना चारा-पानी के सरकारी फाटक में पड़े रहेंगे-भूखे-प्यासे फिर नीलाम हो जाएँगे। भैया और भौजी को वह मुँह नहीं दिखा सकेगा कभी।…नीलाम की बोली उसके कानों के पास गूँज गई-एक-दो-तीन! दारोगा और मुनीम में बात पट नहीं रही थी शायद।

हिरामन की गाड़ी के पास तैनात सिपाही ने अपनी भाषा में दूसरे सिपाही से धीमी आवाज़ में पूछा, ‘का हो? मामला गोल होखी का?’ फिर खैनी-तंबाकू देने के बहाने उस सिपाही के पास चला गया।

एक-दो-तीन! तीन-चार गाड़ियों की आड़। हिरामन ने फ़ैसला कर लिया। उसने धीरे-से अपने बैलों के गले की रस्सियाँ खोल लीं। गाड़ी पर बैठे-बैठे दोनों को जुड़वाँ बाँध दिया। गुदगुदी बैल समझ गए उन्हें क्या करना है। हिरामन उतरा, जुती हुई गाड़ी में बाँस की टिकटी लगा कर बैलों के कंधों को बेलाग किया। दोनों के कानों के पास लगा दी और मन-ही-मन बोला, ‘चलो भैयन, जान बचेगी तो ऐसी-ऐसी सग्गड़ गाड़ी बहुत मिलेगी…एक-दो-तीन! नौ-दो-ग्यारह!

गाड़ियों की आड़ में सड़क के किनारे दूर तक घनी झाड़ी फैली हुई थी। दम साध कर तीनों प्राणियों ने झाड़ी को पार किया-बेखटक, बेआहट! फिर एक ले, दो ले-दुलकी चाल! दोनों बैल सीना तान कर फिर तराई के घने जंगलों में घुस गए। राह सूँघते, नदी-नाला पार करते हुए भागे पूंछ उठा कर, पीछे-पीछे हिरामन रातभर भागते रहे थे।

तीनों जन घर पहुँच कर दो दिन तक बेसुध पड़ा रहा हिरामन। होश में आते ही उसने कान पकड़ कर कसम खाई थी। ‘अब कभी ऐसी चीजों की लदनी नहीं लादेंगे. चोरबाजारी का माल? तोबा, तोबा!…’ पता नहीं मुनीम जी का क्या हुआ! भगवान जाने उसकी सग्गड़ गाड़ी का क्या हुआ! असली इस्पात लोहे की धुरी थी। दोनों पहिए तो नहीं, एक पहिया एकदम नया था। गाड़ी में रंगीन डोरियों के फुंदने बड़े जतन से गूंथे गए थे।

दो कसमें खाई हैं उसने। एक चोरबाजारी का माल नहीं लादेंगे, दूसरी-बांस। अपने हर भाड़ेदार से वह पहले ही पूछ लेता है ‘चोरी-चमारीवाली चीज तो नहीं? और, बाँस?’ बाँस लादने के लिए पचास रुपए भी दे कोई, हिरामन की गाड़ी नहीं मिलेगी। दूसरे की गाड़ी देखे।

बाँस लदी हुई गाड़ी! गाड़ी से चार हाथ आगे बाँस का अगुआ निकला रहता है और पीछे की ओर चार हाथ पिछुआ! क़ाबू के बाहर रहती है गाड़ी हमेशा। सो बेकाबूवाली लदनी और खरैहिया। शहरवाली बात! तिस पर बाँस का अगुआ पकड़ कर चलनेवाला भाड़ेदार का महाभकुआ नौकर, लड़की-स्कूल की ओर देखने लगा। बस, मोड़ पर घोड़ागाड़ी से टक्कर हो गई। जब तक हिरामन बैलों की रस्सी खींचे, तब तक घोड़ागाड़ी की छतरी बाँस के अगुआ में फंस गई। घोड़ा-गाड़ीवाले ने तड़ातड़ चाबुक मारते हुए गाली दी थी! बाँस की लदनी ही नहीं, हिरामन ने खरैहिया शहर की लदनी भी छोड़ दी। और जब फारबिसगंज से मोरंग का भाड़ा ढोना शुरू किया तो गाड़ी ही पार! कई वर्षों तक हिरामन ने बैलों को आधीदारी पर जोता, आधा भाड़ा गाड़ीवाले का और आधा बैलवाले का हिस्स! गाड़ीवानी करो मुफ्त! आधीदारी की कमाई से बैलों के ही पेट नहीं भरते। पिछले साल ही उसने अपनी गाड़ी बनवाई है।

देवी मैया भला करें उस सरकस-कंपनी के बाघ का, पिछले साल इसी मेले में बाघगाड़ी को ढोनेवाले दोनों घोड़े मर गए। चंपानगर से फारबिसगंज मेला आने के समय सरकस-कंपनी के मैनेजर ने गाड़ीवान-पट्टी में ऐलान करके कहा ‘सौ रुपया भाड़ा मिलेगा!’ एक-दो गाड़ीवान राज़ी हुए, लेकिन उनके बैल बाघगाड़ी से दस हाथ दूर ही डर से डिकरने लगे- बां आं! रस्सी तुड़ा कर भागे। हिरामन ने अपने बैलों की पीठ सहलाते हुए कहा, ‘देखो भैयन, ऐसा मौका फिर हाथ न आएगा। यही है मौका अपनी गाड़ी बनवाने का। नहीं तो फिर आधेदारी। अरे पिंजड़े में बंद बाघ का क्या डर? मोरंग की तराई में दहाड़ते हुइ बाघों को देख चुके हो, फिर पीठ पर मैं तो हूँ…’

गाड़ीवानों के दल में तालियाँ पटपटा उठी थीं एक साथ. सभी की लाज रख ली हिरामन के बैलों ने। हुमक कर आगे बढ़ गए और बाघगाड़ी में जुट गए एक-एक करके। सिर्फ़ दाहिने बैल ने जुतने के बाद ढेर-सा पेशाब किया। हिरामन ने दो दिन तक नाक से कपड़े की पट्टी नहीं खोली थी। बड़ी गद्दी के बड़े सेठ जी की तरह नकबंधन लगाए बिना बघाइन गंध बरदास्त नहीं कर सकता कोई।

बाघगाड़ी की गाड़ीवानी की है हिरामन ने, कभी ऐसी गुदगुदी नहीं लगी पीठ में, आज रह-रह कर उसकी गाड़ी में चंपा का फूल महक उठता है। पीठ में गुदगुदी लगने पर वह अँगोछे से पीठ झाड़ लेता है।

हिरामन को लगता है, दो वर्ष से चंपानगर मेले की भगवती मैया उस पर प्रसन्न है। पिछले साल बैलगाड़ी जुट गई। नकद एक सौ रुपए भाड़े के अलावा बुताद, चाह-बिस्कुट और रास्ते-भर बंदर-भालू और जोकर का तमाशा देखा सो फोकट में!

और, इस बार यह जनानी सवारी। औरत है या चंपा का फूल! जब से गाड़ी मह-मह महक रही है।

कच्ची सड़क के एक छोटे-से खड्ड में गाड़ी का दाहिना पहिया बेमौके हिचकोला खा गया। हिरामन की गाड़ी से एक हल्की ‘सिस’ की आवाज़ आई. हिरामन ने दाहिने बैल को दुआली से पीटते हुए कहा,‘साला! क्या समझता है, बोरे की लदनी है क्या?’

‘अहा! मारो मत!’

अनदेखी औरत की आवाज़ ने हिरामन को अचरज में डाल दिया। बच्चों की बोली जैसी महीन, फेनूगिलासी बोली!

मथुरामोहन नौटंकी कंपनी में लैला बननेवाली हीराबाई का नाम किसने नहीं सुना होगा भला! लेकिन हिरामन की बात निराली है! उसने सात साल तक लगातार मेलों की लदनी लादी है, कभी नौटंकी-थियेटर या बायस्कोप सिनेमा नहीं देखा। लैला या हीराबाई का नाम भी उसने नहीं सुना कभी, देखने की क्या बात! सो मेला टूटने के पंद्रह दिन पहले आधी रात की बेला में काली ओढ़नी में लिपटी औरत को देख कर उसके मन में खटका अवश्य लगा था। बक्सा ढोनेवाले नौकर से गाड़ी-भाड़ा में मोल-मोलाई करने की कोशिश की तो ओढ़नीवाली ने सिर हिला कर मना कर दिया। हिरामन ने गाड़ी जोतते हुए नौकर से पूछा, ‘क्यों भैया, कोई चोरी चमारी का माल-वाल तो नहीं?’ हिरामन को फिर अचरज हुआ. बक्सा ढोनेवाले आदमी ने हाथ के इशारे से गाड़ी हाँकने को कहा और अँधेरे में ग़ायब हो गया। हिरामन को मेले में तंबाकू बेचनेवाली बूढ़ी की काली साड़ी की याद आई थी।

ऐसे में कोई क्या गाड़ी हाँके!

एक तो पीठ में गुदगुदी लग रही है। दूसरे रह-रह कर चंपा का फूल खिल जाता है उसकी गाड़ी में बैलों को डांटो तो ‘इस-बिस’ करने लगती है। उसकी सवारी, उसकी सवारी! औरत अकेली, तंबाकू बेचनेवाली बूढ़ी नहीं! आवाज़ सुनने के बाद वह बार-बार मुड़ कर टप्पर में एक नज़र डाल देता है, अँगोछे से पीठ झाड़ता है…भगवान जाने क्या लिखा है। इस बार उसकी क़िस्मत में! गाड़ी जब पूरब की ओर मुड़ी, एक टुकड़ा उसकी चाँदनी गाड़ी में समा गई। सवारी की नाक पर एक जुगनू जगमगा उठा। हिरामन को सबकुछ रहस्यमय-अजगुत-अजगुत-लग रहा है। सामने चंपानगर से सिंधिया गाँव तक फैला हुआ मैदान…कहीं डाकिन-पिशाचिन तो नहीं?

हिरामन की सवारी ने करवट ली। चाँदनी पूरे मुखड़े पर पड़ी तो हिरामन चीखते-चीखते रुक गया, ‘अरे बाप! ई तो परी है!’

परी की आँखें खुल गईं। हिरामन ने सामने सड़क की ओर मुँह कर लिया और बैलों को टिटकारी दी। वह जीभ को तालू से सटा कर टि-टि-टि-टि आवाज निकालता है। हिरामन की जीभ न जाने कब से सूख कर लकड़ी-जैसी हो गई थी!

‘भैया, तुम्हारा नाम क्या है?’

हू-ब-हू फेनूगिलास!…हिरामन के रोम-रोम बज उठे. मुँह से बोली नहीं निकली। उसके दोनों बैल भी कान खड़े करके इस बोली को परखते हैं।

‘मेरा नाम! …नाम मेरा है हिरामन!

उसकी सवारी मुस्कराती है…मुस्कराहट में ख़ुशबू है।

‘तब तो मीता कहूँगी, भैया नहीं. मेरा नाम भी हीरा है।’

‘इस्स!’ हिरामन को परतीत नहीं. मर्द और औरत के नाम में फ़र्क़ होता है. ‘हाँ जी, मेरा नाम भी हीराबाई है’।

कहाँ हिरामन और कहाँ हीराबाई, बहुत फ़र्क़ है!

हिरामन ने अपने बैलों को झिड़की दी, ‘कान चुनिया कर गप सुनने से ही तीस कोस मंजिल कटेगी क्या? इस बाएँ नाटे के पेट में शैतानी भरी है.’ हिरामन ने बाएँ बैल को दुआली की हल्की झड़प दी।
‘मारो मत, धीरे-धीरे चलने दो। जल्दी क्या है!’

हिरामन के सामने सवाल उपस्थित हुआ। वह क्या कह कर ‘गप’ करे हीराबाई से? ‘तोहे’ कहे या ‘अहाँ?’ उसकी भाषा में बड़ों को ‘अहाँ’ अर्थात ‘आप’ कह कर संबोधित किया जाता है, कचराही बोली में दो-चार सवाल-जवाब चल सकता है, दिल-खोल गप तो गाँव की बोली में ही की जा सकती है किसी से।

आसिन-कातिक के भोर में छा जानेवाले कुहासे से हिरामन को पुरानी चिढ़ है। बहुत बार वह सड़क भूल कर भटक चुका है, किंतु आज के भोर के इस घने कुहासे में भी वह मगन है। नदी के किनारे धन-खेतों से फूले हुए धान के पौधों की पवनिया गंध आती है। पर्व-पावन के दिन गाँव ऐसी ही सुगंध फैली रहती है। उसकी गाड़ी में फिर चंपा का फूल खिला। उस फूल में एक परी बैठी है…जै भगवती.

हिरामन ने आँख की कनखियों से देखा, उसकी सवारी…मीता…हीराबाई की आँखें गुजुर-गुजुर उसको हेर रही हैं। हिरामन के मन में कोई अजानी रागिनी बज उठी. सारी देह सिरसिरा रही है। बोला, ‘बैल को मारते हैं तो आपको बहुत बुरा लगता है?’

हीराबाई ने परख लिया, हिरामन सचमुच हीरा है।

चालीस साल का हट्टा-कट्टा, काला-कलूटा, देहाती नौजवान अपनी गाड़ी और अपने बैलों के सिवाय दुनिया की किसी और बात में विशेष दिलचस्पी नहीं लेता। घर में बड़ा भाई है, खेती करता है। बाल-बच्चे वाला आदमी है। हिरामन भाई से बढ़ कर भाभी की इज़्ज़त करता है। भाभी से डरता भी है। हिरामन की भी शादी हुई थी, बचपन में ही गौने के पहले ही दुलहिन मर गई। हिरामन को अपनी दुलहिन का चेहरा याद नहीं…दूसरी शादी? दूसरी शादी न करने के अनेक कारण हैं। भाभी की जिद, कुमारी लड़की से ही हिरामन की शादी करवाएगी। कुमारी का मतलब हुआ पाँच-सात साल की लड़की, कौन मानता है, सरधा-क़ानून? कोई लड़कीवाला दोब्याहू को अपनी लड़की गरज में पड़ने पर ही दे सकता है। भाभी उसकी तीन-सत्त करके बैठी है, सो बैठी है। भाभी के आगे भैया की भी नहीं चलती!…अब हिरामन ने तय कर लिया है, शादी नहीं करेगा। कौन बलाय मोल लेने जाए!…ब्याह करके फिर गाड़ीवानी क्या करेगा कोई! और सब कुछ छूट जाए, गाड़ीवानी नहीं छोड़ सकता हिरामन।

हीराबाई ने हिरामन के जैसा निश्छल आदमी बहुत कम देखा है। पूछा, ‘आपका घर कौन जिल्ला में पड़ता है?’ कानपुर नाम सुनते ही जो उसकी हँसी छूटी, तो बैल भड़क उठे। हिरामन हँसते समय सिर नीचा कर लेता है। हँसी बंद होने पर उसने कहा, ‘वाह रे कानपुर! तब तो नाकपुर भी होगा?’ और जब हीराबाई ने कहा कि नाकपुर भी है, तो वह हँसते-हँसते दुहरा हो गया।

‘वाह रे दुनिया! क्या-क्या नाम होता है! कानपुर, नाकपुर!’ हिरामन ने हीराबाई के कान के फूल को ग़ौर से देखा, नाक की नकछवि के नग देख कर सिहर उठा-लहू की बूँद!

हिरामन ने हीराबाई का नाम नहीं सुना कभी। नौटंकी कंपनी की औरत को वह बाईजी नहीं समझता है…कंपनी में काम करनेवाली औरतों को वह देख चुका है। सरकस कंपनी की मालकिन, अपनी दोनों जवान बेटियों के साथ बाघगाड़ी के पास आती थी, बाघ को चारा-पानी देती थी, प्यार भी करती थी। ख़ूब. हिरामन के बैलों को भी डबलरोटी-बिस्कुट खिलाया था। बड़ी बेटी ने।

हिरामन होशियार है। कुहासा छँटते ही अपनी चादर से टप्पर में परदा कर दिया ‘बस दो घंटा! उसके बाद रास्ता चलना मुश्किल है। कातिक की सुबह की धूल आप बर्दास्त न कर सकिएगा। कजरी नदी के किनारे तेगछिया के पास गाड़ी लगा देंगे। दुपहरिया काट कर…

सामने से आती हुई गाड़ी को दूर से ही देख कर वह सतर्क हो गया. लीक और बैलों पर ध्यान लगा कर बैठ गया. राह काटते हुए गाड़ीवान ने पूछा, ‘मेला टूट रहा है क्या भाई?’

हिरामन ने जवाब दिया, वह मेले की बात नहीं जानता। उसकी गाड़ी पर ‘बिदागी’ (नैहर या ससुराल जाती हुई लड़की) है. न जाने किस गाँव का नाम बता दिया हिरामन ने.
‘छतापुर-पचीरा कहाँ है?’

‘कहीं हो, यह ले कर आप क्या करिएगा?’ हिरामन अपनी चतुराई पर हँसा। परदा डाल देने पर भी पीठ में गुदगुदी लगती है।
हिरामन परदे के छेद से देखता है। हीराबाई एक दियासलाई की डिब्बी के बराबर आईने में अपने दांत देख रही है…मदनपुर मेले में एक बार बैलों को नन्हीं-चित्ती कौड़ियों की माला ख़रीद दी थी। हिरामन ने, छोटी-छोटी, नन्हीं-नन्हीं कौड़ियों की पाँत।

तेगछिया के तीनों पेड़ दूर से ही दिखलाई पड़ते हैं। हिरामन ने परदे को जरा सरकाते हुए कहा, ‘देखिए, यही है तेगछिया। दो पेड़ जटामासी बड़ है और एक उस फूल का क्या नाम है, आपके कुरते पर जैसा फूल छपा हुआ है, वैसा ही, खूब महकता है, दो कोस दूर तक गंध जाती है, उस फूल को खमीरा तंबाकू में डाल कर पीते भी हैं लोग।

‘और उस अमराई की आड़ से कई मकान दिखाई पड़ते हैं, वहाँ कोई गाँव है या मंदिर?’

हिरामन ने बीड़ी सुलगाने के पहले पूछा, ‘बीड़ी पिएं? आपको गंध तो नहीं लगेगी?…वही है नामलगर ड्योढ़ी। जिस राजा के मेले से हम लोग आ रहे हैं, उसी का दियाद-गोतिया है…जा रे जमाना!’

हिरामन ने जा रे जमाना कह कर बात को चाशनी में डाल दिया। हीराबाई ने टप्पर के परदे को तिरछे खोंस दिया. हीराबाई की दंतपंक्ति।
‘कौन ज़माना?’ ठुड्डी पर हाथ रख कर साग्रह बोली।

‘नामलगर ड्योढ़ी का जमाना! क्या था और क्या-से-क्या हो गया!’
हिरामन गप रसाने का भेद जानता है। हीराबाई बोली, ‘तुमने देखा था वह ज़माना?’

‘देखा नहीं, सुना है. राज कैसे गया, बड़ी हैफवाली कहानी है। सुनते हैं, घर में देवता ने जन्म ले लिया, कहिए भला, देवता आखिर देवता है। है या नहीं? इंदरासन छोड़ कर मिरतूभुवन में जन्म ले ले तो उसका तेज कैसे सम्हाल सकता है कोई! सूरजमुखी फूल की तरह माथे के पास तेज खिला रहता। लेकिन नजर का फेर, किसी ने नहीं पहचाना. एक बार उपलैन में लाट साहब मय लाटनी के, हवागाड़ी से आए थे। लाट ने भी नहीं, पहचाना आखिर लटनी ने. सुरजमुखी तेज देखते ही बोल उठी-ए मैन राजा साहब, सुनो, यह आदमी का बच्चा नहीं है, देवता है.’

हिरामन ने लाटनी की बोली की नकल उतारते समय ख़ूब डैम-फैट-लैट किया। हीराबाई दिल खोल कर हँसी। हँसते समय उसकी सारी देह दुलकती है।
हीराबाई ने अपनी ओढ़नी ठीक कर ली। तब हिरामन को लगा कि…लगा कि…
‘तब? उसके बाद क्या हुआ मीता?’

‘इस्स! कथा सुनने का बड़ा सौक है आपको?…लेकिन, काला आदमी, राजा क्या महाराजा भी हो जाए, रहेगा काला आदमी ही। साहेब के जैसे अक्किल कहाँ से पाएगा! हँस कर बात उड़ा दी सभी ने। तब रानी को बार-बार सपना देने लगा देवता! सेवा नहीं कर सकते तो जाने दो, नहीं, रहेंगे तुम्हारे यहाँ । इसके बाद देवता का खेल शुरू हुआ। सबसे पहले दोनों दंतार हाथी मरे, फिर घोड़ा, फिर पटपटांग…’
‘पटपटांग क्या है?’

हिरामन का मन पल-पल में बदल रहा है। मन में सतरंगा छाता धीरे-धीरे खिल रहा है, उसको लगता है….उसकी गाड़ी पर देवकुल की औरत सवार है। देवता आख़िर देवता है!
‘पटपटांग! धन-दौलत, माल-मवेसी सब साफ! देवता इंदरासन चला गया।’
हीराबाई ने ओझल होते हुए मंदिर के कँगूरे की ओर देख कर लंबी साँस ली।
‘लेकिन देवता ने जाते-जाते कहा, इस राज में कभी एक छोड़ कर दो बेटा नहीं होगा। धन हम अपने साथ ले जा रहे हैं, गुन छोड़ जाते हैं। देवता के साथ सभी देव-देवी चले गए, सिर्फ सरोसती मैया रह गई, उसी का मंदिर है।’
देसी घोड़े पर पाट के बोझ लादे हुए बनियों को आते देख कर हिरामन ने टप्पर के परदे को गिरा दिया। बैलों को ललकार कर बिदेसिया नाच का बंदनागीत गाने लगा-
‘जै मैया सरोसती, अरजी करत बानी,
हमरा पर होखू सहाई हे मैया, हमरा पर होखू सहाई!’

घोड़लद्दे बनियों से हिरामन ने हुलस कर पूछा, ‘क्या भाव पटुआ खरीदते हैं महाजन?’
लँगड़े घोड़ेवाले बनिए ने बटगमनी जवाब दिया ‘नीचे सताइस-अठाइस, ऊपर तीस. जैसा माल, वैसा भाव.’
जवान बनिए ने पूछा, ‘मेले का क्या हालचाल है, भाई? कौन नौटंकी कंपनी का खेल हो रहा है, रौता कंपनी या मथुरामोहन?’
‘मेले का हाल मेलावाला जाने?’ हिरामन ने फिर छतापुर-पचीरा का नाम लिया।
दो बाँस ऊपर आ गया था। हिरामन अपने बैलों से बात करने लगा। ‘एक कोस जमीन! जरा दम बाँध कर चलो। प्यास की बेला हो गई न! याद है, उस बार तेगछिया के पास सरकस कंपनी के जोकर और बंदर नचानेवाला साहब में झगड़ा हो गया था। जोकरवा ठीक बंदर की तरह दांत किटकिटा कर किक्रियाने लगा था, न जाने किस-किस देस-मुलुक के आदमी आते हैं!’
हिरामन ने फिर परदे के छेद से देखा, हीराबाई एक काग़ज़ के टुकड़े पर आँख गड़ा कर बैठी है। हिरामन का मन आज हल्के सुर में बंधा है। उसको तरह-तरह के गीतों की याद आती है। बीस-पच्चीस साल पहले, बिदेसिया, बलवाही, छोकरा-नाचनेवाले एक-से-एक ग़ज़ल खेमटा गाते थे। अब तो, भोंपा में भोंपू-भोंपू करके कौन गीत गाते हैं लोग! जा रे जमाना! छोकरा-नाच के गीत की याद आई हिरामन को-
‘सजनवा बैरी हो गय हमारो! सजनवा…!
अरे, चिठिया हो तो सब कोई बाँचे चिठिया हो तो…
हाय! करमवा, होय करमवा…’

गाड़ी की बल्ली पर उँगलियों से ताल दे कर गीत को काट दिया हिरामन ने. छोकरा-नाच के मनुवाँ नटुवा का मुँह हीराबाई-जैसा ही था….क़हाँ चला गया वह ज़माना? हर महीने गाँव में नाचनेवाले आते थे। हिरामन ने छोकरा-नाच के चलते अपनी भाभी की न जाने कितनी बोली-ठोली सुनी थी। भाई ने घर से निकल जाने को कहा था।
आज हिरामन पर माँ सरोसती सहाय हैं, लगता है। हीराबाई बोली, ‘वाह, कितना बढ़िया गाते हो तुम!’
हिरामन का मुँह लाल हो गया। वह सिर नीचा कर के हँसने लगा।

आज तेगछिया पर रहनेवाले महावीर स्वामी भी सहाय हैं हिरामन पर। तेगछिया के नीचे एक भी गाड़ी नहीं। हमेशा गाड़ी और गाड़ीवानों की भीड़ लगी रहती हैं। यहाँ सिर्फ़ एक साइकिल वाला बैठ कर सुस्ता रहा है। महावीर स्वामी को सुमर कर हिरामन ने गाड़ी रोकी। हीराबाई परदा हटाने लगी। हिरामन ने पहली बार आँखों से बात की हीराबाई से-साइकिलवाला इधर ही टकटकी लगा कर देख रहा है।
बैलों को खोलने के पहले बाँस की टिकटी लगा कर गाड़ी को टिका दिया। फिर साइकिलवाले की ओर बार-बार घूरते हुए पूछा, ‘कहाँ जाना है? मेला? कहाँ से आना हो रहा है? बिसनपुर से? बस, इतनी ही दूर में थसथसा कर थक गए? जा रे जवानी!’

साइकिल वाला दुबला-पतला नौजवान मिनमिना कर कुछ बोला और बीड़ी सुलगा कर उठ खड़ा हुआ। हिरामन दुनिया-भर की निगाह से बचा कर रखना चाहता है हीराबाई को। उसने चारों ओर नज़र दौड़ा कर देख लिया-कहीं कोई गाड़ी या घोड़ा नहीं।

कजरी नदी की दुबली-पतली धारा तेगछिया के पास आ कर पूरब की ओर मुड़ गई है. हीराबाई पानी में बैठी हुई भैसों और उनकी पीठ पर बैठे हुए बगुलों को देखती रही।
हिरामन बोला, ‘जाइए, घाट पर मुंह-हाथ धो आइए!’

हीराबाई गाड़ी से नीचे उतरी। हिरामन का कलेजा धड़क उठा….नहीं, नहीं! पाँव सीधे हैं, टेढ़े नहीं. लेकिन, तलुवा इतना लाल क्यों हैं? हीराबाई घाट की ओर चली गई, गाँव की बहू-बेटी की तरह सिर नीचा कर के धीरे-धीरे। कौन कहेगा कि कंपनी की औरत है!…औरत नहीं, लड़की. शायद कुमारी ही है।
हिरामन टिकटी पर टिकी गाड़ी पर बैठ गया। उसने टप्पर में झाँक  कर देखा। एक बार इधर-उधर देख कर हीराबाई के तकिए पर हाथ रख दिया। फिर तकिए पर केहुनी डाल कर झुक गया, झुकता गया। ख़ुशबू उसकी देह में समा गई। तकिए के गिलाफ़ पर कढ़े फूलों को उँगलियों से छू कर उसने सूँघा, हाय रे हाय! इतनी सुगंध! हिरामन को लगा, एक साथ पाँच चिलम गाँजा फूँक कर वह उठा है। हीराबाई के छोटे आईने में उसने अपना मुँह देखा। आंखें उसकी इतनी लाल क्यों हैं?
हीराबाई लौट कर आई तो उसने हँस कर कहा, ‘अब आप गाड़ी का पहरा दीजिए, मैं आता हूँ तुरंत।’
हिरामन ने अपना सफरी झोली से सहेजी हुई गंजी निकाली। गमछा झाड़ कर कंधे पर लिया और हाथ में बालटी लटका कर चला। उसके बैलों ने बारी-बारी से ‘हंक-हुंक’ करके कुछ कहा। हिरामन ने जाते-जाते उलट कर कहा, ‘हां, हां, प्यास सभी को लगी है। लौट कर आता हूँ तो घास दूँगा, बदमासी मत करो!’
बैलों ने कान हिलाए।
नहा-धो कर कब लौटा हिरामन, हीराबाई को नहीं मालूम। कजरी की धारा को देखते-देखते उसकी आँखों में रात की उचटी हुई नींद लौट आई थी। हिरामन पास के गाँव से जलपान के लिए दही-चूड़ा-चीनी ले आया है।
‘उठिए, नींद तोड़िए! दो मुट्ठी जलपान कर लीजिए!’
हीराबाई आँख खोल कर अचरज में पड़ गई। एक हाथ में मिट्टी के नए बरतन में दही, केले के पत्ते। दूसरे हाथ में बालटी-भर पानी। आँखों में आत्मीयतापूर्ण अनुरोध!
‘इतनी चीज़ें कहाँ से ले आए!’
‘इस गाँव का दही नामी है…चाह तो फारबिसगंज जा कर ही पाइएगा।’
हिरामन की देह की गुदगुदी मिट गई। हीराबाई ने कहा, ‘तुम भी पत्तल बिछाओ…क्यों? तुम नहीं खाओगे तो समेट कर रख लो अपनी झोली में. मैं भी नहीं खाऊँगी।’
‘इस्स!’ हिरामन लजा कर बोला, ‘अच्छी बात! आप खा लीजिए पहले!’
‘पहले-पीछे क्या? तुम भी बैठो।’
हिरामन का जी जुड़ा गया। हीराबाई ने अपने हाथ से उसका पत्तल बिछा दिया, पानी छींट दिया, चूड़ा निकाल कर दिया. इस्स! धन्न है, धन्न है! हिरामन ने देखा, भगवती मैया भोग लगा रही है। लाल होंठों पर गोरस का परस!…पहाड़ी तोते को दूध-भात खाते देखा है?
दिन ढल गया।
टप्पर में सोई हीराबाई और जमीन पर दरी बिछा कर सोए हिरामन की नींद एक ही साथ खुली।…मेले की ओर जानेवाली गाड़ियाँ तेगछिया के पास रुकी हैं। बच्चे कचर-पचर कर रहे हैं।
हिरामन हड़बड़ा कर उठा। टप्पर के अंदर झाँक कर इशारे से कहा दिन ढल गया! गाड़ी में बैलों को जोतते समय उसने गाड़ीवानों के सवालों का कोई जवाब नहीं दिया। गाड़ी हाँकते हुए बोला, ‘सिरपुर बाजार के इसपिताल की डागडरनी हैं। रोगी देखने जा रही हैं। पास ही कुड़मागाम।’
हीराबाई छत्तापुर-पचीरा का नाम भूल गई. गाड़ी जब कुछ दूर आगे बढ़ आई तो उसने हँस कर पूछा, ‘पत्तापुर-छपीरा?’
हँसते-हँसते पेट में बल पड़ जाए हिरामन के ‘पत्तापुर-छपीरा! हा-हा। वे लोग छत्तापुर-पचीरा के ही गाड़ीवान थे, उनसे कैसे कहता! ही-ही-ही!’
हीराबाई मुस्कराती हुई गाँव की ओर देखने लगी।
सड़क तेगछिया गाँव के बीच से निकलती है। गाँव के बच्चों ने परदेवाली गाड़ी देखी और तालियाँ बजा-बजा कर रटी हुई पंक्तियाँ दुहराने लगे-
‘लाली-लाली डोलिया में
लाली रे दुलहिनिया
पान खाए…!’

हिरामन हँसा. ‘…दुलहिनिया …लाली-लाली डोलिया! दुलहिनिया पान खाती है, दुलहा की पगड़ी में मुँह पोंछती है। ओ दुलहिनिया, तेगछिया गाँव के बच्चों को याद रखना। लौटती बेर गुड़ का लड्डू लेती आइयो। लाख बरिस तेरा हुलहा जीए!’…कितने दिनों का हौसला पूरा हुआ है हिरामन का! ऐसे कितने सपने देखे हैं उसने! वह अपनी दुलहिन को ले कर लौट रहा है। हर गाँव के बच्चे तालियां बजा कर गा रहे हैं। हर आँगन से झाँक कर देख रही हैं। औरतें, मर्द लोग पूछते हैं, कहाँ की गाड़ी है, कहाँ जाएगी? उसकी दुलहिन डोली का परदा थोड़ा सरका कर देखती है। और भी कितने सपने…
गाँव से बाहर निकल कर उसने कनखियों से टप्पर के अंदर देखा, हीराबाई कुछ सोच रही है। हिरामन भी किसी सोच में पड़ गया। थोड़ी देर के बाद वह गुनगुनाने लगा-
‘सजन रे झूठ मति बोलो, खुदा के पास जाना है.
नहीं हाथी, नहीं घोड़ा, नहीं गाड़ी…
वहां पैदल ही जाना है. सजन रे…

हीराबाई ने पूछा,‘क्यों मीता? तुम्हारी अपनी बोली में कोई गीत नहीं क्या?’
हिरामन अब बेखटक हीराबाई की आँखों में आँखें डाल कर बात करता है। कंपनी की औरत भी ऐसी होती है? सरकस कंपनी की मालकिन मेम थी। लेकिन हीराबाई! गाँव की बोली में गीत सुनना चाहती है। वह खुल कर मुस्कराया, ‘गाँव की बोली आप समझिएगा?’
‘हूं-ऊं-ऊं !’ हीराबाई ने गर्दन हिलाई। कान के झुमके हिल गए।
हिरामन कुछ देर तक बैलों को हाँकता रहा चुपचाप। फिर बोला, ‘गीत ज़रूर ही सुनिएगा? नहीं मानिएगा? इस्स! इतना सौक गाँव का गीत सुनने का है आपको! तब लीक छोड़ानी होगी। चालू रास्ते में कैसे गीत गा सकता है कोई!’
हिरामन ने बाएं बैल की रस्सी खींच कर दाहिने को लीक से बाहर किया और बोला, ‘हरिपुर हो कर नहीं जाएँगे तब।’
चालू लीक को काटते देख कर हिरामन की गाड़ी के पीछेवाले गाड़ीवान ने चिल्ला कर पूछा, ‘काहे हो गाड़ीवान, लीक छोड़ कर बेलीक कहाँ उधर?’
हिरामन ने हवा में दुआली घुमाते हुए जवाब दिया, ‘कहाँ है बेलीकी? वह सड़क नननपुर तो नहीं जाएगी।’ फिर अपने-आप बड़बड़ाया,‘इस मुलुक के लोगों की यही आदत बुरी है। राह चलते एक सौ जिरह करेंगे। अरे भाई, तुमको जाना है, जाओ…देहाती भुच्च सब!’

नननपुर की सड़क पर गाड़ी ला कर हिरामन ने बैलों की रस्सी ढीली कर दी। बैलों ने दुलकी चाल छोड़ कर कदमचाल पकड़ी।
हीराबाई ने देखा, सचमुच नननपुर की सड़क बड़ी सूनी है। हिरामन उसकी आँखों की बोली समझता है, ‘घबराने की बात नहीं। यह सड़क भी फारबिसगंज जाएगी, राह-घाट के लोग बहुत अच्छे हैं,…एक घड़ी रात तक हम लोग पहुँच जाएंगे।’
हीराबाई को फारबिसगंज पहुँचने की जल्दी नहीं। हिरामन पर उसको इतना भरोसा हो गया कि डर-भय की कोई बात नहीं उठती है। मन में हिरामन ने पहले जी-भर मुस्करा लिया। कौन गीत गाए वह! हीराबाई को गीत और कथा दोनों का शौक है…इस्स! महुआ घटवारिन? वह बोला, ‘अच्छा, जब आपको इतना सौक है तो सुनिए महुआ घटवारिन का गीत। इसमें गीत भी है, कथा भी है।’
…कितने दिनों के बाद भगवती ने यह हौसला भी पूरा कर दिया। जै भगवती! आज हिरामन अपने मन को खलास कर लेगा। वह हीराबाई की थमी हुई मुस्कुराहट को देखता रहा।
‘सुनिए! आज भी परमार नदी में महुआ घटवारिन के कई पुराने घाट हैं। इसी मुलुक की थी महुआ! थी तो घटवारिन, लेकिन सौ सतवंती में एक थी। उसका बाप दारू-ताड़ी पी कर दिन-रात बेहोश पड़ा रहता। उसकी सौतेली माँ साच्छात राकसनी! बहुत बड़ी नजर-चालक, रात में गांजा-दारू-अफीम चुरा कर बेचनेवाले से ले कर तरह-तरह के लोगों से उसकी जान-पहचान थी। सबसे घुट्टा-भर हेल-मेल। महुआ कुमारी थी, लेकिन काम कराते-कराते उसकी हड्डी निकाल दी थी राकसनी ने। जवान हो गई। कहीं शादी-ब्याह की बात भी नहीं चलाई। एक रात की बात सुनिए!’
हिरामन ने धीरे-धीरे गुनगुना कर गला साफ़ किया।
‘हे अ-अ-अ- सावना-भादवा के-र-उमड़ल नदिया -गे-में-मैं-यो-ओ-ओ,
मैयो गे रैनि भयावनि-हे-ए-ए-ए;
तड़का-तड़के-धड़के करेज-आ-आ मोरा
कि हमहूं जे बार-नान्ही रे-ए-ए …’

जय हिन्द

इस कहानी का अगला दूसरा भाग, भाग-2 में है।

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