फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफाम (कहानी) भाग-2

ओ माँ! सावन-भादों की उमड़ी हुई नदी, भयावनी रात, बिजली कड़कती है, मैं बारी-क्वारी नन्ही बच्ची, मेरा कलेजा धड़कता है। अकेली कैसे जाऊं घाट पर? सो भी परदेसी राही-बटोही के पैर में तेल लगाने के लिए! सत-माँ ने अपनी बज्जर-किवाड़ी बंद कर ली। आसमान में मेघ हड़बड़ा उठे और हरहरा कर बरसा होने लगी, महुआ रोने लगी। अपनी माँ को याद करके आज उसकी माँ रहती तो ऐसे दुरदिन में कलेजे से सटा कर रखती अपनी महुआ बेटी को। गे मइया, इसी दिन के लिए, यही दिखाने के लिए तुमने कोख में रखा था? महुआ अपनी माँ पर गुस्साई-क्यों वह अकेली मर गई, जी-भर कर कोसती हुई बोली।
हिरामन ने लक्ष्य किया, हीराबाई तकिए पर केहुनी गड़ा कर, गीत में मगन एकटक उसकी ओर देख रही है….खोई हुई सूरत कैसी भोली लगती है!
हिरामन ने गले में कंपकंपी पैदा की
‘हूं-ऊं-ऊं-रे डाइनियां मैयो मोरी-ई-ई,
नोनवा चटाई काहे नाहिं मारलि सौरी-घर-अ-अ.
एहि दिनवां खातिर छिनरो धिया
तेंहु पोसलि कि नेनू-दूध उगटन …
हिरामन ने दम लेते हुए पूछा, ‘भाखा भी समझती हैं कुछ या खाली गीत ही सुनती हैं?’
हीरा बोली, ‘समझती हूँ। उगटन माने उबटन-जो देह में लगाते हैं।’
हिरामन ने विस्मित हो कर कहा, ‘इस्स!’
…सो रोने-धोने से क्या होए! सौदागर ने पूरा दाम चुका दिया था महुआ का बाल पकड़ कर घसीटता हुआ नाव पर चढ़ा और माँझी को हुकुम दिया, नाव खोलो, पाल बाँधों! पालवाली नाव परवाली चिड़िया की तरह उड़ चली। रात-भर महुआ रोती-छटपटाती रही। सौदागर के नौकरों ने बहुत डराया-धमकाया-चुप रहो, नहीं तो उठा कर पानी में फेंक देंगे। बस, महुआ को बात सूझ गई। भोर का तारा मेघ की आड़ से जरा बाहर आया, फिर छिप गया। इधर महुआ भी छपाक से कूद पड़ी पानी में….सौदागर का एक नौकर महुआ को देखते ही मोहित हो गया था। महुआ की पीठ पर वह भी कूदा। उलटी धारा में तैरना खेल नहीं, सो भी भरी भादों की नदी में। महुआ असल घटवारिन की बेटी थी। मछली भी भला थकती है पानी में! सफरी मछली-जैसी फरफराती, पानी चीरती भागी चली जा रही है। और उसके पीछे सौदागर का नौकर पुकार-पुकार कर कहता है, ‘महुआ जरा थमो, तुमको पकड़ने नहीं आ रहा, तुम्हारा साथी हूँ। जिंदगी-भर साथ रहेंगे हम लोग। लेकिन…
हिरामन का बहुत प्रिय गीत है यह। महुआ घटवारिन गाते समय उसके सामने सावन-भादों की नदी उमड़ने लगती है, अमावस्या की रात और घने बादलों में रह-रह कर बिजली चमक उठती है। उसी चमक में लहरों से लड़ती हुई बारी-कुमारी महुआ की झलक उसे मिल जाती है। सफरी मछली की चाल और तेज हो जाती है। उसको लगता है, वह खुद सौदागर का नौकर है। महुआ कोई बात नहीं सुनती। परतीत करती नहीं। उलट कर देखती भी नहीं। और वह थक गया है, तैरते-तैरते। इस बार लगता है महुआ ने अपने को पकड़ा दिया। खुद ही पकड़ में आ गई है। उसने महुआ को छू लिया है, पा लिया है, उसकी थकन दूर हो गई है। पंद्रह-बीस साल तक उमड़ी हुई नदी की उलटी धारा में तैरते हुए उसके मन को किनारा मिल गया है। आनंद के आँसू कोई भी रोक नहीं मानते।
उसने हीराबाई से अपनी गीली आँखों ने की कोशिश की। किंतु हीरा तो उसके मन में बैठी न जाने कब से सब कुछ देख रही थी। हिरामन ने अपनी काँपती हुई बोली को क़ाबू में ला कर बैलों को झिड़की दी, ‘इस गीत में न जाने क्या है कि सुनते ही दोनों थसथसा जाते हैं। लगता है, सौ मन बोझ लाद दिया किसी ने।’
हीराबाई लंबी सांस लेती है। हिरामन के अंग-अंग में उमंग समा जाती है।
‘तुम तो उस्ताद हो मीता!’
‘इस्स!’
आसिन-कातिक का सूरज दो बाँस दिन रहते ही कुम्हला जाता है। सूरज डूबने से पहले ही नननपुर पहुँचना है, हिरामन अपने बैलों को समझा रहा है, ‘कदम खोल कर और कलेजा बाँध कर चलो…ए…छि…छि! बढ़के भैयन! ले-ले-ले-ए ह-य!’
नननपुर तक वह अपने बैलों को ललकारता रहा। हर ललकार के पहले वह अपने बैलों को बीती हुई बातों की याद दिलाता- ‘याद नहीं, चौधरी की बेटी की बरात में कितनी गाड़ियाँ थीं, सबको कैसे मात किया था! हाँ, वह कदम निकालो. ले-ले-ले! नननपुर से फारबिसगंज तीन कोस! दो घंटे और!’
नननपुर के हाट पर आजकल चाय भी बिकने लगी है। हिरामन अपने लोटे में चाय भर कर ले आया…कंपनी की औरत जानता है वह, सारा दिन, घड़ी-घड़ी भर में चाय पीती रहती है। चाय है या जान!
हीरा हँसते-हँसते लोट-पोट हो रही है, ‘अरे, तुमसे किसने कह दिया कि क्वारे आदमी को चाय नहीं पीनी चाहिए?’
हिरामन लजा गया। क्या बोले वह? लाज की बात। लेकिन वह भोग चुका है एक बार। सरकस कंपनी की मेम के हाथ की चाय पी कर उसने देख लिया है। बड़ी गर्म तासीर!
‘पीजिए गुरु जी!’ हीरा हंसी!
‘इस्स!’
नननपुर हाट पर ही दीया-बाती जल चुकी थी।  हिरामन ने अपना सफरी लालटेन जला कर पिछवा में लटका दिया।  आजकल शहर से पाँच कोस दूर के गाँव वाले भी अपने को शहरू समझने लगे हैं। बिना रौशनी की गाड़ी को पकड़ कर चालान कर देते हैं। बारह बखेड़ा!
‘आप मुझे गुरु जी मत कहिए।’
‘तुम मेरे उस्ताद हो। हमारे शास्तर में लिखा हुआ है, एक अच्छर सिखानेवाला भी गुरु और एक राग सिखानेवाला भी उस्ताद!’
‘इस्स! सास्तर-पुरान भी जानती हैं!…मैंने क्या सिखाया? मैं क्या…?’
हीरा हँस कर गुनगुनाने लगी,‘हे-अ-अ-अ- सावना-भादवा के-र …!’
हिरामन अचरज के मारे गूंगा हो गया…इस्स! इतना तेज़ जेहन! हू-ब-हू महुआ घटवारिन!
गाड़ी सीताधार की एक सूखी धारा की उतराई पर गड़गड़ा कर नीचे की ओर उतरी। हीराबाई ने हिरामन का कँधा धर लिया एक हाथ से। बहुत देर तक हिरामन के कँधे पर उसकी पड़ी रहीं। हिरामन ने नज़र फिरा कर कँधे पर केंद्रित करने की कोशिश की, कई बार। गाड़ी चढ़ाई पर पहुँची तो हीरा की ढीली उंगलियाँ फिर तन गईं।

सामने फारबिसगंज शहर की रोशनी झिलमिला रही है। शहर से कुछ दूर हट कर मेले की रौशनी टप्पर में लटके लालटेन की रौशनी में छाया नाचती है। आसपास…डबडबाई आँखों से, हर रौशनी सूरजमुखी फूल की तरह दिखाई पड़ती है।
फारबिसगंज तो हिरामन का घर-दुआर है!
न जाने कितनी बार वह फारबिसगंज आया है। मेले की लदनी लादी है। किसी औरत के साथ? हाँ, एक बार। उसकी भाभी जिस साल आई थी गौने में। इसी तरह तिरपाल से गाड़ी को चारों ओर से घेर कर बासा बनाया गया था।
हिरामन अपनी गाड़ी को तिरपाल से घेर रहा है, गाड़ीवान-पट्टी में। सुबह होते ही रौता नौटंकी कंपनी के मैनेजर से बात करके भरती हो जाएगी हीराबाई। परसों मेला खुल रहा है। इस बार मेले में पालचट्टी ख़ूब जमी है…बस, एक रात। आज रात-भर हिरामन की गाड़ी में रहेगी वह। हिरामन की गाड़ी में नहीं, घर में!
‘कहाँ की गाड़ी है? कौन, हिरामन! किस मेले से? किस चीज की लदनी है?’
गाँव-समाज के गाड़ीवान, एक-दूसरे को खोज कर, आसपास गाड़ी लगा कर बासा डालते हैं। अपने गाँव के लालमोहर, धुन्नीराम और पलटदास वगैरह गाड़ीवानों के दल को देख कर हिरामन अचकचा गया। उधर पलटदास टप्पर में झाँक कर भड़का। मानो बाघ पर नज़र पड़ गई। हिरामन ने इशारे से सभी को चुप किया। फिर गाड़ी की ओर कनखी मार कर फुसफुसाया ‘चुप! कंपनी की औरत है, नौटंकी कंपनी की।’
‘कंपनी की ई-ई-ई!’
‘? ?..? ?…!’
एक नहीं, अब चार हिरामन! चारों ने अचरज से एक-दूसरे को देखा। कंपनी नाम में कितना असर है! हिरामन ने लक्ष्य किया, तीनों एक साथ सटक-दम हो गए। लालमोहर ने ज़रा दूर हट कर बतियाने की इच्छा प्रकट की, इशारे से ही। हिरामन ने टप्पर की ओर मुँह करके कहा, ‘होटिल तो नहीं खुला होगा कोई, हलवाई के यहाँ से पक्की ले आवें!’
‘हिरामन, जरा इधर सुनो …मैं कुछ नहीं खाऊँगी अभी। लो, तुम खा आओ।’
‘क्या है, पैसा? इस्स!’…पैसा दे कर हिरामन ने कभी फारबिसगंज में कच्ची-पक्की नहीं खाई। उसके गांव के इतने गाड़ीवान हैं, किस दिन के लिए? वह छू नहीं सकता पैसा। उसने हीराबाई से कहा, ‘बेकार, मेला-बाजार में हुज्जत मत कीजिए। पैसा रखिए।’ मौका पा कर लालमोहर भी टप्पर के क़रीब आ गया। उसने सलाम करते हुए कहा, ‘चार आदमी के भात में दो आदमी खुसी से खा सकते हैं। बासा पर भात चढ़ा हुआ है। हें-हें-हें! हम लोग एकहि गाँव के हैं। गौंवां-गिरामिन के रहते होटिल और हलवाई के यहाँ खाएगा हिरामन?’
हिरामन ने लालमोहर का हाथ टीप दिया ‘बेसी भचर-भचर मत बको।’
गाड़ी से चार रस्सी दूर जाते-जाते धुन्नीराम ने अपने कुलबुलाते हुए दिल की बात खोल दी, ‘इस्स! तुम भी खूब हो हिरामन! उस साल कंपनी का बाघ, इस बार कंपनी की जनानी!’
हिरामन ने दबी आवाज में कहा, ‘भाई रे, यह हम लोगों के मुलुक की जनाना नहीं कि लटपट बोली सुन कर भी चुप रह जाए। एक तो पच्छिम की औरत, तिस पर कंपनी की!’
धुन्नीराम ने अपनी शंका प्रकट की, ‘लेकिन कंपनी में तो सुनते हैं पतुरिया रहती है।’
‘धत्!’ सभी ने एक साथ उसको दुरदुरा दिया, ‘कैसा आदमी है! पतुरिया रहेगी कंपनी में भला! देखो इसकी बुद्धि। सुना है, देखा तो नहीं है। कभी!’
धुन्नीराम ने अपनी ग़लती मान ली। पलटदास को बात सूझी, ‘हिरामन भाई, जनाना जात अकेली रहेगी गाड़ी पर? कुछ भी हो, जनाना आखिर जनाना ही है। कोई जरूरत ही पड़ जाए!’
यह बात सभी को अच्छी लगी। हिरामन ने कहा, ‘बात ठीक है। पलट, तुम लौट जाओ, गाड़ी के पास ही रहना। और देखो, गपशप जरा होशियारी से करना। हां!’
हिरामन की देह से अतर-गुलाब की ख़ुशबू निकलती है। हिरामन करमसांड़ है। उस बार महीनों तक उसकी देह से बघाइन गंध नहीं गई। लालमोहर ने हिरामन की गमछी सूंघ ली ‘ए-ह!’
हिरामन चलते-चलते रुक गया, ‘क्या करें लालमोहर भाई, जरा कहो तो! बड़ी जिद्द करती है, कहती है, नौटंकी देखना ही होगा।’
‘फोकट में ही?’
‘और गाँव नहीं पहुँचेगी यह बात?’
हिरामन बोला, ‘नहीं जी! एक रात नौटंकी देख कर जिंदगी-भर बोली-ठोली कौन सुने?…देसी मुर्गी विलायती चाल!’
धुन्नीराम ने पूछा, ‘फोकट में देखने पर भी तुम्हारी भौजाई बात सुनाएगी?’
लालमोहर के बासा के बगल में, एक लकड़ी की दुकान लाद कर आए हुए गाड़ीवानों का बासा है। बासा के मीर-गाड़ीवान मियांजान बूढ़े ने सफरी गुड़गुड़ी पीते हुए पूछा, ‘क्यों भाई, मीनाबाजार की लदनी लाद कर कौन आया है?’
मीनाबाज़ार! मीनाबाज़ार तो पतुरिया-पट्टी को कहते हैं…क्या बोलता है। यह बूढ़ा मियाँ? लालमोहर ने हिरामन के कान में फुसफुसा कर कहा, ‘तुम्हारी देह मह-मह-महकती है। सच!’
लहसनवां लालमोहर का नौकर-गाड़ीवान है। उम्र में सबसे छोटा है। पहली बार आया है तो क्या? बाबू-बबुआइनों के यहाँ बचपन से नौकरी कर चुका है। वह रह-रह कर वातावरण में कुछ सूँघता है, नाक सिकोड़ कर। हिरामन ने देखा, लहसनवां का चेहरा तमतम गया है। कौन आ रहा है? धड़धड़ाता हुआ? ‘कौन, पलटदास? क्या है?’
पलटदास आ कर खड़ा हो गया चुपचाप। उसका मुँह भी तमतमाया हुआ था। हिरामन ने पूछा, ‘क्या हुआ? बोलते क्यों नहीं?’
क्या जवाब दे पलटदास! हिरामन ने उसको चेतावनी दे दी थी, गपशप होशियारी से करना। वह चुपचाप गाड़ी की आसनी पर जा कर बैठ गया, हिरामन की जगह पर हीराबाई ने पूछा, ‘तुम भी हिरामन के साथ हो?’ पलटदास ने गरदन हिला कर हामी भरी। हीराबाई फिर लेट गई। …चेहरा-मोहरा और बोली-बानी देख-सुन कर, पलटदास का कलेजा कांपने लगा, न जाने क्यों. हां! रामलीला में सिया सुकुमारी इसी तरह थकी लेटी हुई थी। जै! सियावर रामचंद्र की जै! …पलटदास के मन में जै-जैकार होने लगा। वह दास-वैस्नव है, कीर्तनिया है। थकी हुई सीता महारानी के चरण टीपने की इच्छा प्रकट की उसने, हाथ की उँगलियों के इशारे से, मानो हारमोनियम की पटरियों पर नचा रहा हो। हीराबाई तमक कर बैठ गई, ‘अरे, पागल है क्या? जाओ, भागो!…’
पलटदास को लगा, ग़ुस्साई हुई कंपनी की औरत की आंखों से चिनगारी निकल रही है ‘छटक्-छटक्!’ वह भागा.
पलटदास क्या जवाब दे! वह मेला से भी भागने का उपाय सोच रहा है। बोला, ‘कुछ नहीं। हमको व्यापारी मिल गया। अभी ही टीसन जा कर माल लादना है। भात में तो अभी देर हैं। मैं लौट आता हूँ तब तक।’

खाते समय धुन्नीराम और लहसनवां ने पलटदास की टोकरी-भर निंदा की। छोटा आदमी है। कमीना है। पैसे-पैसे का हिसाब जोड़ता है। खाने-पीने के बाद लालमोहर के दल ने अपना बासा तोड़ दिया। धुन्नी और लहसनवां गाड़ी जोत कर हिरामन के बासा पर चले, गाड़ी की लीक धर कर। हिरामन ने चलते-चलते रुक कर, लालमोहर से कहा, ‘जरा मेरे इस कंधे को सूंघो तो। सूंघ कर देखो न?’
लालमोहर ने कंधा सूंघ कर आँखें मूंद लीं। मुँह से अस्फुट शब्द निकला ‘ए-ह!’
हिरामन ने कहा, ‘ज़रा-सा हाथ रखने पर इतनी ख़ुशबू!…समझे!’ लालमोहर ने हिरामन का हाथ पकड़ लिया, ‘कंधे पर हाथ रखा था, सच?…सुनो हिरामन, नौटंकी देखने का ऐसा मौक़ा फिर कभी हाथ नहीं लगेगा। हां!’
‘तुम भी देखोगे?’ लालमोहर की बत्तीसी चौराहे की रौशनी में झिलमिला उठी।
बासा पर पहुँच कर हिरामन ने देखा, टप्पर के पास खड़ा बतिया रहा है कोई, हीराबाई से. धुन्नी और लहसनवां ने एक ही साथ कहाँ, ‘कहाँ रह गए पीछे? बहुत देर से खोज रही है कंपनी…!’
हिरामन ने टप्पर के पास जा कर देखा-अरे, यह तो वही बक्सा ढोनेवाला नौकर, जो चंपानगर मेले में हीराबाई को गाड़ी पर बिठा कर अंधेरे में ग़ायब हो गया था।
‘आ गए हिरामन! अच्छी बात, इधर आओ…यह लो अपना भाड़ा और यह लो अपनी दच्छिना! पच्चीस-पच्चीस, पचास।’
हिरामन को लगा, किसी ने आसमान से धकेल कर धरती पर गिरा दिया। किसी ने क्यों, इस बक्सा ढोनेवाले आदमी ने कहाँ से आ गया? उसकी जीभ पर आई हुई बात जीभ पर ही रह गई …इस्स! दच्छिना! वह चुपचाप खड़ा रहा।
हीराबाई बोली, ‘लो पकड़ो! और सुनो, कल सुबह रौता कंपनी में आ कर मुझसे भेंट करना। पास बनवा दूँगी…बोलते क्यों नहीं?’
लालमोहर ने कहा, ‘इलाम-बकसीस दे रही है मालकिन, ले लो हिरामन!’ हिरामन ने कट कर लालमोहर की ओर देखा…बोलने का ज़रा भी ढंग नहीं इस लालमोहरा को।
धुन्नीराम की स्वगतोक्ति सभी ने सुनी, हीराबाई ने भी गाड़ी-बैल छोड़ कर नौटंकी कैसे देख सकता है, कोई गाड़ीवान, मेले में?
हिरामन ने रुपया लेते हुए कहा, ‘क्या बोलेंगे!’ उसने हसने की चेष्टा की।
कंपनी की औरत कंपनी में जा रही है। हिरामन का क्या! बक्सा ढोनेवाला रास्ता दिखाता हुआ आगे बढ़ा, ‘इधर से।’ हीराबाई जाते-जाते रुक गई। हिरामन के बैलों को संबोधित करके बोली, ‘अच्छा, मैं चली भैयन।’
बैलों ने, भैयन शब्द पर कान हिलाए।

‘भा-इ-यो, आज रात! दि रौता संगीत कंपनी के स्टेज पर! गुलबदन देखिए, गुलबदन! आपको यह जान कर खुशी होगी कि मथुरामोहन कंपनी की मशहूर एक्ट्रेस मिस हीरादेवी, जिसकी एक-एक अदा पर हजार जान फिदा हैं, इस बार हमारी कंपनी में आ गई हैं। याद रखिए, आज की रात। मिस हीरादेवी गुलबदन…!’
नौटंकीवालों के इस एलान से मेले की हर पट्टी में सरगर्मी फैल रही है…हीराबाई? मिस हीरादेवी? लैला, गुलबदन…? फिलिम एक्ट्रेस को मात करती है।
तेरी बांकी अदा पर मैं खुद हूं फिदा,
तेरी चाहत को दिलबर बयां क्या करूं!
यही ख्वाहिश है कि इ-इ-इ तू मुझको देखा करे
और दिलोजान मैं तुमको देखा करूं.
किर्र-र्र-र्र-र्र…कडड़ड़ड़डड़ड़र्र-ई-घन-घन-धड़ाम।

हर आदमी का दिल नगाड़ा हो गया है।
लालमोहर दौड़ता-हांफता बासा पर आया, ‘ऐ, ऐ हिरामन, यहाँ क्या बैठे हो, चल कर देखो जै-जैकार हो रहा है! मय बाजा-गाजा, छापी-फाहरम के साथ हीराबाई की जै-जै कर रहा हूं.’

हिरामन हड़बड़ा कर उठा। लहसनवां ने कहा, ‘धुन्नी काका, तुम बासा पर रहो, मैं भी देख आऊं।’
धुन्नी की बात कौन सुनता है। तीनों जन नौटंकी कंपनी की एलानिया पार्टी के पीछे-पीछे चलने लगे। हर नुक्कड़ पर रुक कर, बाजा बंद कर के एलान किया जाना है। एलान के हर शब्द पर हिरामन पुलक उठता है। हीराबाई का नाम,  नाम के साथ अदा-फिदा वगैरह सुन कर उसने लालमोहर की पीठ थपथपा दी, ‘धन्न है, धन्न है! है या नहीं?’
लालमोहर ने कहा, ‘अब बोलो! अब भी नौटंकी नहीं देखोगे?’ सुबह से ही धुन्नीराम और लालमोहर समझा रहे थे, समझा कर हार चुके थे, ‘कंपनी में जा कर भेंट कर आओ। जाते-जाते पुरसिस कर गई है.’ लेकिन हिरामन की बस एक बात, ‘धत्त, कौन भेंट करने जाए! कंपनी की औरत, कंपनी में गई। अब उससे क्या लेना-देना! चीन्हेगी भी नहीं!’
वह मन-ही-मन रूठा हुआ था। एलान सुनने के बाद उसने लालमोहर से कहा, ‘जरूर देखना चाहिए, क्यों लालमोहर?’
दोनों आपस में सलाह करके रौता कंपनी की ओर चले। खेमे के पास पहुँच कर हिरामन ने लालमोहर को इशारा किया, पूछताछ करने का भार लालमोहर के सिर। लालमोहर कचराही बोलना जानता है। लालमोहर ने एक काले कोटवाले से कहा, ‘बाबू साहेब, जरा सुनिए तो!’
काले कोटवाले ने नाक-भौं चढ़ा कर कहा, ‘क्या है? इधर क्यों?’
लालमोहर की कचराही बोली गड़बड़ा गई, तेवर देख कर बोला, ‘गुलगुल..नहीं-नहीं…बुल-बुल…नहीं …’
हिरामन ने झट-से सम्हाल दिया, ‘हीरादेवी किधर रहती है, बता सकते हैं?’ उस आदमी की आँखें हठात लाल हो गईं। सामने खड़े नेपाली सिपाही को पुकार कर कहा, ‘इन लोगों को क्यों आने दिया इधर?’
‘हिरामन!’…वही फेनूगिलासी आवाज़ किधर से आई? खेमे के परदे को हटा कर हीराबाई ने बुलाया, ‘यहाँ आ जाओ, अंदर!…देखो, बहादुर! इसको पहचान लो। यह मेरा हिरामन है। समझे?’
नेपाली दरबान हिरामन की ओर देख कर ज़रा मुस्कराया और चला गया। काले कोटवाले से जा कर कहा, ‘हीराबाई का आदमी है। नहीं रोकने बोला!’
लालमोहर पान ले आया नेपाली दरबान के लिए, ‘खाया जाए!’
‘इस्स! एक नहीं, पांच पास। चारों अठनिया! बोली कि जब तक मेले में हो, रोज रात में आ कर देखना। सबका खयाल रखती है। बोली कि तुम्हारे और साथी है, सभी के लिए पास ले जाओ। कंपनी की औरतों की बात निराली होती है! है या नहीं?’
लालमोहर ने लाल कागज के टुकड़ों को छू कर देखा, ‘पास! वाह रे हिरामन भाई!…लेकिन पाँच पास ले कर क्या होगा? पलटदास तो फिर पलट कर आया ही नहीं है अभी तक।’
हिरामन ने कहा, ‘जाने दो अभागे को। तकदीर में लिखा नहीं…हां, पहले गुरु कसम खानी होगी सभी को, कि गाँव-घर में यह बात एक पंछी भी न जान पाए।’
लालमोहर ने उत्तेजित हो कर कहा, ‘कौन साला बोलेगा, गाँव में जा कर? पलटा ने अगर बदनामी की तो दूसरी बार से फिर साथ नहीं लाउँगा।’
हिरामन ने अपनी थैली आज हीराबाई के जिम्मे रख दी है। मेले का क्या ठिकाना! किस्म-किस्म के पाकिटकाट लोग हर साल आते हैं। अपने साथी-संगियों का भी क्या भरोसा! हीराबाई मान गई। हिरामन के कपड़े की काली थैली को उसने अपने चमड़े के बक्स में बंद कर दिया। बक्से के ऊपर भी कपड़े का खोल और अंदर भी झलमल रेशमी अस्तर! मन का मान-अभिमान दूर हो गया।
लालमोहर और धुन्नीराम ने मिल कर हिरामन की बुद्धि की तारीफ़ की, उसके भाग्य को सराहा बार-बार। उसके भाई और भाभी की निंदा की, दबी जबान से। हिरामन के जैसा हीरा भाई मिला है, इसीलिए! कोई दूसरा भाई होता तो…
लहसनवां का मुँह लटका हुआ है। एलान सुनते-सुनते न जाने कहाँ  चला गया कि घड़ी-भर साँझ होने के बाद लौटा है। लालमोहर ने एक मालिकाना झिड़की दी है, गाली के साथ, ‘सोहदा कहीं का!’
धुन्नीराम ने चूल्हे पर खिचड़ी चढ़ाते हुए कहा, ‘पहले यह फैसला कर लो कि गाड़ी के पास कौन रहेगा!’
‘रहेगा कौन, यह लहसनवां कहां जाएगा?’
लहसनवां रो पड़ा, ‘ऐ-ए-ए मालिक, हाथ जोड़ते हैं। एक्को झलक! बस, एक झलक!’
हिरामन ने उदारतापूर्वक कहा, ‘अच्छा-अच्छा, एक झलक क्यों, एक घंटा देखना। मैं आ जाऊंगा।’


नौटंकी शुरू होने के दो घंटे पहले ही नगाड़ा बजना शुरू हो जाता है। और नगाड़ा शुरू होते ही लोग पतिंगों की तरह टूटने लगते हैं। टिकटघर के पास भीड़ देख कर हिरामन को बड़ी हँसी आई, ‘लालमोहर, उधर देख, कैसी धक्कमधुक्की कर रहे हैं लोग!’
‘हिरामन भाय!’

‘कौन, पलटदास! कहां की लदनी लाद आए?’ लालमोहर ने पराए गाँव के आदमी की तरह पूछा।
पलटदास ने हाथ मलते हुए माफ़ी मांगी, ‘कसूरबार हैं, जो सजा दो तुम लोग, सब मंजूर है। लेकिन सच्ची बात कहें कि सिया सुकुमारी…’
हिरामन के मन का पुरइन नगाड़े के ताल पर विकसित हो चुका है। बोला, ‘देखो पलटा, यह मत समझना कि गाँव-घर की जनाना है। देखो, तुम्हारे लिए भी पास दिया है, पास ले लो अपना, तमासा देखो.’
लालमोहर ने कहा, ‘लेकिन एक सर्त पर पास मिलेगा। बीच-बीच में लहसनवां को भी…’
पलटदास को कुछ बताने की ज़रूरत नहीं। वह लहसनवां से बातचीत कर आया है अभी।
लालमोहर ने दूसरी शर्त सामने रखी, ‘गाँव में अगर यह बात मालूम हुई किसी तरह…!’
‘राम-राम!’ दांत से जीभ को काटते हुए कहा पलटदास ने।

पलटदास ने बताया, ‘अठनिया फाटक इधर है!’ फाटक पर खड़े दरबान ने हाथ से पास ले कर उनके चेहरे को बारी-बारी से देखा, बोला, ‘यह तो पास है। कहां से मिला?’
अब लालमोहर की कचराही बोली सुने कोई! उसके तेवर देख कर दरबान घबरा गया, ‘मिलेगा कहां से? अपनी कंपनी से पूछ लीजिए जा कर। चार ही नहीं, देखिए एक और है।’ जेब से पाँचवा पास निकाल कर दिखाया लालमोहर ने।
एक रुपया वाले फाटक पर नेपाली दरबान खड़ा था। हिरामन ने पुकार कर कहा, ‘ए सिपाही दाजू, सुबह को ही पहचनवा दिया और अभी भूल गए?’
नेपाली दरबान बोला, ‘हीराबाई का आदमी है सब। जाने दो। पास हैं तो फिर काहे को रोकता है?’
अठनिया दर्जा!
तीनों ने ‘कपड़घर’ को अंदर से पहली बार देखा। सामने कुरसी-बेंचवाले दर्जे हैं। परदे पर राम-बन-गमन की तसवीर है। पलटदास पहचान गया। उसने हाथ जोड़ कर नमस्कार किया, परदे पर अंकित रामसिया सुकुमारी और लखनलला को। ‘जै हो, जै हो!’ पलटदास की आंखें भर आईं।

हिरामन ने कहा, ‘लालमोहर, छापी सभी खड़े हैं या चल रहे हैं?’
लालमोहर अपने बगल में बैठे दर्शकों से जान-पहचान कर चुका है। उसने कहा, ‘खेला अभी परदा के भीतर है। अभी जमिनका दे रहा है, लोग जमाने के लिए।’
पलटदास ढोलक बजाना जानता है, इसलिए नगाड़े के ताल पर गरदन हिलाता है और दियासलाई पर ताल काटता है। बीड़ी आदान-प्रदान करके हिरामन ने भी एकाध जान-पहचान कर ली। लालमोहर के परिचित आदमी ने चादर से देह ढकते हुए कहा, ‘नाच शुरू होने में अभी देर है, तब तक एक नींद ले लें…सब दर्जा से अच्छा अठनिया दर्जा। सबसे पीछे सबसे ऊँची जगह पर है। जमीन पर गरम पुआल! हे-हे! कुरसी-बेंच पर बैठ कर इस सरदी के मौसम में तमासा देखनेवाले अभी घुच-घुच कर उठेंगे चाह पीने।’
उस आदमी ने अपने संगी से कहा, ‘खेला शुरू होने पर जगा देना। नहीं-नहीं, खेला शुरू होने पर नहीं, हिरिया जब स्टेज पर उतरे, हमको जगा देना।’
हिरामन के कलेजे में जरा आँच लगी…हिरिया! बड़ा लटपटिया आदमी मालूम पड़ता है। उसने लालमोहर को आँख के इशारे से कहा, ‘इस आदमी से बतियाने की जरूरत नहीं।’
घन-घन-घन-धड़ाम! परदा उठ गया. हे-ए, हे-ए, हीराबाई शुरू में ही उतर गई स्टेज पर! कपड़घर खचमखच भर गया है। हिरामन का मुँह  अचरज में खुल गया। लालमोहर को न जाने क्यों ऐसी हँसी आ रही है। हीराबाई के गीत के हर पद पर वह हँसता है, बेवजह।
गुलबदन दरबार लगा कर बैठी है। एलान कर रही है, जो आदमी तख्तहजारा बना कर ला देगा, मुँहमांगी चीज इनाम में दी जाएगी…अजी, है कोई ऐसा फनकार, तो हो जाए तैयार, बना कर लाए तख्तहजारा-आ! किड़किड़-किर्रि-! अलबत्त नाचती है! क्या गला है!
‘मालूम है, यह आदमी कहता है कि हीराबाई पान-बीड़ी, सिगरेट-जर्दा कुछ नहीं खाती!’
‘ठीक कहता है। बड़ी नेमवाली रंडी है।’
‘कौन कहता है कि रंडी है!’
‘दांत में मिस्सी कहाँ है।’
‘पौडर से दांत धो लेती होगी।’
‘हरगिज नहीं।’
‘कौन आदमी है, बात की बेबात करता है! कंपनी की औरत को पतुरिया कहता है!’
‘तुमको बात क्यों लगी? कौन है रंडी का भड़वा? मारो साले को! मारो! तेरी…’
हो-हल्ले के बीच, हिरामन की आवाज़ कपड़घर को फाड़ रही है, ‘आओ, एक-एक की गरदन उतार लेंगे।’
लालमोहर दुलाली से पटापट पीटता जा रहा है सामने के लोगों को। पलटदास एक आदमी की छाती पर सवार है, ‘साला, सिया सुकुमारी को गाली देता है, सो भी मुसलमान हो कर?’
धुन्नीराम शुरू से ही चुप था। मारपीट शुरू होते ही वह कपड़घर से निकल कर बाहर भागा।

काले कोटवाले नौटंकी के मैनेजर नेपाली सिपाही के साथ दौड़े आए। दारोगा साहब ने हंटर से पीट-पाट शुरू की। हंटर खा कर लालमोहर तिलमिला उठा, कचराही बोली में भाषण देने लगा, ‘दारोगा साहब, मारते हैं, मारिए। कोई हर्ज नहीं। लेकिन यह पास देख लीजिए, एक पास पाकिट में भी हैं। देख सकते हैं हुजूर. टिकट नहीं, पास!…तब हम लोगों के सामने कंपनी की औरत को कोई बुरी बात करे तो कैसे छोड़ देंगे?’
कंपनी के मैनेजर की समझ में आ गई सारी बात। उसने दारोगा को समझाया, ‘हुजूर, मैं समझ गया। यह सारी बदमाशी मथुरामोहन कंपनीवालों की है। तमाशे में झगड़ा खड़ा करके कंपनी को बदनाम…’

‘नहीं हुजूर, इन लोगों को छोड़ दीजिए, हीराबाई के आदमी हैं। बेचारी की जान खतरे में हैं। हुजूर से कहा था न!’
हीराबाई का नाम सुनते ही दारोगा ने तीनों को छोड़ दिया। लेकिन तीनों की दुआली छीन ली गई। मैनेजर ने तीनों को एक रुपए वाले दरजे में कुरसी पर बिठाया, ‘आप लोग यहीं बैठिए। पान भिजवा देता हूँ।’ कपड़घर शांत हुआ और हीराबाई स्टेज पर लौट आई।
नगाड़ा फिर घनघना उठा।
थोड़ी देर बाद तीनों को एक ही साथ धुन्नीराम का खयाल हुआ, ‘अरे, धुन्नीराम कहाँ गया?’
‘मालिक, ओ मालिक!’ लहसनवां कपड़घर से बाहर चिल्ला कर पुकार रहा है, ‘ओ लालमोहर मा-लि-क…!’
लालमोहर ने तारस्वर में जवाब दिया, ‘इधर से, उधर से! एकटकिया फाटक से।’ सभी दर्शकों ने लालमोहर की ओर मुड़ कर देखा। लहसनवां को नेपाली सिपाही लालमोहर के पास ले आया। लालमोहर ने जेब से पास निकाल कर दिखा दिया। लहसनवां ने आते ही पूछा, ‘मालिक, कौन आदमी क्या बोल रहा था? बोलिए तो जरा। चेहरा दिखला दीजिए, उसकी एक झलक!’
लोगों ने लहसनवां की चौड़ी और सपाट छाती देखी। जाड़े के मौसम में भी खाली देह! …चेले-चाटी के साथ हैं ये लोग!
लालमोहर ने लहसनवां को शांत किया।
तीनों-चारों से मत पूछे कोई, नौटंकी में क्या देखा। क़िस्सा कैसे याद रहे! हिरामन को लगता था, हीराबाई शुरू से ही उसी की ओर टकटकी लगा कर देख रही है, गा रही है, नाच रही है। लालमोहर को लगता था, हीराबाई उसी की ओर देखती है। वह समझ गई है, हिरामन से भी ज़्यादा पावरवाला आदमी है लालमोहर! पलटदास क़िस्सा समझता है…क़िस्सा और क्या होगा, रमैन की ही बात। वही राम, वही सीता, वही लखनलाल और वही रावन! सिया सुकुमारी को राम जी से छीनने के लिए रावन तरह-तरह का रूप धर कर आता है। राम और सीता भी रूप बदल लेते हैं। यहाँ भी तख्त-हजारा बनानेवाला माली का बेटा राम है। गुलबदन मिया सुकुमारी है। माली के लड़के का दोस्त लखनलला है और सुलतान है रावन। धुन्नीराम को बुखार है तेज! लहसनवां को सबसे अच्छा जोकर का पार्ट लगा है…चिरैया तोंहके लेके ना जइवै नरहट के बजरिया! वह उस जोकर से दोस्ती लगाना चाहता है। नहीं लगावेगा दोस्ती, जोकर साहब?
हिरामन को एक गीत की आधी कड़ी हाथ लगी है, ‘मारे गए गुलफाम!’ कौन था यह गुलफाम? हीराबाई रोती हुई गा रही थी, ‘अजी हां, मारे गए गुलफाम!’ टिड़िड़िड़ि…बेचारा गुलफाम!
तीनों को दुआली वापस देते हुए पुलिस के सिपाही ने कहा, ‘लाठी-दुआली ले कर नाच देखने आते हो?’
दूसरे दिन मेले-भर में यह बात फैल गई, मथुरामोहन कंपनी से भाग कर आई है हीराबाई, इसलिए इस बार मथुरामोहन कंपनी नहीं आई है…उसके गुंडे आए हैं। हीराबाई भी कम नहीं। बड़ी खेलाड़ औरत है। तेरह-तेरह देहाती लठैत पाल रही है…वाह मेरी जान भी कहे तो कोई! मजाल है!
दस दिन…दिन-रात…!
दिन-भर भाड़ा ढोता हिरामन। शाम होते ही नौटंकी का नगाड़ा

बजने लगता। नगाड़े की आवाज़ सुनते ही हीराबाई की पुकार कानों के पास मंडराने लगती- भैया…मीता…हिरामन…उस्ताद गुरु जी! हमेशा कोई-न-कोई बाजा उसके मन के कोने में बजता रहता, दिन-भर। कभी हारमोनियम, कभी नगाड़ा, कभी ढोलक और कभी हीराबाई की पैजनी। उन्हीं साजों की गत पर हिरामन उठता-बैठता, चलता-फिरता। नौटंकी कंपनी के मैनेजर से ले कर परदा खींचनेवाले तक उसको पहचानते हैं…हीराबाई का आदमी है।
पलटदास हर रात नौटंकी शुरू होने के समय श्रद्धापूर्वक स्टेज को नमस्कार करता, हाथ जोड़ कर। लालमोहर, एक दिन अपनी कचराही बोली सुनाने गया था हीराबाई को। हीराबाई ने पहचाना ही नहीं। तब से उसका दिल छोटा हो गया है। उसका नौकर लहसनवां उसके हाथ से निकल गया है, नौटंकी कंपनी में भर्ती हो गया है। जोकर से उसकी दोस्ती हो गई है। दिन-भर पानी भरता है, कपड़े धोता है। कहता है, गांव में क्या है जो जाएंगे! लालमोहर उदास रहता है. धुन्नीराम घर चला गया है, बीमार हो कर।
हिरामन आज सुबह से तीन बार लदनी लाद कर स्टेशन आ चुका है. आज न जाने क्यों उसको अपनी भौजाई की याद आ रही है…धुन्नीराम ने कुछ कह तो नहीं दिया है, बुखार की झोंक में! यहीं कितना अटर-पटर बक रहा था गुलबदन, तख्त-हजारा! लहसनवां मौज में है। दिन-भर हीराबाई को देखता होगा। कल कह रहा था, हिरामन मालिक, तुम्हारे अकबाल से खूब मौज में हूँ। हीराबाई की साड़ी धोने के बाद कठौते का पानी अत्तरगुलाब हो जाता है। उसमें अपनी गमछी डुबा कर छोड़ देता हूँ। लो, सूंघोगे? हर रात, किसी-न-किसी के मुँह से सुनता है वह-हीराबाई रंडी है। कितने लोगों से लड़े वह! बिना देखे ही लोग कैसे कोई बात बोलते हैं! राजा को भी लोग पीठ-पीछे गाली देते हैं! आज वह हीराबाई से मिल कर कहेगा, नौटंकी कंपनी में रहने से बहुत बदनाम करते हैं लोग। सरकस कंपनी में क्यों नहीं काम करती? सबके सामने नाचती है, हिरामन का कलेजा दप-दप जलता रहता है उस समय. सरकस कंपनी में बाघ को…उसके पास जाने की हिम्मत कौन करेगा! सुरक्षित रहेगी हीराबाई! किधर की गाड़ी आ रही है?
‘हिरामन, ए हिरामन भाय!’ लालमोहर की बोली सुन कर हिरामन ने गरदन मोड़ कर देखा।

क्या लाद कर लाया है लालमोहर?
‘तुमको ढूंढ़ रही है हीराबाई, इस्टिसन पर। जा रही है।’ एक ही सांस में सुना गया। लालमोहर की गाड़ी पर ही आई है मेले से।
‘जा रही है? कहां? हीराबाई रेलगाड़ी से जा रही है?’
हिरामन ने गाड़ी खोल दी। मालगुदाम के चौकीदार से कहा, ‘भैया, जरा गाड़ी-बैल देखते रहिए, आ रहे हैं।’
‘उस्ताद!’ जनाना मुसाफ़िरखाने के फाटक के पास हीराबाई ओढ़नी से मुँह-हाथ ढंक कर खड़ी थी। थैली बढ़ाती हुई बोली, ‘लो! हे भगवान! भेंट हो गई, चलो, मैं तो उम्मीद खो चुकी थी। तुमसे अब भेंट नहीं हो सकेगी। मैं जा रही हूँ गुरु जी!’

बक्सा ढोनेवाला आदमी आज कोट-पतलून पहन कर बाबूसाहब बन गया है। मालिकों की तरह कुलियों को हुक़ुम दे रहा है, ‘जनाना दर्जा में चढ़ाना। अच्छा?’
हिरामन हाथ में थैली लेकर चुपचाप खड़ा रहा. कुरते के अंदर से थैली निकाल कर दी है हीराबाई ने। चिड़िया की देह की तरह गर्म है थैली।
‘गाड़ी आ रही है।’ बक्सा ढोनेवाले ने मुँह बनाते हुए हीराबाई की ओर देखा। उसके चेहरे का भाव स्पष्ट है-इतना ज़्यादा क्या है?
हीराबाई चंचल हो गई। बोली, ‘हिरामन, इधर आओ, अंदर। मैं फिर लौट कर जा रही हूँ मथुरा मोहन कंपनी में। अपने देश की कंपनी है…वनैली मेला आओगे न?’
हीराबाई ने हिरामन के कंधे पर हाथ रखा,…इस बार दाहिने कंधे पर। फिर अपनी थैली से रुपया निकालते हुए बोली,‘एक गरम चादर खरीद लेना…’
हिरामन की बोली फूटी, इतनी देर के बाद, ‘इस्स! हरदम रुपैया-पैसा! रखिए रुपैया! क्या करेंगे चादर?’
हीराबाई का हाथ रुक गया। उसने हिरामन के चेहरे को ग़ौर से देखा। फिर बोली, ‘तुम्हारा जी बहुत छोटा हो गया है। क्यों मीता? महुआ घटवारिन को सौदागर ने ख़रीद जो लिया है गुरु जी!’
गला भर आया हीराबाई का बक्सा ढोनेवाले ने बाहर से आवाज़ दी, ‘गाड़ी आ गई।’ हिरामन कमरे से बाहर निकल आया। बक्सा ढोनेवाले ने नौटंकी के जोकर जैसा मुँह बना कर कहा, ‘लाटफारम से बाहर भागो। बिना टिकट के पकड़ेगा तो तीन महीने की हवा…’
हिरामन चुपचाप फाटक से बाहर जा कर खड़ा हो गया…टीसन की बात, रेलवे का राज! नहीं तो इस बक्सा ढोनेवाले का मुँह सीधा कर देता हिरामन।

हीराबाई ठीक सामनेवाली कोठरी में चढ़ी। इस्स! इतना टान! गाड़ी में बैठ कर भी हिरामन की ओर देख रही है, टुकुर-टुकुर। लालमोहर को देख कर जी जल उठता है, हमेशा पीछे-पीछे, हरदम हिस्सादारी सूझती है।
गाड़ी ने सीटी दी। हिरामन को लगा, उसके अंदर से कोई आवाज़ निकल कर सीटी के साथ ऊपर की ओर चली गई-कू-ऊ-ऊ! इ-स्स!
छी-ई-ई-छक्क! गाड़ी हिली। हिरामन ने अपने दाहिने पैर के अंगूठे को बाएं पैर की एड़ी से कुचल लिया। कलेजे की धड़कन ठीक हो गई। हीराबाई हाथ की बैंगनी साफी से चेहरा पोंछती है। साफी हिला कर इशारा करती है…अब जाओ। आख़िरी डिब्बा गुज़रा, प्लैटफ़ॉर्म ख़ाली, सब ख़ाली खोखले…मालगाड़ी के डिब्बे! दुनिया ही ख़ाली हो गई मानो! हिरामन अपनी गाड़ी के पास लौट आया।
हिरामन ने लालमोहर से पूछा, ‘तुम कब तक लौट रहे हो गाँव?’
लालमोहर बोला, ‘अभी गाँव जा कर क्या करेंगे? यहाँ तो भाड़ा कमाने का मौका है! हीराबाई चली गई, मेला अब टूटेगा।’
‘अच्छी बात। कोई समाद देना है घर?’
लालमोहर ने हिरामन को समझाने की कोशिश की। लेकिन हिरामन ने अपनी गाड़ी गाँव की ओर जानेवाली सड़क की ओर मोड़ दी। अब मेले में क्या धरा है! खोखला मेला!
रेलवे लाइन की बगल से बैलगाड़ी की कच्ची सड़क गई है दूर तक। हिरामन कभी रेल पर नहीं चढ़ा है। उसके मन में फिर पुरानी लालसा झांकी, रेलगाड़ी पर सवार हो कर, गीत गाते हुए जगरनाथ-धाम जाने की लालसा। उलट कर अपने खाली टप्पर की ओर देखने की हिम्मत नहीं होती है। पीठ में आज भी गुदगुदी लगती है। आज भी रह-रह कर चंपा का फूल खिल उठता है, उसकी गाड़ी में. एक गीत की टूटी कड़ी पर नगाड़े का ताल कट जाता है, बार-बार!
उसने उलट कर देखा, बोरे भी नहीं, बाँस भी नहीं, बाघ भी नहीं -परी …देवी …मीता …हीरादेवी …महुआ घटवारिन – कोई नहीं। मरे हुए मुहर्तों की गूँगी आवाजें मुखर होना चाहती है। हिरामन के होंठ हिल रहे हैं। शायद वह तीसरी कसम खा रहा है-कंपनी की औरत की लदनी…
हिरामन ने हठात अपने दोनों बैलों को झिड़की दी, दुआली से मारते हुए बोला, ‘रेलवे लाइन की ओर उलट-उलट कर क्या देखते हो?’ दोनों बैलों ने क़दम खोल कर चाल पकड़ी. हिरामन गुनगुनाने लगा, ‘अजी हाँ, मारे गए गुलफाम…!

जय हिंद

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