कुछ वर्षों में पत्नी ने उन्हें एक कन्या का उपहार दिया; पर इसके उपरांत वह विश्राम और पथ्य के अभाव में प्रसूति ज्वर से पीड़ित हुई तथा उचित चिकित्सा के अभाव में डेढ़ वर्ष की बालिका छोड़कर अपने कठोर जीवन से मुक्ति पा गई । ठकुरी उसी रात आल्हा सुनाकर लौटे थे। माता की मृत्यु का उन्हें स्मरण नहीं था, वृद्ध पिता की विदा ने उनके मर्म को छेदा नहीं था; पर यौवन के प्रथम प्रहर में सारे स्नेह-बंधन तोड़ जानेवाली पत्नी ने उनके हृदय को हिला दिया। खारे आँसुओं ने आँखों का गुलाबीपन धोकर उन्हें जीवन-दर्शन के लिए स्वच्छ बनाया। पत्नी को खोकर ही ठकुरी वास्तविक पति और पिता बन सके।
घर में बालिका की उपेक्षा देखकर और उसके परिणाम की कल्पना करके वे अलगौझे पर बाध्य हुए तथा घर की व्यवस्था के लिए अपनी बूढ़ी मौसी को लिवा लाए पर कन्या की देख-रेख वे स्वयं करते थे । आल्हा ऊदल की कथा के प्रेमी पिता की बेला, विनोद के समय उनके कंधे पर चढ़ी हुई घूमती थी और काम के समय पीठ पर बँधी हुई उनके काम की निगरानी करती थी। किसी के हँसने पर ठकुरी कह देते कि जब मजदूर माँ अपने बच्चों को लेकर काम करती है, तब पिता के ऐसा करने में लजाने की कौन बात है ! बेला के लिए तो वही बाप है और वही माँ ।
बालिका जब छः-सात वर्ष की हुई, तब ठकुरी किसी काव्यप्रेमी सजातीय के सुशील, पर मातृ-पितृहीन भतीजे को ले आए और बेला की सगाई करके भावी जामाता को अपना काम-काज सिखाने लगे। भाग्य संभवतः इस देहाती कवि से रुष्ट था, इसी से शिक्षा समाप्त होते ही भावी जामाता के चेचक निकल आई। वह बच तो गया; पर एक आँख के लिए संपूर्ण सृष्टि अंधकारमय हो गई और दूसरी में इतनी ज्योति शेष रही कि ठोस संसार भाप का बादल – सा दिखाई पड़ने लगा ।
पिता ने कन्या की इच्छा जाननी चाही; पर वह हठ में महोबे की लड़ाई की उस बेला के समान निकली, जिसने पिता के बाग में लगे चंदन की चिता पर ही सती होने का प्रण किया था। बेला ने बचपन के साथी को छोड़ना नहीं चाहा और इस प्रकार ठकुरी बाबा वचन भंग के पातक से बच गए।
अब कवि ससुर, उसकी बूढ़ी मौसी, अंधा दामाद और रूपसी बेटी एक विचित्र परिवार बनाए बैठे हैं। ससुर ने जामाता को भी काव्य की पर्याप्त शिक्षा दे डाली है । ठकुरी चिकारा बजाकर भक्ति के पद गाते हैं, तब वह खंजरी पर दो उँगलियों से थपकी देकर तान सँभालता है, बूढ़ी मौसी तन्मयता के आवेश में मँजीरा झनकार देती है और भीतर काम करती हुई बेला की गति में एक थिरकन भर जाती है।
घर में एक मुर्रा भैंस, दो पछाही गायें और एक हल की खेती होने के कारण जीवन-यापन का प्रश्न विशेष समस्या नहीं उत्पन्न करता । यह विचित्र परिवार हर वर्ष माघ मेले के अवसर पर गंगा- तीर कल्पवास करके पुण्यपर्व मनाता है। इसके साथ गाँव के अन्य भक्तगण भी खिंचे चले आते हैं।
ठकुरी बाबा तो सबको अपना अतिथि बनाने को प्रस्तुत रहते हैं। पर कल्पवास में दूसरे का अन्न खाने वाले को विनिमय में अपना पुण्य फल दे देना पड़ता है, इसी से वे सब अपनी-अपनी गठरी-मुटरी में खाने-पीने का सामान लेकर घर से निकलते हैं; पर वस्तु से वस्तु का विनिमय वर्ज्य नहीं माना जाता, चाहे विनिमय वाली वस्तुओं में कितनी ही असमानता क्यों न हो। आवश्यकता और नियम के बीच में वे सरल ग्रामीण जैसा समझौता करा देते हैं, उसे देखकर हँसी आए बिना नहीं रहती। कोई गुड़ की एक डली रखकर ठकुरी बाबा से आधा सेर आटा ले जाता है, कोई चार मिर्च देकर आलू-शकरकंद का फलाहार प्राप्त कर लेता है। कोई पत्ते पर तोला भर दही रखकर कटोरा भर चावल नापता है। कोई धूप के लिए रत्ती भर घी देकर लुटिया भर दूध चाहता है।
ठकुरी बाबा को देने में एक विशेष प्रकार की आनंदानुभूति होती है, इसी से वे स्वयं पूछ-पूछकर इस विनिमय व्यापार को शिथिल होने नहीं देते। वे भावुक और विश्वासी जीव हैं। चिकारा हाथ में लेते ही उनके लिए संसार का अर्थ बदल जाता है। उनकी उदारता, सहज सौहार्द, सरल भावुकता आदि गुण ग्रामीण जीवन के लक्षण होने पर भी अब वहाँ सुलभ नहीं रहे। वास्तव में गाँव का जीवन इतना उत्पीड़ित और दुर्वह होता जा रहा है कि उसमें मनुष्यता को विकास के लिए अवकाश मिलना ही कठिन है।
सदा के समान इस वर्ष भी ठकुरी बाबा के दल में विविधता है। भोजन की व्यवस्था के लिए बालू खोदकर चूल्हे बनाती हुई लोकचिंता-रत बेटी, चिकारा, मँजीरे और डफली आदि की पृष्ठभूमि के साथ स्वप्न-दर्शन में अचल जामाता और घी की हँडिया, काशीफल आदि के बीच में बैठकर लोक और परलोक की समस्या सुलझाती हुई मौसी से ठकुरी बाबा का कुटुंब बना है। शेष मानो विभिन्न वर्गों और जातियों की सम्मिलित परिषद् है ।
एक वृद्धा ठकुराइन हैं। पति के जीवनकाल में वे परिवार में रानी की स्थिति रखती थीं, परंतु विधवा होते ही जिठौतों ने निःसंतान काकी से मत देने का अधिकार भी छीन लिया। गाँव के नाते वे ठकुरी की बुआ होती थीं, इसी से पुण्य कमाने के अवसर पर वे उन्हें साथ लाना नहीं भूलते।
दूसरी एक सहुआइन हैं, जिनके पति गाँव की तेली-बालिका को लेकर कलकत्ते में कर्तव्य पालन कर रहे हैं। विवाहिता जीवन के डबल सर्टीफिकेट के समान दो-दो बिछुए पहनकर और नाक तक खिंचे घूँघट में वधूवंश की मर्यादा को सुरक्षित रखकर वे परचून दूकान द्वारा जीवन-यापन करती हैं।
हर माघ में वे अपने दो किशोर बालकों के साथ आकर कल्पवास की कठोरता सहती हैं और कमर तक जल में खड़ी होकर भावी जन्मों में साहुजी को पाने का वरदान माँगती हैं। पति ने उनका इहलोक बिगाड़ दिया है; पर अब उसके अतिरिक्त किसी और की कामना करके वे परलोक नहीं बिगाड़ना चाहतीं ।
तीसरा एक विधुर काछी है। किसी के खेत के टुकड़े में कुछ तरकारी बो कर, किसी की आम की बगिया की रखवाली करके अपना निर्वाह करता है। उसकी घरवाली तीन पुत्रियों की भेंट दे चुकी थी। चौथा पुत्र- उपहार देने के अवसर पर वह संसार के सभी आदान-प्रदानों में छुट्टी पा गई। रात-दिन कठोर परिश्रम करके भी उसे प्रायः भूखा सोना पड़ता था। चौथी बार पुत्र जन्म के उपरांत घर में थोड़ा चावल ही मिल सका। बड़ी लड़की ने उसी का भात चढ़ा दिया। भात यदि माँ खा लेती, तो बच्चे भूखे सोते, इसी से उसने चावल पसाकर माड स्वयं पी लिया और भात उनके लिए रख दिया। उसी रात वह सन्निपात – ग्रस्त हुई और तीसरे दिन नवजात पुत्र के साथ ही उसके जीवन की कठिन तपस्या समाप्त हो गई।
पिछले वर्ष काछी आम के पेड़ पर से गिर पड़ा, तब से न वह सीधा खड़ा हो सकता है और न कठिन परिश्रम के योग्य है। दोनों किशोरी बालिकाएँ कभी सहुआइन भौजी के कंडे पाथकर, कभी पंडिताइन का घर लीपकर कुछ पा जाती हैं; पर छोटी बालिका पिता के गले की फाँसी हो रही है। ठकुरी बाबा के भरोसे ही वह अपनी तीन जीवों की सृष्टि लेकर कल्पवास करने आता है; पर गंगा माई से वह माँगता क्या है, इसका अनुमान लगाना कठिन है।
चौथे ब्राह्मण-दंपति हैं। गँवई -गाँव की यजमानी वह कामधेनु नहीं है कि पंडितजी महंती माँग लेते; पर कहीं कथा बाँचकर और कहीं पुरोहिती करके वे आजीविका का प्रश्न हल कर लेते हैं। विधाता ने जाने कैसा षड्यंत्र रचकर उन्हें पुं नामक नरक से उबारने वाले को अवतार नहीं लेने दिया । पर पंडितजी अपनी स्तुतियों द्वारा गंगा को गद्गद करके बेचारे चित्रगुप्त का लेखा-जोखा व्यर्थ कर देना चाहते हैं।
पंडिताइन भी अच्छी हैं; पर संतान के लिए इतनी लम्बी प्रतीक्षा ने उनकी आशा के माधुर्य में वैसी ही खटाई उत्पन्न कर दी है, जैसी देर से रखे हुए दूध के फट जाने पर स्वाभाविक है।
पति के पूजा-पाठ का खटराग पंडिताइन को फूटी आँख नहीं सुहाता इसी से वह कभी चंदन का मुठिया नाज में गाड़ देती है, कभी सुमिरनी मोखे में छिपा आती है और कभी पोथी – पत्रा अपनी पिटारी में बंद कर रखती है।
एक ममेरी विधवा बहिन का देहांत हो जाने पर पंडित, बालक भांजे को आश्रय देने के लिए बाध्य हो गए। तब से वही महाभारत की द्रौपदी बन गया है। उससे पुत्र का अभाव भरने के स्थान में और अधिक रिक्त होता जा रहा है। अपना होता तो कहना मानता; अपना रक्त होता, तो अपनी ममता करता, आदि का अर्थ बालक की अबोधता देखकर समझ में नहीं आता। वह बेचारा इन सिद्धांत – वाक्यों को केवल चकित, विस्मित भाव से सुनता रहता है, क्योंकि अपने-पराये की परिभाषा अभी तक उसने सीखी ही नहीं है। जैसा वह माँ के जीवनकाल में था, वैसा ही आज भी है। अब अचानक वह मामी को इतना क्रोधित कैसे कर देता है, यह प्रश्न उसके मन को जब मथ डालता है, तब वह फूट-फूटकर रो उठता है ।
इस विचित्र साम्राज्य के साथ मैंने माघ का महीना भर बिताया, अतः इतने दिनों के संस्मरण कुछ कम नहीं हैं; पर इनमें एक संध्या मेरे लिए विशेष महत्त्व रखती है।
मैं अधिक रात गए तक पढ़ती रहती थी, इसी से मेरा वह अतिथि वर्ग भजन कीर्तन के लिए दूसरे कल्पवासियों की मंडली में जा बैठता था। एक दिन ठकुरी बाबा ने स्नेह-भरी शिष्टता के साथ कहा कि एक बार अपनी कुटी में भी भजन हो तो अच्छा है। मैं कोलाहल से दूर रहती हूँ, इसी से भजन-कीर्तन में सम्मिलित होना भी मेरे लिए सहज नहीं होता; पर उस दिन संभवतः कुतूहलवश ही मैंने उनका निमंत्रण स्वीकार कर लिया। दिन निश्चित हो गया।
माघी पूर्णिमा के पहले आने वाली त्रयोदशी रही होगी। सवेरे कुछ मेघखंड आकाश में एकत्र हो गए थे; पर संध्या की सुनहली आभा के खर प्रवाह में वे धारा में पड़े नीले कमलों के समान बहकर किसी अज्ञात कूल से जा लगे । संध्या-स्नान और गंगा में दीपदान करके वे सब कुटी के बरामदे में और बाहर बालू पर एकत्र हो गए।
पंडितजी ने पूजा के लिए एक छोटे गमले में मिट्टी भर कर तुलसी रोप दी थी। उसी को बीच में स्थापित करके बालू का एक छोटा-सा चबूतरा बनाया गया।
फिर बूढ़ी मौसी के पिटारे में रखी हुई द्वारकाधीश की ताम्रमयी छाप, पंडितजी की रंगीन काठ की डिबिया के बंदी शालग्राम, ठकुराइन बुआ के चाँदी की जलहरी में विराजमान महादेवजी, ठकुरी बाबा का पुराने फ्रेम और टूटे शीशे में जड़ा हुआ रामपंचायतन का चित्र, सूर के हाथ में लड्डू लिए पीतल के बालमुकुंद और सहुआइन भौजी के पास पति की स्मृति के रूप में रखे हुए मिट्टी के गणेश सब उसी चबूतरे पर प्रतिष्ठित हो गए। जान पड़ता था, भक्तों ने अपने देवताओं को सम्मेलन के लिए बाध्य कर दिया है।
बैठने में भी व्यवस्था की कमी नहीं दिखाई दी। खुले बरामदे में मेरे लिए आसन बिछा था। दाहिनी ओर दोनों बूढ़ियाँ और कुछ हटकर सहुआइन और पंडिताइन बैठी थीं। बाईं ओर बच्चों की पंक्ति थी, जिसे सर्दी से बचाने के लिए सहुआइन ने अपनी दुसूती चादर खोलकर ओढ़ा दी थी, देवताओं के सामने पंडितजी पुरानी पोथी खोले विराजमान थे। उनसे कुछ हटकर ठकुरी बाबा चिकारे की खूँटी ऐंठ रहे थे और उनके गीत की हर कड़ी ठीक-ठीक सुनने के लिए सटकर बैठा हुआ जामाता गोद में रखी खँजड़ी पर ममता से उँगलियाँ फेर रहा था। काछी काका इन दोनों से कुछ दूर फटी चादर में सिकुड़े हुए थे। झुकी हुई पीठ के कारण जान पड़ता था, मानो बालू के कणों में कुछ पढ़ रहे हैं। दस-पाँच और ऐसे ही कल्पवासी आ गए थे। धूप लाना, आरती के लिए फूल – बत्ती बनाना, घी निकालना आदि काम बेला के जिम्मे थे, अतः वह फिरकनी के समान इधर-उधर नाच रही थी।
भक्तों ने, ‘तुलसा महारानी नमो-नमो’ गाया और पंडितजी ने पूजा का विधान समाप्त किया। तब ताँबे के पंचपात्र और आचमनी से गंगाजल और तुलसीदल बाँटा गया। गंगाजल भक्त मंडली पर छिड़क कर पंडित देवता ने कुछ शुद्ध, कुछ अशुद्ध संस्कृत में गंगा के माहात्म का पाठ किया। फिर उच्च स्वर से रामायण का वह अवतरण गाया, जिसमें श्रीराम-जानकी-लक्ष्मण गंगा पार करते हैं। श्रोतागणों को वह अवतरण कंठस्थ होने के कारण कथावाचक का स्वर अन्य स्वरों की समष्टि में डूबकर अपना बेसुरापन छिपा सका।
तब गौरी-गणेश की वंदना से गीत- सम्मेलन आरंभ हुआ। यह कहना कठिन होगा कि उनमें कौन सुंदर गाता था; पर यह तो स्वीकार करना ही होगा कि सभी के गीत तन्मयता के संचार में एक-से प्रभविष्णु थे।
कबीर, सूर, तुलसी जैसे महान् कवियों से लेकर अज्ञातनामा ग्रामीण तुक्कड़ों तक के पद उन्हें स्मरण थे। एक जो कड़ी गाता था, उसे सबका समवेत स्वर दोहरा देता था ! दबे पाँव तट तक आकर फिर खिलखिलाती हुई-सी लौटनेवाली लहरें मानो अविराम ताल दे रही थीं।
गायकों में क्रम था और गीतों में गाने वालों की अवस्था के अनुसार विविधता। सबसे पहले दो बूढ़ियों ने गाया। ठकुरी बाबा की मौसी ने ‘सो ठाढ़े दोउ भइया सुरसरि तीर। ऐही पार से लखन पुकारै केवट लाओ नइया सुरसरि तीर।’ गाकर बनवासी राम का जो मार्मिक चित्र उपस्थित किया, उसी की प्रतिकृति ठकुराइन की ‘दखिन दिसया हेरें भरत सकारे, आजु अवइया मोरे राम पियारे ! दिवस गिनत मोरी पोरें खियानी, मग जोवत थाके नैन के तारे!’ आदि पंक्तियों में मिली साँस भर आने के कारण रुक-रुककर गाए हुए गीत मानो हृदय के रस से भीगकर भारी हो गए थे। पंडिताइन के ‘कहन लागे मोहन मइया मइया’ में यदि भाव का विस्तार था, तो सहुआइन के ‘चले गए गोकुल से बलवीरा चले गए… बिलखत ग्वाल बिसूरति गौएँ तलफत जमना-नीरा चले गए।’ में अभाव की गहराई। ‘सुनाए बिना गुजर न होई’ कह कहकर गवाए हुए काछी काका के, ‘मन मगन भया तब क्या बोले’ में यदि तन्मयता की सिद्धि थी, तो अंधे युवक के ‘सुधि ना बिसरै मोहि श्याम तुम्हारे दरसन की’ में स्मृति की साधना। ठकुरी बाबा ने खाँस-खाँसकर कंठ साफ करने के उपरांत आँख मूँद कर गाया-
खेले लागे अँगना में कुँवर कन्हइया हो !
बोले लागे ‘मइया नीकी खोटो बलभइया हो’ !
खटरस भोग उनहिं नहिं भावै रामा,
मइया माखन रोटी खवावै लै बलइया हो ।
साला दुसाला मनहिं नहिं भावै रामा,
हसिके कारी कमरी उढ़ावै उनकर मइया हो !
लैके भौरा चकई खेलन नहिं जावे रामा,
माँगे ‘देदे लकुटी मैं घेरि लावौं गइया हो’ ?
कृष्ण के जीवन में साधारण व्यक्तियों को इतना अपनापन मिलता है, इस प्रश्न का जो उत्तर उस दिन सहज ही मिल गया, उसका अन्यत्र मिलना कठिन होगा।
स्वर, रेखाएँ और रंग भी प्रत्यक्ष कर सकते हैं, यह उनकी गीत – लहरी की चित्रमयता से प्रत्यक्ष हो गया।
बूढ़े से बालक तक सब को एक ही स्पन्दन, एक ही पुलक और एक ही भाव बाँधे हुआ था।
कितनी देर तक उन्होंने क्या-क्या गाया, यह बताना संभव नहीं; क्योंकि जब अंतिम आरती ने इस सम्मेलन की समाप्ति की सूचना दी, तब मैं मानो नींद से जागी।
थोड़ी देर में, सब बरामदे में अपना-अपना बिछौना ठीक करके लेट गए, किंतु मैं अपनी कोठरी में पीतल की दीवट में जलते हुए दीये के सामने बैठकर कुछ सोचती रह गई।
सहुआइन ने पहले बाहर से झाँका, फिर एक पैर भीतर रखकर विनीत भाव से जो कहा, उसका आशय था कि अब दीये को विदा कर देना चाहिए, उसकी माँ राह देखती होगी।
हँसी मेरे ओठों तक आकर रुक गई। जब इनके लिए सब कुछ सजीव है, तब ये दीपक की माँ की और उसकी प्रतीक्षा की कल्पना क्यों न करें! बुझाए देती हूँ, कहने पर सहुआइन ने आगे बढ़कर आँचल की हवा से उसे बुझा दिया। बेचारी को भय था कि मैं शहराती शिष्टाचार हीनता के कारण कहीं फूँक से ही न बुझा बैठूं।
कितनी देर तक मैं अंधकार में बैठकर सोचती रही, यह स्मरण नहीं; पर जब मैं कुटी के बाहर आकर खड़ी हुई, तब रात ढल रही थी। निस्तब्धता से भीगी चाँदनी हल्की सफेद रेशमी चादर की तरह लहरों में सिमटी और बालू में फैली हुई थी।
मेरी पर्णकुटी के बरामदे चाँदनी से घुल गए थे उनमें ठंडी जमीन चादर, पुआल आदि पर जो सृष्टि सो रही थी, उसके बाह्य रूप और हृदय में इतना अंतर क्यों है, यही मैं बार-बार सोच रही थी। उनके हृदय का संस्कार, उनकी स्वाभाविक शिष्टता, उनकी रस- विदग्धता, उनकी कर्मठता आदि का क्या इतना कम मूल्य है कि उन्हें जीवन-यापन की साधारण सुविधाएँ तक दुर्लभ हो जावें।
उन मानव-हृदयों में उमड़ते हुए भाव- समुद्र की जो स्पर्श मधुर तरंग मुझे छू भर गई थी, उसी की स्मृति मेरे मानस-तट पर न जाने कितने विरोधी चित्र आँकने लगी।
कितने ही विराट् कवि सम्मेलन, कितनी ही अखिल भारतीय कवि-गोष्ठियाँ मेरी स्मृति के धरोहर हैं। मन ने कहा- खोजो तो उनमें कोई इससे मिलता हुआ चित्र – और बुद्धि प्रयास में थकने लगी।
सजे हाल, ऊँचे मंच, माला- विभूषित सभापति मेरी स्मृति में उदय हो आए। उनके इधर-उधर देवदूतों के समान विराजमान कविगण रूप और मूल्य दोनों में अपूर्ण थे। कोई फर्स्ट क्लास का किराया लेकर थर्ड की शोभा बढ़ाता हुआ आया था। कोई अपने कार्यवश पहले ही से उस नगर में उपस्थित था; पर थोड़ा समय वहाँ बिताने के लिए इतनी फीस चाहता था, जिसमें आना-जाना और आवश्यक कार्य-संपन्न होने के उपरांत भी कुछ बच सके। किसी ने अपने काव्य की महार्घता बढ़ाने के लिए ही अपनी गलेबाजी का चौगुना मूल्य निश्चित किया था।
मूल्य से जो महत्ता नहीं व्यक्त हो सकी, वह वेश-भूषा में प्रत्यक्ष थी। किसी के नए सिले सूट की अँगरेजियत, ताम्बूलराग की स्वदेशीयता में रंजित होकर निखर उठी थी। किसी का चीनांशुक का लहराता हुआ भारतीय परिधान, सिगरेट की धूमलेखाओं में उलझकर रहस्यमय हो रहा था। किसी के सिर के बड़े बाल अमामी से संगमूसा के चमकीले फर्श की भ्रांति उत्पन्न करते थे। किसी की सिल्की शैंपू से धुली सीधी लटों का कृत्रिम कुंचन विधाता पर मनुष्य की विजय की घोषणा करता था।
कुछ प्राचीनवादियों की कभी निर्निमेष खुली आँखें और कभी मिलित पलकें प्रकट करती थीं कि काव्य-रस में विश्वास न होने के कारण उन्हें विजया से सहायता माँगनी पड़ी है।
इन आश्चर्य- पुत्रों के सामने श्रोतागणों की जो समष्टि थी, वह मानो उनके चमत्कारवाद की परीक्षा लेने के लिए ही एकत्र हुई थी !
कचहरी में गवाही की पुकार के समान नामों की पुकार होती थी। कवियों में कोई मुस्कराता, कोई लजाता, कोई आत्म-विश्वास से छाती फुलाता हुआ आगे आता। कोई पंचम, कोई षड्ज, कोई गांधार और कोई सब स्वरों के अभाव में एक सानुनासिकता के साथ कलाबाजियों में काव्य को उलझा उलझाकर श्रोताओं के सामने उपस्थित करता और ‘वाह वाह’ के लिए सब ओर गर्दन घुमाता ।
उनके इतने करतब पर भी दर्शक चमत्कृत होना नहीं जानते थे। कहीं से आवाज आती- कंठ अच्छा नहीं है। कोई बोल उठता-भाव भी बताते जाइए। किसी ओर से सुनाई पड़ता- बैठ जाइए। कोई धृष्ट श्रोता कवि से किसी उच्छृंखल शृंगारमयी रचना को सुनाने की फरमाइश करके महिलाओं की पलकों का झुकना देखता ।
कवि भी हार न मानने की शपथ लेकर बैठते हैं। ‘वह नहीं सुनना चाहते तो इसे सुनिए, यह मेरी नवीनतम कृति है, ध्यान से सुनिए’ आदि-आदि कहकर वे पंडों की तरह पीछे पड़ जाते हैं। दोनों ओर से कोई भी न अपनी हार स्वीकार करने को प्रस्तुत होता है और न दूसरे को हराने का निश्चय बदलना चाहता है।
कभी-कभी आठ-आठ घंटे तक यह कवायद चलती रहती है; पर इतने दीर्घ समय में ऐसे कुछ क्षण भी निकालना कठिन होगा, जिसमें कवि का भाव श्रोता में अपनी प्रतिध्वनि जगा सका हो और दोनों पक्ष, बाजीगर और तमाशबीन का स्वाँग छोड़कर काव्यानंद में एकत्व प्राप्त कर सके हों। कवि कहेगा ही क्या; यदि उसकी इकाई सबकी इकाई बनकर अनेकता नहीं पा सकी और श्रोता सुनेंगे ही क्या, यदि उन सबकी विभिन्नताएँ कवि में एक नहीं हो सकीं।
जब यह समारोह समाप्त हो जाता है, तब सुनानेवाले निराश और सुननेवाले थके हुए-से लौटते हैं। उन पर काव्य का सात्विक प्रभाव कितना कम रहता है, इसे समझने के लिए उन सम्मेलनों का स्मरण पर्याप्त होगा, जिनसे लौटनेवालों में कतिपय व्यक्ति संगीत – व्यवसायिनियों के गान से मन बहलाने में नहीं हिचकते ।
भाव यदि मनुष्य की क्षुद्रता, दुर्भावना और विकृतियाँ नहीं बहा पाता, तब वह उसकी दुर्बलता बन जाता है। इसी से स्नेह, करुणा आदि के भाव हृदय की शक्ति बन सकते हैं और द्वेष, क्रोध के दुर्भाव उसे और अधिक दुर्बल स्थिति में छोड़ जाते हैं ।
ग्रामीण समाज अपने रस-समुद्र में व्यक्तिगत भेदबुद्धि और दुर्बलताएँ सहज ही डुबा देता है, इसी से इस भावस्नान के उपरांत वह अधिक स्वस्थ रूप प्राप्त कर सकता है।
हमारे सभ्यता- दर्पित शिष्ट समाज का काव्यानंद छिछला और उसका लक्ष्य सस्ता मनोरंजन मात्र रहता है, इसी से उसमें सम्मिलित होने वालों की भेदबुद्धि एक दूसरे को नीचा दिखलाने के प्रयत्न और वैयक्तिक विषमताएँ और अधिक विस्तार पा लेती हैं। एक वह हिंडोला है, जिसमें ऊँचाई – नीचाई का स्पर्श भी एक आत्मविस्मृति में विश्राम देता है। दूसरा वह दंगल का मैदान है जिसका सम धरातल भी हार-जीत के दाँव-पेंचों के कारण सतर्कता की श्रांति उत्पन्न करता है।
अपने इन सम्मेलनों की व्यर्थता का मुझे ज्ञान था; पर उसमें कदर्थन की अनुभूति उसी दिन सुलभ हो सकी। इसके कुछ वर्षों के उपरांत तो वह स्थिति इतनी दुर्वह हो उठी कि मुझे शिष्ट सम्मेलनों से विदा ही लेनी पड़ी।
ख्याति के मध्याह्न में कवि के लिए, अपने प्रशंसकों और अपने बीच में ऐसा दुर्भे परदा डाल लेना सहज नहीं होता। उस सरल जीवन की सात्विकता ने यदि दूसरे पक्ष की कृत्रिमता; इतनी कठिन रेखाओं में न आँक दी होती, तो मेरा विद्रोह इतना तीव्र न हो पाता । विशेषतः ऐसा करना तब और भी कठिन हो जाता है, जब आडंबर के साथ अर्थ भी उपस्थित हो, क्योंकि अर्थ ही इस युग का देवता है ।
कवि अपनी श्रोता-मंडली में किन गुणों को अनिवार्य समझता है यह प्रश्न आज नहीं उठता; पर अर्थ की किस सीमा पर वह अपने सिद्धांतों का बीज फेंककर नाच उठेगा, इसका उत्तर सब जानते हैं। उसकी इच्छा अर्थ के क्षेत्र में जितनी मुक्त है, वह श्रोताओं की इच्छा का उतना ही अधिक बंदी है।
जिस दरिद्र समाज ने इस व्यावसायिक आस्था के संबंध में मुझे नास्तिक बना दिया, उसे अब तक मेरी ओर से धन्यवाद भी नहीं मिल सका।
जब ठकुरी बाबा और उनके साथी वसंतपंचमी का स्नान करके चले गए, तब जीवन में पहली बार मुझे कोलाहल का अभाव अखरा। तब से अनेक माघ- मेलों में मैंने उन्हें देखा है। कितनी ही बार नाव पर या तट पर उनकी भगत का आयोजन हुआ, कितनी बार उन्होंने खिचड़ी, बाजरे के पुए आदि व्यंजनों से मेरा सत्कार किया और कितनी ही बार अपने जीवन का आख्यान सुनाया।
मैंने उनसे अधिक सहृदय व्यक्ति कम देखे हैं। यदि यह वृद्ध यहाँ न होकर हमारे बीच में होता, तो कैसा होता, यह प्रश्न भी मेरे मन में अनेक बार उठ चुका है; पर जीवन के अध्ययन ने मुझे बता दिया है कि इन दोनों समाजों का अंतर मिटा सकना सहज नहीं। उनका बाह्य जीवन दीन है और हमारा अंतर्जीवन रिक्त। उस समाज में विकृतियाँ व्यक्तिगत हैं; पर सद्भाव सामूहिक रहते हैं। इसके विपरीत हमारी दुर्बलताएँ समष्टिगत हैं; पर शक्ति वैयक्तिक मिलेगी ।
ठकुरी बाबा अपने समाज के प्रतिनिधि हैं, इसी से उनकी सहायता वैयक्तिक विचित्रता न होकर ग्रामीण जीवन में व्याप्त सहृदयता को व्यक्त करती है। हमारे समाज में उनकी दो ही स्थितियाँ संभव थीं। यदि उनमें दुर्बलताओं का प्राधान्य होता, तो वे इस समाज का प्रतिनिधित्व करते और यदि शक्ति का प्राधान्य होता, तो अपवाद की कोटि में आ जाते।
इधर दो वर्ष से ठकुरी बाबा माघ मेले में नहीं आ रहे हैं। कभी-कभी इच्छा होती है कि सैदपुर जाकर खोज करूँ, क्योंकि वहाँ से 33 मील पर उनका गाँव है। उनके कुछ पद मैंने लिख रखे हैं, जिन्हें मैं अन्य ग्रामगीतों के साथ प्रकाशित करने की इच्छा रखती हूँ। यदि ठकुरी बाबा से भेंट हो तो यह संग्रह और भी अच्छा हो सकेगा।
‘यदि भेंट न हो’ यह प्रश्न हृदय के किसी कोने में उठता है अवश्य, पर मैं उसे आगे बढ़ने नहीं देती। ठकुरी बाबा जैसे व्यक्ति कहीं अपनी धरती का मोह छोड़ सकते हैं।
पिछली बार जब वे आए थे, तब कुछ शिथिल जान पड़ते थे। हाथ दृढ़ता के साथ चिकारा थामता था; पर उँगलियाँ तार के साथ काँपती थीं। पैर विश्वास के साथ पृथ्वी पर पड़ते थे; पर पिंडलियों की थरथराहट गति को डगमग कर देती थी। कंठ में पहले जैसा ही लोच था; पर कफ की घरघराहट उसे बेसुरा बनाती रहती थी। आँखों में ममता का वही आलोक था; पर समय ने अपनी छाया डालकर उसे धुंधला कर दिया था। मुख पर वैसी ही उन्मुक्त हँसी का भाव था; पर मानो धीरे-धीरे साथ छोड़ने वाले दाँतों को याद रखने के लिए ओठों ने अपने ऊपर स्मृति की रेखाएँ खींच ली थीं।
व्यक्ति समय के सामने कितना विवश है। समय को स्वीकृति देने के लिए भी शरीर को कितना मूल्य देना पड़ता है।
तब ठकुरी बाबा की मौसी विदा ले चुकी थीं। उनकी उपस्थिति ठकुरी बाबा के लिए इतनी स्वाभाविक हो गई थी कि अभाव की अस्वाभाविकता ने उन्हें एकदम चकित कर दिया होगा। एक बार भी उनके परिचय की सीमा में आ जाने वाला व्यक्ति ठकुरी बाबा का आत्मीय बन जाता है, तब जो इतने वर्षों तक आत्मीय रहा हो, उसके महत्त्व के संबंध में क्या कहा जावे। मौसी के अभाव ने ठकुरी बाबा के हृदय में एक और चिंता भी जगा दी हो तो आश्चर्य नहीं। ऐसे ही एक दिन उनका अभाव बेला को सहना पड़ेगा और तब वह किस प्रकार जीवन की व्यवस्था करेगी, यही सोचना स्वाभाविक कहा जाएगा; पर वे अपनी चिंता को व्यक्त कम होने देते थे ।
उनके स्वास्थ्य के संबंध में प्रश्न करने पर उत्तर मिला- ‘अब चला चली कै बिरिया नियराय आई है बिटिया रानी ! पाके पातन की भली चलाई। जौन दिन झरि जाएँ तौन दिन सही।’
मैंने हँसी में कहा- ‘तुम स्वर्ग में कैसे रह सकोगे बाबा ! वहाँ तो न कोई तुम्हारे कूट पद और उलटबांसियाँ समझेगा और न आल्हा ऊदल की कथा सुनेगा। स्वर्ग के गंधर्व और अप्सराओं में तुम कुछ न जँचोगे ।’
ठकुरी बाबा का मन प्रसन्न हो आया। कहने लगे- ‘सो तो हम जानित है बिटिया ! हम उहाँ अस सोर मचाउब कि भगवानजी पुन धरती पै ढनकाय देहैं। हम फिर धान रोपब, कियारी बनाउब, चिकारा बजाउब और तुम पचै का आल्हा ऊदल की कथा सुनाउब। सरग हमका ना चही, मुदा हम दूसर नवा सरीर माँगे बरे जाब तौ जरूर। ई ससुर बनाय के जरजर हुइगा’- और वे गा उठे-
‘चलत प्रान काया काहे रोई राम।’
उस कल्पवास की पुनरावृत्ति न हो सकी। संभव है, वे नया शरीर माँगने चले गए हों; पर धरती से उनका प्रेम इतना सच्चा, जीवन से उनका संबंध ऐसा अटूट है कि उनका कहीं और रहना संभव ही नहीं जान पड़ता। अथर्व के जो गायक अपने-आपको धरती का पुत्र कहते थे, ठकुरी बाबा उन्हीं के सजातीय कहे जा सकते हैं। इनके लिए जीवन धरती का वरदान, काव्य उसके सौंदर्य की अनुभूति, प्रेम उसके आकर्षण की गति और शक्ति उसकी प्रेरणा का नाम है। ऐसे व्यक्ति मुक्ति की ऊँची-से-ऊँची कल्पना को दूध में खिले नीचे से नीचे फूल पर न्यौछावर कर दें, तो आश्चर्य नहीं ।
ठकुरी बाबा की कथा लिखते-लिखते रात ढल गई जाती हुई चाँदनी के पीछे आता हुआ प्रभात का धूमिल आभास ऐसा लगता है, मानो उसी की छाया हो ।
किसी अलक्ष्य महाकवि के प्रथम जागरण- छंद के समान पक्षियों का कलरव नींद की निस्तब्धता पर फैल रहा है। रात की गहरी निस्पंद नींद से जागे हुए वृक्षों के दीर्घ निश्वास के समान समीर बह रही है। और ऐसे समय में मेरी स्मृति ने मुझे भी किसी अतीतकाल के प्रभात में जगा दिया है। जान पड़ता है ठकुरी बाबा गंगा तट पर बैठकर तन्मय भाव से प्रभाती गा रहे हैं- ‘जागिए कृपानिधान पंछी बन बोले।’
अपनी प्रभाती से वे किसे जगाते हैं, यह कहना कठिन है।
जय हिंद